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तालाब किनारे देहाती लवर की रासलीला

मई 17, 2026 by hamari Leave a Comment

Village Romantic Chudai

अरुण अपने घर से कुछ दूरी पर बने तालाब किनारे एक पेड़ की छाया में बैठा था। अरुण एक 21 वर्ष का गठीला नौजवान था। सिर पर काले घुंघराले बाल, चौड़ी बलिष्ठ छाती और मजबूत बाहें। यह उसकी पसंदीदा जगह थी। उसे जब भी समय मिलता वो यहीं आकर बैठता था। यहाँ पर शांति थी और एकांत उसे अच्छा लगता था। Village Romantic Chudai

अरुण ने आगे बढ़कर एक पत्थर को उठा लिया और हवा में उछालने लगा जैसे कि उसका वजन नाप रहा हो। फिर उसकी निगाह अपने सामने रखे कुछ पन्नों पर पड़ी, जिन पर सुंदर अक्षरों में कुछ लिखा हुआ था। कागज़ के पन्ने हवा में फड़फड़ा रहे थे। पत्थर के वजन से संतुष्ट हो उसने वो पन्ने अपनी गोद में रख लिए और पत्थर को ठीक उनके बीचों-बीच रखकर पन्नों को उस पत्थर से लपेट दिया।

फिर अपनी जेब से एक पतली सी रस्सी निकाल उसने उन पन्नों को बाँध दिया। वो अपनी जगह से उठा और तालाब के किनारे पर आकर उस पत्थर को पानी के बीचों-बीच फेंक दिया। पत्थर के फेंकते ही पानी जोरों से चारों तरफ उछला और वो पत्थर तालाब की गहराइयों में समाता चला गया।

अरुण चुपचाप सोच रहा था कि ना जाने कितने पन्ने इस तालाब की गहराई में दफन पड़े हैं। वैसे तो पानी एक कतरा उन पर लिखी लकीरों को मिटाने के लिए काफी है पर अगर शब्द सिर्फ ढूंढ ले पड़े तो वो पढ़ने के लिए काफी होंगे। क्या उसे इन पन्नों को जला देना चाहिए था जिस पर उसने अपनी कल्पना को एक कहानी की शक्ल में अंजाम दिया था।

तभी उसे तालाब के दूसरी तरफ से कुछ आवाज़ सुनाई दी। उसने अपनी बहन की आवाज़ को तुरंत पहचान लिया। वो तुरंत उस पेड़ के पीछे छिप गया जिससे आने वाले की नज़र उस पर न पड़ सके। जैसे ही उसने अपनी बहन को देखा जिसने एक सफेद रंग की शॉर्ट्स के ऊपर एक लाल रंग का टॉप पहन रखा था उसकी आँखें बंद हो गईं।

उसने पेड़ का सहारा ले लिया और अपने खयालों में खोया अपनी बहन अंशिका की प्यारी हँसी सुनने लगा। थोड़ी ही देर में उसका लंड उसकी शॉर्ट में तनकर खड़ा हो गया। दिल में जज़्बात का एक मीठा-मीठा दर्द उमड़ने लगा। वो जानता था कि उसे एक दिन अपनी बहन को पाना था।

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अंशिका रोज़ अपनी सहेलियों को घर लाकर उसे चिढ़ाती थी। उसे उसकी इस हरकत पर प्यार आता था पर वो अपनी बहन से इससे कहीं ज़्यादा प्यार करता था। वो जानता था कि अंशिका की सब सहेलियाँ उसे लाइन मारती हैं पर उसकी सब सुंदर सहेलियाँ भी उसे अपनी बहन से अलग नहीं कर सकती थीं।

अरुण का दायाँ हाथ उसके खड़े लंड पर आ गया। शॉर्ट्स के ऊपर से ही वो अपने लंड के सुपाड़े को मसलने लगा। उसके मुँह से एक मदक कराह निकली तो पेड़ पर बैठे कुछ पक्षी उसकी बहन की दिशा में उड़ गए। उसे तुरंत अपनी गलती का एहसास हुआ। उसने अपने आप को और पेड़ के पीछे इस कदर छुपा लिया कि किसी की भी नज़र उस पर न पड़ सके।

अपने एकांत से संतुष्ट हो उसने अपनी शॉर्ट्स की ज़िप खोली और अपने खड़े लंड को खुली हवा में आज़ाद कर दिया। अब वो अपनी आँखें बंद अपने लंड को मसलने लगता है। खुली आँखों के जगह वो बंद आँखों से अपनी बहन को और ज़्यादा अच्छे रूप में देख रहा था।

उसने देखा कि उसकी बहन नंगे पैरों घास पर दौड़ रही है। अरुण अपनी 18 वर्षीया बहन के पीछे दौड़ रहा है उसे पकड़ने के लिए और आखिर में वो उसे पकड़ ही लेता है। दोनों घास पर गिर जाते हैं और अंशिका हँस पड़ती है। थोड़ी देर बाद वो उसके मुलायम पंजों को मसलने लगता है।

वो खुले आसमान के नीचे घास पर लेटे उसकी उँगलियों को महसूस कर रही थी। वो अपनी जादुई उँगलियों से उसकी पैरों की मालिश करने लगा तो वो सिसक पड़ी और उसकी छोटे-छोटे मम्मे टॉप के अंदर उछलने लगे। उसने उसकी दाहिनी टाँग को उठाकर अपनी गोद में रख लिया।

इससे उसकी जाँघें थोड़ी फैल गईं और उसकी नज़र ठीक उसकी जाँघों के बीच में पड़ी। पैर थोड़ा सा उठा हुआ होने की वजह से शॉर्ट्स के अंदर से सब दिख रहा था। उसने देखा कि उसने काले रंग की पैंटी पहन रखी और उसकी चूत की बारिकियाँ पैंटी के बगल से दिख रही हैं।

अरुण अपनी कल्पना को किसी फिल्म की तरह अपने खयालों में देख रहा था, और उसका हाथ पूरी रफ्तार से खुद के लंड पर चल रहा था। अपनी कल्पना में अरुण अपने हाथ उसकी नाजुक पंजों को मसलते-मसलते उसके घुटनों तक ले आया और वहाँ की मालिश करने लगा। कितनी सुंदर मुलायम त्वचा थी।

घुटनों की मालिश करते-करते भी उसकी निगाह शॉर्ट्स में दिखती काली पैंटी पर टिकी हुई थी। घुटनों से आगे बढ़कर उसके हाथ अब जाँघों के भीतरी हिस्सों पर पहुँचे। जैसे ही उसका हाथ जाँघों से थोड़ा ऊपर पहुँचा उसका शरीर काँप उठा। एक शांत रज़ामंदी पाकर उसके हाथ शॉर्ट्स के अंदर उसकी पैंटी के किनारे तक पहुँचे तो उसे लगा जैसे कि कोई गरम भाप पैंटी के अंदर से उठ रही है। यह उसकी कल्पना थी।

आखिरी छन में जब उसके लंड में उबाल आने लगा तो उसने यहाँ तो सोच डाला कि वो उसके पैरों के बीच बैठा अपने लंड को उस छोटे से छेद में घुसा रहा है। उसका लंड उस छोटे छेद की दीवारों को चीरता हुआ अंदर तक घुस रहा है। तभी उसके लंड ने उबाल खाया और वीर्य की एक लंबी फुहार सामने के पत्थरों पर गिरने लगी। ये कहानी आप हमारी वासना डॉट नेट पर पढ़ रहे है.

वो जोरों से अपने लंड को मसलते हुए लंड से आखिरी बूँद तक पत्थरों पर फेंकने लगा। उसने अपनी आँखें खोलीं और सामने गिरे वीर्य को देखने लगा। “कहाँ है वो?” अंशिका ने अपने आप से पूछा। वो और उसकी सहेली खुशबू एक-दूसरे का हाथ पकड़े तालाब के किनारे तक आ गई थीं। उसने अभी थोड़ी देर पहले उसे तालाब के किनारे बैठे एक पत्थर को तालाब में फेंकते देखा था, अब कहाँ चला गया।

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“यार मैं तो थक गई हूँ,” खुशबू ने शिकायत की।

उसे पता था कि उसकी कोई अदा कोई तरीका अरुण को पटाने में कामयाब नहीं हुआ था।

“मेरी तो समझ में नहीं आ रहा कि मैं क्या करूँ।”

“आओ यहाँ तालाब के किनारे बैठते हैं,” अंशिका ने कहा।

तालाब के किनारे बैठते ही उसका ध्यान अपने 21 वर्षीय भाई अरुण पर आ टिका। कितना अकेला-अकेला रहता है वो। वो हमेशा अपनी सहेलियों को घर लाती जिससे उसका दिल बहल जाए। पर वो है कि अलग-अलग ही रहना पसंद करता है। अंशिका को पता था कि उसका भाई एक प्यारा और जज़्बाती इंसान है।

वो अपने कॉलेज की आखिरी साल में थी और अरुण ग्रेजुएशन कर चुका था। ग्रेजुएशन करने के बाद भी उसने अभी तक कोई गर्लफ्रेंड नहीं बनाई थी। वो इसी उम्मीद से अपनी सहेलियों को घर लाती कि शायद इनमें से कोई उसके भाई को भा जाए। पर ऐसा न होने पर अब उसकी सहेलियों ने भी आना छोड़ दिया था। खुशबू भी यही शिकायत कर रही थी। अंशिका को सब समझ में आ रहा था और उसे अपने भाई पर झल्लाहट भी हो रही थी।

“सिर्फ अपनी स्टुपिड किताब में कुछ लिखता रहता है,” अंशिका ने शिकायत करते हुए कहा।

“अरुण?” खुशबू ने पूछा।

“हाँ और क्या,” अंशिका ने कहा, “यही काम है जो वो दिन भर करता रहता है। ग्रेजुएशन के बाद कितना बदल गया है वो। ऐसा लगता है कि उसकी जिंदगी किसी जगह आकर ठहर गई है। वो मुझे भी हर समय नज़रअंदाज़ करता रहता है। समझ में नहीं आता कि उसे परेशानी क्या है।”

“क्या लिखता रहता है वो अपनी किताब में?” खुशबू ने पूछा।

अंशिका ने अपने कंधे उचकाते हुए कहा, “मुझे पता नहीं। मैंने कई बार जानने की कोशिश की लेकिन वो हर बार छिपा लेता। जब वो लिखना खत्म कर लेता है तो उन पन्नों को किताब में से फाड़ देता है। हज़ारों कहानियाँ लिखी होंगी उसने।”

“हो सकता है कि वो कहानियाँ न हों, सिर्फ डायरी मेंटेन करता हो,” खुशबू ने कहा।

“हाँ हो सकता है,” अंशिका ने इतना कहा ही था कि उसने अरुण को पेड़ के पीछे से बाहर आते देखा। पहली बार उसे एहसास हुआ कि वो पेड़ के पीछे था, पर वो कर क्या रहा था? उसने सोचा।

“शैतान का नाम लो और शैतान हाज़िर है,” खुशबू ने हँसते हुए कहा, “तुम्हें पता है अंशिका अगर ये तेरा भाई अगर मुझे रात भर भी लिफ्ट देता तो मैं पहले ही दिन उसे सेंचुरी बनाने का मौका दे देती।”

“चल छिनाल साली,” अंशिका ने कहा, “अच्छा एक बात तो बता वैसे अब तक कितने बैट्समैन को बैटिंग करने का मौका दिया है?”

“वैसे अभी तक तो छिनाल बनी नहीं हूँ,” खुशबू ने कहा, “पर हाँ इसके लिए छिनाल बनने को भी तैयार हूँ, मैं तो बस इतना कहती हूँ कि मैं अपनी जान देती हूँ इसपर।”

“हाँ ये तो है,” अंशिका ने अपने भाई की ओर देखते हुए कहा जो तालाब के राउंड लगाते हुए उनकी तरफ ही आ रहा था।

अंशिका के मन में जलन सी जग गई ये सोचकर कि कितनी लड़कियाँ उसके भाई पर जान छिड़कती हैं। उसकी आँखों में हल्की सी नमी सी आ गई। दिल में एक अजीब सा दर्द सा उठने लगा जो हमेशा किसी वक्त उसके प्यार से भरा रहता था। अब वो उसपर ध्यान ही नहीं देता था।

अंशिका ने देखा कि अरुण उनकी तरफ ही बढ़ रहा है। जलन के मारे उसने खुशबू को देखा जो घास पर लेटी थी और अपने उभरे हुए मम्मे दिखाने की कोशिश कर रही थी। उसकी चुचियाँ किसी मधुमक्खी के छत्ते की तरह उठी हुई थीं जैसे कि मक्खियों को न्योता दे रही हों।

उसकी समझ में नहीं आ रहा था कि अगर अरुण ने उसकी तरफ ध्यान दिया और कुछ कहा तो वो क्या करेगी। किंतु अरुण ने ऐसा कुछ नहीं किया और उसकी बगल से गुज़रते हुए उसके सिर को थपथपाते हुए सिर्फ इतना कहा, “अपनी जिंदगी को जीना सीखो और मेरी जिंदगी में दखल देना बंद करो।”

अरुण की बात उसके दिल को चुभ गई किंतु दिल में एक अजीब खुशी भी जाग उठी। आज कितने महीनों बाद उसके भाई ने उससे बात की थी। खुशी की एक हल्की लकीर उसके होठों पर आ गई।

“मैं तो अपनी जिंदगी जी रही हूँ लेकिन एक तुम हो जो अपनी जिंदगी से भाग रहे हो…” अंशिका ने अपनी खुशी को छुपाते हुए कहा।

अरुण ने एक राहत की साँस ली। वो हमेशा से डरता था कि अगर वो अंशिका के ज़्यादा करीब रहेगा तो एक दिन उसकी बहन उसके मन की भावनाओं को पहचान लेगी। जबसे उसकी कल्पनाएँ वो आने लगी थीं उसने उसके करीब रहना छोड़ दिया था। एक यही तरीका था उसके पास अपने जज़्बात और अपनी भावनाओं को छिपाने का। वो अपनी बहन को बहुत प्यार करता था और उससे दूर रहकर ही वो एक बड़े भाई का फर्ज़ निभा सकता था।

“तुम सच कहती हो अंशिका, वो अपनी जिंदगी से भाग ही रहा है।”

अरुण के व्यवहार को देख खुशबू को एक बार फिर दुख पहुँचा था। उसने कितना प्रयत्न किया था कि अरुण को आकर्षित कर सके किंतु वो सफल नहीं हो पा रही थी।

“अंशिका मैं अब चलती हूँ, सोमवार को सुबह कॉलेज में मिलेंगे,” खुशबू ने कहा।

अंशिका ने पलटकर अपने भाई की ओर देखा। अरुण उसकी नज़रों से ओझल हो चुका था लेकिन वो अब भी उसके खयालों में बसा हुआ था। उसे लगा कि वो घूमकर उसके पास आ गया है और उसकी बगल में घास पर बैठ गया है। वो उससे उसके दोस्त, उसकी कॉलेज लाइफ के बारे में पूछ रहा है। ये कहानी आप हमारी वासना डॉट नेट पर पढ़ रहे है.

उसकी कल्पना में आया कि अचानक उसका बायाँ हाथ उसे दाएँ हाथ से टकरा गया और उसके बदन में जैसे बिजली का करंट दौड़ गया हो। उसके मन में आया कि वो उसे सब कुछ बता दे कि किस तरह उसकी कमी उसके जीवन को खोखला कर रही है, उसे अपना वही पुराना भाई चाहिए जो पहले था।

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“अंशिका ज़रा ये कचरा तो बाहर फेंक देना,” उसकी मम्मी ने कहा।

“पर मम्मी ये तो अरुण का काम है ना,” अंशिका ने कहा।

“अरुण घर पर नहीं है, और तुम घर पर हो इसलिए मुझसे ज़्यादा बहस मत करो और जाकर कचरा फेंककर आओ,” उसकी मम्मी ने थोड़ा गुस्सा दिखाते हुए कहा।

बेमन से अंशिका ने कचरे की थैली डस्टबिन से बाहर निकाली और बगल में रख दी। फिर एक फ्रेश नई थैली डस्टबिन में लगा दी तभी उसका ध्यान कचरे की थैली से बाहर झाँकती एक किताब पर पड़ा। उत्सुकता वश उसने वो किताब उठा ली और बगल की अलमारी में छिपा दी।

अंशिका ने कचरे की थैली घर से बाहर फेंककर वापस आई और वो किताब अलमारी से निकाल अपने कमरे में आ गई। कमरे का दरवाज़ा अंदर से बंद कर वो किताब खोल देखने लगी। उसने देखा कि किताब के पन्ने खाली थे और उन पर कुछ भी नहीं लिखा था।

तभी उसने देखा कि पन्नों पर लेखनी के कुछ अक्षर दिख रहे हैं। वो दौड़कर अपने कॉलेज बैग से पेंसिल निकालकर लाई और उन पन्नों पर घिसने लगी। थोड़ी ही देर में लेखनी के अक्षर उभरकर साफ हो गए। किताब पर लिखे शब्दों को पढ़ वो चौंक गई। क्या अरुण यही सब अपनी कहानी में लिखता रहा है।

“मैंने उससे कह दिया कि मैं उससे प्यार करता हूँ। वो मुस्कुराकर मेरी तरफ देखती है। मैं हल्के से उसकी चुची को छूता हूँ वो पड़ती है। मैं और ज़ोर से दबाता हूँ। उसे अच्छा लगता है। मैं उसकी दोनों चुचियों को दबाता हूँ। अब वो गरमाने लगती है। मैं जानता हूँ वो मुझे पाना चाहती है……”

“कौन है ये लड़की…?” अंशिका मन ही मन बड़बड़ाती उठती है। कोई काल्पनिक लड़की है या हकीकत में कोई है… अंशिका किताब को अपनी छाती से लगाए पलंग पर लेट जाती है। वो सोचने लगती है कि वो लड़की कौन हो सकती है। अचानक उसे लगता है कि वो लड़की खुद ही। अपनी ही कल्पना में खोए वो अपने अक्ष को उन खाली पन्नों में ढूंढने की कोशिश करती है।

“ओह्ह अरुण मैं तुमसे कितना प्यार करती हूँ।” वो कह उठती है, उसे लगता है कि अरुण उसके बगल में ही लेटा हुआ है। अपना प्यार खुद पर जाहिर कर उसे लगा कि उसके दिल से बोझ उतर गया। जिन भावनाओं को वो छुपाते आई थी आज वो रंग दिखाने लगी थी।

उसके हाथ खुद-ब-खुद उसकी चुचियों पर जा पहुँचते हैं और वो उन्हें मसलने लगती है। उत्तेजना और प्यार की मदकता में उसके निप्पल तनकर खड़े हो जाते हैं। कामुकता की आग में उसका बदन ऐंठने लगता है। दरवाज़े पर थपथपाहट सुन उसका ध्यान भंग होता है। फिर जैसे वो दरवाज़े को खुलता देखती है झट से अपना हाथ अपनी चुचियों से खींच लेती है।

अरुण ने अर्धखुले दरवाज़े से अंदर झाँका। उसने देखा कि अंशिका का लाल रंग का टॉप थोड़ा ऊपर को खिसका हुआ था और उसकी चुचियों की गोलियाँ साफ दिख रही थीं साथ ही उसके खड़े निप्पल भी उसकी नज़र से बच नहीं सके। इस नज़ारे को देख उसका लंड उसकी शॉर्ट में फिर तनकर खड़ा हो गया।

अंशिका ने उसकी नज़रों का पीछा किया तो उसने देखा कि अरुण उसकी चुचियों को ही घूर रहा था। उसने झट से अपने टॉप को नीचे किया पर ऐसा करने से उसके निप्पल और तने हुए दिखाई देने लगे। शर्म के मारे उसका चेहरा लाल हो गया।

“तुमने मेरी जगह पर कचरा फेंककर आई उसके लिए तुम्हें थैंक्स कहने आया था,” अरुण ने कहा।

“कोई बात नहीं,” वो चाहती थी कि अरुण जल्दी से जल्दी यहाँ से चला जाए।

अरुण कुछ और कहना चाहता था लेकिन जब उसने देखा अंशिका शरमा रही है तो उसकी मन की पढ़ते हुए वो चुपचाप वहाँ से चला गया।

अंशिका अपने चेहरे को अपने हाथों से ढक अपने आप को कोसने लगी, “बेवकूफ लड़की आज कितने महीनों बाद उसने तुमसे इस तरह प्यार से बात की और तुम हो कि उसे भगा दिया। तुम्हें बिस्तर पर उठकर बिठा जाना था और उसे कमरे में आने के लिए कहती। बेवकूफ बेवकूफ।”

जैसे ही वो बिस्तर पर से उठने लगी उसकी नज़र अरुण की किताब पर पड़ी, “हे भगवान काश उसने ये सब न देखा हो।”

अंशिका सोच में पड़ गई कि हे भगवान उसने ये क्या किया। अगर अरुण ने वो किताब देख ली होगी तो एक बार फिर उसने अरुण को खो दिया है। वो अपनी रुलाई को रोक न पाई, उसकी आँखों से तर-तर आँसू बहने लगे। अरुण का ध्यान अपनी बहन पर से हटाए नहीं हट रहा था। ये कहानी आप हमारी वासना डॉट नेट पर पढ़ रहे है.

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जब वो बाहर से आया तो मम्मी ने उससे कहा था कि वो जाकर अंशिका का धन्यवाद करे कि उसका काम अंशिका ने किया था। मम्मी की आज्ञा मान वो उसके कमरे में गया था और उसने उसे थैंक्स कहा था। जब उसने अंशिका को बिस्तर पर लेटे देखा तो उसे वो किसी अप्सरा से कम नहीं लगी थी।

जिस तरह से वो लेटी थी और उसके टॉप ऊपर को उठे हुए उसकी चुचियों को और उसके खड़े निप्पल दिख रहे थे वो ठीक किसी काम देवी की तरह लग रही थी। उसके दिल में तो आया कि उन कुछ लम्हों में वो अपने दिल की बात अंशिका को बता दे लेकिन दिल की बात ज़बान तक आ नहीं पाई।

उसकी समझ में नहीं आया कि वो अपने जज़्बात किस तरह अपनी सगी बहन को बताए। वो अपनी बातों को शब्दों में नहीं ढाल पाया। उसे पता था कि थोड़े दिनों में अंशिका कॉलेज चली जाएगी और शायद उसे फिर मौका न मिले उसे बताने का।

अरुण अपने कमरे में आ गया, वो चाहता तो सीधे अंशिका के कमरे में जाता और उसे सब कुछ बता देता पर उसमें शायद इतनी हिम्मत नहीं थी कि वो उसे बता पाए। उसे उम्मीद थी कि रात के खाने पर अंशिका से उसकी मुलाकात होगी। पर अंशिका थी कि उसका कहीं पता नहीं था।

अरुण ने खाना खत्म ही किया था कि उसका सबसे प्यारा दोस्त अरविन्द अपनी बहन पूजा के साथ आ पहुँचा। पूजा बगल के शहर के कॉलेज में पढ़ती थी। अरविन्द अरुण की ही उम्र का था और दोनों ने ग्रेजुएशन साथ-साथ पूरा किया था। पूजा अरविन्द से दो साल बड़ी थी।

बचपन के दोस्त होने की वजह से दोनों का एक-दूसरे के घर आना-जाना था। जबसे पूजा जवान हुई थी अरुण के मन में उसके लिए कुछ था पर पूजा थी कि उसे अपनी उम्र से बड़े लड़कों से ही फुरसत नहीं थी। पर आज वो कुछ अलग ही लग रही थी। उसने एक चंचल मुस्कान से अरुण से हाथ मिलाया और उसके गालों पर एक चूमा दे दिया जैसे कि बरसों के पुराने दोस्त हों।

पूजा आज बहुत ही सेक्सी लग रही थी। उसने एक काले रंग की टाइट जींस पहन रखी थी और साथ ही एक गुलाबी रंग का स्लीवलेस टॉप। जींस इतनी टाइट थी कि उसके चूतड़ की गलाइयाँ दिख रही थीं और टॉप के ऊपर से उसकी नुकीली चुचियाँ बाहर को उछल रही थीं।

अरुण अरविन्द और पूजा के साथ तालाब के किनारे चल पड़ा। बरसों से वहाँ एक अलाव बनाया गया था जहाँ रात को लोग उसमें लकड़ियाँ जला पार्टी मनाते थे। आज की रात भी कुछ ऐसा ही प्रोग्राम था तीनों का। अंशिका को घर के पीछे कुछ आवाज़ें सुनाई दीं। सूरज डूब चुका और अंधेरा होने लगा था।

उसने कमरे की लाइट जलाई और खिड़की पर लगे पर्दों को हटाकर बाहर देखा। जब उसकी आँखें अंधेरे में देखने को अभ्यस्त हो गईं तो उसे अपने भाई अरुण के साथ अरविन्द और लड़की को तालाब की ओर जाते देखा। उसके दिल में फिर से जलन जाग उठी। मन तो किया कि दौड़कर उनके साथ शामिल हो जाए।

पहले तो माँ मना कर दिया करती थी पर अब वो 18 की हो चुकी थी पर अपनी शर्म की वजह से वो ऐसा न कर सकी। अंशिका ने खिड़की को थोड़ा खोल दिया जिससे वो उनपर नज़र रख सके। उसने देखा कि जब अरुण ने उस अलाव में जो लकड़ियाँ पड़ी उसे जला दिया और फिर कुछ लकड़ियाँ ढूंढने को जाने लगा तो उस लड़की ने उसका हाथ पकड़ा और उसके साथ चल पड़ी।

जिस तरह से उस लड़की ने अरुण का हाथ पकड़ा था उसे देख अंशिका को फिर जलन होने लगी। अरुण ने जब अपने हाथों में पूजा के हाथ को महसूस किया तो वो चौंक पड़ा। दोनों हाथ में हाथ डाले इस तरह चल रहे थे जैसे कि दो प्रेमी चाँदनी रात में सैर को निकले हों। पूजा के बदले हुए व्यवहार से अरुण को आश्चर्य हो रहा था।

“कितनी सुंदर जगह है,” पूजा ने रुकते हुए सामने दिखती पहाड़ियों पर नज़र डालते हुए कहा। “कितनी और शांति और एकांत यहाँ पर है… ना।”

जब पूजा ने अपना सिर उसके कंधे पर रखा तो उसके बदन से उठती महक ने अरुण के लंड में फिर सरसरी भर दी।

“पिछले कई सालों से तुम मुझे नज़रअंदाज़ कर रही हो, और आज अचानक ऐसे बिहेव कर रही हो जैसे कि मेरी प्रेमिका हो?” अरुण ने पूछा।

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“यही तो हम लड़कियों की खासियत है, जिसे हम पसंद करते हैं उसे नज़रअंदाज़ करते हैं,” पूजा ने जवाब दिया, “और सब लड़के हमें परेशान करते हैं चिढ़ाते हैं कभी हमारे बाल खींचकर या फिर दूसरे तरीके से, जो तुम कभी नहीं करते थे। यही वजह है कि मैं तुम्हें हमेशा से पसंद करती आई हूँ।”

पूजा की बात सुनकर अरुण सोच में पड़ गया। वो भी तो अंशिका को नज़रअंदाज़ करता है और अंशिका भी उससे दूर-दूर रहती है, तो क्या पूजा के अनुसार हम दोनों एक-दूसरे को पसंद करते हैं।

“किस सोच में खो गए अरुण?” पूजा उसके सिर को थपथपाते हुए बोली। “अगर तुम्हें नहीं दिखाई दे रहा है तो मैं साफ शब्दों में कह रही हूँ कि आज की रात मैं अपने आप को तुम्हारे हवाले कर रही हूँ, आया समझ में बुद्धू।”

मुझे विश्वास नहीं हो रहा था कि बरसों से जिसके पीछे मैं पड़ा था आज खुद वो अपने आप को मुझे सौंप रही थी मेरे लिए ये किसी तोहफे से कम नहीं था।

“हाँ मैं समझ रहा हूँ,” मैंने हँसते हुए कहा।

पूजा मेरे पास चिपककर खड़ी हो गई, “ये अलाव की आग बुझने में कितना वक्त लगेगा?”

“ज़्यादा से ज़्यादा 15-20 मिनट,” मैंने जवाब दिया।

“तो फिर एक काम करते हैं, हम पकड़ा-पकड़ी खेलते हैं, आग बुझने से पहले अगर तुमने मुझे पकड़ लिया तो मैं तुम्हारी।” पूजा ने चंचल मुस्कान के साथ कहा।

उसकी समझ में नहीं आ रहा था कि वो क्या खेल उसके साथ खेलना चाहती है। पूजा जैसे ही पेड़ों की तरफ भागी अरुण भी उसके पीछे भागा। किंतु थोड़ी ही देर में उसने उसे पकड़ लिया। जैसे ही उसने उसे पकड़ना चाहा वो लड़खड़ाकर नीचे गिर पड़ी, “पागल हो गए हो क्या।”

“मैं तुम्हारे बाल खींचना चाहता जैसे तुमने कहा कि मैं नहीं करता,” अरुण ने हँसते हुए कहा।

“हाँ… लेकिन इसका ये मतलब नहीं कि हर लड़की की ये हरकत पसंद आती है,” पूजा ने कहा।

पूजा ने उसके पैंट के बकल को पकड़ा और उसे अपने ऊपर खींच लिया। अरुण को पूजा किसी अप्सरा से कम नहीं लग रही थी। पूजा को वो बचपन से जानता था और वो उसे हमेशा से अच्छी लगती आई थी वही जज़्बा फिर उसके दिल में उमड़ आया। वो गहरी नज़रों से पूजा को देख रहा था। ये कहानी आप हमारी वासना डॉट नेट पर पढ़ रहे है.

“अरुण… मुझे प्यार करो ना…” पूजा ने अपना चेहरा उसकी चौड़ी छाती में छुपाते हुए कहा।

अरुण ने अपनी नज़रें उसकी नज़रों से मिलाई। उसने देखा कि उसकी आँखों में मदकता छाई हुई थी। उसने उसके स्लीवलेस ब्लाउज़ के ऊपर से उसकी चुचियों को पकड़ा जिन्हें वो बरसों से महसूस करना चाहता था। उसके लंड में लहू की धारा तेज़ हो गई। वो धीरे-धीरे उसके मुलायम लेकिन कठोर चुचियों को दबाने लगा।

उन्माद की मस्ती में पूजा ने अपनी आँखें बंद कर लीं। उसके हाथ अरुण की पीठ पर जकड़ गए। अरुण उसके निप्पल को अपनी उँगलियों से भींच रहा था। उत्तेजना के मारे उसका लंड पैंट के बाहर आने को फड़फड़ा रहा था। अरुण ने उसके टॉप को नीचे से पकड़ा और उसके सिर के ऊपर कर उतार दिया।

पूजा ने अपना हाथ अरुण की जाँघों के बीच रखा और पैंट के ऊपर से उसके लंड को सहलाने लगी। उसके लंड को मसल-मसल वो उसे चिढ़ाने लगी। फिर उसने उसकी पैंट के बकल को खोला और बटन खोल उसकी पैंट को ढीला कर दिया। फिर उसने उसकी अंडरवियर की इलास्टिक में अपनी उँगली फँसा उसे थोड़ा नीचे कर दिया। अरुण का लंड उछलकर बाहर आ गया। उसके खड़े लंड को देख पूजा की आँखों में चमक सी आ गई।

“काश तुमने मेरे बाल बहुत साल पहले खींचे होते,” वो उसके लंड की चमड़ी को ऊपर-नीचे करने लगी। “अगर तुमने ऐसा पहले किया होता तो पता नहीं मैं कितनी बार इस प्यारे लंड का स्वाद चख चुकी होती।”

“हाँ मुझे भी ऐसा ही लग रहा है,” कहकर अरुण उसकी चुचियों को मसलने लगा।

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पूजा ने अरुण को खिसकाकर अपने बगल में लिटा दिया और फिर उसके ऊपर झुककर उसके लंड को अपनी मुट्ठी में ले मसलने लगी। फिर उसने झुककर उसके सुपाड़े को अपने मुँह में ले लिया। पहले तो वो अपनी जीभ से सुपाड़े को चाटती रही फिर अपने मुँह को पूरा खोल लंड को अंदर लेने लगी। लंड उसके गले तक आ गया था।

पूजा को पता था कि समय कम है इसलिए वो जोरों से उसके लंड को चूसने लगी। उसे लगा कि अरुण का लंड उसके मुँह में और बड़ा होता जा रहा है। वो अपनी ज़ुबान उसके लंड पर फिराते जोरों से चूसने लगी। फिर उसने अपना मुँह हटाया और घास पर पीठ के बल लेट गई। पूजा का मुँह लंड पर हटते देख अरुण उसकी पैंट के बटन को खोलने लगा। उसकी जींस को उसने नीचे खिसका उतार दिया। फिर उसने उसकी पैंटी को भी उतार दिया। पूजा ने अपनी जाँघों को थोड़ा फैला दिया।

“मुझे विश्वास नहीं हो रहा कि हम सही में ये सब कर रहे हैं,” अरुण ने थोड़ी आश्चर्य भरी आवाज़ में कहा।

“काश हमने पहले ये सब किया होता,” पूजा ने उसकी नज़रों से नज़रें मिलाते हुए कहा, “मुझे चोदोगे ना अपने इस प्यारे लंड से…”

अरुण उसकी जाँघों के बीच आ गया और अपने लंड को उसकी चूत पर घिसने लगा। जैसे ही लंड ने चूत को छुआ वो सिसक पड़ी और आहें भरने लगी। अरुण ने उसकी चूत की पंखुड़ियों को थोड़ा फैलाया और अपने लंड को धीरे से उसकी चूत के अंदर घुसा दिया।

“अरुण कितना अच्छा लग रहा है तुम्हारा लंड मुझे अपनी चूत में…” अरुण ने अपना सुपाड़ा ही उसकी चूत में घुसाया था, वो सुपाड़े को इधर-उधर घुमा रहा था।

“रुक क्यों गए अरुण… डालो ना पूरा लंड मेरी चूत में… मुझे पूरा लंड चाहिए अपनी चूत में। डालो ना अरुण मत तड़पाओ मुझे… प्लीज़…” पूजा सिसक पड़ी…

अरुण ने उसके कंधे पकड़े और एक ज़ोर का धक्का मार अपने लंड को उसकी चूत में पेल दिया। पूजा ने भी अपनी टाँगें उसकी कमर से जकड़ लीं और नीचे से चूतड़ उठा उसके लंड को अपनी चूत के अंदर ले लिया। थोड़ी ही देर में उनकी कमर लय में हिल रही थी। अरुण उसे चोद रहा था। पूजा की चूत की मांसपेशियों ने अरुण के लंड को जकड़ लिया और चूत की गर्मी ने अरुण को और उत्तेजित कर दिया था। वो उछल-उछलकर धक्के लगा रहा था।

“तुम्हारी चूत तो गज़ब की है पूजा… काश मैंने इसे पहले चोदा होता।”

“मेरी चुचियों से खेलो अरुण निप्पल को मुँह में लेकर चूसो…” पूजा गहरी साँस लेती हुई बोली।

अरुण ने अपनी गर्दन झुकाई और उसके कठोर निप्पल को अपने दाँतों में ले काट डाला।

“ओह्ह मैंने चूसने को कहा था काटने को नहीं दर्द होता है ना…”

अपने लंड के ज़ोरदार धक्के मारते हुए वो जोरों से उसकी चुचियों को मसलने और चूसने लगा।

“ओह्ह अरुण मान गई तुम्हें क्या चुदाई करते हो… बस थोड़ा और ज़ोर से… ओह्ह हाँ ऐसे और ज़ोर से मेरा चूतने वाला है…” पूजा नीचे से अपनी कमर उचालते हुए बोली।

अरुण अब लंबे और ज़ोर के धक्कों से उसे चोदने लगा। पूजा का शरीर हर धक्के से उसके नीचे दहल जाता। उसकी चूत से बहता पानी उसकी जाँघों तक आ गया था। जैसे-जैसे उसकी चूत चूतने के करीब आती उसका शरीर और काँप जाता। ज़मीन पर लेटे होने की वजह से उसकी पीठ दर्द कर रही थी। पर चुदाई की मस्ती के आगे पीठ के दर्द का कहाँ होश था। वो जोरों से अपनी कमर नीचे से उचाल रही थी। अपनी चूत की मांसपेशियों से उसके लंड को और जकड़ वो सिसक रही थी।

‘हाँ अरुण चोदो मैं तो गई… ओह हाँ ज़ोर से अंदर तक पेलो ओह्ह गई…’

अपनी टाँगों को और कमर में कस उसकी चूत ने पानी छोड़ दिया। अरुण ने भी उसकी चुचियों को ज़ोर से भींचा और ज़ोर का धक्का मार अपना पानी छोड़ दिया। पसीने से लथपथ वो उसके शरीर पर गिर सा पड़ा।

“मुझे उठने दो अरुण नीचे की खुरदरी ज़मीन मेरी पीठ पर घाव कर देगी,” पूजा ने अरुण को अपने ऊपर से अलग करते हुए कहा।

अरुण उसके ऊपर से खड़ा हुआ और उसने पूजा का हाथ पकड़ उसे भी खड़ा कर दिया। खड़े होते ही पूजा की नज़रें अरुण के लंड पर पड़ीं। चाँद की रोशनी में लंड पर चमकती वीर्य की बूँदें देख वो मंत्रमुग्ध हो गई। वो उसकी टाँगों के बीच बैठ गई और उसके लंड पर अपनी जीभ घुमा उन बूंदों को चाटने लगी। ये कहानी आप हमारी वासना डॉट नेट पर पढ़ रहे है.

अरुण का लंड एक बार फिर तनने लगा था। उसने पास के ही पेड़ की टहनी को पकड़ लिया। पूजा अब उसके लंड को अपने मुँह में ले चूस रही थी। वो मुट्ठी से उसके लंड को मसलते हुए उसके सुपाड़े को और ज़ोरों से चूसने लगी। अरुण ने अपनी एक टाँग उठाकर पूजा के कंधे पर रख दिया और उसके चेहरे को और अपनी जाँघों के करीब कर लिया।

पूजा ने भी अपने दोनों हाथों से उसके चूतड़ को पकड़ और जोरों से उसके लंड को चूसने लगी। अरुण ने भी उसके सिर को पकड़ उसके मुँह को चोदने लगा। थोड़ी ही देर में उसका लंड फुहार पर फुहार चोद रहा था जैसे पूजा पीये जा रही थी। कुछ वीर्य उसके होठों के किनारे से बहकर नीचे गिर रहा था। जब उसने अरुण के लंड की आखिरी बूँद भी निचोड़कर पी ली तो उसने उसके लंड को अपने मुँह से निकाल दिया।

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“देखा आज तक तुम क्या मिस करते आए,” अपनी जीभ से बहते वीर्य को चाटते हुए पूजा बोली।

“अच्छा होगा अगर हम कपड़े पहन कुछ लकड़ियाँ ढूंढ लें,” अरुण ने पूजा को याद दिलाया।

दोनों समय पर ही अलाव के पास पहुँच गए। आग बुझने को ही थी। अरविन्द संकेत नज़रों से दोनों को देख रहा था लेकिन उसने कुछ कहा नहीं। अरुण ने कुछ चुनी हुई लकड़ियाँ आग में डालीं और उन्हें हवा देकर जलाने लगा।

“मैंने ज़रा घर में जाकर बाथरूम होकर आती हूँ,” अपने हाथों की लकड़ियों को ज़मीन पर रखती हुई वो बोली।

पूजा पहले भी कई बार अरुण के घर में आ चुकी थी। पर जब उसका टकराव पहली बार अंशिका से हुआ तो वो तुरंत उसे पहचान गई।

“कैसी हो अंशिका?” पूजा ने पूछा।

“हाय,” अंशिका ने कहा, किंतु उसके चेहरे के भावों को देख पूजा समझ गई कि अंशिका ने उसे पहचाना नहीं है।

“मैं पूजा हूँ, अरविन्द की बड़ी बहन,” पूजा ने अपना परिचय दिया। “मैं सिर्फ दो दिन की छुट्टी में कॉलेज से घर आई हूँ। मैं पास के शहर में पढ़ती हूँ।”

“क्या बात है तुम हम सब के साथ बाहर नहीं हो?” अंशिका की समझ में नहीं आया कि वो क्या जवाब दे। करीब-करीब एक अनजान इंसान को वो कैसे बताए कि वो अपने भाई के प्यार में पागल है। कैसे कहे कि आज उसने खुद अपना मज़ाक बनाया था अपने भाई के सामने और अब वो उससे नज़रें भी नहीं मिला पा रही है।

“मुझे नहीं मालूम,” बस इतना ही कह पाई वो।

“तुम दो मिनट यहीं रुको मैं बाथरूम जाकर आती हूँ फिर हम साथ-साथ तालाब तक चलेंगे,” पूजा ने कहा।

अंशिका को नहीं मालूम था कि पूजा क्या सोच रही थी। पूजा को अंशिका काफी पसंद आई थी ठीक किसी गुड़िया की तरह। पूजा एक खुले विचारों की लड़की थी और जहाँ तक सेक्स का सवाल था उसका उसूल था जो दिल को भाए उससे के साथ करो ना भाए तो ना करो।

बाथरूम से निकल जब वो अंशिका के कमरे के बगल से निकली तो पूछा, “तैयार हो।”

कमरे से कोई आवाज़ न आने पर पूजा ने अंदर झाँककर देखा तो पाया कि अंशिका पलंग पर लेटी थी और छत को घूर रही थी। वो चलकर पलंग के करीब आई और उस लड़की के जवान शरीर को निहारने लगी। पूजा खास तौर पर अंशिका की छोटी और गोल-गोल चुचियों की ओर आकर्षित हो गई थी। उसका दिल तो चाहा कि आगे बढ़कर उन चुचियों को छूए प्यार करे। उसके दिल ने कहा कि अगर अंशिका खुले विचारों की हुई तो ज़रूर एक रात उसके साथ प्यार करेगी।

“क्या बात है बहुत ज़्यादा टेंस लग रही हो?” पूजा प्यार से अंशिका से पूछा।

“ऐसा कुछ नहीं है जो मैं तुम्हें समझा सकूँ,” अंशिका ने जवाब दिया।

पूजा के अनुभव ने उसे बता दिया कि अंशिका किसी के प्रेम में पागल है। प्यार का कोई इलाज नहीं होता, ये वो दर्द है जो सिर्फ सहा जाता है बनता नहीं जाता।

“चलो उठो,” पूजा ने उसकी बाँह पकड़कर उसे उठाते हुए कहा, “अरविन्द आने साथ वाइन और खाने के लिए बहुत सारी चीज़ें लाया है, और हाँ एक बात मुझे ना सुनना पसंद नहीं है। अगर दिल में तकलीफ है तो एक ही इलाज है अपनी सुध-बुध खो बैठो समझी।”

पूजा के काफी समझाने पर अंशिका बिस्तर से उठी और पूजा के साथ बाहर आ गई। दोनों लड़कियाँ धीरे-धीरे चलते हुए उस अलाव के पास आ गईं। चलते-चलते पूजा का बदन कई बार अंशिका के बदन से टकराया। हर टकराव के बाद पूजा के बदन में झुरझुरी सी दौड़ जाती। उसने अंशिका के उँगलियों को अपनी उँगलियों में फँसाया और उसका हाथ थामे चलने लगी। अंशिका को भी उसके हाथ का स्पर्श अच्छा लगा। थोड़ी ही देर में वो दो सहेलियों की तरह बातें कर रही थीं।

अरुण जैसे ही अलाव में लकड़ियाँ डालकर घूमा तो उसने देखा कि अंशिका बीयर का एक कैन खोल उसमें से घूँट ले रही थी। अंशिका को वहाँ देख वो थोड़ा सा नर्वस सा हो गया, अंशिका कभी उसकी पार्टियों में दखल नहीं देती थी। पूजा ने अरुण के चेहरे पर उसके भाव पढ़ लिए, उसने इशारे से उसे बताया कि वो अंशिका को वहाँ लेकर आई है। ये कहानी आप हमारी वासना डॉट नेट पर पढ़ रहे है.

“अरुण ये लो,” कहकर अरविन्द ने एक सिगरेट और लाइटर अरुण की ओर बढ़ा दिया।

अरुण ने सिगरेट लेते-लेते एक सरसरी सी निगाह अंशिका पर डाली और फिर अपना ध्यान पूजा पर केंद्रित कर दिया। वो सिगरेट से हल्के-हल्के कश लेकर पूजा को ही देख रहा था। सिगरेट पीते ही अरुण समझ गया कि सिगरेट में नशीली दवाई मिली है, पर ना जाने क्यों आज उसे ये सिगरेट पीकर सुकून मिल रहा था। अरविन्द ने एक दूसरी सिगरेट जलाई और पूजा को पकड़ा दी।

“तैयार हो?” पूजा ने अंशिका से पूछा।

पूजा के सवाल से अंशिका चौंक पड़ी, “किस बात के लिए?”

पूजा के चेहरे को देख अंशिका समझ गई कि उसकी नई दोस्त उसके साथ कोई शरारत करना चाहती है।

“सिर्फ मेरे पास रहना,” पूजा ने अंशिका से कहा।

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पूजा ने सिगरेट के लंबे-लंबे कश ले अपनी छातियों से सिगरेट के धुएँ से भर ली। फिर अंशिका पर झुकते हुए उसने अपने होंठ अंशिका के होंठों पर रख दिए। अंशिका ने जैसे ही अपने होंठ थोड़े से खोले पूजा ने सारा धुआँ उसके मुँह में छोड़ दिया। फिर थोड़ी देर बाद पूजा ने अपनी जीभ उसके मुँह में डाल उसकी जीभ को चुलबुलाने लगी। अंशिका की साँसें रुकने लगी थीं, उसने अपने मुँह से धुएँ को बाहर फेंका और खाँसते-खाँसते ताज़ा हवा अंदर लेने लगी। इसी तरह सिगरेट के कई दौर चले। हर बार पूजा यही क्रिया दोहराने लगी। और हर बार उसका चुम्बन पहले से कहीं लंबा होता था।

थोड़े ही देर में चारों को थोड़ा-थोड़ा नशा होने लगा। अब चारों आपस में हँसी-मज़ाक कर रहे थे। जब भी अंशिका ने अरुण की ओर देखा तो उसने उसे ही घूरते पाया। जब अरुण ने उसकी ओर देखकर मुस्कुराया तो मन खुशी से उछल पड़ा उसे लगा कि अरुण ने उसे माफ कर दिया है। कुछ घंटे बाद सभी घर जाने की सोची। अरुण और अरविन्द सामान उठा अरविन्द की गाड़ी की ओर बढ़ गए। अंशिका और पूजा उन दोनों के पीछे-पीछे चलने लगीं। पूजा ने अरुण और अंशिका को गले लगाते हुए विदा ली और अरविन्द के साथ गाड़ी में बैठ चली गई।

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