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पति में जोश जगाने का तरीका नौकरानी से सिखा

अगस्त 12, 2026 by hamari Leave a Comment

Wife Pyasi Chut

नए शहर की वो पहली शाम थोड़ी भीगी हुई और शांत थी। शीला अपने पति के साथ इस विशाल सरकारी आवास में कदम रख रही थी। शीला, जिसका स्वभाव जितना शालीन और गंभीर था, उसकी सुराहीदार गर्दन और तीखे नैन-नक्श उतने ही कातिलाना थे—एक ऐसा विरोधाभास जो किसी को भी बांध ले। Wife Pyasi Chut

घर का कोना-कोना करीने से सजाया जा चुका था। शीला के पति, जो एक ऊंचे सरकारी पद पर थे, स्वभाव से जितने रोबीले थे, शीला के सामने उतने ही पिघल जाते थे। उस बड़े, आलीशान बंगले के सन्नाटे में अब सिर्फ वे दोनों थे। बाहर पत्तों की सरसराहट थी और भीतर, एक-दूसरे की सांसों की धीमी गूंज, जिसने बिना कुछ कहे ही हवा में एक अनकहा सा तनाव घोल दिया था।

उनकी शादी को अभी कुछ ही महीने हुए थे, और वे हाल ही में अपने हनीमून से लौटे थे। बाहर से देखने वालों के लिए वे एक आदर्श जोड़ा थे, लेकिन उस बड़े सरकारी बंगले की चारदीवारी के भीतर एक अजीब सी खामोशी पसरी रहती थी। शीला, जिसका यौवन इस समय अपने पूरे शबाब पर था, अंदर ही अंदर किसी बुझती हुई शमआ की तरह ढल रही थी।

उसका अंग-अंग आकर्षण से भरा था, उसकी त्वचा में एक मखमली अहसास था, लेकिन उसकी आँखों में एक गहरी मायूसी थी। वह अपने पति से दूर, एक अनकहे दुख में डूबी रहती थी। उसका वह भरा-पूरा यौवन, जो किसी की भी बांहों में पिघलने को बेताब था, अब तक अपने ही पति के स्पर्श के लिए तरस रहा था।

वह अपने इस रूप का रस अपने जीवनसाथी को नहीं चखा पाई थी, और यही अधूरी तड़प इस आलीशान घर के सन्नाटे को और अधिक भारी बना रही थी। उस विशाल सरकारी बंगले के सन्नाटे को तोड़ने के लिए वहाँ एक और दंपत्ति मौजूद था—संतोष और उसकी पत्नी नंदिनी।

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वे दोनों बंगले की देखरेख और सेवा के लिए तैनात थे। शीला और उसके पति के बीच पसरी खामोशी के विपरीत, संतोष और नंदिनी का रिश्ता जिंदादिली और आपसी तालमेल से भरा था। वे बेहद खुशमिजाज थे और पूरे दिल से साहब और मेमसाहब की सेवा में लगे रहते थे।

रसोई से आती नंदिनी की चूड़ियों की खनक और काम के बहाने संतोष का उसके पास जाकर धीरे से मुस्कुरा देना, बंगले की हवाओं में एक अलग ही रंग घोल देता था। उन दोनों की इस सहज नजदीकी और आपसी प्रेम को देखकर, शीला के भीतर की तड़प और गहरी हो जाती।

जब भी वह संतोष और नंदिनी को एक-दूसरे के प्रति समर्पित देखती, उसे अपने सूनेपन का अहसास और ज्यादा सताने लगता कि उसका अपना भरपूर यौवन इस बंद कमरे में क्यों दम तोड़ रहा है। दोपहर का वक्त था। बंगले के बड़े से बरामदे में हल्की धूप छनकर आ रही थी।

शीला अकेली बैठी चाय की चुस्कियां ले रही थी, लेकिन उसका ध्यान चाय के स्वाद से ज्यादा अपनी जिंदगी के खालीपन पर था। तभी नंदिनी हाथ में पीतल का एक थाल लिए वहां आई। उसके चेहरे पर एक गजब की लालिमा थी, और उसकी सूती साड़ी से मोगरे के गजरे की हल्की, सोंधी सी खुशबू आ रही थी।

“मेमसाहब, आपके लिए गरम-गरम समोसे बनाए हैं, साहब तो दफ्तर में होंगे, सोचा आपको दे आऊं,” नंदिनी ने अपनी खनकती आवाज में कहा। उसकी कलाई की कांच की चूड़ियाँ एक-दूसरे से टकराईं। शीला ने उसकी तरफ देखा। नंदिनी के गले में चमकता मंगलसूत्र और उसकी मांग का गाढ़ा सिंदूर गवाही दे रहा था कि वह अपनी गृहस्थी में कितनी तृप्त है।

शीला ने एक फीकी मुस्कान के साथ कहा, “तुम और संतोष हमेशा इतने खुश कैसे रहते हो, नंदिनी? जैसे जिंदगी में कोई शिकायत ही न हो।”

नंदिनी थोड़ा झेंपी, फिर उसकी आंखें चमक उठीं। उसने अपनी साड़ी का पल्लू संभालते हुए धीरे से कहा, “मेमसाहब, संतोष जी भले ही सीधे-साधे हैं, पर मेरा मन बहुत अच्छे से जानते हैं। दिनभर की थकान के बाद जब वो रात को अपनी बांहों में समेटते हैं ना… तो सारी दुनिया का दुख भूल जाती हूँ। बस, उनका वो प्यार से छूना ही मेरी सबसे बड़ी दौलत है।”

नंदिनी की बातें शीला के कानों में पिघले हुए सीसे की तरह उतरीं। ‘प्यार से छूना’… यह एक ऐसा अहसास था जिसके लिए शीला की मखमली त्वचा महीनों से तरस रही थी। उसके जेहन में अपने बेडरूम की वो ठंडी, खामोश रातें तैर गईं, जहां उसका पति पीठ फेरकर सो जाता था।

शीला की सांसें थोड़ी भारी हो गईं, और उसने अपनी रेशमी उंगलियों से अपनी ही बांह को अनजाने में कसकर भींच लिया, जैसे वह उस छुअन को खुद महसूस करना चाहती हो जो उसे कभी मिली ही नहीं। शीला की आंखों में तैर आई नमी को देखकर नंदिनी की चंचलता अचानक चिंता में बदल गई, “क्या हुआ मेमसाहब? मैंने कुछ गलत कह दिया क्या?”

रात के करीब ग्यारह बज रहे थे। बाहर सरकारी बंगले के ऊंचे पेड़ों पर हवाएं अजीब सी सरसराहट पैदा कर रही थीं। शीला बेडरूम के मखमली बिस्तर पर बैठी थी, पर उसका मन दोपहर की नंदिनी की बातों में ही उलझा हुआ था। उसी वक्त दरवाजा खुला और उसका पति, भारी कदमों से कमरे के भीतर दाखिल हुआ। ये कहानी आप हमारी वासना डॉट नेट पर पढ़ रहे है.

उसने हमेशा की तरह अपनी सरकारी फाइलें मेज पर रखीं और बिना शीला की तरफ देखे अपनी शर्ट के बटन खोलने लगा। आज शीला चुप नहीं रहने वाली थी। नंदिनी की बातों ने उसकी रगों में मचलते हुए खून को एक अजीब सी बगावत की आग में बदल दिया था।

वह उठी और अपने रेशमी नाइटगाउन को संभालती हुई सीधे उसके सामने जाकर खड़ी हो गई। उसकी साँसों की गर्माहट और उसके बदन से उठती तेज खुशबू हवा में तैर रही थी। शीला ने उसकी आँखों में आँखें डालकर, बहुत ही धीमी लेकिन कांपती हुई आवाज़ में कहा, “कब तक? कब तक हम इस खामोशी का ढोंग करते रहेंगे? क्या इस आलीशान बंगले और इस मखमली बिस्तर की कीमत मेरा यह तड़पता हुआ यौवन है?”

उसका पति सहम गया। उसकी नजरें झुक गईं। वह पुरुष, जो बाहर दुनिया के सामने एक रोबीला सरकारी अफसर था, इस बंद कमरे में अपनी पत्नी के उठते हुए सवालों के सामने बिल्कुल बौना नजर आ रहा था। उसने नजरें चुराते हुए रूंधे गले से कहा, “शीला… तुम जानती हो सब कुछ… मैं… मैं बेबस हूँ। यह सरकारी रुतबा और दौलत ही है जो मैं तुम्हें दे सकता हूँ।”

शीला ने एक कदम और आगे बढ़ाया, उसका सुगठित बदन उसके पति की छाती से छूने लगा। उसने अपने नाइटगाउन की डोरी को धीरे से ढीला किया, जिससे उसके कंधों से रेशमी कपड़ा सरक गया और उसके भरे हुए स्तनों का उभार मद्धम रोशनी में चमक उठा।

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उसने अपने पति का हाथ पकड़कर जबरन अपनी गर्म और मखमली कमर पर रखा और फुसफुसाकर कहा, “मुझे तुम्हारी ये फाइलें और रुतबा नहीं चाहिए! मुझे देखो… क्या मेरी इस मखमली त्वचा को तुम्हारी इन सूखी फाइलों के लिए सजाया गया है? मेरे इस अंग-अंग में जो आग सुलग रही है, उसकी तड़प तुम्हें महसूस नहीं होती? मुझे इस बिस्तर पर एक अफसर नहीं, एक मर्द चाहिए जो मेरे इस कातिलाना यौवन को बेरहमी से भींचे, मेरी प्यास बुझाए।”

पति का हाथ उसकी रेशमी त्वचा के स्पर्श से कांप उठा, लेकिन उसके भीतर की लाचारी और गहरी हो गई। जवानी के दिनों की कुछ ऐसी गलतियाँ थीं, जिन्होंने आज उसे भीतर से पूरी तरह खोखला और नपुंसक बना दिया था। वह शीला की आँखों में छिपी प्यास और इस खुली माँग को देख तो सकता था, लेकिन उसे बुझाने की कूवत खो चुका था।

उसने कंपकपाते होंठों से कहा, “शीला, मत करो ऐसा… मेरा वजूद अंदर से मर चुका है। तुम्हारा यह रूप, ये उभरे हुए बदन की खुशबू मुझे अंदर तक जलाती है, पर मैं तुम्हें वो सुख देने के काबिल ही नहीं हूँ। मैं चाहकर भी इस जवानी का रस नहीं पी सकता।”

शीला की आँखों से एक आंसू टपक कर उसके पति की कलाई पर गिरा, जहाँ उसकी सांसें और तेज हो गईं। कमरे की ठंडी रोशनी में उन दोनों के बीच की दूरी और बढ़ गई—एक तरफ इच्छाओं का उग्र उफान था जो बगावत पर आमादा था, और दूसरी तरफ एक ऐसा कड़वा सच, जिसने इस शादी की बुनियाद को ही हिलाकर रख दिया था।

कमरे की मद्धम रोशनी में पति ने अपने हाथ कांपते हुए अपनी जेब से वो नीली टैबलेट निकाली। उसने उसे पानी के साथ निगला—वह एक आखिरी कोशिश थी, अपनी मर्दानगी और शीला के प्रति अपने कर्तव्यों को साबित करने की। कुछ ही देर में, उन दवाओं का असर उसके रगों में दौड़ने लगा।

उसके भीतर का जो खोखलापन था, वह एक क्षणिक लेकिन तीव्र उबाल में बदल गया। उसकी आँखें लाल होने लगीं और साँसों की रफ्तार अचानक बढ़ गई। वह एक शिकारी की तरह शीला की ओर बढ़ा। जैसे ही उसने शीला के बदन को छुआ, उसका स्पर्श पहले से कहीं अधिक गरम और आक्रामक था।

उसने शीला की आँखों में देखते हुए भारी और गुर्राती हुई आवाज़ में कहा, “बहुत तड़पाया है न मैंने तुम्हें? बहुत तरसाया है न इस बदन को? आज… आज इस मर्द का असली रूप देखो, शीला। आज तुम्हारी इस सुलगती हुई जवानी को मैं अपने भीतर सोख लूँगा।”

उसकी उंगलियाँ, जो अब दवा के असर से बेताब हो रही थीं, सीधे शीला के उभारों—उसके सुडौल और भरे हुए स्तनों पर जा टिकीं। वह उन्हें इस तरह से मरोड़ने और दबाने लगा मानो वह उसके पूरे अस्तित्व को अपने वश में कर लेना चाहता हो। उसने शीला के स्तनों को अपनी हथेलियों में कसते हुए फुसफुसाया, “कितने भरे हुए हैं ये… कितने गरम हैं। आज इन्हें मसलकर मैं अपनी सारी कसर पूरी कर दूँगा।”

शीला, जो अब तक सन्नाटे और मायूसी की बर्फ में जमी हुई थी, इस अचानक मिले उग्र स्पर्श से पूरी तरह पिघलने लगी। उन स्तनों पर उसका हाथ पड़ते ही शीला के गले से एक दबी हुई गहरी सिसकी निकली। उसकी कमर का निचला हिस्सा एक झटके के साथ धनुष की तरह ऊपर की ओर तन गया। ये कहानी आप हमारी वासना डॉट नेट पर पढ़ रहे है.

उसने अपने पति की छाती पर अपने दोनों हाथ टिकाए, उसकी उँगलियों का दबाव महसूस करते हुए बेबाकी से कहा, “हाँ… और ज़ोर से मसलो इन्हें! इन्हें अपनी उंगलियों से नोंच लो… महीनों से तरस रही हूँ इस दर्द के लिए। आज रुकना मत… मुझे अपनी मर्दानगी की आग में पूरी तरह भस्म कर दो!”

वह ‘मदहोशी’ जो अब तक केवल उसके ख्वाबों में थी, अब हकीकत बनकर उसके रोम-रोम में दौड़ रही थी। उसके पति की सांसें तेज और गर्म हो गई थीं, जो शीला की गर्दन के पास आकर टकरा रही थीं। उसने शीला की गर्दन पर अपने होंठ गड़ाते हुए कहा, “आज चीखने के लिए तैयार रहो शीला… आज तुम्हारी इस गीली प्यास को मैं ऐसा बुझाऊँगा कि तुम अपनी सुध-बुध खो बैठोगी।”

शीला की आँखें आधी बंद थीं, उसके होंठ हल्के से खुले थे, और उसका पूरा शरीर एक ऐसी भूख से भर गया था जो महीनों के उपवास के बाद जाग उठी थी। उसने अपनी टांगों को हल्का सा फैलाते हुए मदहोश आवाज़ में कहा, “मुझे कुछ नहीं सुनना… बस मुझे पूरी तरह से बर्बाद कर दो। अपनी इस गर्मी से मेरी योनि की आग को शांत कर दो, मेरे राजा!”

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उसे अब यह परवाह नहीं थी कि यह स्पर्श दवा के असर से है या असली प्यार से; उसे सिर्फ अपनी त्वचा पर उन उंगलियों की जलन और उस दबी हुई तड़प को मिटाने का अहसास चाहिए था। उस पल में, बंगले की पुरानी खामोशी दोनों की बेहद कामुक, उग्र और तेज आहों में बदल गई

कमरे का तापमान जैसे अचानक कई डिग्री बढ़ गया था। शीला की सांसों की रफ्तार इतनी तेज हो चुकी थी कि उसकी छाती का उतार-चढ़ाव साफ देखा जा सकता था। वह पूरी तरह से कामुकता के उस भंवर में डूब चुकी थी, जहाँ सही और गलत का अंतर मिट जाता है।

अपने पति की उंगलियों की गरमी महसूस करते हुए, उसने खुद आगे बढ़कर उसके हाथों को अपने स्तनों पर कसकर भींच लिया। वह चाहती थी कि वे उंगलियाँ उसके चूचकों को और जोर से मसले, उस मीठे दर्द को उसके रोम-रोम में उतार दे जिसके लिए वह महीनों से तड़प रही थी।

शीला ने अपनी आँखें खोलकर उसके चेहरे को देखा और हांफते हुए उत्तेजक लहजे में कहा, “हाँ… ऐसे ही… अपनी उंगलियों से इन चूचकों को कुचल दो! इन्हें तब तक मरोड़ो जब तक कि मेरी चीखें इस पूरे बंगले में न गूंज जाएं। अपनी इस मर्दानगी की पूरी ताकत झोंक दो मुझमें!”

दवाइयों के असर और शीला के इस बेबाक रूप ने उसके पति के भीतर भी एक अजीब सा जूनून भर दिया था। दोनों के जिस्म एक-दूसरे में सिमटते चले गए। जब उसका पति पूरी तरह उसके ऊपर झुका, तो दोनों के सबसे संवेदनशील हिस्से एक-दूसरे के संपर्क में आए। शीला ने अपनी आँखें कसकर बंद कर लीं।

जैसे ही उसकी योनि का उसके कड़े लिंग से घर्षण शुरू हुआ, शीला के बदन में बिजली की एक लहर कौंध गई। उस तीव्र रगड़ और बढ़ती हुई आंच ने शीला के भीतर कामुक रस का झरना बहा दिया था; उसकी योनि पूरी तरह से गीली और मखमली हो चुकी थी, जो किसी भी क्षण उस चरम सुख को पाने के लिए पूरी तरह तैयार थी।

उसका पति इस कामुक घर्षण से पागल हो उठा। उसने शीला के कानों के पास अपनी भारी, कामुक आवाज़ में फुसफुसाते हुए कहा, “देखो शीला… तुम्हारी यह मखमली योनि कितनी गर्म हो चुकी है। इसका पानी मेरे लिंग को छू रहा है… यह मुझे पागल कर रहा है। आज मैं इसके भीतर तब तक गहरे प्रहार करूँगा, जब तक कि तुम पूरी तरह से निढाल न हो जाओ।”

शीला ने अपनी आँखें खोलीं, जिनमें इस समय केवल और केवल जूनून का सैलाब था। उसने अपनी दोनों बाहें अपने पति के गले में डाल दीं और अपनी रसीली उंगलियों से उसके बालों को कसकर भींच लिया। उसने अपने होंठों को उसके होंठों पर टिका दिया—एक ऐसा चुंबन जिसमें तड़प भी थी, भूख भी थी और महीनों का सूखा भी। दोनों की जीभ आपस में किसी नाग-नागिन की तरह उलझ गईं। ये कहानी आप हमारी वासना डॉट नेट पर पढ़ रहे है.

उस मदहोश कर देने वाले चुंबन के बीच ही उसने अपने होंठों को जरा सा अलग किया और अपनी कांपती, बेहद भड़काऊ और भारी आवाज़ में सीधे उसके कान के पास फुसफुसाया, “चोदो मेरे राजा… मुझे बेरहमी से चोदो! अपने इस कड़े और गर्म औजार को मेरी योनि की गहराइयों में उतार दो। यह जवानी, यह बदन सिर्फ और सिर्फ तुम्हारे लिए है… मेरे इस प्यासे शरीर की भूख को आज अपनी पूरी ताकत से मिटा दो, मुझे फाड़ कर रख दो, पर मुझे पूरी तरह अपना बना लो!”

शीला के इन जोशीले और तीखे शब्दों ने उसके पति को पूरी तरह एक जानवर की तरह उत्तेजित कर दिया, और उसने एक गहरे और उग्र प्रहार के लिए अपनी कमर को पीछे खींचा। शीला के इन शब्दों ने आग में घी का काम किया। अपने भीतर उठते हुए उस चरम वेग को संभालने के लिए, शीला ने अपनी दोनों मखमली टांगों को ऊपर उठाया और उन्हें अपने पति की पीठ पर ले जाकर कस लिया।

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उसने अपने पूरे वजूद को उसके नीचे इस तरह जकड़ लिया कि उनके बीच हवा का गुजरना भी नामुमकिन हो गया। उसकी गीली और तैयार योनि अब उस अंतिम और गहरे प्रहार के लिए पूरी तरह से व्याकुल थी, जो उसे इस तड़प से आज़ाद कर सके।

शीला ने अपनी जांघों को उसके जिस्म पर और कसते हुए बेबाकी से कहा, “अब और मत तरसाओ मेरे राजा… अपनी पूरी ताकत से इस मखमली गुफा को चीरते हुए भीतर आ जाओ। देखो, मेरी योनि का पानी बह-बह कर तुम्हारी जांघों को छू रहा है। इसे अब और बर्दाश्त नहीं होता, मुझे पूरा का पूरा निगल जाओ!”

शीला के उस बेबाक आमंत्रण ने उसके पति के भीतर सोए हुए पुरुषत्व को जैसे पूरी तरह जगा दिया था। दवाओं की गर्मी और शीला के बदन की खुशबू ने उसे पूरी तरह से उन्मादी बना दिया था। वह बिना एक पल गंवाए शीला की जांघों के बीच झुका और एक अतृप्त शिकारी की तरह उसकी योनि से रिसते हुए काम-रस का पान करने लगा।

उसने शीला के नितंबों को ऊपर उठाते हुए कहा, “कितना मीठा और गर्म रस निकल रहा है तुम्हारी इस जवानी से, शीला… आज मैं इसका एक-एक कतरा पी जाऊँगा। तुम्हारी इस प्यासी योनि को आज अपनी जीभ से ऐसा मसलूँगा कि तुम होश खो बैठोगी।”

उसकी जीभ के हर एक उग्र स्पर्श पर शीला का पूरा बदन बिस्तर पर छटपटा उठता, उसकी उंगलियाँ चादर को कसकर भींच लेतीं। उसने अपनी गर्दन पीछे की ओर मोड़ते हुए ऊँची सिसकारी भरी, “आह्ह्ह… हाँ… वहीं… अपनी जीभ को और गहरे डालो… चूस लो मेरी इस जवानी के पानी को… उफ्फ, मैं मर जाऊँगी राजा… और तेज़ करो!”

लेकिन यह भूख इतनी आसानी से शांत होने वाली नहीं थी। अपनी स्थिति बदलते हुए, वह शीला के चेहरे के ऊपर आया। उत्तेजना के इस चरम क्षण में, उसने अपना सख्त होता हुआ लिंग सीधे शीला के खुले हुए होंठों के बीच उतार दिया। उसने हाँफते हुए शीला के बालों को खींचा और उग्रता से कहा, “लो… अब इस लोहे जैसे कड़े अंग का स्वाद चखो। अपने इस रसीले मुंह में इसे पूरा निगल जाओ और मेरी इस सांड जैसी गर्मी को शांत करो!”

शीला ने बिना किसी हिचकिचाहट के उस गर्म, कड़े और नस-नस से फड़कते हुए अंग को अपने मुंह के भीतर समा लिया। उस स्पर्श, उस स्वाद और उस अनूठे अहसास ने शीला के मन और मस्तिष्क को पूरी तरह से सुन्न कर दिया था। वह अपने मुंह की सिक्त गहराई से उसे सुख देने लगी, मानो दोनों सदियों के भूखे मुसाफिर थे जो आज इस आलीशान बंगले के बंद कमरे में एक-दूसरे को पूरी तरह से निचोड़ लेना चाहते थे।

उसके मुंह के भीतर जाते ही पति के मुंह से एक गहरी आह निकली, “ओह्ह शीला… तुम्हारा मुंह कितना गर्म और मखमली है… ऐसे ही आगे-पीछे करो… अपनी जीभ इस पर रगड़ो… आज इस सुख से मुझे पागल कर दो!” शीला इस समय पूरी तरह से कामुकता के वशीभूत थी।

उसने अपने दोनों हाथों से उसके कड़े लिंग को थामा और अपने मुंह के भीतर उसे गहराई से लेते हुए आगे-पीछे करने लगी। उसके होंठों और जीभ की मखमली छुअन ने उस अंग को और अधिक उत्तेजित कर दिया। इस बेकाबू कर देने वाले सुख के आवेग में शीला इतनी खो गई कि कभी-कभी उत्तेजना के अतिरेक में उसके तीखे दांत हल्के से उस पर गड़ जाते।

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दांतों की उस हल्की सी छुअन पर उसके पति के मुंह से एक कराह निकली, “उफ़्फ़… शीला… धीरे… मरे जा रहा हूँ मैं! तुम्हारे मुंह की यह गर्मी और ये दांत… मुझे पागल कर देंगे। ऐसे ही चूसती रहो… मेरा सब कुछ निकलने वाला है!” उस मीठे और तीखे दर्द ने उसके पति के पूरे शरीर में बिजली का एक ऐसा झटका दिया जिससे उसकी रीढ़ की हड्डी तक कांप उठी।

वह दर्द और चरम सुख का ऐसा मिला-जुला सैलाब था जिसे वह ज्यादा देर संभाल नहीं पाया। दवाओं के असर और शीला के इस जानलेवा अंदाज़ के कारण उसका बांध पूरी तरह टूट गया। एक गहरी, दबी हुई चीख के साथ उसका पूरा वीर्य गर्म फुहार बनकर शीला के मुंह के भीतर समा गया। ये कहानी आप हमारी वासना डॉट नेट पर पढ़ रहे है.

उसने शीला के सिर को अपने हाथों से भींचते हुए चिल्लाकर कहा, “आह्ह्ह… लो शीला… पी जाओ मेरी इस मर्दानगी का पूरा रस… सब कुछ तुम्हारा है… उफ़्फ़, मैं ख़त्म हो गया!” उस अंतिम प्रहार के बाद, वह पुरुष जो कुछ देर पहले तक पूरे जोश में था, अचानक अपनी सारी ऊर्जा खो बैठा।

उसका शरीर पूरी तरह से ढीला पड़ गया और वह बेदम होकर शीला के बगल में मखमली बिस्तर पर निढाल हो गया। कमरे में अब सिर्फ उन दोनों की भारी और तेज चलती सांसों की आवाजें गूंज रही थीं। उसका पति तो निढाल होकर बिस्तर पर सीधा लेट चुका था, लेकिन शीला के भीतर की आग अभी भी पूरी तरह सुलग रही थी।

उसका अंग-अंग अभी भी उस अंतिम तृप्ति के लिए तड़प रहा था, जो उसे नहीं मिल पाई थी। अपनी इस अधूरी भूख को शांत करने के लिए वह एक पल भी और रुकने के मूड में नहीं थी। उसने अपने बिखरे हुए बालों को पीछे झटका और बिस्तर पर घुटनों के बल आ गई।

उसने नीचे लेटे हुए अपने पति के चेहरे की तरफ देखा, जो थक कर आँखें बंद किए हुए था। शीला ने बिना कोई संकोच किए, अपने दोनों हाथों से उसके सिर के बालों को मजबूती से भींच लिया। उस मजबूत पकड़ के साथ, उसने अपनी कमर को आगे बढ़ाया और अपनी पूरी तरह से गीली, काम-रस से सराबोर योनि को सीधे उसके मुंह और होंठों के ऊपर लाकर रख दिया।

शीला का यह रूप पूरी तरह से अप्रत्याशित और हावी होने वाला था। उसने अपने बालों को और ज़ोर से खींचते हुए, बेहद उग्र और भड़काऊ आवाज़ में कहा, “तुम इतनी जल्दी हार नहीं मान सकते मेरे राजा! तुम्हारा काम तो पूरा हो गया, लेकिन मेरी इस योनि की भूख का क्या? देखो यह कैसे तड़प रही है… इसका पानी अभी भी बह रहा है। खोलो अपना मुंह… और चाटो अपनी इस रानी के रस को! जो काम अधूरा छूटा है, उसे अपनी जीभ से पूरा करो!”

उसने अपने बालों की पकड़ को और कसते हुए अपनी योनि के गर्म और मखमली हिस्से को उसके होठों पर रगड़ना शुरू किया, मानो वह आदेश दे रही हो कि जो काम अधूरा रह गया है, उसे चूसकर और चाटकर पूरा किया जाए। उसका पति इस उग्रता से हक्का-बक्का रह गया, पर उसकी योनि की तीखी और नम महक ने उसके बंद हो चुके होश को एक बार फिर जगा दिया।

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उसने नीचे से शीला की कमर को थामते हुए अपनी भारी आवाज़ में कहा, “ओह्ह शीला… तुम तो पूरी तरह डायन बन चुकी हो आज… लो, मैं चाटूंगा तुम्हारी इस जवानी के एक-एक कतरे को।” उस तीखी और नम महक ने बंद कमरे के सन्नाटे में एक बार फिर से वासना का नया चक्रव्यूह रच दिया था, जहाँ शीला अपनी तृप्ति के लिए किसी भी हद तक जाने को बेताब थी।

शीला के इस बेबाक और उग्र रूप ने उसके पति के भीतर थके हुए पुरुष को जैसे एक बार फिर चुनौती दे दी थी। दवाओं के असर से उसका शरीर भले ही ढीला पड़ रहा था, लेकिन अपनी पत्नी की इस बेकाबू भूख और उसके इस हावी होते अंदाज ने उसके भीतर एक नई, उग्र प्रतिक्रिया को जन्म दिया।

उसने शीला की इस पकड़ का विरोध नहीं किया, बल्कि उसके इस समर्पण को देखकर उसका अपना जूनून भी सातवें आसमान पर पहुँच गया। उसने शीला के नितंबों को ऊपर से कसकर भींचते हुए नीचे से दहाड़कर कहा, “अगर तुम्हारी आग ऐसी है शीला, तो आज मैं भी पीछे नहीं हटूगा! देखो… कैसे चाटता हूँ तुम्हें… तुम्हारी इस चीख को आज मैं अपने मुंह में दफन कर लूँगा!”

उसने अपने दोनों मजबूत हाथों से शीला के नितंबों को कसकर थामा और अपनी जीभ को उसकी पूरी तरह से गीली योनि की गहराइयों में उतार दिया। उसकी जीभ का हर एक प्रहार उग्र और तीव्र था, मानो वह शीला के रोम-रोम से उसका सारा रस निचोड़ लेना चाहता हो।

केवल जीभ ही नहीं, उसने अपनी उंगलियों को भी उस मखमली और संकीर्ण रास्ते में तेजी से आगे-पीछे करना शुरू कर दिया। उंगलियों की उस अंदरूनी हलचल और जीभ के तीखे स्पर्श ने मिलकर शीला के बदन में एक ऐसा भूचाल ला दिया कि वह जोर-जोर से सिसकने लगी।

उसकी पीठ धनुष की तरह तन गई और उसने उसके बालों को और जोर से भींच लिया। वह मदहोश होकर चिल्लाने लगी, “ओह्ह्ह राजा… हाँ… वहीं… उफ़्फ़, उँगलियों को और अंदर डालो… तुम्हारी जीभ मुझे मार डालेगी… मैं निकलने वाली हूँ… मुझे पूरी तरह निचोड़ लो!”

कुछ ही घड़ियों के इस तीव्र और तूफानी मिलन के बाद, शीला का पूरा बदन एक झटके के साथ काँप उठा। उसकी योनि से काम-रस का एक आखिरी फव्वारा छूटा, जिसने उसके पति के पूरे चेहरे को सराबोर कर दिया। उसका पति उसकी जांघों को चूमते हुए हांफने लगा, “देखो शीला… तुम्हारी इस जवानी का पानी मेरे पूरे चेहरे पर लगा है… तुम जीत गईं मेरी रानी…”

उस चरम आनंद को पाते ही शीला के भीतर महीनों से सुलग रही वह आग आखिरकार शांत हो गई। उसकी सांसें धीरे-धीरे धीमी पड़ने लगीं, आँखों का जूनून एक सुकून भरी थकावट में बदल गया और वह बेदम होकर अपने पति के सीने पर ढह गई। आलीशान सरकारी बंगले का वह कमरा, जो कभी खामोशी और मायूसी का गवाह था, अब दो तृप्त शरीरों की शांत साँसों से महक रहा था।

बिस्तर पर निढाल पड़े अपने पति के सीने से उठकर शीला ने उसकी आँखों में देखा, जिनमें अब लाचारी की जगह एक अजीब सा संतोष था। शीला के अपने होंठ और उसका पूरा चेहरा अभी भी उसके पति के उसी गाढ़े काम-रस से भीगा हुआ था, जिसे उसने कुछ पलों पहले अपने मुंह में समेटा था। उस रस का स्वाद और उसकी गर्माहट अभी भी शीला के जेहन पर हावी थी। ये कहानी आप हमारी वासना डॉट नेट पर पढ़ रहे है.

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उसने धीरे से अपनी उंगलियों से अपने पति की ठुड्डी को ऊपर उठाया। उसका पति उसे देखकर धीरे से मुस्कुराया और फुसफुसाया, “अब भी मन नहीं भरा क्या, मेरी जान?” शीला ने अपनी मदहोश और रसीली आँखों से उसकी तरफ देखा और बहुत ही धीमी आवाज़ में कहा, “यह रस सिर्फ मेरा नहीं है… यह तुम्हारी मर्दानगी की निशानी है। इसे हम दोनों को मिलकर पीना होगा।”

उसने सीधे उसके सूखे होंठों पर अपने रसीले होंठ टिका दिए। यह महज़ एक चुंबन नहीं था, बल्कि तृप्ति का एक अनोखा आदान-प्रदान था। शीला ने अपने मुंह के भीतर सहेज कर रखे उस वीर्य के अंश को, उस गाढ़े काम-रस को अपनी जीभ के सहारे धीरे-धीरे उसके मुंह के भीतर धकेलना शुरू कर दिया।

चुंबन की उस गहराई के बीच पति के गले से एक दबी हुई आह निकली, जब उसने अपनी ही गर्मी का स्वाद शीला की जीभ के ज़रिए अपने मुंह में महसूस किया। दोनों के होंठ आपस में इस तरह गुंथ गए कि उनके स्वादों और रसों का फासला पूरी तरह मिट गया।

अपने ही पुरुषत्व का वह रस, जो शीला के माध्यम से उसके अपने मुंह में वापस लौट रहा था, उसके पति के लिए एक ऐसा अहसास था जिसने उसे भीतर तक झकझोर दिया। इस गहरे, गीले और रसीले चुंबन ने उन दोनों के बीच के सारे संकोच, अतीत की गलतियों और शारीरिक कमियों को हमेशा के लिए उस मखमली बिस्तर पर पिघलाकर एक कर दिया।

दोनों एक-दूसरे की बाँहों में बंधे, रसों से सराबोर होकर अंततः गहरी और शांत नींद के आगोश में समा गए। रात का वह भयंकर तूफ़ान अब शांत हो चुका था, लेकिन बेडरूम की हवा में अभी भी काम-रस, पसीने और इत्र की मिली-जुली तीव्र गंध तैर रही थी।

शीला और उसका पति, दोनों ही कल रात के उस उन्माद से इस कदर थके थे कि उन्हें समय का अंदाज़ा ही नहीं रहा। दोनों मखमली चादरों से बेपरवाह, पूरी तरह से नग्न अवस्था में एक-दूसरे की बाहों में गुंथे सो रहे थे। शीला की सुडौल पीठ खुली थी और उसके पति का हाथ अभी भी शीला के नितंब पर कसा हुआ था।

सुबह के करीब आठ बज रहे थे। नंदिनी हमेशा की तरह चाय की ट्रे लेकर बेडरूम की तरफ आई। दरवाजा कल रात की बेताबी में ठीक से बंद नहीं हो पाया था, वह थोड़ा सा खुला रह गया था। जैसे ही नंदिनी ने हौसले से दरवाजा आगे धकेला, कमरे के भीतर का दृश्य देखकर उसके पैर वहीं जम गए।

ट्रे उसके हाथ में कांपने लगी। उसने देखा कि उसकी मालकिन शीला और साहब, बिना एक भी धागे के, आदिम रूप में बिस्तर पर बिखरे पड़े हैं। शीला के गोरे बदन पर और साहब के चेहरे पर सूखे हुए काम-रस के निशान सुबह की धूप में चमक रहे थे। उस पूरी तरह से नग्न और कामुक दृश्य ने नंदिनी के भीतर जैसे बिजली दौड़ा दी।

उसका अपना गाउन उसकी भारी होती सांसों से फूलने लगा, उसकी योनि में एक तीखी सरसराहट हुई और वह गहरी कामुकता से भर उठी। वह चाहकर भी अपनी आँखें उस नग्नता से हटा नहीं पा रही थी। उसने दबे पाँव दरवाज़ा बंद किया और अंदर ही अंदर एक मीठी तड़प लेकर लौट गई।

उसी दोपहर, जब बंगले में कोई नहीं था, शीला बरामदे में बैठी बाल सुखा रही थी। नंदिनी उसके पास आई और उसकी आँखों में देखते हुए शरारत भरी मुस्कान के साथ बोली, “मालकिन, आजकल चेहरे पर बड़ी रौनक है। सरकारी बंगले की खामोशी जैसे रातों-रात गायब हो गई है।”

शीला का चेहरा शर्म और उत्तेजना से लाल हो गया। उसने नंदिनी का हाथ पकड़कर उसे अपने पास बिठाया और धीमी आवाज़ में कहा, “सब तेरी ही बातों का असर है नंदिनी… कल तूने जो आग लगाई, उसने मुझे बगावत करने पर मजबूर कर दिया। पर… पर साहब ने कल रात कुछ दवाइयाँ खाई थीं। वह रात तो अद्भुत थी, पर मैं डरती हूँ कि क्या यह सुख हमेशा ऐसा ही रहेगा?”

नंदिनी ने मुस्कुराते हुए शीला के उभरे हुए स्तनों की तरफ देखा और कहा, “मालकिन, मर्द को वश में करने के लिए सिर्फ दवाओं की जरूरत नहीं होती। असली जादू औरत के बदन के पैंतरे और उसकी काम-कला में होता है। अगर आप सही तरीके सीख लें, तो साहब बिना दवा के भी आपके सामने घुटने टेक देंगे।”

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शीला की आँखें बड़ी हो गईं, उसकी उत्सुकता बढ़ गई, “काम-कला? मुझे समझा नंदिनी, मैं क्या करूँ?”

नंदिनी ने बिना किसी संकोच के शीला को करीब खींचा और उसे तरह-तरह के गुप्त आसनों और पुरुषों को रिझाने के पैंतरे सिखाने लगी। उसने बहुत ही बारीक और जोशीले अंदाज़ में समझाना शुरू किया: “सुनो मालकिन, जब मर्द बिस्तर पर ढीला पड़ने लगे, तो सिर्फ नीचे लेटे रहने से काम नहीं चलता।

आपको ‘विपरीत रति’ का आसन अपनाना होगा। साहब को सीधे लेटने दें और खुद उनके ऊपर सवार हो जाएं। अपनी जांघों से उनके पेट को कसें और अपनी कमर को इस तरह हिलाएं जैसे कोई नागिन बलखा रही हो। इससे सारा नियंत्रण आपके हाथ में आ जाएगा।”

शीला उसकी बातें सुनकर हांफने लगी, “पर नंदिनी… क्या उन्हें यह उग्र रूप पसंद आएगा?”

“मर्द बाहर भले ही शेर बनें, पर बिस्तर पर उन्हें एक शिकारी औरत ही पसंद आती है,” नंदिनी ने शीला के कान के पास फुसफुसाते हुए कहा, “और सिर्फ यही नहीं, जब आप उनका लिंग अपने मुंह में लें, तो सिर्फ आगे-पीछे न करें। अपनी जीभ से उसके निचले हिस्से पर गोल-गोल चक्र बनाएं और अपनी उंगलियों से उनके अंडकोषों को हल्के से सहलाएं। इसे ‘मुख-मैथुन’ की कला कहते हैं। यह ऐसा नशा है, जो किसी भी सोए हुए पुरुष को सांड बना सकता है।”

नंदिनी यहीं नहीं रुकी; उसने शीला को अपनी साँसों को नियंत्रित करने, सही समय पर सिसकारियां भरने और अपने नितंबों को घर्षण के दौरान एक खास लय में हिलाने का व्यावहारिक प्रशिक्षण दिया। दोनों औरतें बंद कमरे में एक-दूसरे के बेहद करीब थीं, और नंदिनी के शब्द शीला के भीतर कामुकता का एक नया पाठ लिख रहे थे। ये कहानी आप हमारी वासना डॉट नेट पर पढ़ रहे है.

शीला बड़ी उत्सुकता से नंदिनी की बातें सुन रही थी। उसकी आँखें विस्मय और एक अजीब सी उत्तेजना से फैली हुई थीं। वह आश्चर्यचकित थी कि जो काम-कलाएं उसके लिए अब तक सिर्फ बंद कमरों की खामोशी और मायूसी का कारण बनी हुई थीं, नंदिनी उनके बारे में इतनी शिद्दत और गहराई से जानती थी।

शीला को ऐसा लगा जैसे उसे अपनी अधूरी जवानी को मुकम्मल करने के लिए एक परम ज्ञानी गुरु मिल गई हो। उसने नंदिनी का हाथ, जो इस समय उसकी जांघ के बेहद करीब था, अपने दोनों हाथों में भींच लिया। उसकी सांसें तेज हो चुकी थीं।

उसने अपनी कांपती हुई लेकिन दृढ़ आवाज़ में कहा, “नंदिनी… मैं सिर्फ इन बातों को सुनना नहीं चाहती। मैं यह कला खुद अपनी आँखों से देखना चाहती हूँ। मुझे इसका पूरा प्रशिक्षण दो… मुझे सिखाओ कि अपने शरीर के एक-एक हिस्से से उस सुख को कैसे निचोड़ा जाता है। मैं अपने राजा के सामने फिर कभी बेबस नहीं होना चाहती।”

शीला के मुंह से यह बेबाक मांग सुनकर नंदिनी के चेहरे पर एक गहरी, रहस्यमयी और कामुक मुस्कान तैर गई। उसकी आँखों में एक अजीब सी चमक आ गई, मानो वह इसी पल का इंतज़ार कर रही थी। उसने अपनी कलाई को शीला की पकड़ से धीरे से छुड़ाया और उसकी रेशमी त्वचा पर अपनी उंगलियों को रेंगते हुए बहुत ही कामुक और जोशीले अंदाज़ में कहा: “मालकिन, यह काम-शास्त्र कोई ऐसी चीज़ नहीं है जिसे दो पलों में जुबान से बोलकर सिखा दिया जाए। यह तो वो समंदर है जिसमें खुद डूबना पड़ता है।

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यदि तुम्हें इसकी और गहराई से जानकारी चाहिए, तो तुम्हें मेरे साथ वक्त बिताना होगा। मेरे बदन के एक-एक पैंतरे को देखना होगा। मेरे साथ दिन बिताओ, मैं तुम्हें अपनी उंगलियों और जिस्म के हर झटके से इस विद्या का एक-एक कतरा सिखा दूँगी…” नंदिनी ने थोड़ा और आगे झुकते हुए शीला के कान के ठीक पास अपनी गर्म सांसें छोड़ते हुए फुसफुसाया, “दिन में तुम मुझसे यह गुप्त ज्ञान लो, इसकी बारीकियों को महसूस करो… और रात में उसी तपने वाले ज्ञान को अपने पति के ऊपर इस्तेमाल करो।

फिर देखना मालकिन, साहब आपके इस बदन के ऐसे गुलाम होंगे कि बिना किसी नीली गोली के, सिर्फ आपकी एक सिसकारी सुनकर सांड की तरह आपके ऊपर टूट पड़ेंगे।” नंदिनी की इन भड़काऊ और जोशीली बातों ने शीला के भीतर एक नया रोमांच भर दिया। दिन का उजाला अब उन दोनों औरतों के बीच एक गहरे, गुप्त और बेहद कामुक प्रशिक्षण की शुरुआत का गवाह बनने जा रहा था, जिसकी आंच रात को बेडरूम के मखमली बिस्तर पर और भी भयंकर तूफान लाने वाली थी।

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