Hindi Sasur Bahu Sex
प्रतिभा नई-नवेली दुल्हन के रूप में सजी-सजाई सुहागरात मनाने की तैयारी में अपने पलंग पर बैठी थी। थोड़ा सा घूँघट निकाल रखा था जिसे दो उँगलियों से उठाकर बार-बार कमरे के दरवाजे की ओर देख लेती। उसे बड़ी बेसब्री से इंतजार था अपने पति के आने का। Hindi Sasur Bahu Sex
सोच में डूबी थी कि वह आकर धीरे से उसका घूँघट उठाएगा और कहेगा, “वाह! कितनी खूबसूरत हो तुम,” और फिर उसे आलिंगन-बद्ध करके उसके ओठ चूमेगा, फिर गाल, फिर गला और फिर धीरे-धीरे थोड़ा सा नीचे… और नीचे… फिर और नीचे… फिसलता हुआ नाभि तक उतरेगा… और फिर उसके बाद क्या होगा, इसकी कल्पना में डूबी रहते उसे काफी देर हो चली। रात के ग्यारह बज गए। उसकी निगाहें दरवाजे पर ही टिकी हुई थीं।
लगभग आधे घंटे के बाद किसी ने दरवाजे की कुंडी खटखटाई और उसके पति-देव ने अपनी मुँह-बोली भाभी के साथ कक्ष में प्रवेश किया। पति अरुण आकर दुल्हिन के पलंग पर बैठ गया। भाभी बोली, “देख बहू, कहने को तो मैं तेरे पति की मुँह-बोली भाभी हूँ, पर समझती हूँ बिलकुल अपने सगे देवर जैसा ही।”
वह धीरे से उसके कान में फुसफुसाई, “देवर जी जरा शर्मीले मिजाज के हैं। आज की रात पहल तुझे ही करनी पड़ेगी। बाद में सब ठीक-ठाक हो जाएँगे।”
उसके जाने के बाद प्रतिभा ने उठकर कुंडी लगा ली। अरुण चुपचाप यों ही बुत बना बैठा रहा। प्रतिभा उसके पास खिसकी कि वह मुँह फेरकर सो गया। प्रतिभा काफी देर तक सोचती रही कि अब उठेगा और उसे अपनी बाँहों में लेकर उसके चुंबन लेगा… फिर उससे कहेगा ‘चलो, सोते हैं। सारे दिन की थकी-हारी होगी।’ और फिर अपने साथ लेटने को कहेगा। वह थोड़े-बहुत नखरे दिखाकर उसके साथ सुहागरात मनाने को राजी हो जाएगी। प्रतिभा को सोचते-सोचते न जाने कब नींद आ गई।
जब घड़ी ने दो बजाए तो उसकी दोबारा आँखें खुल गईं। उसने उसी प्रकार लेटे-लेटे धीरे से अपनी एक टाँग पति के ऊपर रख दी। पति हल्का सा कुनमुनाकर फिर से सो गया। रात बीतती जा रही थी। प्रतिभा प्रथम रात्रि के खूबसूरत मिलन की आस लिए छटपटा रही थी। प्रतिभा के सब्र का बाँध टूटने लगा।
मन में तरह-तरह की शंकाएँ उठने लगीं—‘कहीं उसका पति नपुंसक तो नहीं, वरना अब तक तो उसकी जगह कोई भी होता तो उसके शरीर के चिथड़े उड़ा देता।’ उसके मन में आया कि क्यों न पति के पुरुषत्व की जाँच कर ली जाए। उसने धीरे से सोता-नींदी का अभिनय करते हुए अपना एक हाथ अरुण की जाँघों के बीचो-बीच रख दिया।
उसे कोई कड़ी सी चीज उभरती सी प्रतीत हुई। प्रतिभा ने अंदाजा लगा लिया कि कम से कम वह नपुंसक तो नहीं है। आखिर फिर क्यों वह अब तक चुपचाप पड़ा है। उसे भाभी की बात याद आ गई—‘बहू, हमारे देवर जी जरा शर्मीले मिजाज के हैं। आज की रात पहल तुझे ही करनी पड़ेगी।’ चलो, मैं ही कुछ करती हूँ।
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वह पति से बोली, “क्यों जी, ऐसा नहीं हो सकता कि मैं तुमसे चिपटकर सो जाऊँ। नया घर है, नई जगह, मुझे तो डर सा लग रहा है।”
“ठीक है, सो जाओ। मगर मेरे ऊपर अपनी टाँगें मत रखना।”
“क्यों जी, आपकी पत्नी हूँ, कोई गैर तो नहीं हूँ।”
अरुण कुछ न बोला। पत्नी उससे चिपक गई। दोनों की साँसें टकराने लगीं। प्रतिभा पर मस्ती सी छाने लगी। उसने धीरे से अपनी एक टाँग उठाकर चित्त लेटे हुए पति पर रख दी। इस बीच उसने फिर कोई सख्त सी चीज अपनी जाँघ पर चुभती महसूस की। वह बोली, “ऐसा करते हैं, मैं करवट लेकर सो जाती हूँ। तुम मेरे ऊपर अपनी टाँग रखो, मुझे अच्छा लगेगा।”
ऐसा कहकर प्रतिभा ने पति की ओर अपनी पीठ कर दी। अरुण कुछ बोला नहीं, पर उसने पत्नी के कूल्हे पर अपनी एक टाँग रख दी। प्रतिभा को इसमें बड़ा ही अच्छा लग रहा था क्योंकि अब वह पति की जाँघों के बीच वाली चीज अपने नितंबों के बीचो-बीच गड़ती हुई सी महसूस कर रही थी। इसी को पाने के लिए ही तो बेचारी घंटों से परेशान थी। आज उसका पति जरूर उसके मन की बात समझकर रहेगा। अगर नहीं भी समझा तो समझाकर रहूँगी।
प्रतिभा से अब अपने यौवन का बोझ कतई नहीं झेला जा रहा था। वह चाह रही थी कि उसका पति उसके तन-बदन को किसी रसदार नींबू की तरह निचोड़ डाले। खुद भी अपनी प्यास बुझा ले और अपनी तड़पती हुई पत्नी के जिस्म की आग भी ठंडी कर दे। अत: उसने पति का हाथ पकड़कर अपने सीने की गोलाइयों से छुआते हुए कहा, “देखो जी, मेरा दिल कितनी तेजी से धड़क रहा है।”
अरुण ने पत्नी की छातियों के भीतर तेजी से धड़कते हुए दिल को महसूस किया और बोला, “ठहरो, मैं अभी पापा को उठाता हूँ। उनके पास बहुत सारी दवाइयाँ रहती हैं। तुम्हें कोई-न-कोई ऐसी गोली दे देंगे कि तुम्हारी ये धड़कन कम हो जाएगी।”
प्रतिभा घबरा उठी, बोली, “अरे नहीं, जब पति-पत्नी पहली रात को साथ-साथ सोते हैं तो ऐसा ही होता है।”
“तो फिर मेरा दिल क्यों नहीं धड़क रहा? देखो, मेरे दिल पर हाथ रखकर देखो।”
प्रतिभा बोली, “तुम लड़की थोड़े ही हो, तुम तो लड़के हो। तुम्हारी भी कोई चीज फड़क रही है, मुझे पता है।” प्रतिभा मुस्कुराते हुए बोली।
अरुण बोला, “पता है तो बताओ, मुझे क्या हो रहा है?”
प्रतिभा ने फिर पूछा, “बताऊँ, बुरा तो नहीं मानोगे?”
“नहीं मानूँगा, चलो बताओ?”
प्रतिभा ने पति की जाँघों के बीच के बेलनाकार अंग को अपनी मुट्ठी में पकड़कर कहा, “फिर ये क्या चीज है जो बराबर मेरी पीठ में गड़ रही है? कहीं किसी का बिना बात में तनता है क्या?”
अरुण सचमुच झेंप सा गया और बोला, “मेरा तो कुछ भी नहीं है, पड़ोस वाले भैया का तो इतना लंबा और मोटा है कि देख लोगी तो डर जाओगी।”
प्रतिभा ने पूछा, “तुम्हें कैसे पता कि उनका बहुत मोटा और लंबा है? तुमने क्या देखा है उनका?”
अरुण थोड़ा रुका फिर बोला, “हाँ, मैंने देखा है उनका। एक बार मैं अपनी खिड़की से बाहर की ओर झाँक रहा था कि अचानक मेरी निगाह उनके कमरे की ओर उठ गई। मैंने देखा कि भैया भाभी को बिलकुल नंगा करके…”
“क्या कर रहे थे भाभी को बिलकुल नंगा करके?” प्रतिभा को इन बातों में बड़ा आनंद आ रहा था, बोली, “बताओ न, तुम्हें मेरी कसम है।”
अरुण ने प्रतिभा के मुँह पर हाथ रख दिया और नाराज होता हुआ बोला, “आज के बाद मुझे कभी अपनी कसम मत देना।”
“क्यों?” प्रतिभा ने पूछा।
अरुण बोला, “एक बार मुझे मेरी माँ ने अपनी कसम दी थी, वो मुझसे हमेशा के लिए दूर चली गईं।”
“इसका मतलब है तुम नहीं चाहते कि मैं तुमसे दूर चली जाऊँ?”
अरुण खामोश रहा। प्रतिभा ने कहा, “अगर तुम मेरी बात मानोगे तो मैं तुम्हें कभी अपनी कसम नहीं दूँगी, बोलो मानोगे मेरी बात?”
अरुण ने धीमे स्वर में हामी भर दी। प्रतिभा बोली, “फिर बताओ न, क्या किया भैया ने भाभी के साथ उन्हें नंगा करके?”
अरुण बोला, “पहले भैया ने भाभी को बिलकुल नंगा कर डाला, और फिर खुद भी नंगे हो गए। फिर उन्होंने एक तेल की शीशी उठाकर भाभी की जाँघों के बीच में तेल लगाया। तब उन्होंने अपने उस पर भी मसला।”
“किस पर मसला?” प्रतिभा बातों को कुरेदकर पूरा-पूरा मजा ले रही थी, साथ ही पति के मोटे बेलनाकार अंग पर भी हाथ फेरती जा रही थी। “बताओ, किस पर मसला?”
“अरे, अपने बेलन पर मसला और किस पर मसलते!”
“फिर आगे क्या हुआ?”
“होता क्या… उन्होंने अपना बेलन भाभी की जाँघों के बीच में घुसेड़ दिया… और फिर वो काफी देर तक अपने बेलन को आगे-पीछे करते रहे… भाभी मुँह से बड़ी डरावनी आवाजें निकाल रही थीं। ऐसा लग रहा था कि भाभी को काफी दर्द हो रहा था। मगर… फिर वह भैया को हटाने की बजाय उनसे चिपट क्यों रही थीं, ये बात मेरी समझ में आज तक नहीं आई।”
प्रतिभा बोली, “मेरे भोले पति-देव, ये बात तुम तब समझोगे जब तुम किसी के अंदर अपना ये बेलन डालोगे।”
अरुण ने पूछा, “किसके अंदर डालूँ?”
प्रतिभा बोली, “मैं तुम्हारी बीबी हूँ। मेरी जाँघों के बीच में डालकर देखो, मुझे मजा आता है या मुझको दर्द होता है?”
“ना बाबा ना, मुझे नहीं डालना तुम्हारी जाँघों के बीच में अपना बेलन। तुम्हें दर्द होगा तो तुम रोओगी।”
प्रतिभा बोली, “अगर मैं वादा करूँ कि नहीं रोऊँगी तो करोगे अपना बेलन मेरे अंदर?”
“मुझे शर्म आती है।”
प्रतिभा ने पति की जाँघों के बीच फनफनाते हुए उसके बेलन को पकड़ लिया और उसे धीरे-धीरे सहलाने लगी। अरुण का बेलन और भी सख्त होने लगा। प्रतिभा बोली, “अच्छा, मेरी एक बात मानो। आज की रात हम पति-पत्नी की सुहाग की रात है। अगर आज की रात पति अपनी पत्नी की बात नहीं मानेगा तो पत्नी मर भी सकती है। बोलो, क्या चाहते हो मेरी जिंदगी या मेरी मौत?”
“मैं तुम्हारी जिंदगी चाहता हूँ।”
“तो दे दो फिर मुझे जिंदगी।” प्रतिभा बोली।
“आ जाओ मेरे ऊपर और मसलकर रख दो मुझ अनछुई कच्ची कली को।” अरुण डर गया और शरमाते हुए पत्नी के ऊपर आने लगा। प्रतिभा बोली, “रुको, ऐसे नहीं, पहले अपने सारे कपड़े उतारो।” अरुण ने वैसा ही किया। जब वह नंगा होकर पत्नी के ऊपर आया तो उसने पाया कि उसकी पत्नी प्रतिभा पहले से ही अपने सारे कपड़े उतारकर नंगी पड़ी थी। ये कहानी आप हमारी वासना डॉट नेट पर पढ़ रहे है.
प्रतिभा ने अरुण से कहा, “अब शुरू करो न।” प्रतिभा ने अपनी छातियों को खूब सहलवाया और उसका हाथ अपनी जाँघों के बीच में ले जाकर अपनी सुलगती सुरंग को भी सहलवाया। अरुण बेचारा… एक छोटे आज्ञाकारी बच्चे की भाँति पत्नी के कहे अनुसार वो सब-कुछ किए जा रहा था जैसा वह आदेश दे रही थी।
अब बारी आई कुछ खास काम करने की। प्रतिभा ने पति का लंड पकड़कर सहलाना शुरू कर दिया और उस पर तेल लगाकर मालिश करने लगी। अगले ही क्षण उसने पति के तेल में डूबे हथियार को अपनी सुलगती हुई भट्टी में रख लिया और पति से जोरों से धक्के मारने को कहा। तेल का चुपड़ा लंड घचाक से आधे से ज्यादा अंदर घुस गया।
“उई माँ मर गई मैं तो…” प्रतिभा तड़प उठी और सुबकते हुए पति से बोली, “आखिर फाड़ ही डाली न, तुम्हारे इस लोहे के डंडे ने मेरी सुरंग।” अगले ही पल बाकी का आधा लंड भी बुर में जा समाया। उसकी बुर बुरी तरह से आहत हो चुकी थी। योनी-द्वार से खून का एक फव्वारा सा फूट पड़ा… पर इस दर्द से कहीं ज्यादा उसे आनंद की अनुभूति हो रही थी… वह पति को तेज और तेज रफ्तार बढ़ाने का निर्देश देने से बाज नहीं आ रही थी। आह! आज तो मजा आ गया सुहागरात का।
पति ने पूछा, “अगर दर्द हो रहा है तो निकाल लूँ अपना डंडा बाहर।”
“नहीं, बाहर मत निकालो अभी… बस घुसेड़ते रहो अपना डंडा मेरी गुफा में अंदर-बाहर… जोरों से… आह, और जोर से, आज दे दो अपनी मर्दानगी का सबूत मुझे… आह, अरुण, अगर तुम पूरे दिल से मुझे प्यार करते हो तो आज मेरी इस सुलगती भट्टी को फोड़ डालो…”
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अरुण को भी अब काफी आनंद आ रहा था, वह बढ़-चढ़कर पूरा मर्द होने का परिचय दे रहा था। लगभग आधे घंटे की लिंग-बुर की इस लड़ाई में पति-पत्नी दोनों ही मस्ती में भर उठे। कुछ देर के लगातार घर्षण ने प्रतिभा को पूरी तरह तृप्त कर दिया। बाकी की रात दोनों एक-दूजे से यों ही नंगे लिपटे सोते रहे।
सुबह आठ बजे तक दोनों सोते रहे। जब प्रतिभा के ससुर बनारसी दास ने आकर द्वार खटकाया तब दोनों ने जल्दी से अपने-अपने कपड़े पहने और प्रतिभा ने आकर कुंडी खोली। सामने ससुर बनारसी दास को खड़े देख उसने जल्दी से सिर पर पल्लू रखा और उसके पैर छुए। “सदा सुखी रहो बहू!” कहकर ससुर बनारसी दास बाहर चला गया।
प्रतिभा ने अपने ससुर के यहाँ आकर केवल दो लोगों को ही पाया। एक तो उसका बुद्धू, अनाड़ी पति और दूसरा उसका ससुर बनारसी दास। सास, ननद, जेठ, देवर के नाम पर उसने किसी को नहीं देखा। वह अपने अनाड़ी पति के बारे में सोचती तो उसे अपने भाग्य पर बहुत ही क्रोध आता।
किन्तु अब हो भी क्या सकता था। फिर वह सब्र कर लेती कि चलो बस औरतों के मामले में ही तो अरुण शर्मीला है। बाकी न तो पागल है और न ही कम-दिमाग है। वैसे तो हर अच्छे-बुरे का ज्ञान है ही उसे। वह सोचने लगी कि अगर कल रात वह स्वयं पहल न करती तो सारी रात यों ही तड़पना पड़ता उसे।
सुहागरात से ही प्रतिभा के तन-बदन में आग सी लगी हुई थी। हालाँकि उसके पति ने उसे संतुष्ट करने में कोई कसर बाकी नहीं रखी थी। उसने जैसा कहा बेचारा वैसा ही करता रहा था सारी रात, किन्तु फिर भी प्रतिभा के जिस्म की प्यास पूरी तरह से नहीं बुझ पाई थी। वह तो चाहती थी कि सुहाग की रात उसका पति उसके जवान व नंगे जिस्म की एक-एक पर्त हटाकर उसकी जवानी का भरपूर आनंद लेता, किन्तु अरुण ने तो उसे नंगा देखने तक से मना कर दिया था।
सुबह जब अरुण उठा तब से ही उसकी तबीयत कुछ खराब सी हो रही थी। वह सुबह खेतों में चला तो गया परन्तु अनमने और अलसाए हुए मन से। दूसरी रात फिर पत्नी ने छेड़खानी शुरू कर दी। वह रात भर उसे अपनी ओर आकर्षित करने के नए-नए उपाय करती रही मगर अरुण टस से मस न हुआ। हार-झाँक मारकर वह सो गई।
तीसरी रात को अरुण ने कहा, “प्रतिभा मुझे परेशान न करो, मेरी तबीयत ठीक नहीं है।”
प्रतिभा ने अरुण के बदन को छूकर देखा, उसे सचमुच बुखार था। प्रतिभा ने माथे पर पानी की गीली पट्टी रखकर सुबह तक बुखार तो उतार दिया, फिर भी वह स्वयं को ठीक महसूस नहीं कर रहा था। अरुण को डॉक्टर को दिखाया गया। डॉक्टर ने बताया कि कोई खास बात नहीं है।
अधिक परिश्रम करने के कारण उसको कमजोरी आ गई है। तीन दिन के बाद अरुण का बुखार उतर गया। प्रतिभा के मन में लड्डू फूटने लगे। आज की रात तो बस अपनी सारी इच्छाएँ पूरी करके ही दम लेगी। आज तो वह पति के आगे पूरी नंगी होकर पसर जाएगी, फिर देखें कैसे वह मना करेगा।
रात हुई, प्रतिभा पूरी तैयारी के साथ उसके साथ लेटी थी। धीरे-धीरे उसका हाथ पति की जाँघों तक जा पहुँचा। अरुण ने एक बार को उसे रोकना भी चाहा किन्तु वह अपनी पर उतर आई। उसने पति के लंड को कसकर अपनी मुट्ठी में पकड़ लिया और कहने लगी, “अगर इतनी ही शर्म आती है तो फिर मुझसे शादी ही क्यों की थी। आज मैं तुम्हें वो सारी चीजें दिखाऊँगी जिनसे तुम दूर भागना चाहते हो।”
ऐसा कहते हुए उसने अपने ऊपर पड़ी रजाई एक ओर सरका दी और बोली, “इधर देखो मेरी तरफ… बताओ तो सही मैं अब कैसी दिख रही हूँ।” अरुण ने उसकी ओर देखा तो देखता ही रह गया। “प्रतिभा तुम्हारा नंगा बदन इतना गोरा और सुंदर है! मैंने तो आज तक किसी का नंगा बदन नहीं देखा।”
अपनी आशा के विपरीत पति के वचन सुनकर प्रतिभा की बाछें खिल उठीं। उसने उछलकर पति को अपनी बाँहों में भर लिया।
अरुण बोला, “अरे, जरा सब्र करो। मुझे भी कपड़े तो उतार लेने दो। आज मैं भी नंगा होकर ही तुम्हारा साथ दूँगा।” वह अपने कुरते के बटन खोलता हुआ बोला।
तब तक प्रतिभा ने उसके पायजामे का नाड़ा खोल दिया और उसे नीचे खिसकाने लगी।
“अरे, अरे, रुको भी भई। जरा तो धीरज रखो। आज भी मैं वही करूँगा जो तुम कहोगी।”
“तो फिर जल्दी उतार फेंको सारे कपड़ों को… और आ चढ़ो एक अच्छे पति की तरह मेरे ऊपर।”
कपड़े उतारकर अरुण प्रतिभा के ऊपर आ गया। उसका लंड गर्म और तनतनाया हुआ था। प्रतिभा ने लपककर उसे पकड़ लिया और अपने समूचे नंगे जिस्म पर रगड़ने लगी। अपने पति को इस हाल में देख वह खुशी से फूली नहीं समा रही थी। उससे अधिक देर तक नहीं रुका गया और उसने पति के लंड को अपनी दोनों जाँघों के बीच कसकर भींच लिया.
और पति के ऊपर आकर लंड को अपने योनी-द्वार पर टिकाकर अपने अंदर घुसाने का प्रयास करने लगी। प्रतिभा ने कसकर एक जोरदार झटका दिया कि सारा का सारा लंड एक ही बार में उसकी बुर के भीतर समा गया। खुशी से उछल पड़ी वह, और फिर जोरों से धक्के मार-मारकर किलकारियाँ भरने लगी।
पर बेचारी की यह खुशी अधिक देर तक नहीं टिक सकी। दो-तीन झटकों में ही अरुण का लंड उसका साथ छोड़ बैठा। यानी एकदम खल्लास हो गया। प्रतिभा ने दोबारा उसे खड़ा करने की बहुतेरी कोशिश की पर नाकाम रही। अरुण ने उसके क्रोध को और भी बढ़ा दिया यह कहकर कि “प्रतिभा अब तुम भी सो जाओ। कल सुबह मुझे दो एकड़ खेत जोतना है।”
प्रतिभा ने झुँझलाकर कहा, “दो एकड़ खेत क्या खाक जोतोगे… पत्नी की दो इंच की जगह तो जोती नहीं जाती, कब से सूखी पड़ी है।” प्रतिभा नाराज होकर सो गई।
सुबह पड़ोस की भाभी ने पूछा, “इतनी सुबह देवर जी कहाँ जाते हैं, मैं कई दिनों से देख रही हूँ उन्हें जाते हुए।”
प्रतिभा बोली, “आजकल उन पर खेत जोतने की धुन सवार है। इसीलिए सुबह-सुबह घर से निकल पड़ते हैं।”
भाभी ने व्यंग्य कसा, “अरी बहू, तेरा खेत भी जोतता है या यों ही सूखा छोड़ रखा है।”
इस पर प्रतिभा की आँतें-पीतें सुलग उठीं किन्तु मुँह से बोली कुछ नहीं। धीरे-धीरे एक माह बीत चला, अरुण ने प्रतिभा को छुआ तक नहीं। प्रतिभा खिन्न सी रहने लगी। बनारसी दास (प्रतिभा का ससुर) प्रतिभा के अंदर आते बदलाव को कुछ दिनों से देख रहा था।
एक दिन जब बेटा खेतों पर गया हुआ था, वह प्रतिभा से पूछ ही बैठा, “बहू, तू मुझे कुछ उदास सी दिखाई पड़ती है, बेटा तू खुश तो है न, अरुण के साथ।” प्रतिभा कुछ न बोली मगर उसकी आँखों से आँसू टपकने लगे। बनारसी दास की अनुभवी आँखें तुरंत भांप गईं कि कहीं कुछ गड़बड़ तो जरूर है।
वह धीमे से उसके पास आकर बोला, “अरुण और तेरे बीच वो सब कुछ तो ठीक है न, जो पति-पत्नी के बीच होता है। समझ गई न, मैं क्या कहना चाह रहा हूँ?” प्रतिभा इस बार भी न बोली, सिर्फ आँसू बहाती रही। बनारसी दास बोला, “चल, अंदर चलकर बात करते हैं। तू अगर अपना दुखड़ा मुझसे नहीं कहेगी तो फिर किससे कहेगी।”
ससुर-बहू बाहर से उठकर अंदर कमरे में आ खड़े हुए। बनारसी दास ने बड़े ही प्यार से प्रतिभा के सिर पर हाथ फेरते हुए पूछा, “बता बेटा, मुझे बता, तुझे क्या दुख है?” बनारसी दास का हाथ उसके सिर से फिसलकर उसके कंधों पर आ गया। वह बोला, “देख बहू, मैं तेरा ससुर ही नहीं, तेरे पिता के समान भी हूँ। तुझे दुखी मैं कैसे देख सकता हूँ।”
ऐसा कहकर बनारसी दास ने बहू को अपने सीने से लगा लिया। उसका हाथ कंधों से फिसलकर बहू की पीठ पर आ गया। उसने प्रतिभा की पीठ सहलाते हुए कहा, “बहू, सच-सच बता… सुहागरात के बाद तुम पति-पत्नी के बीच दुबारा कोई संबंध बना?”
“बस एक बार और बना था।”
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“वह कैसा रहा?” ससुर ने पुनः पूछा। प्रतिभा से अब कतई न रहा गया। वह फूट-फूटकर रो पड़ी। बोली, “पापा जी, वो तो बिलकुल ही नामर्द हैं।” बनारसी दास ने उसे और जोरों से अपने वक्ष से सटाते हुए तसल्ली दी, “रोते नहीं बेटी, इस तरह धीरज नहीं खोते। मेरे पास ऐसे-ऐसे नुस्खे हैं जिनसे जन्म से नामर्द लोग भी मर्द बन जाते हैं। अगर सौ साल का बूढ़ा भी मेरा एक नुस्खा खा ले तो सारी रात मस्ती से काटेगा।”
बनारसी दास के अब दोनों हाथ बहू की पीठ और उसके नितंबों को सहलाने लगे थे। बनारसी दास का अनुभव कब काम आएगा। वह अब हर पैंतरा बहू पर आजमाने की पूरी कोशिश में जुटा था। बहू को एक बार भी विरोध न करते देख वह समझ चुका था कि वह आसानी से उस पर चड्डी गाँठ सकता है। ये कहानी आप हमारी वासना डॉट नेट पर पढ़ रहे है.
बहू के नितंबों को सहलाने के बाद तो उसका भी तनकर खड़ा हो गया था। इधर प्रतिभा के अंदर का सैलाब भी उमड़ने लगा। उसके तन-बदन में वासना की हजारों चींटियाँ काटने लगी थीं। बनारसी दास का तना हुआ लंड प्रतिभा की जाँघों से रगड़ खा रहा था जिससे प्रतिभा को बड़ा सुखद अनुभव हो रहा था, किंतु कैसे कहती कि पापा जी, अपना पूरा लंड खोलकर दिखा दो।
वह चाह रही थी कि किसी प्रकार ससुर जी ही पहल करें। वह अपना सारा दुख-दर्द भूलकर ससुर की बातों और उसके हलके स्पर्श का पूरा आनंद ले रही थी। बनारसी दास किसी न किसी बहाने बात करते-करते बहू की छातियों का भी स्पर्श कर लेता था। प्रतिभा को अब यह सब बर्दाश्त के बाहर होता जा रहा था।
जब बनारसी दास ने भांपा कि अब प्रतिभा उसका बिलकुल विरोध करने की स्थिति में नहीं है तो बोला, “आ बहू, बैठकर बात करते हैं। तुझे अभी बहुत कुछ समझाना बाकी है। अच्छा एक बात बता, मेरा प्यार से तेरे ऊपर हाथ फिराना कहीं तुझे बुरा तो नहीं लग रहा है?”
“नहीं तो…” बनारसी दास ने बहू के मुँह से ये शब्द सुने तो उसने उसे और भी कसकर अपनी बाँहों में भरकर बोला, “देख, आज मैं तुझे एक ऐसी सीडी दूँगा, जिसे देखकर नामर्दों का भी खड़ा हो जाएगा। तू कभी वक्त निकालकर पहले खुद देखना तभी तुझे मेरी बात का यकीन हो जाएगा।”
“ऐसा क्या है पापा जी उसमें?”
“उसमें ऐसी-ऐसी फिल्में हैं जिसे तू भी देखेगी तो पागल हो उठेगी। औरत-मर्द के बीच रात में जो कुछ भी होता है वो सब कुछ तुझे इसी सीडी में देखने को मिलेगा।” इसी बीच बनारसी दास ने बहू के नितंबों को जोरों से दबा दिया और फिर अपने हाथ फिसलाकर उसकी जाँघों पर ले आया। प्रतिभा ने एक हलकी सी सिसकारी भरी। बनारसी दास आगे बोला, “क्या तू विश्वास कर सकती है कि कोई औरत घोड़े का झेल सकती है?”
“नहीं, ऐसा कैसे हो सकता है, पापा जी? औरत मर नहीं जाएगी घोड़े का डलवाएगी अपने अंदर तो?”
“अरे, तू मेरा यकीन तो कर। अच्छा, कल तुझे वह सीडी दूँगा तो खुद ही देख लेना।”
“पापा जी, आज ही दिखाओ न, वह कैसी सीडी है। मुझे जरा भी यकीन नहीं आ रहा।”
“जिद नहीं करते बेटा, कल रात को जब अरुण एक विवाह में शामिल होने जाएगा तो तू रात में देख लेना। अभी अरुण के आने का वक्त हो चला है।” बनारसी दास ने बहू के गालों पर एक प्यार भरी थपकी दी और उसके नितंबों की दोनों फाँकों को कस इधर-उधर को फैलाया और फिर कमरे से बाहर निकल आया।
बनारसी दास के कमरे से बाहर निकलते ही अरुण आ गया। प्रतिभा ने ईश्वर को धन्यवाद दिया कि अच्छा हुआ जो पापा जी वक्त रहते बाहर निकल गए, वरना अरुण पर जरूर इसका गलत प्रभाव पड़ता। रात हुई और पति-पत्नी फिर एक साथ लेटे। प्रतिभा ने धीरे से अपना हाथ पति की जाँघों की ओर बढ़ाया और पति-देव के मुख्य कारिंदे को मुट्ठी में पकड़कर रगड़ना शुरू कर दिया पर लंड में तनिक भी तनाव नहीं आया।
अरुण कुछ देर तक चुपचाप लेटा रहा और प्रतिभा उसके लंड को बराबर सहलाती रही। अंत में कोई हरकत न देख वह उठी और उसने मुरझाए हुए लंड को ही मुँह में लेकर खूब चूसा। काफी देर के बाद लंड में हरकत सी देख प्रतिभा पति के लंड पर सवार होने की चेष्टा में उसके ऊपर आ गई और उसने अपनी बुर को फैलाकर लंड को अंदर लेने की कोशिश की।
इस बार लंड मुश्किल से अंदर तो हो गया किन्तु जाते ही स्खलित हो गया और सिकुड़े हुए चूहे जैसा बाहर आ गया। प्रतिभा का पारा सातवें आसमान पर जा पहुँचा। रात भर बुर में उँगली डालकर बड़-बड़ करती अपनी काम-पिपासा को शांत करती रही।
अगले दिन अरुण किसी विवाहोत्सव में सम्मिलित होने चला जाएगा, यह सोचकर प्रतिभा बहुत खुश थी। वह शीघ्र ही रात होने का इंतजार करने लगी। एक-एक पल उसे युगों सा कटता प्रतीत हो रहा था। दिन भर वह बनारसी दास के ख्यालों में खोई रही। उसे ससुर द्वारा अपने सिर से लेकर कंधों, पीठ और फिर अपने नितंबों तक हाथ फिसलाते हुए ले जाना, अपनी चूचियों को किसी न किसी बहाने छू लेना, और उनका कड़े लंड का अपनी जाँघों से स्पर्श होना रह-रह याद आ रहा था।
वह एक सुखद कल्पना में सारे दिन डूबी रही। शाम को अरुण विवाह में शामिल होने चला गया तब उसे कहीं चैन आया। अब उसने पक्का निश्चय कर लिया था कि आज की रात वह अपने ससुर (बनारसी दास) के साथ ही बिताएगी और वह भी पूरी मस्ती के साथ।
इसी बीच उसने अपने कक्ष के दरवाजे पर हलकी सी थपथपाहट सुनी। वह दौड़कर गई और दरवाजे की कुंडी खोली तो देखा बाहर उसका ससुर बनारसी दास खड़ा था। बिना कुछ बोले वह अंदर आ गई और पीछे-पीछे ससुर जी भी आ खड़े हुए। प्रतिभा ने गद-गद कंठ से पूछा, “पापा जी, लाए वह सीडी, जो आप बता रहे थे।”
“हाँ बहू, ये ले और डालकर देख इसे सीडी प्लेयर में।” प्रतिभा ने लपककर सीडी बनारसी दास के हाथ से ले ली और उसे प्लेयर में डालकर टीवी ऑन कर दिया। परदे पर स्त्री-पुरुष की यौन क्रीड़ाएँ चल रही थीं। बनारसी दास ने सीन को आगे बढ़ाया—एक मोटा चिंपैंजी एक कुँवारी लड़की की बुर में अपना मोटा लंबा लंड घुसाने की चेष्टा में था।
लड़की बुरी तरह से दर्द से छटपटा रही थी। आखिरकार वह उसकी बुर फाड़ने में कामयाब हो ही गया। इस सीन को देखकर प्रतिभा ससुर के सीने से जा लिपटी। बनारसी दास ने उसे अपनी बाँहों में भरकर तसल्ली दी, “अरे, इतने से ही डर गई। अभी तो बहुत कुछ देखना बाकी है बहू।”
बनारसी दास के हाथ अब खुलकर प्रतिभा की छातियाँ सहला रहे थे। प्रतिभा को एक विचित्र से आनंद की अनुभूति हो रही थी। वह और भी बनारसी दास के सीने से चिपटी जा रही थी। बनारसी दास ने बहू का हाथ थामकर अपने लंड का स्पर्श कराया। प्रतिभा अब कतई विरोध की स्थिति में नहीं थी। उसने धीरे से बनारसी दास के लंड का स्पर्श किया और फिर हलके-हलके उस पर हाथ फेरने लगी। वह बनारसी दास से बोली, “पापा जी वह सीन कब आएगा?”
“कौन सा बहू?” इस बीच बनारसी दास ने प्रतिभा की जाँघों को सहलाना शुरू कर दिया था। जाँघें सहलाते-सहलाते उसने प्रतिभा की सुरंग में अपनी एक उँगली घुसेड़ दी। प्रतिभा सिहर उठी और उसके मुँह से एक तेज सिसकारी फूट पड़ी—“आह! उफ्फ…. अब बिलकुल भी बर्दाश्त नहीं हो रहा….”
“क्या बर्दाश्त नहीं हो रहा बहू? ले तुझे अच्छा नहीं लगता तो मैं अपनी उँगली बाहर निकाल लेता हूँ।” बनारसी दास ने बहू की सुरंग से अपनी उँगली बाहर निकाल ली और दूर जा बैठा। वह जानता था कि प्रतिभा के रोम-रोम में मस्ती भर उठी है और वह अब समूचा लंड अपनी दहकती भट्टी में डलवाए बिना नहीं रह सकती। प्रतिभा को लगा कि ससुर जी नाराज हो गए हैं। वह दूर जा बैठे बनारसी दास से जा लिपटी। बोली, “पापा जी, आप तो बुरा मान गए।”
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“…तो फिर तुमने ये क्यों कहा कि अब तो बिलकुल बर्दाश्त नहीं हो रहा…”
“पापा जी, मेरा मतलब ये नहीं था जो आप समझ रहे हैं।”
“फिर क्या था तुम्हारा मतलब?”
“अब पापा जी, आप से क्या छिपा है… आप नहीं जानते, जब औरत की आग पूरी तरह से भड़क जाती है तो उसकी क्या इच्छा होती है?”
“नहीं, मुझे क्या पता औरत की चाहत का कि वह क्या चाहती है।”
प्रतिभा बोली, “अब मैं आपको कैसे समझाऊँ कि मेरी क्या इच्छा हो रही है।”
“बहू, तू ही बता, मैं तेरी मर्जी कैसे जान सकता हूँ। तू एक हल्का सा इशारा दे, मैं समझने की कोशिश करता हूँ।”
“मैं कुछ नहीं बता सकती, आपको जो भी करना है करो… अब मैं आपको रोकूँगी नहीं।”
“ठीक है… फिर मैं तो कहूँगा कि तू अपने सारे कपड़े उतार दे, और बिलकुल नंगी होकर मेरे सामने पसर जा। आज मैं तेरी गदराई जवानी का खुलकर मजा लूँगा… बोल देगी?”
प्रतिभा ने धीरे से सिर हिलाकर स्वीकृति दे दी और बोली, “नंगी मुझे आप खुद करोगे, हाँ, मैं पसर जाऊँगी आपके सामने।”
बनारसी दास ने कहा, “देख बहू, फिर तेरी फट-फट जाए तो मुझे दोष न देना, पहले मेरे इसकी लंबाई और मोटाई देख ले अच्छी तरह से।” बनारसी दास ने अपना कच्छा उतार फेंका और अपना फनफनाता लंड उसके हाथों में थमा दिया। “कोई बात नहीं, मुझे सब मंजूर है।” फिर बनारसी दास ने एक-एक करके प्रतिभा के सारे कपड़े उतार फेंके और खुद भी नंगा हो गया। प्रतिभा ससुर से आ लिपटी और उसका मोटा लंड सहलाते हुए बोली, “पापा जी, बुरा तो नहीं मानोगे?”
“नहीं मानूँगा, बोल…”
प्रतिभा ने कहा, “आपका ये किसी घोड़े के से कम थोड़े ही है।”
इसी बीच दोनों की निगाहें एक साथ टीवी पर जा पहुँचीं। एक नंगी औरत घोड़े का लंड अंदर ले जाने की कोशिश में थी। धीरे-धीरे उसने घोड़े का आधा लंड अपनी बुर के अंदर कर लिया। प्रतिभा सहमकर ससुर से बुरी तरह से चिपक गई।
बनारसी दास ने बहू को नंगा करके अपने सामने लिटा रखा था और उसकी जाँघें फैलाकर सुरंग की एक-एक परत हटाकर रसदार बुर को चूसे जा रहा था। प्रतिभा अपने नितंबों को जोरों से हिला-हिलाकर पूरा आनंद ले रही थी। प्रतिभा ने एक बार फिर टीवी का सीन देखा। लड़की की बुर में घोड़े का पूरा लंड समा चुका था। ये कहानी आप हमारी वासना डॉट नेट पर पढ़ रहे है.
एकाएक बनारसी दास को जैसे कुछ याद आ गया हो, वह उठा और टेबल पर रखा रेजर उठा लाया। उसने प्रतिभा के गुप्तांग पर उगे काले-घने बाल अपनी उँगलियों में उलझाते हुए कहा, “ये घना जंगल और ये झाड़-झंखाड़ क्यों उगा रखा है अपनी इस खूबसूरत गुफा के चारों ओर?”
“पापा जी, मुझे इन्हें साफ करना नहीं आता।”
“ठीक है, मैं ही इस जंगल का कटान किए देता हूँ।” ऐसा कहकर बनारसी दास ने उसकी बुर पर शेविंग-क्रीम लगाई और रेजर से तनिक देर में सारा जंगल साफ कर दिया और बोला, “जाओ, बाथरूम में जाकर इसे धोकर आओ। तब दिखाऊँगा तुम्हें तुम्हारी इस गुफा की खूबसूरती।”
प्रतिभा बाथरूम में जाकर अपनी बुर को धोकर आई और फिर बनारसी दास के आगे अपनी दोनों जाँघें इधर-उधर फैलाकर चित्त लेट गई। बनारसी दास ने एक शीशे के द्वारा उसे उसकी बुर की सुंदरता दिखाई। प्रतिभा हैरत से बोली, “अरे, मेरी ये तो बहुत ही प्यारी लग रही है।” वह आगे बोली, “पापा जी, आपके इस मोटे मूसल पर भी तो बहुत सारे बाल हैं। आप इन्हें साफ क्यों नहीं करते?”
बनारसी दास बोला, “बहू, यही बाल तो हम मर्दों की शान हैं। जिसकी मूँछें न हों और लंड पर घने बाल न हों तो फिर वह मर्द ही क्या। हमेशा एक बात याद रखना, औरतों की बुर चिकनी और बाल-रहित सुंदर लगती है मगर पुरुषों के लंड पर जितने अधिक बाल होंगे वह मर्द उतना ही औरतों के आकर्षण का केंद्र बनेगा।”
प्रतिभा बोली, “पापा जी, मुझे तो आपका ये बिना बालों के देखना है। लाइए रेजर मुझे दीजिए और बिना हिले-डुले चुपचाप लेटे रहिए, वरना कुछ कट-फट गया तो मुझे दोष मत दीजिएगा।” प्रतिभा ने ससुर के लंड पर झटपट शेविंग क्रीम लगाई और सारे के सारे बाल मुँडकर रख दिए।
बनारसी दास जब लंड धोकर बाथरूम से लौटा तो उसके गोरे, मोटे और चिकने लंड को देखकर प्रतिभा की बुर लार चुआने लगी। बुर बनारसी दास के लंड को गपकने के लिए बुरी तरह फड़फड़ाने लगी और प्रतिभा ने लपककर उसका मोटा तनतनाया लंड अपने मुँह में भर लिया और उतावली होकर चूसने लगी।
बनारसी दास बोला, “बहू, तू अब अपनी जाँघें फैलाकर चित्त लेट जा और अपने नितंबों के नीचे एक हल्का सा तकिया लगा ले।”
“ऐसा क्यों पापा जी?”
“ऐसा करने से तेरी बुर पूरी तरह से फैल जाएगी और उसमें मेरा ये मोटा-ताजा, हट्टा-कट्टा डंडा बिना किसी परेशानी के सीधा अंदर घुस जाएगा।”
प्रतिभा ने वैसा ही किया। बनारसी दास ने बहू के योनी-द्वार पर अपने लंड का सुपाड़ा टिकाकर एक जोरदार झटका मारा कि उसका समूचा लंड धचाक से अंदर जा घुसा। प्रतिभा आनंद से उछल पड़ी। वह मस्ती में आकर अपने कुल्हे और कमर उछाल-उछालकर लंड को ज्यादा से ज्यादा अंदर-बाहर ले जाने की कोशिश में जुटी थी।
बनारसी दास बोला, “बहू, तेरी तो वाकई बहुत ही चुस्त है। कुदरत ने बड़ी ही फुर्सत में गढ़ी होगी तेरी बुर ।”
प्रतिभा बोली, “आपका हथियार कौन सा कम गजब का है। पापा जी, सच बताइए, सासू जी के अलावा और कितनी औरतों की फाड़ी है आपके इस मोटे लट्ठे ने।”
बनारसी दास प्रतिभा की बुर में लगातार जोरों के धक्के लगाता हुआ बोला, “मैंने कभी इस बात का हिसाब नहीं लगाया। हाँ, तुझे एक बात से सावधान कर दूँ। मेरे-तेरे बीच के इन संबंधों की तेरी पड़ोसिन जिठानी को जरा भी भनक न लग जाए। वह बड़ी ही छिनाल किस्म की औरत है। हमें सारे में बदनाम करके ही छोड़ेगी।”
“नहीं पापा जी, मैं क्या पागल हूँ जो किसी को भी इस बात की जरा भी भनक लगने दूँगी। वैसे, आप एक बात बताओ, क्या ये औरत आपसे बची हुई है?”
बनारसी दास जोरों से हँस पड़ा, बोला, “तेरा यह सोचना बिलकुल सही है बहू, इसने भी मुझसे एक बार नहीं, कितनी ही बार ठुकवाया है।”
“अच्छा, एक बात और पूछनी है आपसे…”
“पूछो बहू…”
“पहली रात को क्या सासू जी आपका ये मोटा हथियार झेल पाई थीं?”
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“अरे कुछ मत पूछ बहू, जब मेरा तेरी सास के साथ ब्याह हुआ था तब वह सिर्फ अठारह साल की थी और मैं उन्नीस साल का। इतना तजुर्बा भी कहाँ था तब मुझे, कि पहले उसकी बुर को सहला-सहलाकर गर्म करता और जब वह तैयार हो जाती तो मैं उसकी कुँवारी व अनछुई बुर में अपना लंड धीरे-धीरे सरकाता।
मैं तो बेचारी पर एकदम से टूट पड़ा था और उसे नंगी करके उसकी बुर के चिथड़े-चिथड़े कर डाले थे। बस बुर फटकर फरुखाबाद जा पहुँची थी। पूरे तीन दिन में होश में आई थी तेरी सास। अगली बार जब मैंने उसकी ली तो पहले उसे खूब गरम कर लिया था जिससे वह खुद ही अपने अंदर डलवाने को राजी हो गई।”
प्रतिभा तपाक से बोली, “जैसे मेरी बुर को सहला-सहलाकर उसे आपने खौलती भट्टी बना दिया था आज। पापा जी, इधर का काम चालू रखिए… एक बार, सिर्फ एक बार मेरी सुलगती सुरंग को फाड़कर रख दीजिए। मैं हमेशा-हमेशा के लिए आपकी दासी बन जाऊँगी।”
“ले बहू, तू भी क्या याद करेगी… तेरा भी कभी किसी मर्द से पाला पड़ा था। आज मुझे रोकना मत, अभी तेरी उफनती जवानी को मसलकर रखे देता हूँ।” ऐसा कहकर बनारसी दास अपने मोटे लंड पर तेल मलकर प्रतिभा पर दुबारा पेला तो प्रतिभा सिर से पैर तक आनंद में डूब गई। बनारसी दास के लंड का मजा ही कुछ और था पर वह भी कब हिम्मत हारने वाली थी। अपने ससुर को खूब अपने नितंबों को उछाल-उछालकर दे रही थी।
अंततः लगभग एक घंटे की इस लिंग-बुर की धुआँधार लड़ाई में दोनों ही एक साथ झड़ गए और काफी देर तक एक-दूजे के नंगे शरीरों से लिपटकर सोते रहे। बीच-बीच में दो-तीन बार उनकी आँखें खुलीं तो वही सिलसिला दुबारा शुरू हो गया। उस रात बनारसी दास ने बहू की चार बार मारी और हर बार में दोनों को ही पहले से दूना मजा आया।
प्रतिभा उसी रात से ससुर की पक्की चेली बन गई। अब वह ससुर के खाने-पीने का भी काफी ध्यान रखती थी ताकि उसका फौलादी डंडा पहले की तरह ही मजबूत बना रहे। पति की नपुंसकता की अब उसे जरा भी फिक्र न थी। हाँ, इस घटना के बाद रिश्ते जरूर बदल गए थे।
बनारसी दास सबके सामने प्रतिभा को बहू या बेटी कहकर पुकारता परन्तु एकांत में उसे मेरी रानी, मेरी बुलबुल आदि नामों से संबोधित करता था। और प्रतिभा समाज के सामने एक लंबा घूँघट निकाले उसके पैर छूकर ससुर का आशीर्वाद लेती और रात में अपने सारे कपड़े उतारकर उसके आगे पसर जाती थी।
आज बनारसी दास अपनी बहू प्रतिभा के साथ कामक्रीड़ा में व्यस्त था। अपने बेटे अरुण को वह अक्सर विवाह-शादियों में भेजता रहता था ताकि वह अधिक से अधिक रातें अपनी पुत्रवधू प्रतिभा के साथ बिता सके। प्रतिभा से यौन-संबंध बनाने के बाद से वह पहले की अपेक्षा कुछ और अधिक जवान दिखने लगा था। बहू की बुर में अपनी उँगली डालकर उसे इधर-उधर घुमाते हुए उसने पूछा, “रानी, मैं देख रहा हूँ, कुछ दिनों से तुम किसी चिंता में डूबी हुई नजर आ रही हो।”
प्रतिभा ने कहा, “राजा जी, मेरी छोटी बहन के ससुराल वालों ने पूरे पाँच लाख रुपये की माँग की है। मेरे तीनों भाई मिलकर सिर्फ चार लाख रुपये ही जुटा पाए हैं। उन लोगों का कहना है कि अगर पूरे पैसों का प्रबंध नहीं हुआ तो वे लोग मेरी बहन अंशिका से सगाई तोड़कर किसी दूसरी जगह अपने बेटे का ब्याह कर लेंगे।”
बनारसी दास कुछ सोचता हुआ बोला, “उनकी माँ का खोपड़ा सालों की। तू चिंता मत कर, उनका मुँह बंद करना मुझे आता है। बस इतनी सी बात को लेकर परेशान है मेरी जान।” बनारसी दास ने एक साथ तीन उँगलियाँ बहू की बुर में घुसेड़ दीं। प्रतिभा ने एक लंबी सी आह भरी। ससुर की बात पर प्रतिभा खुश हो गई, उसने बनारसी दास का लंड अपनी मुट्ठी में लेकर सहलाना शुरू कर दिया और उसके अंडकोषों की गोलियों को घुमा-घुमाकर उनसे खेलने लगी।
बनारसी दास बोला, “अपनी बहन को यहीं बुला ले मेरी रानी, मेरी जान! हम भी तो देखें तेरी बहन कितनी खूबसूरत है।”
“मेरी बहन मुझसे सिर्फ तीन साल ही छोटी है। देखने में बहुत गोरी-चिट्टी, तीखे नयन-नक्श, पतली कमर, सुडौल कूल्हों के साथ-साथ उसके सीने का उभार भी बड़े गजब का है।”
बनारसी दास के मुँह में पानी भर आया, बहू की बहन की इतनी सारी तारीफें सुनकर। वह आहें भरता हुआ बोला, “हाय, हाय, हाय! क्या मेरा दम ही निकालकर छोड़ेगी मेरी जान, अब उसकी तारीफें करना बंद करके यह बता कि कब उसे बुलाकर मेरी आँखों को ठंडक देगी। मेरा तो कलेजा ही मुँह को आ रहा है उसकी तारीफें सुन-सुनकर…”
प्रतिभा बोली, “देखो जानू, बुला तो मैं लूँगी ही उसे मगर उस पर अपनी नीयत मत खराब कर बैठना। वह पढ़ी-लिखी लड़की है, अभी-अभी बीए पास किया है उसने। आपके झाँसे में नहीं फँसने वाली वो।”
बनारसी दास ने उसे पानी चढ़ाया, बोला, “फिर तू किस मर्ज की दवा है मेरी बालूशाही! तेरे होते हुए भी अगर हमें तेरी बहन की कातिल जवानी चखने को न मिली तो कितने दुख की बात होगी। हाँ, रुपये-पैसों की तू चिंता न करना। ये चाबी का गुच्छा तेरे हाथों में थमा दूँगा, जितना जी चाहे खर्च करना अपनी बहन की शादी में। तू तो इस घर की मालकिन है, मालकिन!”
बनारसी दास पाँच सौ बीघे का जोतता था। ट्रैक्टर-ट्राली, जीप, मोटरसाइकिल, नौकर-चाकर, एक बड़ी हवेली—सब कुछ तो था उसके पास, क्या नहीं था? तिजोरी नोटों से भरी रहती थी उसकी। अगर कहीं कमी थी तो उसके बेटे के पास पुरुषत्व की। प्रतिभा तो तब भी रानी होती और अब भी महारानियों की तरह राज कर रही थी, बनारसी दास की धन-दौलत पर और साथ ही उसके दिल पर भी। ये कहानी आप हमारी वासना डॉट नेट पर पढ़ रहे है.
प्रतिभा ने बनारसी दास की बात पर कुछ देर तक सोचा और फिर बोली, “हाय मेरे राजा… मैं कैसे राजी करूँगी उसे तुम्हारे साथ सोने को?”
बनारसी दास ने बहू की बुर में अब अपना समूचा लंड घुसेड़ दिया और उसे धीरे-धीरे अंदर-बाहर करता हुआ बोला, “मेरी बिल्लो, वह सीडी किस दिन काम आएगी। उसे दिखाकर पटा लेना। जब वह घोड़े, कुत्ते, भालुओं को नंगी औरतों की बुर फाड़ते हुए देखेगी तो उसकी बुर भी पानी छोड़ने लगेगी। तू उसको पहले इतने सीन दिखा डालना फिर वह तो खुद ही अपनी बुर में उँगलियाँ घुसेड़ने लगेगी। अगर वह ना अपनी फड़वाने को राजी हो जाए तो मैं तेरा हमेशा के लिए गुलाम बन जाऊँगा।”
प्रतिभा बोली, “ये कौन सा बड़ा काम करोगे। गुलाम तो मेरे अब भी हो मेरे दिल के राजा! मैं तो तुम पर अपना सब कुछ लुटाए बैठी हूँ, अपनी लाज-शर्म, अपनी इज्जत-आबरू और अपना ईमान-धर्म तक। अब धीरे-धीरे मेरी बुर के साथ मजाक और खिलवाड़ मत करो। जरा, जोरों के धक्के मार दो कस-कस के।”
बनारसी दास ने अपने लंड में तेजी लानी शुरू कर दी, उस पर मानो मर्दानगी का भूत सवार हो गया था। इतने तेज धक्कों की चोट तो शायद ही कोई औरत बर्दाश्त कर पाती। पर प्रतिभा तो आनंदित होकर खुशी की किलकारियाँ भर रही थी—
“आह मेरे शेर… कितना मजा आ रहा है मुझे… बस ऐसे ही सारी रात मेरी दहकती भट्टी में अपना भुट्टा भूनते रहो। तुम्हारी कसम मैं अपनी बहन की जवानी का पूरा-पूरा मजा दिलवाकर रहूँगी… आह: ओह… सीईईईईई… आज तो मेरी पूरी तरह से फाड़कर रख दो… भले ही कल तुम्हें मेरी बुर किसी मोची से ही क्यों न सिलवानी पड़े।”
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बनारसी दास ने धक्कों की रफ्तार पूरी गति पर छोड़ दी, दे दना दन… आज बनारसी दास ने तय कर लिया कि जब तक प्रतिभा उससे रुकने को नहीं कहेगी, वह धक्के मारता ही रहेगा। करीबन तीस-चालीस मिनटों तक बनारसी दास ने थमने का नाम नहीं लिया। अंत में जब तक प्रतिभा निश्चेष्ट होकर न पड़ गई बनारसी दास उसकी बजाता ही रहा।
दूसरे ही दिन प्रतिभा ने खबर भेजकर अपनी छोटी बहन अंशिका को अपने यहाँ बुलवा लिया। प्रतिभा के मायके में तीन भाई और एक बहन थी उससे सिर्फ तीन साल छोटी। माता-पिता उसके बचपन में ही मर चुके थे। सभी भाई-बहनों को बड़े भाई ने ही पाला था। प्रतिभा के दो भाई विवाहित थे और सबसे छोटा भाई अभी अविवाहित था। वह हाल में ही नौकरी पर लगा था।
कुल मिलाकर उसके मायके वालों की दशा कुछ खास अच्छी न थी। उस पर अंशिका के ससुराल वालों का दहेज में पाँच लाख रुपये की माँग करना, किन्तु बनारसी दास द्वारा उनकी माँग पूरी करने की बात सुनकर प्रतिभा की सारी चिंता जाती रही। आज ही उसकी छोटी बहन उसके घर आई थी।
ससुर बनारसी दास ने प्रतिभा को अपने पास बुलाकर उसके कान में फुसफुसाते हुए कहा, “रानी समझ गई न तुझे क्या करना है, किसी प्रकार अपनी बहन को वह सीडी दिखा दे। तेरी कसम, जबसे उसके रूप को मैंने देखा है, तन-बदन में आग सी लगी हुई है। आज ही तो अरुण बाहर गया है, सात दिनों के बाद लौटेगा। तब तक तुम दोनों बहनों की जवानी का रस खूब छककर पिऊँगा। खूब जमकर मजा लूँगा इन सात रातों में। जा, जाकर उसे वह सीडी दिखा…”
प्रतिभा अपने कमरे में आई और उसे ब्लू-फिल्म दिखाने की कोई तरकीब सोचने लगी। दोपहर का खाना खाकर दोनों बहनें पलंग पर लेटकर बातें करने लगीं। बातों ही बातों में प्रतिभा ने उसके ब्याह का जिक्र छेड़ दिया। इसी दौरान प्रतिभा ने अंशिका से पूछा, “अंशिका, तुझे सुहागरात के बारे में कुछ नॉलेज है कि उस रात पति-पत्नी के बीच क्या होता है? फिर न कहना कि मुझे इस बारे में किसी ने कुछ बताया ही नहीं था।”
अंशिका ने अनजान बनते हुए शरमाकर पूछा, “क्या होता है दीदी, उस रात को? बताइए, मुझे कुछ नहीं मालूम।”
प्रतिभा बोली, “पगली, इस रात को पति-पत्नी का शारीरिक मिलन होता है।”
“कैसे दीदी, जरा खुलके बताओ न, कैसा मिलन?”
“अरी पगली, पति-पत्नी एक-दूसरे को प्यार करते हैं। पति पत्नी के ओठों का चुंबन लेता है, उसके ब्लाउज के हुक खोलता है और फिर उसकी ब्रा को उतारकर उसकी चूचियों का चुंबन लेता है, उन्हें दबाता है। धीरे-धीरे पति अपना हाथ पत्नी के सारे शरीर पर फेरने लगता है, वह उसकी छातियों से धीरे-धीरे अपना हाथ उसकी जाँघों पर ले जाता है और फिर उसकी दोनों जाँघों के बीच की जगह को अपनी उँगली डालकर उसका स्पर्श करता है।”
“फिर क्या होता है दीदी, बताइए न, आप कहते-कहते रुक क्यों गईं?”
“कुछ नहीं, मैं भी तुझे क्यों ये बातें बताने लगी। ये सारी बातें तो तुझे खुद भी आनी चाहिए, अब तू बच्ची तो नहीं रही।” प्रतिभा ने नकली झुँझलाहट का प्रदर्शन किया।
“दीदी, बताओ प्लीज, फिर पति क्या करता है पत्नी के साथ?”
“उसे पूरी तरह से नंगी कर देता है और फिर खुद भी नंगा हो जाता है। दोनों काफी देर तक एक-दूसरे के अंगों को छूते हैं, उन्हें सहलाते हैं और अंत में पति अपनी पत्नी की बुर में अपना लंड डालने की कोशिश करता है। जब उसका लंड आधे के करीब बुर के अंदर घुस जाता है.
तो पत्नी की बुर की झिल्ली फट जाती है और उसे बड़ा दर्द होता है, बुर से कुछ खून भी निकलता है। कोई-कोई पत्नी तो दर्द के मारे चीखने तक लगती है। परन्तु पति अपनी मस्ती में भरकर अपना शेष लंड भी पत्नी की बुर में घुसेड़ ही देता है।”
“फिर क्या होता है दीदी?”
“होता क्या, थोड़ी-बहुत देर में पत्नी को भी पति का लंड डालना अच्छा लगता है और वह भी अपने कुल्हे मटका-मटकाकर पति का साथ देती है। इस क्रिया को संभोग-क्रिया या मैथुन-क्रिया कहते हैं।”
प्रतिभा समझ चुकी थी कि अब अंशिका भी पूरी जानकारी लेने को उतावली हो गई है तो उसने अंशिका से कहा, “अगर तू पूरी जानकारी चाहती है तो मेरे पास सुहागरात की एक सीडी पड़ी है, उसे देख ले बस तुझे इस बारे में सब-कुछ पता लग जाएगा।”
अंशिका एकदम चहक उठी, बोली, “दिखाओ दीदी, कहाँ है वह सीडी? जल्दी दिखाओ नहीं तो रात को जीजू आ जाएँगे तुम्हारे कमरे में।”
प्रतिभा बोली, “तेरे जीजू के पास वो सब-कुछ है ही कहाँ, जो मेरे साथ कुछ कर सकें।”
अंशिका ने आश्चर्य से पूछा, “हैं, सच दीदी… जीजू नहीं करते आपके साथ, जो कुछ आपने मुझे बताया अभी तक पति-पत्नी के रिश्ते के बारे में?”
प्रतिभा बोली, “तेरे जीजू तो बिलकुल नामर्द हैं। पहली रात को तो मैंने किसी तरह उनका लंड सहला-सहलाकर खड़ा कर लिया था और हम दोनों का मिलन भी हुआ था मगर उस दिन के बाद तो उनके लंड में कभी तनाव आया ही नहीं।”
अंशिका ने पूछा, “दीदी, फिर तुम अपनी इच्छा कैसे पूरी करती हो?”
प्रतिभा बोली, “ये सारी बातें मैं तुझे बाद में बताऊँगी, पहले तू सीडी देख।”
प्रतिभा ने सीडी लेकर सीडी प्लेयर में डाल दी और फिर दोनों बहनें एक साथ मिलकर देखने लगीं। पहले ही सीन में एक युवक अपनी पत्नी की चूचियाँ दबा रहा था। पत्नी सी… सी करके उत्तेजित होती जा रही थी और युवक का लंड अपनी मुट्ठी में लेकर सहला रही थी।
धीरे-धीरे उसने पत्नी के सभी कपड़े उतार फेंके और खुद भी नंगा हो गया। उसने अपनी पत्नी की बुर को चाटना शुरू कर दिया। पत्नी भी उसका लंड मुँह में लेकर चूस रही थी। यह दृश्य देखकर अंशिका के संपूर्ण शरीर में एक उत्तेजक लहर दौड़ गई। उसकी बुर में भी एक अजीब सी सुरसुराहट होने लगी थी।
वह बोली, “दीदी, मुझे कुछ-कुछ हो सा रहा है।”
प्रतिभा बोली, “तेरी बुर भी पानी छोड़ने लगी होगी।”
अंशिका बोली, “हाँ दीदी, चड्डी के अंदर कुछ गीला-गीला सा महसूस हो रहा है मुझे।”
प्रतिभा ने उसकी सलवार खोलते हुए कहा, “देखूँ तो…” प्रतिभा ने ऐसा कहकर अंशिका की बुर को एक उँगली से सहलाना शुरू कर दिया। एक सिसकी अंशिका के मुँह से फूट निकली… “आह: दीदी, बहुत मन कर रहा है, कोई मोटी सी चीज ठूँस दो इसके अंदर, बस आप इसी तरह से मेरी बुर में अपनी उँगली डालकर उसे अंदर-बाहर करती रहो।”
प्रतिभा ने अंशिका की सलवार उतार फेंकी और बोली, “तू इसी तरह से चुपचाप पड़ी रहना मैं दरवाजे की सिटकनी लगाकर अभी आती हूँ।”
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प्रतिभा ने लौटकर देखा कि अंशिका अपनी बुर को खूब तेजी से सहला रही थी। प्रतिभा ने उसके सारे कपड़े उतारकर उसे पूरा नंगा कर दिया और फिर वह खुद भी नंगी हो गई। दोनों बहनों ने एक-दूसरे को अपनी बाँहों में भर लिया और कसकर चिपक गईं। दोनों बहनों की आँखें टीवी पर टिकी थीं जहाँ स्त्री-पुरुषों के बीच नाना-प्रकार की काम-क्रीड़ाएँ चल रही थीं। प्रतिभा ने अंशिका की चूचियों को कसकर दबाना शुरू कर दिया और अपने होठ उसके होठों से सटा दिए।
सामने के दृश्य में एक साँड़ अपने लंड को एक नंगी औरत की बुर में घुसेड़ने की तैयारी में था। कुछ ही देर में वह अपना लंड उसके बुर में घुसेड़कर लगातार धक्के लगा रहा था और अंत में औरत साँड़ के लंड को बर्दाश्त न कर पाई और बेहोश हो गई। साँड़ उसकी फटी हुई बुर से बहता हुआ खून चाट-चाटकर उसे साफ कर रहा था। यह सब देख, अंशिका का सारा बदन गर्म हो गया। वह बुरी तरह कामाग्नि में झुलसने लगी। उसके मुख से अजीब सी कामुक आवाजें आने लगी थीं।
अगले दृश्य में उसने एक स्त्री को गधे का लंड सहलाते हुए देखा, गधे का लंड थोड़ी ही देर में पूरा बाहर निकल आया। उस औरत ने लंड को अपनी बुर पर टिका लिया और फिर गधे ने एक जोर का रेला उसकी बुर में दिया। गधे का समूचा लंड एक ही झटके से बुर में जा घुसा। औरत थोड़ी देर छटपटाई और फिर उठ खड़ी हुई। ये कहानी आप हमारी वासना डॉट नेट पर पढ़ रहे है.
अंशिका का शरीर बेकाबू हो गया। उसने अपनी बड़ी बहन को अपनी बाँहों में कसकर जकड़ लिया और बोली, “दीदी, अब अपनी बुर में भी किसी का लंड डलवाने की मेरी बहुत इच्छा हो रही है। दीदी, जीजू जब इस लायक नहीं हैं तो फिर तुम अपनी कामाग्नि कैसे शांत करती हो?”
प्रतिभा ने अपनी बहन को प्यार से चूमते हुए कहा, “फिक्र मत कर, आज मैं और तू किसी हट्टे-कट्टे आदमी से अपनी प्यास बुझाएँगे।”
अंशिका ने चहककर पूछा, “कौन है दीदी, जो हमारी प्यास बुझाएगा? आह: दीदी, मैं तो तड़प रही हूँ अपनी बुर फड़वाने के लिए। काश! वह साँड़ ही टीवी फाड़कर निकल आए और हम दोनों को तृप्त कर दे अपने लंड के धक्कों से।”
“सब्र कर बेवकूफ, वो मर्द कोई और नहीं है, मेरे पापा जी ही हैं जो आज हम दोनों की इच्छाएँ पूरी करेंगे।”
“दीदी, ये क्या कह रही हैं आप?”
“हाँ अंशिका, वे मेरे ससुर ही हैं जो मुझ तड़पती हुई औरत को सहारा देते हैं। अब तू ही बता मुझे क्या करना चाहिए? क्या मैं पास-पड़ोस के लोगों को फँसाती फिरूँ अपनी प्यास बुझाने के लिए?”
अंशिका ने अपनी दीदी की बात पर अपनी सहमति व्यक्त की, बोली, “तुम ठीक ही कह रही हो दीदी, इससे घर की इज्जत भी बची रहेगी और तुम्हारी कामाग्नि भी शांत होती रहेगी। अच्छा दीदी, एक बात बताओ। क्या मौसा जी का भी इतना बड़ा और सख्त लंड है जितना कि इस फिल्म में मर्दों का दिखा रहे थे, ऐसा मोटा-लंबा किसी लंबे खीरे जैसा?”
प्रतिभा बोली, “आज तू खुद ही देख लेना अपनी आँखों से, अगर देखकर डर न जाए तो मेरा नाम बदल देना। मुझे तो डर है कि तू झेल भी पाएगी या नहीं।”
“हैं दीदी, सच में मैं नहीं झेल पाऊँगी उनका?”
दोनों बहनें बहुत देर तक वासना की इन्हीं बातों में डूबी रहीं। अंशिका बोली, “दीदी, अगर आप इजाजत दें तो मैं भी आपकी बुर चाटकर देख लूँ?”
प्रतिभा बोली, “चल देख ले। आज तू भी चखकर देख, बुर से जो पानी निकलता है वह कितना आनंददायक होता है।” प्रतिभा ने लाइन क्लियर कर दी। अंशिका ने दीदी की बुर पर अपनी जीभ फेरनी शुरू कर दी। प्रतिभा की बुर बुरी तरह फड़कने लगी। वह बोली, “अंशिका, जरा जोरों से चाट, आह: कितना मजा आ रहा है। अपनी जीभ मेरी बुर के अंदर-बाहर कर… उई माँ… मर गई मैं तो… अंशिका और जोर से प्लीज… आह:… ऊह…”
आधे घंटे तक चाटने के बाद अंशिका बोली, “दीदी, अब मेरी भी चाटो न,” तब प्रतिभा ने उसकी कुँवारी बुर को चाटना शुरू कर दिया। अंशिका का समूचा बदन झनझना उठा। अंशिका के मुँह से भी सिसकारियाँ फूटने लगीं। वह बोली, “दीदी, क्या मौसा जी इस समय नहीं आ सकते? प्लीज उनसे कहो कि आकर मेरी बुर फाड़ डालें।”
प्रतिभा बोली, “क्या पागल हो गई है? थोड़ा सा भी इंतजार नहीं कर सकती।”
“दीदी, अब बिलकुल भी बर्दाश्त नहीं हो रही ये मेरी जवानी की आग… दीदी, मौसा जी राजी तो हो जाएँगे न मेरी फाड़ने के लिए?”
“मेरी बाबली है बिलकुल ही, जिसे एकदम कुँवारी और अछूती बुर मिलेगी चखने को, वह उसे लेने से इनकार कर देगा।”
“दीदी, और अगर नहीं हुए राजी तो…?”
“वो सब तू मुझ पर छोड़, तू एक काम करना। आज रात वो मेरे पास आएँ और हमारी काम-क्रीड़ाएँ शुरू हो जाएँ तो तू एकदम से लाइट ऑन कर देना और जिद करना कि तुझे तो मेरे पास ही सोना है। हमारे पास आकर हमारे ऊपर पड़ा कम्बल खींच देना।
हम दोनों बिलकुल ही नंगे पड़े होंगे कम्बल के भीतर। तू कहना, मौसा जी, मुझे तो दीदी के पास ही सोना है। वे राज खुलने के डर से घबरा जाएँगे और तुझे भी अपने साथ सुलाने को मजबूर हो जाएँगे। बस समझो तेरा काम बन गया। फिर तू उनके साथ चाहे जैसे मजा लेना। समझ गई न?”
अंशिका को तसल्ली हो गई कि आज उसके मौसा जी उसकी बुर जरूर फाड़ देंगे।
अंशिका ने दीदी से कहा, “दीदी, तुम्हें एक बात नहीं मालूम होगी।”
“क्या?” प्रतिभा ने पूछा।
अंशिका ने बताया, “तुम्हारी शादी के बाद एक दिन मैं यों ही खिड़की की ओट से मँझले भैया के कमरे में झाँकने लगी, मुझे भाभी के साथ किसी मर्द की आवाजें सुनाई दीं। कोई कह रहा था, ‘अपने सारे कपड़े उतारकर मेरे ऊपर आ जा। अब मुझसे ज्यादा इंतजार नहीं हो रहा।’
मेरी उत्सुकता बढ़ी। मैंने सोचा कि मँझले भैया तो नाइट ड्यूटी जाते हैं फिर ये कौन आदमी भाभी से नंगी होने की बात कह रहा है। मैंने खिड़की थोड़ी सी और खोलकर अंदर झाँका तो दीदी, बिलकुल ऐसा ही सीन अंदर चल रहा था जैसा कि हम लोगों ने अभी ब्लू-फिल्म में देखा था।
बड़े भैया, मँझली भाभी को नंगी करके अपने ऊपर लिटाए हुए थे और भाभी ऊपर से धक्के मार-मारकर बड़े भैया का लंड अंदर लिए जा रही थीं। मुझे यह खेल देखने का चस्का लग गया। एक बार मैंने उनका यह खेल छोटे भैया को भी दिखाया। देखते-देखते छोटे भैया उत्तेजित हो उठे और उन्होंने मेरी छातियों पर हाथ फेरना आरंभ कर दिया।
मैं किसी तरह भागकर अपने कमरे में चली आई, छोटे भैया ने समझा कि बुरा मानकर अंदर भाग आई हूँ। वे मेरे पीछे-पीछे आए और मुझसे माफी माँगने लगे। आगे कभी ऐसा न करने का वादा भी करने लगे। मैं कुछ नहीं बोली, और वे चुपचाप वहाँ से चले गए।
उनके चले जाने के बाद मैं बहुत पछताई कि क्यों मैंने उनको नाराज कर दिया। अगर उनसे करवा ही लेती तो उस दिन मुझे कितना आनंद आता। अफसोस तो इस बात का रहा कि उन्होंने दुबारा मेरी छातियाँ क्यों नहीं दबाईं। अगर आगे वह ऐसा करें तो मुझे क्या करना चाहिए दीदी? हथियार डाल दूँ उनके आगे, और कर दूँ अपने आपको उनके हवाले?”
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“पागल हो गई है क्या तू! सगे भाई से यह सब करवाने की बात तेरे दिमाग में आई ही कैसे! देख अंशिका, सगे भाई-बहन का रिश्ता बहुत ही पवित्र होता है। आगे से ऐसा कभी सोचना भी मत।”
“दीदी, तुम्हारी बातें सही हैं मगर जब लड़का और लड़की दोनों के ही सर पर वासना का भूत सवार हो जाए तो बेचारा दिल क्या करे? मेरी कितनी ही सहेलियाँ ऐसी हैं जिनके यौन-संबंध उनके अपने सगे भाइयों से हैं। और ये संबंध उनके वर्षों से चले आ रहे हैं। मेरी एक सहेली को तो अपनी शादी के बाद अपने सगे छोटे भाई के साथ संबंध बनाने पड़े। उसका पति नपुंसक है और कभी उसके लंड में थोड़ी-बहुत उत्तेजना आती भी है तो वह पत्नी की बुर तक पहुँचते-पहुँचते ही झड़ जाता है।”
दोनों बहनों को बातें करते-करते शाम हो आई। ससुर ने आवाज लगाई, “बहू, जरा इधर तो आ। क्या आज खाना नहीं बनाना है?” प्रतिभा पास आकर ससुर के कान में फुसफुसाई, “जानू आज समझो तुम्हारा काम बन गया। उसी को पटाने में इतनी देर लग गई। आप आज रात को मेरे पलंग पर आकर चुपचाप लेट जाना, आगे सब मैं संभाल लूँगी।”
रात हुई, दोनों बहनें अलग-अलग बिस्तरों पर लेटीं। अंशिका आँखें बंद करके सोई हुई होने का नाटक करने लगी। रात के करीब दस बजे धीरे से दरवाजा खुलने की आवाज आई। अंशिका चौकन्नी हो गई, उसने कम्बल से एक आँख निकालकर देखा कि दीदी के ससुर अंदर आए।
अंदर आकर उन्होंने अंदर से कुंडी लगा ली और दबे पाँव दीदी के कम्बल में घुस गए। प्रतिभा पहले से ही पेटीकोट और ब्रा में थी। बनारसी दास ने भी अपने सारे वस्त्र उतार फेंके और प्रतिभा को नंगी करके उसके ऊपर चढ़ गया। अब दोनों की काम-क्रीड़ाएँ शुरू हो गईं।
बनारसी दास धीरे से प्रतिभा के कान में बोला, “थोड़ी सी पिएगी मेरी जान, आज मैं विलायती व्हिस्की लेकर आया हूँ। आज बोतल की और इस नई लौंडिया की सील एक साथ तोड़ूँगा।” बनारसी दास ने अपने कुरते को टटोलना शुरू किया ही था कि-
प्रतिभा उसे रोकते हुए बोली, “अभी नहीं, अंशिका पर काबू पाने के बाद शुरू करेंगे पीना। आज मैं तुम दोनों को अपने हाथों से पिलाऊँगी और खुद भी पीऊँगी तुम्हारे साथ। पहले मेरी बहन की अनछुई जवानी का ढक्कन तो खोल दो, बाद में बोतल का ढक्कन खुलेगा।”
बनारसी दास मुस्कुराया, बोला, “मेरी जान, तू मेरे लिए कितना कुछ करने को तैयार है। यहाँ तक कि अपनी छोटी बहन की सील तुड़वाने को भी राजी हो गई।”
“आप भी तो हमारे ऊपर सब-कुछ लुटाने को तैयार रहते हो मेरे राजा, फिर तुम्हारी रानी तुम्हारे लिए इतना सा काम भी नहीं कर सकती।”
अंशिका कम्बल की ओट से सब-कुछ साफ-साफ देख पा रही थी। नाइट बल्ब की रौशनी में दोनों के गुप्तांग स्पष्ट दिखाई दे रहे थे। अंशिका ने सोचा ‘दीदी ने तो कहा था लाइट ऑन करके दोनों के ऊपर से कम्बल हटाने के लिए। यहाँ तो कुछ भी हटाने की जरूरत नहीं है, सब काम कम्बल हटाकर ही हो रहा है।’ अंशिका ने उठकर लाइट ऑन कर दी। दोनों ने दिखावे के तौर पर अपने को कम्बल में ढकने का प्रयास किया।
अंशिका बोली, “दीदी, मैं तो तुम्हारे पास सोऊँगी। मुझे तो डर लग रहा है अकेले में।”
प्रतिभा ने दिखावटी तौर पर उसे समझाया, “हम लोग यहाँ क्या कर रहे हैं, ये तो तूने देख ही लिया है, फिर भी तू मेरे पास सोने की जिद कर रही है।”
बनारसी दास बोला, “हाँ, हाँ, सुला लो न बेचारी को अपने पास। उसे हमारे काम से क्या मतलब, एक कोने में पड़ी रहेगी बेचारी। आ जा बेटी, तू मेरी तरफ आ जा।”
अंशिका झटपट बनारसी दास की ओर जा लेटी और बोली, “आप लोगों को जो भी करना है करो, मुझे तो जोरों की नींद लगी है।”
इधर प्रतिभा और बनारसी दास का पहला राउंड चल रहा था, इस बीच अंशिका कभी अपनी चूचियों को दबाती तो कभी अपनी बुर खुजलाती। जब प्रतिभा और बनारसी दास स्खलित हो गए तो बनारसी दास ने कहा, “जानू लाओ तो हमारी व्हिस्की की बोतल, इससे जोश पूरा आएगा, और लंड की ताकत पहले से भी दूनी हो जाएगी।”
प्रतिभा बोली, “मुझे तो बहुत थोड़ी सी देना, मैं तो पीकर सो जाऊँगी। मेरे राजा, आज तो तुमने मेरी फाड़कर रख दी। बुर भी बहुत दर्द कर रही है।” फिर वह अपने ससुर जी के कान में बोली, “आज इसको कतई छोड़ना मत, सोने का बहाना बनाए पड़ी है। आज मैंने ब्लू-फिल्म दिखाकर इसे तुम्हारा यह मूसल सा मोटा लंड अंदर डलवाने के लिए बिलकुल तैयार कर लिया है।”
लाइट तो ऑन थी ही, पलंग पर दोनों ससुर-बहू बिलकुल नग्नावस्था में बैठे थे। अंशिका ने मौसा जी के मोटे लंड को कनखियों से देखा तो सर से पैर तक काँप गई—‘बाप रे, किसी आदमी का लंड है या किसी घोड़े का!’ पूरे दस इंच लंबा और मोटा लंड अभी भी तनतनाया हुआ था, अंशिका की लेने की आस में।
प्रतिभा ने बोतल की सील तोड़ी और दो गिलासों में शराब उड़ेल दी। दोनों ने जैसे ही सिप करना चाहा कि अंशिका ने कम्बल से मुँह बाहर निकालकर कहा, “दीदी, आप दोनों ये क्या पी रहे हैं? थोड़ी मुझे नहीं दोगे?”
प्रतिभा ने गुस्सा दिखाते हुए कहा, “जहर पी रहे हैं हम लोग, पिएगी?”
“हाँ, मुझे भी दो न।”
बनारसी दास ने अंशिका की हिमायत लेते हुए कहा, “हाँ, दे दो थोड़ी सी इस बेचारी को भी।”
प्रतिभा ने दो पैग शराब एक ही गिलास में डाल दी और गिलास थमाते हुए बोली, “ले मर, तू भी पी थोड़ी सी।”
अंशिका ने दो घूँट गले से नीचे उतारे, और कड़वाहट से मुँह बनाती बोली, “दीदी, ये तो बहुत ही कड़वी है।”
“अब गटक जा सारी चुपचाप, ज्यादा नखरे दिखाने की जरूरत नहीं है। ला थोड़ा सा पानी मिला दूँ इसमें…” प्रतिभा ने बाकी का खाली गिलास पानी से भर दिया। अंशिका दो बार में ही सारी शराब गले के नीचे उतार गई और अपना कम्बल ओढ़कर चुपचाप सोने का अभिनय करने लगी। ये कहानी आप हमारी वासना डॉट नेट पर पढ़ रहे है.
शराब पीने के बाद बनारसी दास का अधखड़ा लंड अब पूरा तनकर खड़ा हो गया। उसने प्रतिभा से पूछा, “क्या शुरू की जाए इसके साथ छेड़खानी?”
प्रतिभा ने धीरे से सर हिलाकर लाइन क्लियर होने का संकेत दे दिया। बनारसी दास प्रतिभा से बोला, “तुम अपने लिए दूसरा कम्बल ले आओ। मैं तो अपनी प्यारी बिटिया के कम्बल में ही सो लूँगा।” ऐसा कहकर वह अंशिका के कम्बल में घुस गया। बनारसी दास के हाथ धीरे-धीरे अंशिका के वक्ष की ओर बढ़े। अंशिका ने अंदर ब्रा नहीं पहनी थी, वह केवल नाइटी में थी।
बनारसी दास ने ऊपर से ही अंशिका की चूचियाँ दबाकर स्थिति का जायजा लिया। अंशिका सोने का बहाना करते हुए सीधी होकर बिलकुल चित्त लेट गई जिससे कि बनारसी दास को उसका सारा बदन टटोलने में किसी प्रकार की बाधा न पड़े। उसका दिल जोरों से धड़कने लगा, साँसें भी कुछ तेज चलने लगीं। बनारसी दास ने उसके होठों पर अपने होठ टिका दिए और बेधड़क होकर चूसने लगा।
अंशिका ने नकली विरोध जताया, “ओह दीदी, क्या मजाक करती हो। मुझे सोने भी दो अब…”
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बनारसी दास ने उसकी तनिक भी परवाह न करते हुए उसकी छातियाँ मसलनी शुरू कर दीं और फिर अपने हाथ उसके सारे बदन पर फेरने लगा। इधर अंशिका पर शराब और शबाब दोनों का ही नशा सवार था। उसके बदन में वासना की हजारों चींटियाँ सी रेंगने लगीं।
उसने अनजान बनते हुए बनारसी दास की जाँघों के बीच में हाथ रखकर उसके लंड का स्पर्श भी कर लिया। तभी उसने लंड को पकड़कर सहलाना शुरू कर दिया, और बोली, “दीदी, तुम्हारी ये क्या चीज है?”
इस बीच बनारसी दास ने उसकी नाइटी भी उतार फेंकी और उसे बिलकुल नंगी कर डाला। बनारसी दास ने ऊपर से कम्बल हटाकर उसका नग्न शरीर प्रतिभा को दिखाते हुए कहा, “देखा रानी, तेरी बहन बेहोशी में जाने क्या-क्या बड़बड़ाए जा रही है।”
बनारसी दास ने उसकी दोनों जाँघों को थोड़ा सा फैलाकर उसकी बुर पर हाथ फिराते हुए कहा, “यार जानू तेरी बहन तो बड़े ही गजब की चीज है। इसकी बुर तो देखो, कितनी गोरी और चिकनी है। कहो तो इसे चाटकर इसका पूरा स्वाद चख लूँ? रानी, तू कहे तो इसकी बुर का पूरा रस पी जाऊँ… बड़ी रसदार मालूम पड़ रही है।”
प्रतिभा बोली, “और क्या… जब नशे में मस्त पड़ी है तो उठा लो मौके का फायदा। होश में आ गई तो शायद न भी दे। अभी अच्छा मौका है, डाल दो अपना समूचा लंड इसकी बुर के अंदर।”
बनारसी दास ने उसकी जाँघें सहलानी शुरू कर दीं। फिर धीरे से उसकी गोरी-चिकनी बुर में अपनी एक उँगली घुसेड़कर उसे अंदर-बाहर करने लगा। उसने प्रतिभा से पूछा, “क्यों जानू इसकी बुर के बाल तुमने साफ किए हैं?”
“नहीं तो…” प्रतिभा बोली, “इसी ने साफ किए होंगे, पूरे एक घंटे में बाथरूम से निकली थी नहाकर।”
बनारसी दास अंशिका की बुर पर हाथ फेरता हुआ बोला, “क्या गजब की सुरंग है इसकी! कसम से इसकी सुलगती भट्टी तो इतनी गर्म है कि डंडा डाल दो तो वह भी जल-भुनकर राख होकर निकलेगा अंदर से।”
अंशिका से अब नहीं रहा गया, बोली, “तो डाल क्यों नहीं देते अपना डंडा मेरी गर्म-गर्म भट्टी में।”
बनारसी दास की बाछें खिल उठीं। उसने अंशिका की चूची को मुँह में भरकर चूसना शुरू कर दिया। अंशिका की सिसकियाँ कमरे में गूँजकर वातावरण को और भी सेक्सी व रोमांटिक बनाने लगीं। बनारसी दास अब खुलकर उसके नग्न शरीर से खेल रहा था।
अंशिका ने बनारसी दास का लंड पकड़कर अपने मुँह में डाल लिया और मस्ती में आकर उसे चूसने लगी। अब उसे अपने बदन की गर्मी कतई सहन नहीं हो रही थी। उसने बनारसी दास का लंड अपनी जाँघों के बीच में दबाते हुए कहा, “मौसा जी, प्लीज… अब अपना यह मोटा डंडा मेरी जाँघों के भीतर सरकाइए, मुझे बड़ा आनंद आ रहा है।”
तब बनारसी दास ने मोटे लंड का ऊपरी लाल भाग अंशिका की बुर में धीरे-धीरे सरकाना आरंभ किया। अंशिका की बुर में एक तेज सनसनाहट दौड़ गई। उसने कसकर अपने दाँत भींच लिए और लंड की मोटाई को झेल पाने का प्रयास करने लगी। बनारसी दास का लंड जितना उसकी बुर के अंदर घुस रहा था बुर में उतनी ही पीड़ा बढ़ती जा रही थी।
अब बनारसी दास के लंड में भी और अधिक उत्तेजना आ गई थी। उसने एक जोरदार धक्का पूरी ताकत के साथ मारा जिससे उसका समूचा लंड अंशिका की कोरी बुर को फाड़ता हुआ अंदर घुस गया। अंशिका के मुँह से एक जोरों की चीख निकलकर वातावरण में गूँज उठी और वह बनारसी दास के लंड को बुर से बाहर निकालने की चेष्टा करने लगी।
प्रतिभा ने बनारसी दास से कहा, “जानू इसके कहने पर अपने इंजन को रोकना नहीं, देखना अभी कुछ ही देर में रेल पटरी पर आ जाएगी।”
बुर से खून बह निकला जो चादर पर फैल गया था। प्रतिभा अंशिका को डाँटते हुए बोली, “देख अंशिका, अब तू चुपचाप पड़ी रहकर इनके लंड के धक्के झेलती रह, यों व्यर्थ की चीखापुकारी से कुछ नहीं होगा। इस वक्त जो दर्द तुझे महसूस हो रहा है वह कुछ ही देर में मजे में बदल जाएगा। इन्हें रोके मत, इनके रेस के घोड़े को सरपट दौड़ने दे, अंधाधुंध अंदर-बाहर। इनका बेलगाम घोड़ा जितनी तेजी से अंदर-बाहर के चक्कर काटेगा उतना ही तुझे मजा आएगा।”
बड़ी बहन की बात मानकर अंशिका थोड़ी देर अपना दम रोके यों ही छटपटाती रही और कुछ ही देर में उसे मजा आने लगा। बनारसी दास अब तक सैकड़ों धक्के अंशिका की बुर में लगा चुका था। अब अंशिका के मुख से बनारसी दास के हर धक्के के साथ मादक सिसकारियाँ फूट रही थीं। उसे लगा कि वह स्वर्ग की सैर कर रही है। इधर बनारसी दास अपने तेज धक्कों से उसे और भी आनंदित किए जा रहा था। अंशिका अब अपने नितंबों को उचका-उचकाकर अपनी बुर में उसके लंड को गपकने का प्रयास कर रही थी।
वह मस्ती में भरकर चीखने लगी, “मौसा जी, जरा जोरों के धक्के लगाओ… तुम्हारे हर धक्के में मुझे स्वर्ग की सैर का आनंद मिल रहा है… आह:… आज तो फाड़ के रख दो मेरी बुर को… और जोर से… और जोरों से… उई माँ… मौसा जी… प्लीज धीरे-धीरे नहीं… थोड़े और जोर से फाड़ो…” उसने बनारसी दास को कसकर अपनी बाँहों में जकड़ लिया।
अपनी दोनों टाँगों से उसने अपने मौसा जी के नितंबों को जकड़ रखा था। अजब प्यास थी उसकी जो बुझाए नहीं बुझ रही थी। अंततः बनारसी दास ने उसकी प्यास बुझा ही डाली। अंशिका बनारसी दास से पहले ही क्षरित होकर शांत पड़ गई.
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उसने अपने हाथ-पैर पटकने बंद कर दिए थे पर वह अब भी चुपचाप पड़ी अपने मौसा जी के लंड के झटके झेल रही थी। आखिरकार बनारसी दास के लंड से भी वीर्य की एक प्रचंड धारा फूट पड़ी। उसने ढेर सारा वीर्य अंशिका की बुर में भर दिया और निढाल सा हो उसके ऊपर लेट गया।
कुछ देर बाद तीनों का नशा मंद पड़ा। रात के करीब दो बजे अंशिका का हाथ बनारसी दास के लंड को टटोलने लगा। वह उसके लंड को धीरे-धीरे पुनः सहलाने लगी। बल्ब की तेज रौशनी में उसने सोते हुए बनारसी दास के लंड को गौर से देखा और फिर उसे अपनी उँगलियों में कसकर सहलाना शुरू कर दिया था। बनारसी दास और प्रतिभा दोनों ही जाग रहे थे। उसकी इस हरकत पर दोनों खिलखिलाकर हँस पड़े।
प्रतिभा ने कहा, “देख ले अपने मौसा जी के लंड को, है न उतना ही मोटा, लंबा जितना कि मैंने तुझे बताया था।” वह शरमाकर मुस्कुराई।
बनारसी दास ने भी हँसते हुए पूछा, “क्यों मेरी जान, मजा आया कुछ?”
अंशिका ने शरमाकर बनारसी दास के सीने में अपना मुँह छिपाते हुए कहा, “हाँ मौसा जी, मुझे मेरी आशा से कहीं अधिक मजा आया आपके साथ। मालूम है, मैंने आपके साथ यह पहला शारीरिक संबंध बनाया है।”
बनारसी दास बोला, “अंशिका रानी, अब से मुझसे मौसा जी मत कहना। मुझसे शारीरिक संबंध बनाकर तूने मुझे अपना क्या बना लिया है, जानती है?”
अंशिका चुप रही।
बनारसी दास बोला, “अब तूने मुझे अपना खसम बना लिया है। मैं अब तुम दोनों बहनों का खसम हूँ। आई कुछ बात समझ में?”
अंशिका बोली, “ठीक है खसम जी, पर सबके आगे तो मैं आपको मौसा जी ही कहूँगी।”
बनारसी दास ने अंशिका की बुर में उँगली घुसेड़कर उसे अंदर-बाहर करते हुए कहा, “चलो सबके आगे तुम्हारा मौसा ही बना रहूँगा।”
अंशिका ने बनारसी दास के एक हाथ से अपनी छातियाँ मसलवाते हुए कहा, “हमारा आपसे मिलन भी प्रतिभा दीदी के सहयोग से ही हुआ है। अगर आज दीदी मुझे वह ब्लू-फिल्म नहीं दिखाती तो मैं आपके इस मोटे हथियार से अपनी बुर फड़वाने का इतना आनंद कभी नहीं ले पाती। मेरे खसम, अब तो अपना ये डंडा एक बार फिर से मेरी बुर में घुसेड़कर उसे फाड़ डालने की कृपा कर दो। इस बार मेरी सुरंग फाड़कर रख दोगे तो भी मैं अपने मुँह से उफ़ तक न करूँगी।”
बनारसी दास बोला, “क्यों अपनी चूत का चित्तोड़गढ़ बनवाना चाह रही है। मैं तो बना डालूँगा, कुछ धक्कों में तेरी बुर की वो दशा कर दूँगा कि किसी को दिखाने के काबिल नहीं रह जाएगी। चल हो जा तैयार…” ऐसा कहकर बनारसी दास ने अपने मजबूत लंड पर हाथ फिराया।
इसी बीच प्रतिभा बोली, “क्यों जी, आज मैं एक बात पूछना चाहती हूँ। मुझे ये समझाओ कि बुर को लोग और किस-किस नामों से पुकारते हैं?”
प्रतिभा की बात पर अंशिका और बनारसी दास दोनों खिलखिलाकर हँस पड़े।
बनारसी दास बोला, “मेरी रानी, किसी भी चढ़ती जवानी की लड़की की बुर को चूत कहते हैं। इसके दो नाम हैं—एक चूत, दूसरा नाम है इसका ‘बुर’। चूत सदैव बिना बालों वाली बुर को कहते हैं जबकि ‘बुर’ के ऊपर घने काले बाल होते हैं। अब नंबर आता है, भोसड़ी का। मेरी दोनों रानियों ध्यान से सुनना। जब औरत की बुर से एक बच्चा बाहर आ जाता है, तो उसे भोसड़ी कहते हैं। और जब उससे 4-5 बच्चे बाहर आ जाते हैं तो वह भोसड़ा बन जाता है।”
अंशिका ने चहककर पूछा, “और अगर किसी औरत की बुर से दस-बारह बच्चे निकल चुके हों तो वह क्या कहलाएगी?”
बनारसी दास बोला, “ये प्रश्न तुमने अच्छा किया। ऐसी औरत की बुर को चूत या भोसड़ी का दर्जा देना गलत होगा। ऐसी बुर बम-भोसड़ा कही जाने के योग्य होगी।” तीनों लोग जोरों से हँस पड़े।
प्रतिभा ने पूछा, “राजा जी, इसी प्रकार लिंगों के भी कई नाम होते होंगे?”
“हाँ, होते हैं। आमतौर पर गँवारू भाषा में इसे ‘लंड’ कहते हैं। परन्तु लड़ते वक्त या गालियाँ देते वक्त लोग इसे ‘लौड़ा’ कहकर संबोधित करते हैं। ये सारे शब्द मुझे कतई पसंद नहीं हैं, क्योंकि मैंने बीसियों रातें तुम्हारे संग गुजारी हैं।
तुम ही खुद बताओ अगर मैंने कभी इन गंदे शब्दों का प्रयोग किया हो। हाँ, मेरी जिंदगी में कुछ ऐसी औरतें जरूर आई हैं, जो अधिक उत्तेजित अवस्था में चीखने लगती हैं… ‘फाड़ डालो मेरी चूत’… ‘मेरी चूत चोद-चोदकर इसका चबूतरा बना डालो’… ‘मेरी चूत को इतना चोदो कि इसका भोसड़ा बन जाए’ बगैरह, बगैरह।”
“एक काम-क्रीड़ा होती है—गुदा-मैथुन। इसमें पुरुष, स्त्री की बुर न मारकर उसकी गुदा मारता है। मेरे अपने विचार से तो गुदा-मैथुन सबसे गंदी, अप्राकृतिक एवं भयंकर काम-क्रीड़ा है। इससे एड्स जैसी लाइलाज बीमारियाँ होने का खतरा रहता है।”
प्रतिभा ने पूछा, “राजा जी, ये चोदना कौन सी बला है। मैंने कितने ही लोगों को कहते सुना है ‘तेरी माँ चोद दूँगा साले’।”
बनारसी दास ने बताया कि स्त्री की बुर में लंड डालकर धक्के मारने की क्रिया को ‘चोदना’ कहते हैं। “मैंने तुम दोनों बहनों के साथ संभोग किया है, चोदा नहीं है तुम्हें।”
अंशिका बोली, “मेरे खसम महाराज, एक बार और जोरों से चोदो न मुझे।”
बनारसी दास बोला, “चलो, तुम्हारी यह इच्छा भी आज पूरी किए देता हूँ। प्रतिभा रानी, पहले एक-एक पैग और बनाओ, हम तीनों के लिए।”
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तीनों शराब गले से उतारने के बाद और भी ज्यादा उत्तेजित हो गए। इस बार तीनों लोग एक साथ मिलकर काम-क्रीड़ा कर रहे थे। बनारसी दास के एक ओर अंशिका और दूसरी ओर प्रतिभा लेटीं और उन दोनों के बीच में बनारसी दास लेटे-लेटे दोनों के नग्न शरीर पर हाथ फेर रहा था। बनारसी दास कभी अंशिका की बुर लेता तो कभी प्रतिभा की चूचियों से खेलता। रात के दस बजे से लेकर सुबह के पाँच बज गए। तब तक तीनों लोग शरीर की नुमाइश और काम-क्रीड़ा में व्यस्त रहे। इस प्रकार बनारसी दास ने दोनों बहनों की रात भर बजाई।
उस रात दोनों बहनें इतनी अधिक तृप्त हो गईं कि दूसरे दिन दस बजे तक सोती रहीं। पूरे सप्ताह बनारसी दास ने अंशिका को इतना छकाया था कि जिसकी याद वह जीवन भर नहीं भूल पाएगी। अंशिका तो अपने घर वापस जाना ही नहीं चाहती थी। जाते वक्त अंशिका बनारसी दास से एकांत में चिपककर खूब रोई। उसका लंड पायजामे के ऊपर से ही सहलाते हुए बोली, “जानू अपने इस डंडे का खयाल रखना। मुझे शादी के बाद भी इसकी जरूरत पड़ सकती है। क्या पता मेरा पति भी जीजू के जैसा ही निकला तो…?”
अंशिका भारी मन से, न चाहते हुए भी अपने घर चली तो गई पर जाते-जाते बनारसी दास के लिए एक प्रश्न छोड़ गई… कि कहीं उसका पति भी जीजू जैसा ही निकला तो…..?
प्रातिक्रिया दे