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जंगल में 2 मर्दों ने पूरी रात मुझे चोदा

जुलाई 5, 2026 by hamari Leave a Comment

Lady Doctor Chudai

मेरी शादी के बाद मेरा ट्रांसफर दूसरी जगह हो गया था। मेरे साथ मेरी प्यारी सहेली प्रतिमा का भी ट्रांसफर उसी जगह हो गया था, जो हमारे लिए बहुत ही खुशी की बात थी। विवेक ने नई जगह पर एक नर्सरी खोल ली, जो उसकी मेहनत से अच्छा चलने लगी। मेरी पहली प्रेग्नेंसी, जो शादी से पहले ही हो गई थी, मिसकैरेज हो गई। हम दोनों बच्चों के मामले में कोई जल्दबाजी नहीं करना चाहते थे। Lady Doctor Chudai

इसलिए हमने शादी के बाद काफी सुरक्षा के साथ ही संभोग किया। प्रतिमा और विवेक में काफी चुहल-बाजी चलती रहती थी, जिसमें मुझे मजा आता था। कुछ दिनों बाद प्रतिमा की शादी वहीं पास के एक फॉरेस्ट ऑफिसर अरुण से हो गई। प्रतिमा यूपी से बिलॉन्ग करती थी। अरुण बहुत ही हंसमुख और रंगीन मिजाज का आदमी था। उसकी पोस्टिंग हमारे अस्पताल से 80 किलोमीटर दूर एक जंगल में थी।

शुरू-शुरू में तो हर दूसरे दिन भाग आता था। कुछ दिनों बाद हफ्ते में दो दिन के लिए आने लगा। हम चारों आपस में काफी खुले हुए थे। अक्सर आपस में रंगीले जोक्स और द्विअर्थी संवाद करते रहते थे। उसकी नजर शुरू से ही मुझ पर थी, मगर न तो मैंने उसे कभी लिफ्ट दी और न ही उसे ज्यादा आगे बढ़ने का मौका मिला।

होली के समय जरूर मौका देखकर रंग लगाने के बहाने मुझसे लिपट गया था और मेरे कुर्ते में हाथ डालकर मेरी छातियों को कसकर मसल दिया था। इससे पहले कि वह और आगे बढ़ता, मैं उसके चंगुल से निकलकर भाग गई थी। उसकी इस हरकत पर किसी की नजर नहीं पड़ी थी, इसलिए मैंने भी चुप रहना बेहतर समझा। वरना बेवजह हम सहेलियों में दरार पड़ जाती।

मैं उससे जरूर अब कुछ कतराने लगी थी, मगर वह मेरे निकट आने के लिए मौका खोजता रहता था। प्रतिमा को शादी के साल भर बाद ही मायके जाना पड़ गया क्योंकि वह प्रेग्नेंट थी। अब अरुण कम ही आता था। आकर भी उसी दिन वापस लौट जाता था। अचानक एक दिन दोपहर को पहुंच गया। उसके पास एक बोलेरो थी, जो इस तरह के जंगल और ऊबड़-खाबड़ रास्ते के लिए एक वरदान थी। उसके साथ में एक और उसका साथी था, जिसका नाम उसने मुकुल बताया। उनका कोई आदमी पेड़ से गिर पड़ा था। बैकबोन में इंजरी थी।

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उस जंगल से अस्पताल का रास्ता खराब था, इसलिए उसे लेकर नहीं आ पाए। उन्होंने मुझसे मदद मांगी। मेरे पास उनके साथ जाने के अलावा कोई चारा भी नहीं था। हालत काफी नाजुक थी, इसलिए वे मुझे साथ ले जाने के लिए ही आए थे। मैंने झटपट अस्पताल में सूचना दी और विवेक को बताकर अपना सामान लेकर निकल गई।

निकलते-निकलते दो बज गए थे। 80 किलोमीटर का फासला कवर करते-करते हमें ढाई घंटे लग गए। रास्ता काफी खराब था। बारिश के दिनों में वैसे ही असम जैसी जगह पर बारिश की अधिकता से रास्तों की हालत बुरी हो जाती है। हम तीनों बोलेरो में आगे की सीट पर बैठे थे।

दोनों के बीच में मैं फंसी हुई थी। रास्ता बहुत उबड़-खाबड़ था। हिचकोले लग रहे थे। हम एक-दूसरे से भिड़ रहे थे। मैं बीच में बैठी थी, इसलिए कभी अरुण के ऊपर गिरती तो कभी मुकुल के ऊपर। मौका देखकर अरुण बीच-बीच में मेरे एक स्तन को कोहनी से दबा देता। कभी जांघों पर हाथ रख देता था।

मुझे तब लगा कि मैंने सामने बैठकर गलती की थी। एक बार तो मेरी दोनों जांघों के बीच भींचकर अपना हाथ रखकर मसल दिया। मैंने शर्म से उनके हाथ को वहाँ से हटाने के अलावा कोई हरकत नहीं की। मुकुल हम दोनों के बीच इस तरह के खेल को गौर से देख रहा था।

मैंने महसूस किया कि वह भी मुझसे सटा गया है और दोनों ने मुझे सैंडविच की तरह अपने बीच जकड़ रखा है। हम शाम तक वहाँ पहुंच गए। मरीज को चेकअप करने में शाम के छह बज गए। वहाँ मौजूद लकड़ी और खपच्चियों से उसके ट्रैक्शन का इंतजाम किया था। कुछ सेडेटिव्स और पेनकिलर्स देकर उनको बताया कि उसे बिल्कुल भी हिलने न दें।

जख्म गहरा नहीं है। बस लिगामेंट में कुछ टूट-फूट थी, जो कुछ दिन के रेस्ट से ठीक हो जाएगा। यहाँ शाम कुछ जल्दी हो जाती है। नवंबर का महीना था। मौसम बहुत रोमांटिक था, मगर धीरे-धीरे बादल घिरने लगे थे। मैं जल्दी अपना काम निपटाकर रात तक घर लौट जाना चाहती थी।

“इतनी जल्दी क्या है? आज रात यहीं रुक जाओ, मेरे झोपड़े में।” अरुण ने कहा, “घबराओ मत, विवेक की याद नहीं आने दूंगा।”

मगर मेरे गुस्से में भरकर देखने पर वह चुप हो गया।

“जीजाजी, अपने गंदे विचारों को संभालो। प्रतिमा ने तुम्हें इस तरह बातें करते सुना तो सर पर एक भी बाल नहीं छोड़ेगी। चलो, मुझे घर छोड़ आओ।” मैंने कहा।

“चल रे मुकुल, मैडम को घर छोड़ आएं। मैडम इस जंगल में रहने को तैयार नहीं हैं।”

हम वापस बोलेरो में वैसे ही बैठ गए, जिस तरह पहले बैठे थे। मैं दोनों के बीच फंसी हुई थी। मैं पीछे बैठने लगी थी कि अरुण ने रोक दिया।

“कहाँ पीछे बैठ रही हो? सामने आ चलो। बातें करते हुए रास्ता गुजर जाएगा। और कोई हसीन साथी हो तो सफर का पता ही नहीं चलता।”

“लेकिन तुम अपनी हरकतों पर काबू रखोगे, वरना मैं प्रतिमा से बोल दूंगी।” मैंने उसे चेताया।

“अरे उस हिटलर को कुछ उल्टा-सीधा मत बताना, नहीं तो वो मेरी अच्छी-खासी रैगिंग ले लेगी।”

मैं उसकी बात सुनकर हंसने लगी और बोलेरो में चढ़कर उनके बगल में बैठ गई। वह जानबूझकर मेरी तरफ खिसककर बैठा था, जिससे मुझे बैठने के लिए जगह कम मिले और मजबूरन उनसे सटकर बैठना पड़े। उसने अपना हाथ उठाकर मेरे कंधे पर रख दिया। मैं उसकी चिकनी-चुपड़ी बातों से फंस गई। हमारी रिटर्न जर्नी शुरू हो गई।

अचानक मूसलाधार बारिश शुरू हो गई। जंगल के अंधेरे रास्तों में ऐसी बारिश में गाड़ी चलाना भी एक मुश्किल काम था। चारों ओर सुनसान था। सिर्फ हवा की साय-साय और जानवरों की आवाजों के अलावा कहीं कोई आवाज नहीं थी। अचानक गाड़ी जंगल के बीच में झटके खाकर रुक गई।

अरुण टॉर्च लेकर नीचे उतरा। उसने बोनट उठाकर कुछ देर गाड़ी चेक की, मगर कोई खराबी पकड़ में नहीं आई। कुछ देर बाद वापस आ गया। वह पूरी तरह भीग चुका था। उसने अपने गीले शर्ट को उतारकर पीछे फेंक दिया और हताशा में हाथ निहालाए।

“कुछ नहीं हो सकता।” उसने कहा, “चलो नीचे उतरकर धक्का लगाओ। हो सकता है कि गाड़ी चल जाए।”

“मगर… बारिश…” मैं बाहर देखकर कुछ हिचकिचाई।

“नहीं तो जब तक बारिश न रुके, तब तक इंतजार करो।” उसने कहा, “अब इस बारिश का भी क्या भरोसा… हो सकता है सारी रात बरसता रहे। इसीलिए तो तुम्हें रात को वहाँ रुकने को कहा था।”

मैं नीचे उतर गई। बारिश की परवाह न कर मैं और मुकुल दोनों काफी देर तक धक्के मारते रहे, मगर गाड़ी नहीं चली। हम थककर वापस आ गए। रात के आठ बज रहे थे। मैं पूरी तरह गीली हो गई थी। मैं वापस आकर पीछे की सीट पर बैठ गई। अरुण ने अंदर की लाइट ऑन की। फिर पीछे की सीट के नीचे से एक इमरजेंसी लाइट निकालकर जलाया। गाड़ी के अंदर काफी रोशनी हो गई।

“अब?…” मैं रुआंसी नजरों से अरुण की तरफ देखा। अरुण बैक मिरर से मेरे बदन का अवलोकन कर रहा था। छातियों से साड़ी सरक गई थी। सफेद ब्लाउज और ब्रा बारिश में भीगकर पारदर्शी हो गए थे। ब्लाउज के ऊपर से मेरे निप्पल दो काले धब्बों के रूप में नजर आ रहे थे। ऊपर से साड़ी का आंचल हट जाने से निप्पल साफ-साफ नजर आ रहे थे। ये कहानी आप हमारी वासना पर पढ़ रहे है.

मैंने उसकी नजरों का पीछा किया और अपनी अर्धनग्न छाती को घूरता पाकर जल्दी से अपनी छातियों को साड़ी से छिपा लिया। उसने भी लाइट बंद कर दी। अंदर का माहौल कुछ गर्म होने लगा था। अरुण बार-बार अपनी सीट पर कसमसा रहा था। उसकी हालत देखकर पता चल रहा था कि इस वीरान जगह और इतने सेक्सी मौसम में उसकी नियत डोलने लगी थी।

“अब यहीं रुकना पड़ेगा रात भर। या अगर कोई और इस रास्ते से जाता हुआ मिल जाए… वैसे उम्मीद कम है, क्योंकि इस रास्ते पर दिन में ही कभी इक्का-दुक्का गाड़ी गुजरती है।”

मैं चुपचाप बैठी रही। रात अंधेरे में दो गैर-मर्दों का साथ… दिल को डुबोने के लिए काफी था। कुछ देर बाद बारिश बंद हो गई, मगर ठंडी हवा चलने लगी। बाहर कभी-कभी जानवरों की आवाज सुनाई दे रही थी। बारिश रुकने के बाद अरुण और मुकुल जीप की हेडलाइट्स ऑन करके गाड़ी से निकल गए। उन्होंने अपने-अपने वस्त्र उतार लिए और निचोड़कर सूखने रख दिए। दोनों सिर्फ अंडरवीयर में थे।

हेडलाइट्स की रोशनी में दोनों के मोटे-मोटे लिंग गीले अंडरवीयर के अंदर से ही साफ नजर आ रहे थे। अरुण का लिंग तो खड़ा हो गया था। उसका मुँह आसमान की ओर था और उसका अंडरवीयर फाड़कर बाहर निकलने के लिए छटपटा रहा था। मुझे उन दोनों के विशाल अस्त्र देखकर झुरझुरी सी लगने लगी। मैं ठंड से काँप रही थी। शर्म की वजह से गीले कपड़े भी उतार नहीं पा रही थी।

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अरुण मेरे पास आया। “देखो अनीशा, घुप अंधेरा है। तुम अपने गीले वस्त्र उतार दो।” अरुण ने कहा, “वरना ठंड लग जाएगी। हम बाहर बैठे रहेंगे, तुम्हें घबराने की कोई जरूरत नहीं है।”

मैं कुछ देर तो असमंजस में चुप रही, फिर दिल को सख्त करके मैंने उसकी बात को मानना ही उचित समझा।

“कुछ है पहनने को?” मैंने पूछा, “कुछ तो पहनने को दो…”

मैं उससे कहते हुए शर्म से दोहरी हो गई।

“नहीं!” अरुण ने कहा, “हमारे पहने कपड़े भी तो भीग चुके हैं। पहले से थोड़े ही मालूम था कि इस तरह हमें रात जंगल में गुजारनी पड़ेगी। और ऊपर से कपड़े भी गीले हो जाएंगे। वैसे यहाँ काफी रीछ और भालू मिलते हैं। रीछ बहुत सेक्सी जानवर होते हैं। सुंदर सेक्सी महिलाओं को देखकर उन पर टूट पड़ते हैं और जमकर उनके साथ संभोग करते हैं।”

“मेरी तो यहाँ जान जा रही है और तुम्हें मजाक सूझ रहा है। यहाँ खड़े-खड़े मुझे सताना छोड़कर कुछ इंतजाम तो करो।” मैंने पूछा, “कुछ तो देखो, नहीं तो मैं ठंड से मर जाऊंगी।” मेरे दाँत बज रहे थे।

“पिकनिक पर गए थे क्या, जो कपड़े-बिस्तर सब लेकर चलते।” अरुण मजाक कर रहा था और बार-बार गाड़ी के अंदर जल रही हल्की रोशनी में मेरे मदक बदन को निहार रहा था।

गीले वस्त्रों में अपने कामुक बदन की नुमाइश करने से बचने की मैं भरसक कोशिश कर रही थी, लेकिन एक अंग छिपाती तो दूसरा अंग बेपर्दा हो जाता।

“सर, एक पुरानी फटी हुई चादर है पीछे। अगर उससे काम चल जाए…” मुकुल ने कहा।

“दिखा डॉक्टर्नी को।” अरुण ने कहा।

मुकुल ने पीछे से एक फटी पुरानी चादर निकाली और मुझे दी। चादर से धूल की महक आ रही थी, लेकिन मुझे इस वक्त तो वह डूबते को तिनके का सहारा लग रहा था।

“चलो, तुम अपने कपड़े उतारकर इसे ओढ़ लो। हम बाहर जाते हैं।”

कहकर अरुण और मुकुल गाड़ी से बाहर निकल गए। गाड़ी का दरवाजा बंद करते ही लाइट बंद हो गई। दो मर्दों के सामने वस्त्र उतारने के ख्याल से ही शर्म आ रही थी। मगर करने को कुछ नहीं था। ठंड के मारे दाँत बज रहे थे और बदन के सारे रोएँ ठंड के मारे एकदम काँटों की तरह तन गए थे। ऐसा लग रहा था मैं बर्फ की सिल्लियों से घिरी हुई बैठी हूँ।

मैंने झिझकते हुए सबसे पहले अपनी साड़ी को बदन से उतार दी। मगर उससे भी कोई राहत नहीं मिली तो मैंने एक बार चारों ओर देखा। अंधेरा घना था, कुछ भी दिखाई नहीं दे रहा था। मैंने अपने बाकी वस्त्र भी उतार देने का मन बनाया। मैंने एक-एक कर के ब्लाउज के सारे बटन खोल दिए।

ब्लाउज को बदन से अलग करने से पहले मैंने वापस चारों ओर नजर दौड़ाई। कुछ भी नहीं दिख रहा था। फिर मैंने ब्लाउज को बदन से उतार दिया। उसके बाद मैंने अपने पेटीकोट को भी उतार दिया। मैं अब सिर्फ ब्रा और पैंटी में थी। मैंने उस अवस्था में ही चादर को अपने बदन पर लपेट लिया।

लेकिन कुछ ही देर में गीली ब्रा और पैंटी मेरे बदन को ठंडा करने लगी तो मैंने उन्हें भी उतार देने का इरादा किया। मैंने अपने हाथ पीछे ले जाकर अपनी ब्रा को भी बदन से अलग कर दिया और उस चादर से वापस बदन पर लपेट लिया। पैंटी को बदन पर ही रहने दी। गाड़ी का दरवाजा खोलकर मैंने उन्हें निचोड़कर सुखाने का सोचा, मगर दरवाजा खोलते ही बत्ती जल गई।

मेरे बदन पर केवल एक जगह-जगह से फटी हुई चादर के अलावा एक तीन अंगुल की छोटी सी पैंटी थी। उन फटे हिस्सों से आधा बदन साफ नजर आ रहा था। मेरा राइट स्तन पार से चादर हटा हुआ था। मैंने देखा, अरुण भौचक्का सा एकटक मेरी नग्न छाती को घूर रहा है। मैंने झट चादर को ठीक किया।

चादर कई जगह से फटी हुई थी, इसलिए एक अंग ढकती तो दूसरा बाहर निकल आता। इस कोशिश में कई बार मैं टॉपलेस भी हो गई। दोनों मेरे निर्वस्त्र यौवन को निहार रहे थे। आखिर मैंने हारकर दरवाजा वापस बंद कर लिया। गाड़ी के अंदर की बत्ती बंद हो गई तो कुछ राहत आई।

“अरुण प्लीज मेरे कपड़ों को सूखने दो।” मैंने खिड़की खोलकर अपने गीले कपड़े बाहर निकाले और कहा।

अरुण ने मेरे हाथों से कपड़े ले लिए और उन्हें निचोड़कर एक पत्थर के ऊपर सूखने को डालने लगा। वह कपड़ों से धीरे-धीरे इस तरह खेल रहा था, मानो वह कपड़ों को नहीं, मेरे बदन को ही मसल रहा हो। साड़ी, पेटीकोट और ब्लाउज फैला देने के बाद हाथ में अब सिर्फ मेरी ब्रा बची थी। ये कहानी आप हमारी वासना पर पढ़ रहे है.

उसे हाथ में लेकर एक बार गाड़ी की तरफ देखा। चारों ओर अंधेरा देखकर उसने सोचा कि उसकी हरकतें मुझे नहीं दिख रही होंगी, लेकिन हल्की-हल्की रोशनी उसकी हरकतों को समझाने के लिए काफी थी। मैंने देखा कि उसने ब्रा को अपनी नाक पर लगाकर कुछ देर तक लंबी-लंबी साँसें लेकर मेरे बदन की खुशबू को अपने दिल में समा लेने की कोशिश की।

फिर उसने मेरी ब्रा के दोनों कप को अपने होंठों से लगा कर पहले तो चूमा, फिर अपनी जीभ निकालकर उन पर फिराई। शर्म से मेरा चेहरा लाल हो गया होगा क्योंकि मुझे इतनी बेशर्मी कभी नहीं झेलनी पड़ी थी। फिर उसने उस ब्रा को भी सूखने डाल दी।

मेरे बदन पर अब केवल गीली पैंटी थी, जिसको मैं अलग नहीं करना चाहती थी। ठंड अब भी लग रही थी, मगर क्या किया जा सकता था। कुछ देर बाद दोनों भी ठंड से बचने के लिए गाड़ी में आ गए। जैसा कि मैंने पहले ही कहा था कि दोनों के बदन पर भी बस एक-एक पैंटी थी। उनके निर्वस्त्र बदन को मैंने भी गहरी नजरों से देखने लगी।

“यार मुकुल, ठंड से तो रात भर में बर्फ की तरह जम जाएंगे। कैबिनेट में रम की एक बोतल रखी है, उसको निकाल।” अरुण ने कहा।

मुकुल ने कैबिनेट से एक बोतल निकाली। लाइट जलाकर मुकुल डैशबोर्ड के अंदर कुछ ढूंढने लगा।

“सर, ग्लास नहीं है।” उसने कहा।

“कोई बात नहीं।” अरुण ने रोशनी में बोतल को ऊँचा किया। आधी बोतल भरी हुई थी। उसने अपने पैरों के पास से एक पानी की बोतल निकालकर रम की बोतल को पूरा भर लिया। अरुण ने बोतल लेकर मुँह से लगाया और दो घूँट लेकर मुकुल की तरफ बढ़ाया।

“मम्म अब मजा आया…” मुकुल ने भी एक घूँट लिया और वापस बोतल अरुण को दे दी।

“अनीशा तू भी दो घूँट ले ले, सारी सर्दी निकल जाएगी।” अरुण ने कहा।

“अरुण, पागल तो नहीं हो गए। तुमको मालूम है मैं शराब नहीं पीती।” मैंने मना कर दिया।

मगर कुछ ही देर में मुझे अपने फैसले पर गुस्सा आने लगा। लेकिन उस वक्त दो आदमखोरों के बीच में मैं इस तरह का कोई रिस्क नहीं लेना चाहती थी। कहीं ऐसा न हो कि मेरा अपने ऊपर से कंट्रोल हट जाए। मगर ठंडक ने मेरी मति मार दी। मैं दोनों को पीते हुए देख रही थी और ठंड से सिकुड़ी हुई बैठी काँप रही थी। उन्होंने फिर मुझसे पूछा। इस बार मेरे ना में दम नहीं था। अरुण ने बोतल मुझे पकड़ा दी।

“अरे ले यार, कोई पाप नहीं लगेगा। एक डॉक्टर के मुँह से इस तरह की दकियानूसी बातें सही नहीं लगती।” अरुण ने कहा।

मैंने काँपते हाथों से बोतल ली और मुँह से लगाकर एक घूँट लिया। ऐसा लगा मानो तेजाब मेरे मुँह और गले को जलाता हुआ पेट में जा रहा है। मुझे फौरन जोर की उबकाई आ गई। मैंने बड़ी मुश्किल से मुँह पर हाथ रखकर अपने आप को रोका। पूरे मुँह का स्वाद कसैला हो गया था।

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काफी देर तक मेरा चेहरा विकृत सा रहा। कुछ देर बाद जब कुछ नॉर्मल हुई तो अरुण ने वापस बोतल मेरी ओर की।

“लो, एक और घूँट लो।”

“नहीं, कितनी गंदी चीज है। तुम लोग पीते कैसे हो?” मैंने कहा।

मगर कुछ देर बाद मैंने हाथ बढ़ाकर बोतल ले ली और एक और घूँट लिया। इस बार उतनी बुरी नहीं लगी।

“बस और नहीं।” मैंने बोतल वापस कर दी।

बोतल को वापस अरुण को लौटाते वक्त चादर मेरी एक छाती से हट गया था। मुझे इसका पता ही नहीं चल पाया। मेरा सर घूम रहा था। सीने में अजीब सी हलचल हो रही थी। बदन गरम होने लगा था। ऐसा लग रहा था कि बदन पर ओढ़ी उस चादर को उतार फेंकूँ। अपने आप को बहुत हल्का-फुल्का महसूस कर रही थी।

अपने ऊपर से कंट्रोल खत्म होने लगा। शरीर काफी गरम हो चला था। नीचे दोनों टांगों के बीच हल्की सी सुरसुरी महसूस हो रही थी। दिमाग चेतावनी दे रहा था, मगर शरीर पर से उसका कंट्रोल खत्म होता जा रहा था। बाहर हवा की साय-साय माहौल को और ज्यादा मदक बना रही थी। अरुण ने अंदर की छोटी सी लाइट ऑन कर दी थी। वह अपने हाथ में बोतल लेकर सामने का दरवाजा खोलकर बाहर निकला और पीछे की सीट पर आ गया।

“तुम्हें तो पसीना आ रहा है। गर्मी कुछ ज्यादा है।” कहते हुए उसने मेरे गले को अपने हाथों से छुआ।

मैं सिमटते हुए दूसरी ओर सरक गई, मगर वह मेरी ओर सरककर वापस मेरे बदन से सट गया।

“देखो अरुण, यह सब ठीक नहीं है। तुम सामने की सीट पर जाओ।” मैंने कहा।

“मैं तुम्हारे साथ कोई जोर-जबर्दस्ती तो कर नहीं रहा हूँ। मैं तो सिर्फ तुम्हारे काँपते हुए बदन को गर्मी देने की कोशिश कर रहा हूँ।”

उसने वापस अपनी उँगलियों से मेरे होंठ के ऊपर छुआ और आगे कहा, “देखो, रम पीने से तुम्हारा बदन राहत महसूस कर रहा है। नहीं तो सुबह तक तो तुम ठंड से अकड़ जाती। लो, एक घूँट और ले लो इस बोतल से। रात अच्छी गुजर जाएगी।”

“नहीं, मुझे नहीं चाहिए।” मैंने उसके हाथ को सामने से हटा दिया।

उसने बोतल से एक घूँट भरा और बोतल सामने बैठे मुकुल को थमा दी। फिर मेरी ओर घूमकर उन्होंने अपने बाँह फैलाकर मुझे आगोश में लेना चाहा। मैं उनको धक्का देती रह गई, मगर उन्होंने मुझे अपनी बाँहों में समा लिया। मेरे स्तन गर्मी से तन गए थे। वो उसकी छाती में दब गए। ये कहानी आप हमारी वासना पर पढ़ रहे है.

मैं उनको अपने हाथों से धक्का देकर दूर करने की कोशिश करती रह गई। लेकिन कुछ तो मेरी कोशिश में इच्छा का अभाव और कुछ उसके बदन में तीव्र जोश का संचार कि मैं उनको अपने बदन से एक इंच भी नहीं हिला पाई। उल्टे उनका सीना और सख्ती से मेरे स्तनों को पीसने लगा।

उसके गरम होंठ मेरे होंठों से चिपक गए। मैंने अपने सिर को हिलाकर उसके होंठों से दूर होने की कोशिश की। “मम्म… नहीं… नहीं… अरून नहीं…… ये सब न… नहीं…” मैंने उसके चेहरे को दूर करने की कोशिश की, मगर नाकाम होने पर मैंने उसके बालों को अपनी मुट्ठी में भरकर अपने से दूर धकेला।

उसके सिर के कुछ बाल तोड़कर मेरी मुट्ठी में रह गए, मगर उसका सिर नहीं हिला। उसने मेरे गले पर अपने तपते होंठ रख दिए। सामने मुकुल रम की बोतल बार-बार अपने होंठों से छुआता हुआ, पीछे की सीट पर चल रही जोर-अजमाइश को देखते हुए मुस्कुरा रहा था।

मैंने उसे धकेलने की कोशिश की, मगर वह मेरे बदन से और जोर से चिपक गया। उसने मेरे बदन से लिपटी चादर के अंदर अपने हाथों को डालने की कोशिश की, मगर उसके हाथ चादर का छोर ढूंढ नहीं पा रहे थे। उसने झुंझलाकर चादर के बाहर से ही मेरे स्तनों को पकड़कर मसलना शुरू कर दिया।

किसी पराए मर्द की नजदीकियाँ, शराब का सुरूर, रात का अंधेरा और वातावरण की मदहोशी सब मिलकर मेरे दिमाग को शिथिल करते जा रहे थे। धीरे-धीरे मैं कमजोर पड़ती जा रही थी। उसने एक झटके में मेरे बदन से चादर को अलग कर दिया।

“मुकुल ले इसे संभाल।” अरुण ने चादर आगे की सीट पर उछाल दी, जिसे मुकुल ने संभाल लिया।

मेरे बदन पर अब सिर्फ एक पैंटी के अलावा कुछ भी नहीं था। मैं अपने हाथों से अपने नग्न बदन को छिपाने की कोशिश कर रही थी, मगर ब्रेस्ट्स के साइज बड़े होने की वजह से उन्हें संभालने में असमर्थ थी। अरुण ने मेरे नग्न बदन को अपने सीने पर खींच लिया। दोनों के नग्न बदन आपस में कसकर लिपट गए।

मुझे लगा मानो मेरे सीने की सारी हवा निकल गई हो। मैं कसमसा रही थी, लेकिन अपने खड़े निप्पल्स को और अपने कड़े ब्रेस्ट्स को उसके चौड़े सीने पर रगड़ने के अलावा कुछ भी नहीं कर पा रही थी। उसे तो मेरे इस तरह छटपटाने में और भी मजा आ रहा था।

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मैंने अरुण को धकेलते हुए कहा, “प्लीज… छोड़ो मुझे, वरना मैं शोर मचाऊंगी।”

मगर मैं उसकी पकड़ से छूट नहीं पा रही थी।

“अरून क्या कर रहे हो… प्लीज… प्लीज… प्रतिमा को पता चल गया तो गजब हो जाएगा… छोड़… छोड़ो मुझे…” मैंने ऊँची आवाज में कहना शुरू किया।

“मचाओ शोर। जितना चाहे चीखो। यहाँ मीलों तक सिर्फ पेड़, पत्थर और जानवरों के सिवा तुम्हारी चीख सुनने वाला कोई नहीं है।”

मुकुल पीछे घूमकर हमारी रासलीला देखने लगा। अरुण के हाथ मेरे बदन पर फिर रहे थे। उसके नग्न बदन से मेरा बदन चिपका हुआ था। मैंने काफी बचने की कोशिश की, अपनी सहेली की दुहाई भी दी, मगर अरुण तो मानो पूरा राक्षस बन चुका था। उस पर मेरा गिड़गिड़ाना, रोना और छटपटाना कोई असर नहीं डाल रहा था।

मेरा विरोध भी धीरे-धीरे मंद पड़ता जा रहा था। उसने मेरे उरोज थाम लिए और निप्पल्स अपने मुँह में लेकर चूसने लगा। उसने एक हाथ से अपने बदन से आखिरी वस्त्र भी उतार दिया और मेरे हाथ को पकड़कर अपने तपते लिंग पर रख दिया। मैंने हटाने की कोशिश की, मगर उसके हाथ मजबूती से मेरे हाथ को लिंग पर थाम रखे थे।

मुझे विवेक के अलावा किसी और के लिंग को अपने हाथों में लेकर सहलाना अजीब लग रहा था, मगर मेरे शरीर में अब उसका विरोध करने की न तो ताकत और न ही इच्छा बची थी। शराब अपना असर दिखाने लगी। मेरा बदन भी गरम होने लगा। कुछ देर बाद मैंने अपने को ढीला छोड़ दिया।

मैं समझ गई कि आज इस वीराने में दोनों मुझसे संभोग किए बिना मुझे छोड़ेंगे नहीं। मैं जितना विरोध करती, संभोग उतना ही दर्दे ला होता और पता नहीं इस वीराने में दोनों अपनी हवस मिटाने के बाद अपने पाप छिपाने के लिए मुझ पर हमला भी कर सकते थे।

मैंने अपना विरोध पूरी तरह समाप्त कर दिया। उसके हाथ मेरे उरोजों को मसलने लगे। उसके होंठ मेरे होंठों से चिपके हुए थे और जीभ मेरे मुँह के अंदर घूम रही थी। मुकुल से अब नहीं रहा गया और वह दूसरी साइड का दरवाजा खोलकर मेरी दूसरी तरफ आ गया। उसने पहले सीट के लेवर को खोलकर बैक रेस्ट को गिरा कर दिया। पीछे की सीट खुलकर एक आरामदेह बिस्तर का रूप ले ली थी।

गाड़ी के अंदर जगह कम थी, मगर इस काम के लिए काफी थी। दोनों एक साथ मेरे बदन पर टूट पड़े। मैं उनके बीच फंसी हुई थी। दोनों ने मेरे एक-एक उरोज थाम लिए। उनके साथ दोनों बुरी तरह पेश आ रहे थे। मसल-मसलकर मेरे दोनों स्तनों को लाल कर दिए थे। कभी चूस रहे थे, कभी काट रहे थे, तो कभी चाट रहे थे।

मेरे दोनों स्तन उनकी हरकतों से दुखने लगे थे। मेरे दोनों हाथों में एक-एक लिंग था। दोनों लिंगों को मैं अपनी मुट्ठी में भरकर सहला रही थी। मेरी पैंटी पहले से ही गीली थी, वरना मेरे कर्म से गीली हो जाती। मेरी योनि से बुरी तरह कामरस चू रहा था। मेरी योनि मर्द के लिंग के लिए तड़प रही थी। मैं उनकी हरकतों से खूब गरम हो चुकी थी।

दोनों अपने एक-एक हाथ से मेरी योनि को पैंटी के ऊपर से सहला रहे थे। कभी-कभी दोनों के हाथ मेरे नितंबों को मसलने लगते। मैं अपनी जांघों को एक-दूसरे पर सख्ती से जकड़कर उनके काम में बाधा डालने की कोशिश कर रही थी, मगर दोनों के आगे मेरी एक नहीं चल रही थी। ये कहानी आप हमारी वासना पर पढ़ रहे है.

उल्टे मैं इस तरह से और उत्तेजित हो गई और एक झटके से मैंने अपनी योनि को सीट पर से उठाकर उनके हाथों को और अंदर जाने का मौका दिया। इसी के साथ मेरे बदन से मेरा सारा विरोध तरल रूप लेकर बाहर निकला। मेरा स्खलन हो गया था। मैं अपने इस हरकत को उनकी नजरों से नहीं छिपा पाई और शर्म से पानी-पानी हो गई थी।

“देख… देख मुकुल कैसे न…ना… कर रही थी। अब देख कैसे हमारे लंड लेने के लिए तड़प रही है।”

मुकुल उसकी बात पर जोर से हंस पड़ा। मैं शर्म से सिकुड़ गई।

दोनों ने मेरी पैंटी को मेरे बदन से नोचकर अलग कर दिया। उसी के साथ दो जोड़ी उँगलियाँ मेरी योनि में प्रवेश कर गईं।

“आआह्ह्ह…… क्या…… कर रहे हो……”

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मेरे मुँह से वासना भरी सिसकारियाँ निकल रही थीं। अरुण ने मुझे किसी गुड़िया की तरह उठाकर अपनी गोद में बिठा लिया। उसने मेरे दोनों पैरों को फैलाकर अपने कमर के दोनों ओर रखा। फिर उसने मुझे खींचकर अपने नग्न बदन से चिपका लिया। मेरे बड़े-बड़े उरोज उसके सीने में पिस जा रहे थे।

वह मेरे होंठों को चूम रहा था। उस वक्त मुकुल के होंठ मेरी पीठ पर फिसल रहे थे। अपनी जीभ निकालकर मेरी गर्दन से लेकर मेरे नितंबों तक ऐसे फिरा रहा था, मानो बदन पर कोई हल्के से पंख फेर रहा हो। पूरे बदन में झुरझुरी सी दौड़ रही थी। मैं दोनों की हरकतों से पागल हुई जा रही थी।

अरुण का लिंग मेरी योनि को ऊपर से सहला रहा था। मैं खुद उसकी में आगे-पीछे होकर उसके लिंग को अपनी योनि से रगड़ रही थी। अब मेरी रही-सही झिझक भी खत्म हो गई थी। मैं अपने हाथ से अरुण के लिंग के टोपे को अपनी योनि के द्वार पर सटाकर अंदर डालने की कोशिश करने लगी। लेकिन एंगल कुछ ऐसा था कि वह अंदर नहीं जा पा रहा था।

अरुण और मुकुल मेरी हरकतों पर हंस रहे थे। मुझे ऐसी हालत में कोई देखता तो एक वेश्या ही समझता। मेरी डिग्निटी, मेरा रेपुटेशन, मेरी शिक्षा सब इस आदिम भूख के सामने छोटी पड़ गई थी। मेरी आँखों में मेरा प्यार, मेरा हमदम, मेरे पति के चेहरे पर इन दोनों के चेहरे नजर आ रहे थे।

शराब ने मुझे अपने वश में ले लिया था। सब कुछ घूमता हुआ लग रहा था। मेरा सिर इतनी बुरी तरह घूम रहा था कि मैं इनकी पकड़ में आराम महसूस कर रही थी। दिमाग कह रहा था कि जो हो रहा है वो अच्छा नहीं है, मगर मैं किसी को मना करने की स्थिति में नहीं थी। मेरा बदन चाह रहा था कि दोनों मुझे खूब मसलें, खूब प्यार करें, खूब रगड़ें।

पता नहीं दोनों ने उस ड्रिंक्स में भी कुछ मिला दिया था या नहीं, लेकिन मेरी कामोत्तेजना नॉर्मल से दस गुना बढ़ गई थी। मैं सेक्स की भूख से तड़प रही थी। अरुण मेरे होंठों को चूस-चूसकर सुजा दिया था। फिर उन्हें छोड़कर मेरे निप्पल्स पर टूट पड़ा। अपने दोनों हाथों से मेरे एक-एक उरोज को निचोड़ रहा था और निप्पल्स को मुँह में डालकर चूस रहा था।

ऐसा लग रहा था मानो बरसों के भूखे के सामने कोई दूध की बोतल आ गई हो। दाँतों के निशान पूरे उरोज पर नजर आ रहे थे। मैंने अपने हाथों से अरुण का सिर पकड़ रखा था और उसे अपने उरोज पर दबाने लगी। मुकुल उस वक्त मेरी गर्दन पर और मेरी नितंबों पर अपने दाँत गड़ा रहा था।

मैं मस्त हुई जा रही थी। फिर मुकुल ने मेरे सिर को पकड़ा और अपने लिंग पर झुकाने लगा। मैं उसके इरादे समझकर कुछ देर तक मुँह को इधर-उधर घुमाती रही। मगर उसके आगे मेरी एक नहीं चल पा रही थी। वो मेरे खूबसूरत होंठों पर अपना काला लिंग फेरने लगा।

मुझे उसके लिंग से पेशाब की बदबू आ रही थी, जिससे मेरा जी मिचलाने लगा।  लिंग के आगे के टोपे की मोटाई देखकर मैं काँप गई। लिंग से चिपचिपा पदार्थ निकलकर मेरे होंठों पर लग रहा था। लेकिन मैंने अपना मुँह नहीं खोला। मुकुल ने काफी कोशिश की मेरे मुँह को खोलने की, मगर मैंने उसकी एक न चलने दी।

कुछ देर बाद अरुण ने मुझे गोद से उठाकर कोहनी और घुटनों के बल पर चौपाया बनाकर पीछे से मेरी योनि को चोदने लगा।  योनि की फांकें अलग कर अपनी उँगलियाँ अंदर-बाहर करने लगा। उसने मेरी योनि से अपनी उँगलियाँ निकालकर एक उँगली को खुद चाटा और दूसरी उँगली मुकुल को चाटने दी।

“ले देख, चाटकर अगर इससे अमृत का स्वाद न आए तो कहना।” अरुण ने कहा।

“म्मम्म बॉस, मजा आ गया… बड़ी नशीली चीज है। आज तक इतना मजा कभी नहीं आया।”

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मुकुल मेरे सिर को वापस अपने लिंग पर दबा रहा था। मुझे मुँह नहीं खोलता देखकर मेरे निप्पल्स को बुरी तरह मसलने लगा। मेरे निप्पल्स इतनी बुरी तरह मसल रहा था और खींच रहा था, मानो उसे आज मेरे बदन से ही उखाड़ फेंकने का मन हो। मैं जैसे ही चीखने के लिए मुँह खोली, उसका मोटा लिंग जीभ को रास्ते से हटाता हुआ गले तक जाकर फंस गया। मेरा दम घुटने लगा था।

मैंने सिर को बाहर खींचने के लिए जोर लगाया तो उसने अपने हाथ को कुछ ढीला कर दिया। लिंग आधा ही बाहर निकला होगा, उसने दोबारा मेरे सिर को दबा दिया। और इस तरह वह मेरे मुँह को किसी योनि की तरह चोदने लगा। उधर अरुण मेरी योनि में अपनी जीभ अंदर-बाहर कर रहा था।

मैं कामोत्तेजना से चीखना चाहती थी, मगर गले में मुकुल का लिंग फंसा होने के कारण मेरे मुँह से सिर्फ “ज” जैसी आवाजें निकल रही थीं। मैं उसी अवस्था में वापस झर गई। काफी देर तक चूसने-चाटने के बाद अरुण उठा। उसके मुँह, नाक पर मेरा कामरस लगा हुआ था। ये कहानी आप हमारी वासना पर पढ़ रहे है.

उसने अपने लिंग को मेरी योनि के द्वार पर सटा दिया। फिर बहुत धीरे-धीरे उसे अंदर धकेलने लगा। खंभे के जैसे अपने मोटे-ताजे लिंग को पूरी तरह मेरी योनि में समा दिया। योनि पहले से ही गीली हो रही थी, इसलिए कोई ज्यादा दिक्कत नहीं हुई। लेकिन उसका लिंग काफी मोटा होने से मुझे हल्की सी तकलीफ हो रही थी।

वो अपने लिंग को वापस पूरा बाहर निकाला और फिर एक जोरदार धक्के से पूरा समा दिया। फिर तो उसके धक्के लगातार होने चले। मुकुल मेरा मुख मैथुन कर रहा था। दोनों के लिंग दोनों तरफ से मेरे बदन में अंदर-बाहर हो रहे थे और मैं जीप में झूला झूल रही थी।

मेरे दोनों उरोज पके हुए अनार की तरह झूल रहे थे। दोनों ने मसलकर काटकर दोनों उरोजों का रंग भी अनारों की तरह लाल कर दिया था। कुछ देर बाद मुझे लगने लगा कि अब मुकुल डिस्चार्ज होने वाला है। यह देखकर मैंने लिंग को अपने मुँह से निकालने का सोचा। मगर मुकुल ने शायद मेरे मन की बात पढ़ ली।

उसने मेरे सिर को पूरी ताकत से अपने लिंग पर दबा दिया। मूसल जैसा लिंग गले के अंदर तक घुस गया। उसका लिंग अब झटके मारने लगा। फिर ढेर सारा गरम-गरम वीर्य उसके लिंग से निकलकर मेरे गले से होता हुआ मेरे पेट में समाने लगा। मेरी आँखें दर्द से उबल पड़ी थीं। दम घुट रहा था।

काफी सारा वीर्य पिलाने के बाद लिंग को मेरे मुँह से निकाला। उसका लिंग अब भी झटके खा रहा था और बूँद-बूँद वीर्य अब भी टपक रहा था। मेरे होंठों से उसके लिंग तक वीर्य एक रेशम की डोर की तरह चिपका हुआ था। मैं जोर-जोर से साँसें ले रही थी। उसके वीर्य के कुछ छींटे मेरी नाक पर और मेरे बालों पर भी गिरे।

अरुण पीछे से जोर-जोर से धक्के दे रहा था और मैं हर धक्के के साथ मुकुल के ढीले पड़े लिंग से भिड़ रही थी। इससे मुकुल का ढीला लिंग फिर कुछ हरकत में आने लगा। मैं सिर को उत्तेजना से झटकने लगी। “ओउईई माँ… ओह्ह्ह… हम्म्प्प” जैसी उत्तेजित आवाजें निकलने लगी।

मेरी योनि ने ढेर सारा रस छोड़ दिया। मगर उसके रफ्तार में कोई कमी नहीं आई थी। मेरी बाहें मेरे बदन को और थाम न सकीं। और मेरा सिर मुकुल की गोद में धंस गया। उसके कामरस से लिसड़े ढीले पड़े लिंग से मेरा गाल रगड़ खा रहा था। काफी देर तक धक्के मारने के बाद उसके लिंग ने अपनी धार से मेरी योनि को लबालब भर दिया।

जब तक पूरा वीर्य मेरी योनि में नहीं निकल गया, तब तक अपने लिंग को अंदर ही डाले रखा। धीरे-धीरे उसका लिंग सिकुड़कर मेरी योनि से बाहर निकल आया। हम तीनों गहरी-गहरी साँसें ले रहे थे। खेल तो अभी शुरू ही हुआ था। दोनों ने कुछ देर सुस्ताने के बाद अपनी जगह बदल ली।

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अरुण ने अपना लिंग मेरे मुख में डाल दिया तो मुकुल मेरी योनि पर चोट करने लगा। दोनों ने करीब दो घंटे तक मेरी इसी तरह से जगह बदलकर चुदाई की। मैं तो दोनों का स्टैमिना देखकर हैरान थी। दोनों ने कई बार मेरे मुँह में, मेरी योनि में और मेरे बदन पर वीर्य की बरसात की। मैं उनके सीने से चिपके साँसें ले रही थी।

“अब तो छोड़ दो। अब तो तुम दोनों ने अपने मन की मुराद पूरी कर ली। मुझे अब आराम करने दो। मैं बुरी तरह थक गई हूँ।” मैंने कहा।

मगर दोनों में से कोई भी मेरी मिन्नतें सुनने के मूड में नहीं लगा। घंटे भर मेरे बदन से खेलने के बाद और अपने लिंग को आराम देने के बाद दोनों के लिंग में फिर दम आने लगा। अरुण सीट पर अब लेट गया और मुझे ऊपर आने का इशारा किया। मैं कुछ कहती उससे पहले मुकुल ने मुझे उठाकर उसके लिंग पर बिठा दिया।

मैं अपने योनि द्वार को अरुण के खड़े लिंग पर टिकाई। अरुण ने अपने लिंग को दरवाजे पर लगाया। मैं धीरे-धीरे उसके लिंग पर बैठ गई। पूरा लिंग अंदर लेने के बाद मैं उसके लिंग पर उठने-बैठने लगी। तभी दोनों के बीच आँखों ही आँखों में कोई इशारा हुआ। अरुण ने मुझे खींचकर अपने नग्न बदन से चिपका लिया।

अरुण मेरे नितंबों को फैलाकर मेरे पिछले द्वार पर उँगली से सहलाने लगा। फिर उँगली को कुछ अंदर तक घुसा दी। मैं चिहुँक उठी। मैं उसका इरादा समझकर सिर को इंकार में हिलाने लगी तो अरुण ने मेरे होंठ अपने होंठों में दबा लिए।

मुकुल ने अपनी उँगली निकालकर मेरी योनि से बहते हुए रस को अपने लिंग और मेरी योनि पर लगा दिया। मैं इन दोनों बलिष्ठ आदमियों के बीच बिल्कुल असहाय महसूस कर रही थी। दोनों मेरे बदन को जैसी मर्जी वैसे मसल रहे थे। मुकुल ने अपना लिंग मेरे गुदा द्वार पर सटा दिया। ये कहानी आप हमारी वासना पर पढ़ रहे है.

“नहीं प्लीज… वहाँ नहीं।” मैंने लगभग रोते हुए कहा, “मेरी फट जाएगी। प्लीज वहाँ मत घुसाओ। मैं तुम दोनों को सारी रात मेरे बदन से खेलने दूंगी, मगर मुझे इस तरह मत करो। मैं मर जाऊंगी।”

मैं गिड़गिड़ा रही थी, मगर उन पर कोई असर नहीं हो रहा था। मुकुल अपने काम में जुटा रहा। मैं हाथ-पैर मार रही थी, मगर अरुण ने अपने बलिष्ठ बाँहों और पैरों से मुझे बिल्कुल बेबस कर दिया था। मुकुल ने मेरे नितंबों को फैलाकर एक जोरदार धक्का मारा।

“ऊऊईई माँआआ मर गईईई।” मेरी चीख पूरे जंगल में गूँज गई। मगर दोनों हंस रहे थे।

“विवेक… विवेक मुझे बचाओ……”

“थोड़ा सब्र करो, सब ठीक हो जाएगा। सारा दर्द खत्म हो जाएगा।” मुकुल ने मुझे समझाने की कोशिश की।

मेरी आँखों से पानी बह निकला। मैं दर्द से रोने लगी। दोनों मुझे चुप कराने की कोशिश करने लगे। मुकुल ने अपना लिंग कुछ देर तक उसी तरह रखा। कुछ देर बाद मैं जब शांत हुई तो मुकुल ने धीरे-धीरे आधा लिंग अंदर कर दिया। मैंने और विवेक ने शादी के बाद से ही खूब सेक्स का खेल खेला था, मगर उसकी नियत कभी मेरे गुदा पर खराब नहीं हुई। मगर इन दोनों ने तो मुझे कहीं का नहीं छोड़ा।

मेरी दर्द के मारे जान निकाली जा रही थी। दोनों के जिस्म के बीच सैंडविच बने हुए छटपटाने के अलावा कुछ भी नहीं कर पा रही थी। आधा लिंग अंदर कर के मुकुल मेरे ऊपर लेट गया। उसके शरीर के बोझ से बाकी बचा आधा लिंग मेरे एस होल को चीरता हुआ जड़ तक धंस गया।

ऐसा लग रहा था मानो किसी ने लोहे की गर्म सलाख मेरे गुदा में डाल दी हो। मैं दोनों के बीच सैंडविच की तरह लेटी हुई थी। एक तगड़ा लिंग आगे से और एक लिंग पीछे से मेरे बदन में ठुका हुआ था। ऐसा लग रहा था मानो दोनों लिंग मेरे बदन के अंदर एक-दूसरे को चूम रहे हों।

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कुछ देर यूं ही मेरे ऊपर लेटे रहने के बाद मुकुल ने अपने बदन को हरकत दे दी। अरुण शांत लेटा हुआ था। जैसे ही मुकुल अपने लिंग को बाहर खींचता, मेरे नितंब उसके लिंग के साथ ही खिंचे चले जाते थे। इससे अरुण का लिंग मेरी योनि से बाहर की ओर सरक जाता और फिर जब दोबारा मुकुल मेरे गुदा में अपना लिंग ठोकता तो अरुण का लिंग अपने आप ही मेरी योनि में अंदर तक घुस जाता।

उस छोटी सी जगह में तीन जिस्म गुदमुद हो रहे थे। हर धक्के के साथ मेरा सिर गाड़ी के बॉडी से भिड़ रहा था। गनीमत थी कि साइड में कुशन लगे हुए थे, वरना मेरे सिर में गूमड़ निकल आता। मुकुल के मुँह से “हुह… हुह… हुह” जैसी आवाज हर धक्के के साथ निकल रही थी। उसके हर धक्के के साथ ही मेरे फेफड़ों की सारी हवा निकल जाती और फिर मैं साँस लेने के लिए उसके लिंग के बाहर होने का इंतजार करती।

मैं दोनों के बीच पिस रही थी। मैं भी मजा लेने लगी। बीस-पच्चीस मिनट तक मुझे इस तरह चोदने के बाद एक साथ दोनों डिस्चार्ज हो गए। मेरे भी फिर से उनके साथ ही डिस्चार्ज हो गया। इस ठंड में भी हम पसीने से बुरी तरह भीग गए थे। मेरा पूरा बदन गीला-गीला और चिपचिपा हो रहा था। दोनों छेदों से वीर्य टपक रहा था।

तीनों के “आआह्ह्ह ओह्ह्ह” से पूरा जंगल गूँज रहा था। अरुण तो चोदते वक्त गंदी-गंदी गालियाँ निकालता था। हम तीनों बुरी तरह हाँफ रहे थे। मैं काफी देर तक सीट पर अपने पैरों को फैलाए पड़ी रही। मुझे दोनों ने सहारा देकर उठाया। मेरे जांघों के जोड़ पर आगे-पीछे दोनों तरफ ही जलन मची हुई थी।

दोनों के बीच मैं उसी हालत में बैठ गई। दोनों के साथ सेक्स होने के बाद अब और शर्म की कोई गुंजाइश नहीं बची थी। दोनों मेरे नग्न बदन को चूम रहे थे और अश्लील भाषा में बातें करते जा रहे थे। दोनों के लिंग सिकुड़कर छोटे-छोटे हो चुके थे।

कुछ देर बाद मुकुल ने पीछे से एक बॉक्स से कुछ सैंडविच निकाले, जो शायद अपने लिए रखे थे। हम तीनों ने उसी हालत में आपस में मिल-बाँटकर खाए। पानी के नाम पर तो बस रम की बोतल ही आधी बची थी। मुझे मन कर भी उस बोतल से दो घूँट लेने पड़े।

दो घूँट पीते ही कुछ देर में सिर घूमने लगा और बदन काफी हल्का हो गया। मैंने अपनी आँखें बंद कर लीं। मैं इस दुनिया से बेखबर थी। तभी दोनों साइड के दरवाजे खुलने और बंद होने की आवाज आई। मगर मैंने अपनी आँखें खोलकर देखने की जरूरत भी महसूस नहीं की।

मैं उसी हालत में अपनी नग्नता से बेखबर गाड़ी की सीट पर पसरी हुई थी। कुछ देर बाद वापस गाड़ी का दरवाजा खुला और मेरी बाँह को पकड़कर किसी ने बाहर खींचा। मैंने अपनी आँख खोलकर देखा कि सड़क के पास घास-फूस इकट्ठा करके एक अलाव जला रखा है। पास ही उस फटी हुई चादर को फैलाकर जमीन पर बिछा रखा था।

उस चादर पर अरुण नग्न हालत में बैठा हुआ शायद मेरा ही इंतजार कर रहा था। मुकुल मुझे खींचकर अलाव के पास ले जा रहा था। मैं लड़खड़ाते हुए कदमों से उसके साथ खिंचती जा रही थी। दो बार तो गिरने को हुई तो मुकुल ने मेरे बदन को सहारा दिया। उसके नग्न बदन की छुआन अपने नंगे बदन पर पाकर मुझे अब तक की पूरी घटना याद आ गई।

मैं उसके पंजों से अपना हाथ छुड़ाना चाहती थी, मगर मुझे लगा मानो बदन में कोई जान ही नहीं बची है। मेरे अलाव के पास पहुँचते ही अरुण ने अपना हाथ बढ़ाकर मुझे अपनी में खींच लिया। मुकुल भी वहीं आकर बैठ गया। दोनों वापस मेरे नग्न बदन को मसलने-कचोटने लगे। मेरे एक-एक अंग को तोड़-मरोड़कर रख दिया।

थकान और नशे से वापस मेरी आँखें बंद होने लगीं। दोनों एक-एक स्तन पर अपना हक जमाने की कोशिश कर रहे थे। दोनों की दो-दो उँगलियाँ एक साथ मेरी योनि के अंदर-बाहर हो रही थीं। मैं उत्तेजना से तड़पने लगी। मैं दोनों के सिरों को जकड़कर अपनी छातियों पर भींच रही थी।

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अरुण घुटने के बल उठा और मेरे सिर को बालों से पकड़कर अपने लिंग पर दबा दिया। वीर्य से सने उसके लिंग को मैंने अपना मुँह खोलकर अंदर जाने का रास्ता दिया। मैं उनके लिंग को चूसने लगी और मुकुल मेरी योनि और नितंबों पर अपनी जीभ फेरने लगा। ये कहानी आप हमारी वासना पर पढ़ रहे है.

मुझे दोनों ने हाथों और पैरों के बल पर किसी जानवर की तरह झुकाया और अरुण मेरे सामने से आकर अपना लिंग वापस मेरे मुँह में डाल दिया। तभी मुकुल ने वापस अपने लिंग को मेरी योनि के अंदर डाल दिया। दोनों एक साथ मेरे आगे और पीछे से धक्का मारते और मैं बीच में फंसी दर्द से कराह उठती।

इस तरह जो संभोग चालू हुआ, तो घंटों चलता रहा। दोनों ने मुझे रात भर बुरी तरह झिंझोर दिया। कभी आगे से, कभी पीछे से, कभी मुँह में तो कभी मेरी दोनों छातियों के बीच, हर जगह जी भरकर मालिश की। मेरे पूरे बदन पर वीर्य का मानो लेप चढ़ा दिया। पूरा बदन वीर्य से चिपचिपा हो रहा था।

ना तो उन्होंने इसे पोंछा और न मुझे ही अपने बदन को साफ करने दिया। दोनों मुझे तब तक रोंदते रहे, जब तक न संभोग करते-करते वे निढाल होकर वहीं पड़ गए। मैं तो मानो कोमा में थी। मेरे बदन के साथ जो कुछ हो रहा था, मुझे लग रहा था मानो कोई सपना हो।

दोनों आखिर निढाल होकर वहीं लुढ़क गए। रात को कभी किसी की आँख खुली तो मुझे कुछ देर तक झिंझोरने लगता। पता ही नहीं चला कब भोर हो गई। अचानक मेरी आँख खुली तो देखा चारों ओर लालिमा फैल रही है। मैं दोनों की गोद में बिल्कुल नग्न लेटी हुई थी।

मेरा नशा खत्म हो चुका था। मुझे अपनी हालत पर शर्म आने लगी। मुझे अपने आप से नफरत होने लगी। किस तरह मैंने उन्हें अपनी मनमानी कर लेने दी। जी में आ रहा था कि वहीं से कोई पत्थर उठाकर दोनों के सिर फोड़ दूँ। मगर उठने लगी तो लगा मानो मेरा निचला बदन सुन्न हो गया हो। दर्द की अधिकता के कारण मैं लड़खड़ा कर वापस वहीं पसर गई।

मेरे गिरने से दोनों चौंककर उठ बैठे और मेरी हालत देखकर मुस्कुरा दिए। मेरे फूल से बदन की हालत बहुत ही बुरी हो रही थी। जगह-जगह लाल-नीले निशान पड़े हुए थे। मेरे स्तन दर्द से सूजे हुए थे। दोनों ने सहारा देकर मुझे उठाया। मुकुल मुझे अरुण की बाँहों में छोड़कर मेरे कपड़े ले आया।

तब तक अरुण मेरे नग्न शरीर से लिपटा हुआ मेरे होंठों को चूमता रहा। एक हाथ मेरे स्तनों को मसल रहे थे तो दूसरा हाथ मेरी जांघों के बीच मेरी योनि को मसल रहा था। दोनों ने मिलकर मुझे कपड़े पहनने में मदद की, मगर अरुण ने मुझे मेरी ब्रा और पैंटी वापस नहीं की।

उन दो कपड़ों को उसने हमारे संभोग की यादगार के रूप में अपने पास रख लिया। मैंने बोलेरो में बैठकर बैक मिरर पर नजर डाली तो अपनी हालत देखकर रो पड़ी। होंठ सूज रहे थे, चेहरे पर वीर्य सूखकर सफेद पपड़ी बना रहा था। मुझे अपने आप से घिन आ रही थी।

सड़क के पास ही थोड़ा पानी जमा हुआ था, जिससे अपना चेहरा धोकर अपने आप को व्यवस्थित किया। दोनों मुझे अपने बदन से उनके दिए निशानों को मिटाने की नाकाम कोशिश करते देख रहे थे। अरुण मेरे बदन से लिपटकर मेरे होंठों को चूम लिया। मैंने उसे धकेलकर अपने से अलग किया।

“मुझे अपने घर वापस छोड़ दो।” मैंने गुस्से से कहा।

अरुण ने सामने की सीट पर बैठकर जीप को स्टार्ट किया। जीप एक ही झटके में स्टार्ट हो गई।

“ये… ये तो एक बार में ही स्टार्ट हो गई…”

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मैंने उनकी तरफ देखा तो दोनों को मुझ पर मुस्कुराते हुए पाया। मैं समझ गई कि यह सब दोनों की मिलीभगत थी। मुझे चोदने के लिए ही सुनसान जगह में ले जाकर गाड़ी खराब कर दी। सारा दोनों की मिली-जुली प्लानिंग का हिस्सा था। मैं चुपचाप बैठी रही और दोनों को मन ही मन कोसती रही। घंटे भर बाद हम घर पहुँचे। रास्ते में भी दोनों मेरे उरोजों पर हाथ फेरते रहे।

मगर मैंने दोनों को गुस्से से अपने बदन से अलग रखा। हम जब तक घर पहुँचे, विवेक अपने काम पर निकल चुका था, जो मेरे लिए बहुत ही अच्छा रहा, वरना उसको मेरी हालत देखकर साफ पता चल जाता कि रात भर मैंने क्या-क्या गुल खिलाए हैं। मेरे लिए उसकी गहरी आँखों को सफाई देना भारी पड़ जाता। मैंने दरवाजा खोला और अंदर गई। दोनों मेरे पीछे-पीछे अंदर आ गए। मैं उन्हें रोक नहीं पाई।

“मैं बाथरूम में जा रही हूँ नहाने के लिए। तुम वापस जाते समय दरवाजा भिड़ा देना।”

“जानेमान, इतनी जल्दी भी क्या है। अभी एक-एक राउंड और खेलने का मन हो रहा है।” अरुण ने बदतमीजी से अपने दाँत निकाले।

“नहीं… चले जाओ, नहीं तो मैं विवेक को बता दूंगी। विवेक को पता चल गया तो वो तुम दोनों को जिंदा नहीं छोड़ेगा।” मैंने दोनों की ओर नफरत से देखा।

“अरे नहीं जानेमान, तुम हम मर्दों से वाकिफ नहीं हो। अभी अगर जाकर मैंने कह दिया कि तुम्हारी बीवी सारी रात हमारे साथ गुलछर्रे उड़ाने के लिए रात भर हमारे पास रुक गई तो तुम्हारा हसबैंड हमें ही सही मानेगा। देती रहना तुम अपनी सफाई। हाहाहा…”

अरुण मेरी बेबसी पर हंस रहा था। मुझे लग रहा था कि अभी दोनों का गला दबा दूँ। मैं चुपचाप खड़ी फटी-फटी आँखों से उसे देखती ही रह गई।

“जाओ जानेमान, नहा लो… बदन से पसीने की बू आ रही है। नहा-धोकर तैयार रहना। और हाँ, बदन पर कोई भी कपड़ा नहीं रहे। हम कुछ देर में तुम्हारे पतिदेव से मिलकर आते हैं। जाने से पहले एक बार तुम्हारे बदन को और अपने पानी से भिगोकर जाएंगे।”

मैं चुपचाप खड़ी रही।

“अगर तूने हमारी बातों को नहीं माना तो कल तक सारा अस्पताल जान जाएगा कि डॉक्टर अनीशा अपनी सहेली के पति और उसके दोस्त के साथ रात भर रंगरलियाँ मना कर आ रही है। तुम्हारी ये ब्रा और पैंटी मेरी बातों को साबित करेंगे।”

मैं ठगी सी देखती रह गई। कुछ भी नहीं कह पाई। दोनों हँसते हुए कमरे से निकल गए। मैं दरवाजा बंद करके अपनी बेबसी पर रो पड़ी। कुछ देर तक बिस्तर पर पड़ी रही, फिर उठकर मैं बाथरूम में घुसकर शावर के नीचे अपने बदन को खूब रगड़-रगड़कर नहाई। मानो उन दोनों के दिए हर निशान को मिटा देना चाहती हूँ। ये कहानी आप हमारी वासना पर पढ़ रहे है.

बाहर निकलकर मैंने कपड़ों की ओर हाथ बढ़ाए। मगर दोनों की हिदायत याद करके रुक गई। मैं कुछ देर तक असमंजस में रही। मैं अकेले में भी कभी घर में नग्न नहीं रही थी। फिर आज… खैर, मैंने एक विवेक के सामने से पूरा खुल जाने वाला गाउन पहना और बिस्तर पर जाकर लुढ़क गई।

अभी नींद का एक झोंका आया ही था कि डोर बेल की आवाज से नींद खुल गई। मैंने उठकर घड़ी की तरफ निगाह डाली। सुबह के दस बज रहे थे। दोनों को गए हुए एक घंटा हो चुका था। इसका मतलब है कि दरवाजे पर दोनों ही होंगे।

मैं दरवाजे पर जाकर अपने गाउन की डोर खींचकर खोल दी। गाउन को अपने बदन से हटाना ही चाहती थी कि अचानक ये विचार कौंध गया कि अगर दोनों के अलावा कोई और हुआ तो? अगर उनकी जगह विवेक ही हुआ तो… क्या सोचेगा मुझे इस रूप में देखकर? …मेरे बदन पर बने अंगिनत नाखूनों और दाँतों के निशान देखकर?

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“कौन है?” मैंने पूछा।

“हम हैं जानेमान… तुम्हारे आशिक।” बाहर से आवाज आई।

मेरे पूरे बदन में एक नफरत की आग जलने लगी। मैंने एक लंबी साँस ली और अपने गाउन को अपने बदन से अलग होकर जमीन पर गिर जाने दिया। और दरवाजे की साँकल नीचे कर दी। दोनों दरवाजे को खोलकर अंदर आ गए। मुझे इस रूप में देखकर दोनों तो बस पागल ही हो गए।

मैं ना-नुकुर करती रही, मगर मेरी मिन्नतों को सुनने का किसी के पास टाइम नहीं था। दोनों अंदर आकर दरवाजे को अंदर से बंद किया। अरुण ने एक झटके से मेरे नंगे बदन को अपनी गोद में उठाकर बेडरूम में ले गया। मुझे बेड पर लिटाकर दोनों अपने कपड़े खोलने लगे।

“जान, आज हम तुझे तेरे उसी बिस्तर पर चोदेंगे, जिस पर तू आज तक अपने विवेक से ही चुदती आई होगी।” अरुण ने कहा, “जरा हम भी तो देखें कि विवेक को कितना मजा आता होगा तेरे इस नाजुक बदन को मसलने में।”

दोनों पूरी तरह नग्न होकर बिस्तर पर चढ़ गए। मुझे चित लिटाकर मुकुल मेरी टांगों के बीच आ गया और अपना लिंग मेरी योनि में एक झटके में डालकर मुझे जोर-जोर से चोदने लगा। पूरी योनि रात भर की चुदाई से सूजी हुई थी। उस पर से मुकुल का मोटा लिंग किसी तरह का रहम देने के मूड में नहीं था।

ऐसा लग रहा था जैसे कोई मेरी योनि को किसी सैंड पेपर से घिस रहा हो। अरुण उसे खींचकर मुझ पर से हटाना चाहा। पहले मेरी योनि की चढ़ाई वो ही करना चाहता था, मगर मुकुल ने कहा, “इस बार तो पहले वो ही चोदेगा।” और उसने हटने से साफ-साफ इनकार कर दिया।

अरुण जब मुझ पर से मुकुल को नहीं हटा पाया तो मेरे स्तनों पर टूट पड़ा। मुकुल मुझे जोर-जोर से चोदने में लगा था। उसके हर धक्के के साथ पूरा बिस्तर हिल जाता था। एक तो पूरी रात चुदाई की थकान और ऊपर से दुखता हुआ बदन, इस बार तो मैं दर्द से दोहरी हुई जा रही थी। मुँह से लगातार दर्द भरी आवाजें और चीखें निकल रही थीं। “फ्फ… हह… ओओह्ह” जैसी आवाजों से कमरा गूँज रहा था।

“मैं इसके पीछे घुसाता हूँ, तू उसके बाद इसकी योनि में अपना लंड ठोकना। दोनों साथ-साथ ठोकेंगे इसे।” अरुण ने कहा।

तो मुकुल ने अपना लिंग मेरी योनि से निकाल लिया। अरुण ने मुझे घुमाकर पेट के बल लिटा दिया और मेरे नितंबों के नीचे अपने हाथ देकर मेरे बदन को कुछ ऊपर खींचा। मेरे बदन में अब उनका किसी भी तरह का विरोध करने की न तो कोई ताकत बची थी और न ही कोई इच्छा।

मैंने अपना बदन ढीला छोड़ रखा था। दोनों जैसे चाह रहे थे, मेरे बदन को उस तरह से भोग रहे थे। अरुण अपने लिंग को मेरे गुदा पर सेट करके मेरे ऊपर लेट गया। उसे इसमें मुकुल मदद कर रहा था। मुकुल ने अपने हाथों से मेरी टांगें फैलाकर मेरे दोनों नितंबों को अलग करके अरुण के लिंग के लिए रास्ता बनाया।

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उसके लेटने से अरुण का लिंग मेरे गुदा द्वार को खोलता हुआ अंदर चला गया। आज ही इसकी सील मुकुल ने तोड़ दी थी, इसलिए इस बार ज्यादा दर्द नहीं हुआ। मुझे उसी अवस्था में अरुण कुछ देर तक चोदता रहा। उसके हाथ नीचे जाकर मेरे स्तनों को वापस निचोड़ने लगे। कुछ देर बाद उसी अवस्था में अपने लिंग को अंदर डाले-डाले अरुण घूम गया। अब मेरा चेहरा छत की तरफ हो गया था। नीचे से अरुण का लिंग मेरे गुदा में धंसा हुआ था।

“अरुण, कुछ बचा भी है इन दूध की बोतलों में? आज इनको भरने की तैयारी करते हैं। देखते हैं दोनों में से कौन बनता है इसके बच्चे का बाप। जब इन बोतलों में दूध आएगा तो ये खुशी-खुशी हमारे लंड को नहलाएगी अपने दूध से।”

मुकुल हंस रहा था। उसने मेरी योनि की फाँकों को अपनी उँगलियों से अलग किया और अपने लिंग को अंदर डाल दिया। वापस मैं दोनों के बीच सैंडविच बनी हुई थी। दोनों ओर से एक-एक लिंग मेरे बदन को पीस रहे थे। दोनों एक साथ अपने लिंग ठोकने लगे। तभी अरुण ने हाथ बढ़ाकर टेलीफोन उठाया। ये कहानी आप हमारी वासना पर पढ़ रहे है.

“अरे मैं तो तुझे कहना ही भूल गया था। विवेक बात करना चाहता है तुझसे। कह रहा था कि अनीशा से मेरी बात करवा देना।”

इससे पहले कि मैं “न्नाही…… नहीं… अभी… नहीं… प्लीज… इस हालत में… नहीं…” कहकर उसे मना करती, अरुण ने नंबर डायल कर दिया था। और उसका रिसीवर मेरे कान पर लगा दिया। हारकर मैंने हाथ बढ़ाकर रिसीवर अपने हाथों में ले लिया।

“Hello…”

दूसरी ओर से विवेक की आवाज आई तो मेरी आँखों से आँसू आ गए। मैं चुप रही। दोनों पूरी ताकत से मुझे चोद रहे थे।

“Hello…” विवेक ने दोबारा कहा तो मैंने भी जवाब दिया, “Hello… विवेक… हह… हह… मैं अनीशा। मैं घर पहुँच गई हूँ।”

“ठीक तो हो ना? रास्ते में कोई परेशानी तो नहीं हुई?”

“नहीं, कोई परेशानी… ऑफ्फ… कोई परेशानी नहीं हुई… आह… मैं ठीक हूँ… तुम हह हह परेशान मत होना।”

“तुम्हारी बातों से तो लग रहा है कि तुम्हारी तबीयत ठीक नहीं है। तुम इतनी हाँफ क्यों रही हो?”

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“अरे कुछ नहीं… सुबह गाड़ी को काफी धक्का लगाना पड़ा, इसलिए अभी तक हाँफ रही हूँ। थकान के कारण ही पूरा बदन दर्द कर रहा है। कोई बात नहीं, अभी कोई पेनकिलर ले लेती हूँ, शाम तक ठीक हो जाऊंगी। हम्म… आह्ह तुम परेशान मत होना।”

कहकर मैंने जल्दी से फोन काट दिया। ज्यादा बात करने से मेरी हालत का पता चल जाने का डर था। दोनों कुछ देर बाद अपने-अपने लिंग से ढेर सारा वीर्य मेरे दोनों छेदों में भरकर मेरे बदन पर से उठ गए। दोनों अपने कपड़े पहने और वापस चले गए।

मैं किसी तरह लड़खड़ाती हुई उठी और उसी हालत में दरवाजे तक आकर उसे बंद किया और दौड़कर वापस बाथरूम में घुस गई। दोनों छेदों से उनका रस रिसता हुआ जांघों तक पहुँच गया था। मैंने वापस पानी से अपने बदन को साफ किया और बिस्तर में आकर पड़ गई। कब मेरी आँख लगी, पता ही नहीं चला। जब आँख खुली तब शाम हो चुकी थी। मैंने पेनकिलर लेकर अपने दुखते बदन को कुछ नॉर्मल किया, जिससे विवेक को पता नहीं चले। और तैयार होकर विवेक का इंतजार करने लगी।

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