Hot Bahu Hardcore Sex Story
सूर्यप्रताप सिंह ने अपने भतीजे अमरेन्द्र सिंह की शादी एक ऐसी लौंडिया से करवाई, जो कमाल की हसीना थी। लौंडिया का नाम बता देना सही रहेगा, उस हसीना जिसकी गरमागरम जवानी कमाल की थी, उसका नाम था सविता। Hot Bahu Hardcore Sex Story
जब सविता अपने दूल्हे-राजा के घर आई तो उसके सपने काफ़ी रंगीन थे, वो अपने साथ बालीवुड के हीरो और हिरोइनों की तस्वीरें लेकर आई, लौंडिया को चुदाई और सेक्स के रंगीन ख्वाबों ने घेर रखा था। हो भी क्यों न! आखिर उसका हुस्न लाखों में एक था! वह थी भी एक माल जैसा पीस।
मैं आपको जरा उसकी जवानी का नक्शा बता दूँ- कुछ लहलहाते हुए धान के खेतों के रंग का सुनहरा सा रूप, सावन-भादों के काले बादलों जैसे घने बाल और उनके नीचे सुराहीदार गरदन। चूचियों का विवरण देने के लिये शब्द नहीं हैं, लेकिन इतना तय है कि इन कुवाँरी चूचियों को देखकर बड़े से लेकर बुड्ढ़े तक सबका दिमाग, इन्हें पीने को बेताब हो जाता था। ये मयखाने थे, जो अब तक किसी ने चखे नहीं थे।
सूर्यप्रताप सिंह ने अपने भतीजे अमरेन्द्र सिंह की शादी करके उसके लिये एक खूबसूरत कामुक गरमा-गर्म बहू के रूप में अपने मतलब का माल ले आये थे। सूर्यप्रताप सिंह रिटायर्ड टीचर हैं और उनका लंड बड़ा ही घातक और प्रचंड है। उस पर तुर्रा यह कि उनकी बीवी की चूत एकदम सड़े हुए पपीते की तरह नाकाम हो चली है।
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अब काम कैसे चलेगा, तो सूर्यप्रताप सिंह ने अपने भतीजे की शादी एक गरीब बाप की खबसूरत बेटी से तय कर दी थी। दुल्हन अपने पिया के घर आई, चुदाई के रंगीन सपने लिये। सुहागरात का नजारा, चलने से पहले बता दें कि अमरेन्द्र सिंह जी बड़े ही दुबले-पतले लंड वाले और हिले हुए पुर्जे टाइप के इंसान थे, जिनके बस का किसी गांड को मारना या, चूत की सील तोड़ना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन था।
सुहागरात की रात सूर्यप्रताप सिंह ने यह नजारा देखने के लिये एक बड़ा ही चौकस जुगाड़ किया और जैसा कि पहले से ही सब तय था कि खुद का कमरा और सुहागरात वाला कमरा आजू-बाजू ही थे और एक ही दीवार दोनों को अलग करती थी। एक खिड़की थी जो सुहागरात वाले कमरे में झांकने का रास्ता थी। उसे उसने पहले से ही थोड़ा हिला-हिला के झिर्रीदार बना दिया था।
जैसे ही चूत की कहानी शुरु होती, सूर्यप्रताप सिंह ने अपनी आँखें खिड़की से लगा दीं। अमरेन्द्र सिंह हिलते हुए अपनी दुल्हन के सामने खड़ा था, वो नीचे देख रही थी और वो ऊपर देख रहा था। कौन किसको चोदने वाला है, यही समझ नहीं आ रहा था लेकिन दुल्हन ने पहल की।
वो समझ गई थी कि ये लौंडा एकदम बकचोदू है और चिकलांडू है क्योंकि सामने चूत का मौका देख कर कोई बकलँड ही इस तरह कांप सकता है। सूर्यप्रताप सिंह को खिड़की से यह दृश्य दिखाई दे रहा था और उनका लंड धोती के अंदर डिस्को भांगड़ा करने लगा था। उन्होंने आंखें गड़ा दीं।
बहू ने अमरेन्द्र सिंह की शेरवानी खोल दी और पजामे का नाड़ा जल्दी में खींच के तोड़ डाला। कहानी उल्टी चल रही थी और सूर्यप्रताप सिंह इतनी गर्म बहू देख कर एकदम बाग-बाग थे क्योंकि वो जान गये थे कि इतनी गर्म और कामुक बहू इस नादान और नामर्द लौंडे से संभलने वाली नहीं है, इसीलिए तो उन्होंने इसकी जल्दी ही शादी करवा दी थी।
बहू ने अमरेन्द्र सिंह को पूरा नंगा कर दिया। आज वो अपना हक अपने मर्द से छीन लेने वाली थी कि अपने पति का ‘टिंगू-लंड’ देख कर उसका दिल बैठ गया। एकदम दो इंच का लंड था और खड़ा होकर साढे तीन इंच का हो गया था। इसे तो चूसा भी नही जा सकता, हद है भई! अमरेन्द्र सिंह जी हांफ़ रहे थे, दुल्हन के इस गरमागरम रूप को देख कर। उसने अमरेन्द्र सिंह को पटक कर उनके मुँह पर अपनी चूत रख दी और अमरेन्द्र सिंह की सांसें फ़ूलने लगीं।
; साले लंड में नहीं था गूदा तो लंका में काहे कूदा!’ गाली देते हुए बोली- काहे तेरे मास्टर चाचा ने मेरी शादी तेरे से की ! मादरचोद ले, अब चूस मेरी चूत और सुबह उस धोती वाले की धोती में आग लगा न दी तो मेरा नाम सविता नहीं।
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लगभग आधा घंटा अपनी चूत और गांड उसके मुँह पर रगड़ने के बाद उसने लाईट आफ़ कर दी और अपनी चूत पसार कर सोने चली गई। सूर्यप्रताप सिंह का दिल बागम-बाग हो गया, लंड को तेल लगा कर उन्होंने मोटा और नुकीला किया और अपनी धोती खोल कर सहलाते हुए सो गये।
बहुत जल्दी सीन में उन्हें एंट्री मारते हुए अपनी बहू को कब्जा लेना था। सुहागरात में अपने भतीजे अमरेन्द्र सिंह का नाकाम फ़्लाप शो देख कर खुश हुआ कि अब तो मेरे लंड को चौका मारने का मौका मिलना तय ही है। सुबह उसने अपने भतीजे अमरेन्द्र सिंह को किसी काम से 6-7 दिनों के लिये बाहर भेज दिया। ये कहानी आप हमारी वासना डॉट नेट पर पढ़ रहे है.
अब घर में अकेले बहू सविता और खूसट ठरकी बुढ़ऊ सूर्यप्रतापसिंह ही बचे थे। खाना परोसते समय बहू का आँचल सरक गया, उसके ब्लाउज का मुँह बड़ा चौड़ा था, तो उजली चूचियों सूर्यप्रताप सिंह के नजरों में चमक गईं। शायद यह सविता की सोची समझी चाल थी। शाम को शौच के लिये उसे बाहर जाना था, खुले में।
बहू को डर लगा तो सूर्यप्रताप सिंह के पास आई और पूछा- चाचाजी, मुझे बाहर जाना है, दो नम्बर के लिये ! लेकिन पहली बार इस गांव में निकलते हुए डर लग रहा है।
बुढ़ऊ का दिल बाग-बाग हो गया और उसने कहा- चिन्ता ना कर बहू, घर की चारदीवारी में ही खुले में इसी काम के लिए गड्डा बना रखा है, चली जा। मैं छत पर ही रहूँगा, कोई डरने की बात नहीं है।
सविता चली गई और बुड्ढा छत पर से उसे टट्टी करते देखता रहा। अचानक दोनों की नजरें मिल गईं। सविता ने अपनी चूत पर टार्च जला कर बुड्ढ़े को अपनी झांट वाली ‘बम्बाट’ बुर दिखा ही दी। वहीं छत पर खड़े-खड़े बुड्ढ़े की धोती में आग लग गई, लंड खड़ा होने लगा और बुड्ढ़े सूर्यप्रताप ने अपना सुपारा हाथ में लेकर रगड़ना शुरु कर दिया। अब वह चूत का मैदान मारने की तैयारी कर चुका था। जैसे ही सविता अंदर आई, दरवाजे पर ही उसने उसे दबोच लिया।
वो बोली- अरे पापा जी रुकिये, गांड तो धो लेने दीजिए अभी टट्टी लगी है उसमें, इतने बेसबरे मत होइये।
सूर्यप्रताप तुरंत हैंड्पंप के पास जाकर पानी चलाने लगा और सविता ने लोटे से पानी लेकर अपनी गांड उस बुड्ढ़े के सामने ही छप्पाक-छ्प्पाक धो डाली। कहानी बुड्ढ़े के अनुसार ही चल रही थी। बूढ़े को अपनी बहू की बड़ी गांड का छोटा छेद बड़ा प्यारा और नाजनीन लगा।
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वह समझ गया कि यही है मेरे लंड का अंतिम डेस्टिनेशन! सविता के खड़े होते ही सूर्यप्रताप ससुर ने उसे दबोच लिया और उसकी साड़ी वहीं आंगन में ही खोलने लगा। घर में कोई नहीं था, चांदनी रात में भतीज-बहू का चीर-हरण, और दूधिया जवानी, दोनों का मेल गजब का था। सारे कपड़े खोल बुड्ढ़े ने सविता के बड़ी चूचियों पर सबसे पहले मुँह मारा।
जैसे ही उसने मुँह मारा, सविता गाली देने लगी- पी ले अपनी माँ के चूचे… बहनचोद बुड्ढ़े! कर दी शादी तूने मेरी नामर्द गांडू से?
सूर्यप्रताप ने कहा- तो कोई बात नहीं बेटी, ये ले बदले में मेरा हल्लबी लौड़ा.. किसी भी जवान से ज्यादा सख्त और बुलंद है।
अपना लंड पकड़ कर वो खड़ा रहा और सविता नीचे बैठ गई। लंड के सुपारे से चमड़े की टोपी हटा उसने लंड को सूंघा तो उसे उस गंध से समझ में आ गया कि यह पुराना चावल काफ़ी मजेदार है। अपने मुँह में ढेर सारा थूक लेकर उसने लंड के ऊपर थूक दिया। मुँह में पेलने को बुड्ढा बेताब हो रहा था लेकिन सविता को अपनी ‘हायजीन’ का पूरा ख्याल था।
उसने लंड को थूक से धोने के बाद उस थूक से लंड की मसाज चालू कर दी। बुढ़ऊ सूर्यप्रताप गाली बक रहा था- हाय मादरचोद, मार डालेगी क्या ! साली जल्दी से मुँह में डाल ! इतना रगड़ती क्यों है… तेरी माँ का लौड़ा !! उफ़्फ़ चूस ना, चूस ना !
सविता ने अधीरता नहीं दिखाई और आराम से लंड को थूक कर चाटती रही। जब पूरा लंड साफ़ चकाचक हो गया, अपने मुँह का रास्ता उस लंड को दिखा दिया। अब बुड्ढ़े के लंड ने मुँह को चूत समझ लिया और उसमें अपना लंड किसी एक्सप्रेस की तरह घुसम-घुसाई करने लगा।
“आह… आह… ले… ले… ये ले… मादरचोद… तुम्हारा ससुर अभी जवान है… ये ले चूस तेरी माँ का लौड़ा।”
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सविता एकदम अवाक थी अपने बुड्ढ़े ससुर की ‘परफ़ार्मेंस’ से। उसने अपना गला फ़ड़वाने की बजाय रात की प्यासी चूत की चुदास बुझाना बेहतर समझा। अब बुड्ढ़े का सपना सच हो गया था। बहू चोद ससुर सूर्यप्रताप सिंह ने अपनी बहू सविता को चोदने की सेटिंग कर ली। अब आप देखेंगे उन दोनों की चुदाई का भयंकर नजारा।
सविता ने तुरंत उसका लंड ऐंठ कर सूर्यप्रताप सिंह को नीचे गिरा दिया। बुड्ढा अपनी बहू के इस कदम से भौंचक्का रह गया, लेकिन यह काम सविता ने उसके अंदर गुस्सा जगाने के लिये किया था जिससे कि वह बदले की भावना से जबरदस्त पेल सके।
बुड्ढ़े ने अपनी धोती खोल फ़ेंकी, उसके अंडकोष किसी पपीते की तरह आधा-आधा किलो के थे। सविता को पटक कर उसने अपना अंडकोष उसके मुँह में दे डाले, कहा- ले चूस बहू, बहुत कलाकार है तू बे मादरचोद साली, लाया था बहू, निकली रंडी। अब तो मेरा काम सेट कर देगी तू !
सविता ने उस अन्डकोष को शरीफ़ा की तरह अपनी जीभ से कुरेदना जारी रखा। बुड्ढा अपने मोटे लंबे लंड से चूत उसके बड़े चूचों की पिटाई कर रहा था और अपनी ऊँगलियाँ उसकी झांटों पर फ़िरा रहा था। जब पूरे अंडकोष पर उसने अपनी जीभ फ़िरा चुकी तो बुड्ढ़े ने अपनी गांड का छेद अपनी बहू के मुँह पर रख दिया।
“ले कर रिम-जॉब!”
बुड्ढा वाकई चोदूमल था, उसे रिम-जाब मतलब कि गांड को चटवाने की कला भी आती थी और वो इसका रस खूब लेता रहा था। वाकई में जब भी वो सोना-गाछी जाता रंडियाँ उसे नया-नया तरीका सिखातीं और अब तो वह अपने घर में ही परमानेंट रंडी ले आया था। सविता ने उसकी गांड को चाट कर उसमें एक उंगली करनी शुरु कर दी। बुढ्ढा पगला गया, उसने तपाक बहू की झांटें पकड़ी और ‘चर्र’ से एक मुठ्ठी उखाड़ लीं।
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“हाय !! मादरचोद बुड्ढ़े !! तुझको अभी देखती हूँ!”
सविता ने बदले में पूरी उंगली उसकी गांड में घुसेड़ कर कहा- मादरचोद पेलेगा नहीं सिर्फ खेलेगा ही क्या बे?
कहानी मजेदार होती जा रही थी। अब बुढ़ऊ की मर्दानगी जग चुकी थी, भयंकर रूप लिये बरसों से चूत के प्यासे मोटे लंबे लंड को, उसने अपनी प्यारी बहू की मुलायम चिकनी चूत में डाल देने का फ़ैसला कर लिया था। उसने सविता की टाँगें खोल दीं और अपनी उंगलियों से चूत का दरवाजा खोला।
सविता मारे उत्तेजना के गालियाँ बक रही थी। वो खेली-खाई माल थी। बुड्ढे ने अपने लंड के सुपारे को चूत के मुहाने पर छोटे से छेद की बाहरी दीवार वाली लाल-लाल पंखुड़ी पर घिसना चालू किया। सविता की सिसकारियाँ गहरी होती चली जा रही थीं। ससुर सूर्यप्रताप ने उसकी बाहर की ‘मेजोरा- लीबिया’ मतलब कि चूत की बाहरी दीवाल को ऐसे खींच रखा था, जैसे टीचर किसी छोटे बच्चे का कान खींच के सजा दे रहा हो।
माहौल एकदम गर्म हो चुका था।दोनों तरफ़ की दीवालों को रगड़ने के बाद बुड्ढे ने अपना लंड का मुँह सविता के थूक से दोबारा गीला करने के लिये सविता के मुँह में हाथ डाल ढेर सारा थूक बटोरा. और फ़िर अपने लंड के मुहाने पर लगा और अपना थूक उसकी चूत में चारों तरफ़ घिस कर अपना लंड धंसाना शुरु कर दिया। ये कहानी आप हमारी वासना डॉट नेट पर पढ़ रहे है.
सविता की आँखें नाचने लगीं थी। उसकी कहानी ससुर के लंड से लिखी जा रही थी और वाकई ससुर सूर्यप्रताप का बुड्ढा लंड जवानों के लंड से भी बेहतरीन था वो कहते हैं ना “पुराने देसी घी और पिशौरी बादाम खाए हुए थे!” वो रुका नहीं और चूत के पेंदे पर जाकर सीधा टक्कर मारी, सविता चिल्लाई- अई माँ! मर गई प्लीज पापा रुकिये ना!
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लेकिन नहीं… सूर्यप्रताप सिंह को चुदास चढ़ चुकी थी और सालों बाद कोई करारा माल और उसकी चूत की कहानी लिखने का मौका मिला था। लंड नुकीला करके उन्होंने उस चूत का सत्यानाश करना शुरु कर दिया था और फ़िर उसके सुनामी छाप धक्कों से चूत की दीवालें तहस-नहस हो रही थीं। सविता अध-बेहोश हो चली थी और सूर्यप्रताप ने उसे पलट कर पेट के बल लिटा दिया। अब उसकी गांड फ़टने वाली थी, दो उंगलियों से पकड़कर उसकी गांड खोल दी सूर्यप्रताप ने और अपनी जीभ अंदर डाल दी।
ताजा-ताजा धुली गांड खूश्बूदार थी। गांड को गीला कर के ढेर सारा थूक अंदर कर दिया, गांड तैयार थी। उसने अपना मोटा लंड एक ही बार में अंदर कर दिया और सविता चिल्लाई- बचाओ!! लेकिन कोई फ़ायदा नहीं। उसकी गांड खुल चुकी थी और लंड उसे छेदते हुए अंदर था। आधे घंटे तक यह गांड मारने के बाद सूर्यप्रताप सिंह ने अपना वीर्य उसके पिछवाड़े पर निकाल कर लंड को चूचों में पोंछ दिया। रात में यह कार्यक्रम तीन-चार बार उस खुली चांदनी में फ़िर चला। ससुर और बहू की यह कहानी अनवरत चुदाई के साथ चलती रही।
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