Teen Nephew Mami Chudai
मेरा नाम नगमा है। आज मैं आपको मेरी कहानी बताती हूँ। यह मेरी ज़िंदगी की सच्ची कहानी है। आप लोग यौवन के दहलीज़ पर कदम रखते ही ज़िंदगी के हसीन अनुभवों के बारे में रंगीन सपने देखना शुरू कर दिए होंगे। ऐसे सपने मैंने भी देखे थे जब मैं 18 साल की हो गई थी। मेरी जन्म एक मध्यम वर्गीय परिवार में हुआ। Teen Nephew Mami Chudai
मेरे पिताजी किसी सरकारी कंपनी के दफ़्तर में छोटी सी पोस्ट पर काम करते थे। माँ एक अच्छे घर से थी लेकिन संप्रदाय और परंपरा के अनुसार पति के घर को अपना संसार और पति की सेवा अपना धर्म मानती चली। पिताजी के तीन और भाई थे। सब अच्छी पढ़ाई और तरक्की की वजह से अच्छे दिन देख रहे थे।
पिताजी पढ़ाई में उतने चालाक और तेज़ नहीं थे। ऊपर से बचपन से ही उनमें आत्मविश्वास और खुद्दारी की कमी थी। धीरज और कर्मठता कम, सेल्फ पिटी और लो सेल्फ एस्टीम ज़्यादा। उनकी एक ही खूबी थी। उनके पिताजी का बड़ा आदर था। खानदान के नाम पर मेरी माँ की शादी उनसे कर दी गई थी।
माँ कभी कुछ माँगने वालों में से नहीं थी। जो मिला उसी से संतुष्ट थी। बहुत खूबसूरत भी थी। उनकी खूबसूरती की वजह से पिताजी का आत्मसम्मान और भी कम हो गया। पिताजी कभी ज़िंदगी में प्रयास नहीं किए। उल्टा अपने जैसे लोगों के संगत में अपनी बदकिस्मती की खुलकर चर्चा करते रहते।
ऐसे संगत में उनकी मुलाकात एक नौजवान से हुई जो उनके जैसे ही था। जब अपने जैसे मिल जाते तो दोस्ती बढ़ जाती है। पिताजी उस नौजवान को अपना खास दोस्त मानने लगे और दिन-रात दोनों अपनी छोटी ज़िंदगी की तकलीफ़ें एक दूसरे के साथ बाँटते रहते। वह नौजवान भी पिताजी के दफ़्तर में काम कर रहा था।
उनकी दोस्ती एक दिन ऐसे मोड़ पर आ गई कि पिताजी ने उसे अपना दामाद बनाने का निश्चय कर लिया। मेरी दो बड़ी बहनें थीं। दोनों की शादी हो गई थी। हम तीनों एक दूसरे के काफ़ी करीब थे। बहनें अपनी सुहागरात और गृहस्थ जीवन की रंगीन अनुभवों के रहस्य मेरे साथ बाँटती थीं। मैं उस लड़के के बारे में नहीं जानती थी।
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शादी तुरंत पक्की हो गई। माँ थोड़े ही मना करने वाली थी? ऊपर से सरकारी नौकरी थी। अंदर की बातें किसको पता? लड़का भी तैयार था। मैं भोली-भाली सी थी मगर माँ पर गई और काफ़ी खूबसूरत थी। मैट्रिक तक पढ़ी थी लेकिन सजने-सँवरने में पक्की थी। ज़ाहिर है साहब तुरंत राज़ी हो गए।
और बहनों की किस्सों के प्रेरित होकर मैं वही सुनहरे सपने देखा करती थी जो आप लोग शायद अभी देख रहे हैं। लड़कों के बारे में तो 19वें साल से ही सोच रही थी। 18 साल की उमर में मेरी ख़यालें सेक्स के बारे में थीं। सुहागरात कैसे कटेगी, पति की बाहों में कैसे सुख प्राप्त होगा, संभोग और कामकला के आसन किस तरह के होंगे, रति सुख कैसा होगा, मर्द का कामांग कैसा होगा – ऐसे रंगीन ख़याल मेरी जवानी की गर्मी को और हवा देने लगे।
सहेलियों की संगत में कुछ ऐसी शारीरिक हरकतों के बारे में ज्ञान प्राप्त हुआ जिससे रति सुख स्वयं अनुभव करने का मौका मिला। हस्त प्रयोग में मज़ा तब आने लगा जब तन की गर्मी बढ़ाने में मदद मिली उन हसीन किताब और पत्रिकाओं से जिनमें आदमी-औरत के बीच की रसभरी सेक्स कांड की खुलकर वर्णन हुआ।
इन किताबों के बदौलत मुझे पूरा सेक्स ज्ञान प्राप्त हुआ और मैं अच्छी तरह से समझ गई कि एकांत में एक मनचाहा मर्द के साथ क्या करना चाहिए। सब लोगों के दिमाग़ में सेक्स की प्रेरणा और दबाव के जैसे नहीं होती। कुछ लोगों में सेक्स की इच्छा बहुत होती है तो कुछ लोगों में सेक्स की इच्छा मामूली सी होती है।
19 साल की उमर में मैं उन लड़कियों में से हूँ जिनमें कामवासना और रति की इच्छा कुछ ज़्यादा ही उभर उठी। शादी मेरे लिए उस द्वार का ताला था जिसको खोलना मेरे जैसे कुमारी लड़कियों के लिए पाबंद था। मेरी कुछ सहेलियों के बॉयफ्रेंड थे जिनके साथ उन्होंने इस द्वार को तोड़ डाला।
पर मैं ऐसी परिवार से थी जहाँ इच्छाओं को लाज और इज़्ज़त के बल पर दबा देनी चाहिए। शादी के बाद कोई पाबंदी नहीं है। कम उमर में शादी हो गई थी लेकिन मेरा शरीर शादी से पूरी तरह से सहमत था। कम उमर में ही मेरी महावारी शुरू हो गई थी और मैं परिपक्व हो गई थी।
थी एक मर्द को सुख देकर उसकी बच्चे की माँ बनने के लिए। 19 साल की उमर में मेरा जिस्म एक 25 साल की औरत की जवानी से भरा था। सुहागरात को मैंने सिर्फ़ थोड़ी ही देर तक लाज-शर्म का ढोंग किया और पहली ही रात मैं लड़की से औरत बन गई जब मेरे पति ने मेरी कौमार्य भंग करते अपनी जवानी को मेरे यौवन में समा दिया और अपना बीज बो दिए।
पूरी तरह से निर्वस्त्र, मैंने हर उल्लंघन को तोड़ दिया और पति को अपनी अछूयी मर्मांग खुलकर परोस दी। पतिदेव ने मेरी उन हर अंग को दबा-दबाकर टटोले और चूमने लगे जिन्हें आज तक मेरे सिवा और कोई नहीं देखे। पति की उस मदभरी सख्त मर्दानी को जब मैंने अपने हाथ में ली तो मेरा मन उस मधुर अनुभव को पूरी तरह से संभाल नहीं पाया और मैं कामुक सीतकारियाँ भरती हुई उसे दबा-दबाकर अपने मदभरी यौन अंग से मिला दी।
सुहागरात वैसे ही कटी जैसे मैंने सपना देखा। पर मेरी ज़िंदगी सिर्फ़ एक दिन की खुशी थी। पति की छोटी सोच, छोटा आत्मसम्मान, निकम्मापन इत्यादि बहुत जल्दी ही बाहर आए। खुशी के कुछ पल जल्दी ही ख़त्म हो गए और हमारे बीच एक बर्फ़ की दीवार बनने लगी जो सीधे बिस्तर पर ख़त्म हो रही थी।
पति अपनी कमज़ोरियों को पत्नी पर ज़ाहिर करने लग गए तो शादी की गर्मी लगभग ख़त्म ही समझो। बिल्कुल मेरे माता-पिता की तरह पति भी मेरी खूबसूरती से परेशान थे। उनकी नाकामयाबी मेरी खूबसूरती से हर पल हार रही थी। उनके ज़हन में एक ही ख़याल था कि लोग यही बात कर रहे होंगे कि ऐसे हसीन बीवी के साथ ऐसा नाकामयाब इंसान कैसा?
इस छोटे ख़याल की वजह से वह मेरे साथ आँखें मिलाना भी छोड़ दिए। बिस्तर पर बर्फ़ की दीवार जम चुकी थी और हमारे दोनों के बीच मीलों का फासला बना दी जिसके कारण हमारी मिलन पूरी तरह से बंद हो गई। 20 साल की उमर में ही मेरी विवाहित जीवन का आख़िरी पत्ता गिर चुका था। ये कहानी आप हमारी वासना डॉट नेट पर पढ़ रहे है.
कभी-कभी उनके मन में थोड़ी सी आत्मविश्वास उभरती और वह रात को मेरे ऊपर चढ़ जाते मुझे आज़माने के लिए। ऐसे मौकों पर मैं भी खुलकर उनका साथ देती यही सोचकर कि बुझते दिए में तेल डालकर ज्योति को और तेज़ करूँ। लेकिन ज्योति थोड़ी देर में ही बुझ जाती और वह बिना कुछ हासिल किए ही ढेर हो जाते।
और वह दिया मेरे अंदर ऐसी आग लगाकर बुझ जाती जो मुझे रात भर जलाती रहती और आख़िर मायके की सहेलियों से मिली हस्त प्रयोग के उपचार से खुद को शांत करती। पिताजी इस बेरंग शादी को अपनी नाकामयाबी के किस्सों में एक और किस्सा बनाकर मुँह मोड़ लिए। बहनें बच्चों के पालन-पोषण में मग्न मुझसे दूर हो गईं।
माँ भी क्या करती, खुद हालात से मजबूर मुझे भी वही नसीहत देती जो उन्होंने अपनी ज़िंदगी में इस्तेमाल किया… हालात से सुलह कर लो और पूजा-पाठ में लगे रहो!!! 20 साल की उमर में पूजा-पाठ कैसा होगा जब मन और तन की माँगें ज़ोर पकड़ रही हैं। मन को कैसे काबू करें? जवानी की आग को कैसे बुझा दें? 18 साल गुज़र गए।
एक पूरा वनवास! पति सिर्फ़ रोटी-कपड़ा और मकान का गारंटी बन गया। टीवी, वीडियो, मैगज़ीन, सिनेमा, बुनाई, सिलाई इत्यादि के सहारे मैंने इतने साल सूखी ज़िंदगी बिताई… बच्चे न होना मेरे पति पर कोई असर नहीं डाला। वह जानता था कि दोष उसी में है। बाहर लोग क्या सोच रहे थे क्या मालूम।
कुछ सहेलियों को मैंने यूँ ही बताया कि हम दोनों में किसी को भी कोई कमज़ोरी नहीं थी और हर कोशिश के बावजूद बच्चा नहीं हुआ। इच्छाओं को दबाकर रखी। सेक्स जब चीड़ने लगता तो हाथों से ही निवारण करती थी। क्रिया कम दवाई ज़्यादा बन गई थी हस्त प्रयोग मेरे लिए। 32 साल की थी। अभी भी जवान। लेकिन एक 50 साल की औरत सी थी मेरी ज़िंदगी।
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एक दिन पति ने बताया कि उनके बहन का बेटा हमारे यहाँ आ रहा था। मैट्रिक ख़त्म किया और इंजीनियरिंग की पढ़ाई के लिए हमारे शहर के एक कॉलेज में दाख़िला ले लिया। पति चाहते थे कि उसे अपने घर में ही रखकर पढ़ाई में मदद दें। उनका मानना था कि वह तो बदकिस्मत है लेकिन इस लड़के की कामयाबी में कोई कसर न छोड़ी जाए और इसकी तरक्की में अपनी सफलता को साकार करें।
मैं क्या बोलती? ऐसी हज़ार बातें सुन चुकी थी। इस लड़के के आने से मेरी घरेलू काम बढ़ती पर उससे ज़्यादा और कुछ नहीं होगा। और फिर इस लड़के का क्या दोष? बेचारा वह हमारे हालात से कैसा जुड़ा? उसे तो पढ़ाई करनी है। मैंने मंज़ूरी दे दी और घर की एक बेडरूम उसे दे दी ताकि वह वहाँ पढ़ाई कर सके।
कुछ दिन बीत गए। भांजा हमारे घर में पूरी तरह से एडजस्ट हो गया। ज़्यादा बात नहीं करता। मैं भी कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई। बस पति के संबंधी होने के नाते उसके रहन-सहन, खाने-पीने इत्यादि की प्रबंध करने लगी। काफ़ी पढ़ाकू था। हर वक्त मोटी किताबों में खोया रहता।
वक़्त का पाबंद था और वक़्त पर कॉलेज जाता, शाम को जल्दी वापस आता, पढ़ाई करता, थोड़ी टीवी देख लेता और सो जाता। मात्र अवसर की बातें हुआ करती हमारे बीच। ज़रूरत पड़ती तो मुझे मामी पुकारता और अपनी बात कर लेता। मेरी ज़िंदगी में उसके आने से तुरंत कोई बदलाव नहीं हुआ।
एक रात पतिदेव जल्दी सो गए। कुछ देर मैं टीवी देखती रही। वैसे भी बेडरूम में और क्या काम। टीवी बंद करके मैगज़ीन पढ़ने लगी। टीवी बंद करने पर छाई अचानक की सन्नाटे में मुझे कुछ सुनाई देने लगा। ऐसा लग रहा था कि घर की किसी कोने में कोई भारी लकड़ी की बॉक्स की हिलने की आवाज़।
घर में एक-दो चूहा घूम रहे थे। शायद किचन की अलमारी में चूहा कोई हरकत कर रहे थे। मैंने किचन की छानबीन की लेकिन आवाज़ वहाँ से नहीं आ रही थी। जैसे ही मैं मेहमान वाली बेडरूम के पास गुज़री वह आवाज़ और स्पष्ट हुई। लगता है बेडरूम की अलमारी से आ रही है। दरवाज़ा बंद था।
भांजा सो चुका था इसलिए दरवाज़े पर दस्तक देकर उसे जगाना मुनासिब नहीं समझा। लेकिन ऐसा लगा कि दरवाज़ा पूरी तरह बंद नहीं था। धीरे से मैंने खोलने लगी कि गैप से अंदर का दृश्य तुरंत सामने आया और मैंने दरवाज़े को वहीं का वहीं पकड़ी खड़ी रही। कमरे में ज़्यादातर अंधेरा था और सिर्फ़ एक रीडिंग लैंप की रोशनी थी। भांजा बिस्तर के छोर पर पेट के बल लेटा हुआ था।
ऊपर कंबल ओढ़ ली थी। बिस्तर के नीचे बगल में फ़र्श पर एक किताब थी और ऐसा लग रहा था कि वह जागा था और लेटे-लेटे नीचे उस किताब को पढ़ रहा था। बिस्तर के बगल में टेबल थी जिस पर रखे रीडिंग लैंप की रोशनी सीधा उस किताब पर पड़ रही थी। पढ़ाकू अभी भी कुछ पढ़ रहा है मैंने सोचा।
लेकिन इस अजीब अवस्था में क्यों पढ़ रहा है? आराम से बैठकर पढ़ सकता है। तभी इस अजीब आसन का उद्देश्य दिखाई दिया। भांजा आगे-पीछे हिल रहा था और उसकी नितंब कंबल के अंदर ऊपर-नीचे हिल रहा था। ऐसा लग रहा था जैसे वह आगे-पीछे ऊपर-नीचे बड़ी तेज़ी से हिल रहा था – शायद तेज़ी से बिस्तर से कुछ रगड़ रहा था।
शादी से पहले की सेक्स शिक्षा और सुहागरात के अनुभवों के बदौलत मुझे साफ-साफ समझ आया कि वह हस्त प्रयोग कर रहा है। लेकिन बिना हाथ लगाए। वह तो अपनी मर्दानी को बिस्तर की गद्दे से ज़ोरों से रगड़कर रति सुख पा रहा था। इसी से बिस्तर हिल रही थी और आवाज़ आ रही थी।
शायद उसे औरत के साथ सेक्स करने पर होने वाली अनुभव को महसूस कर रहा था। किताब में क्या है मुझे देखने की ज़रूरत नहीं थी। दूर से थोड़ी रोशनी में साफ़ नज़र तो नहीं आ रहा था लेकिन देख सकती थी कि एक पन्ने पर कुछ औरतों के नंगे तस्वीर थे… शायद कामकली में लीन औरत-मर्द के जुदे नंगे जिस्म भी!
दूसरे पन्ने पर कुछ लिखा हुआ था… शायद उनके कर्मों का, उनके नंगे जिस्मों और गुप्त अंगों का खुला वर्णन। मुझे इस ‘घिनौनी’ हरकत से उस पर काफ़ी गुस्सा आया और जी चाहा कि अंदर जाकर रंगे हाथ पकड़ूँ उसे और डाँट-फटकार दे दूँ। लेकिन ऐसी किताब मैंने भी पढ़ी और हाथों से सेक्स का अनुभव पाई थी जवानी में।
जो वासना मुझे उन दिनों में हुई थी इस लड़के को भी हुई है। यह उमर ही ऐसा है। सेक्स के प्रति आकर्षण इस उमर में हर एक को होती है। हस्त प्रयोग एक गुप्त चीज़ है लेकिन सभी करते हैं। सेक्स ज्ञान पाने में इसका बड़ा महत्त्व भी है। मैं चुपचाप दरवाज़ा बंद कर दी और लौट आई। उसे अपनी प्राइवेसी चाहिए।
कुछ गुस्सा तो था। यह काम अपनी घर में कर सकता था… मेरी घर में क्यों? फिर सोची, अपने घर तो छुट्टियों में ही जाएगा… तब तक इस आग को कैसे जलने दे? कोई बात नहीं… यहीं करो। फिर मैंने सोचा… मेरे गद्दे और चादर पर अपना रस छोड़ेगा… . ईश! कितना गंदा काम!!! ऐसा कितने बार उसने रस छोड़ा? मुँह में लार और पेशाब की तरह वीर्य भी काफ़ी पर्सनल चीज़ है।
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दूसरों के लिए अछूत सी। बेचारा और कर भी क्या सकता है। मुझे सुबह चादर धोने के लिए डालनी है। गद्दे को बाद में देखूँगी। इन्हीं ख़यालों में मग्न होकर अपने बेडरूम की बिस्तर पर लेट गई। नींद नहीं आ रही थी। भांजे की हरकत दिमाग़ में छाई रही। अपने कुमारी दिन याद आए। कब से कर रहा था यह हरकत?
पढ़ाकू बुद्धू में इतनी सेक्स की प्रेरणा कैसी? किताब कहाँ से लाया? क्या जानता है सेक्स के बारे में? वीर्य स्खलन के वक़्त सीत्कारी भरता है क्या? चरम सुख पर कैसा फीलिंग होता मर्दों के लिए? ख़याल और भी रंगीन होने लगे। उसका लिंग कैसा है, कितना बड़ा है, वीर्य कैसा होगा? क्या उसने किसी लड़की के साथ किया?
उसकी कोई गर्लफ्रेंड तो नहीं जिसके साथ वह सेक्स किया हो? किसने बताया इसे स्वयं सुख के बारे में? लड़के स्वयं सुख पाने के लिए कितने तरीकों से अपने अंग को प्रेरित करते हैं? एकांत में हस्त मैथुन करने के बाद जब वीर्य छोड़ते तो उसका क्या करते? भांजे की वीर्य का गंध कैसा है। बदन पूरा पसीने से भीग गई थी। ये कहानी आप हमारी वासना डॉट नेट पर पढ़ रहे है.
काफ़ी गरम हो चुकी थी। तुरंत हाथों से अपनी चोटी को प्रेरित करने लगी। दिमाग़ में विकृत आलोचनाएँ अभी भी कुछ बची थीं। जी करने लगा कि भांजे की तरह कामांग को किसी चीज़ के साथ रगड़कर सुख पाऊँ? मेरी नज़र एक मोटी मोमबत्ती पर पड़ी जो अक्सर बिजली जाने पर जलती थी।
बिस्तर के बगल के टेबल पे था। उसे हाथ में लेकर आज़माई। काफ़ी बड़ा और मोटा सा था… लंबे समय तक जलने वाली। मोमबत्ती को बिस्तर से लंबाई के हिसाब से सटाकर रख दिया ठीक उस जगह जहाँ मेरी योनि पड़ती जब मैं लेट जाती। फिर मैंने ठीक ऊपर लेट गई और एडजस्ट की ताकि मोमबत्ती की लंबाई मेरी योनि के ठीक नीचे हो।
योनि को बत्ती से दबाई तो एक मधुर अनुभव हुआ। योनि और बत्ती के बीच मेरी नाइटी और पेटीकोट के कपड़े थे। इस वजह से दर्द या चुभन नहीं था। लेटकर मैंने जवानी की उन किताबों की कहानियाँ याद की और धीरे से योनि को बत्ती से रगड़ने लगी। 15 मिनट के बाद बिजली की एक तेज़ झटका सा फीलिंग मेरे मस्तिष्क में भर गई और मुझे समंदर की उठती-गिरती ऊँची लहरों के तरह एक अत्यंत ही रोमांचक चरम सुख का अनुभव हुआ।
ज़ोर की सीत्कारियाँ भरती हुई उस चरम सुख का आनंद लिया मैंने। पतिदेव को अच्छी तरह मालूम था कि मैं कभी-कभी हस्त मैथुन कर लेती हूँ। कई बार मेरी सिसकियाँ सुनकर उठ जाते और गौर से मुझे देखते, उनके आँखों के सामने ही मैं अपनी योनि को ज़ोरों से प्रेरित करते रहती और मादक स्वरों में मिल रहे सुख का आनंद लेती।
अब की ज़ोरदार सीत्कारियों से पति जागे और बोले ”चुपचाप करो न। या दूसरे कमरे में जाकर रगड़ लो”। मुझ पर उनके बातों का कोई असर नहीं हुआ.. नाइटी और पेटीकोट योनि के स्रावों से गीली हो चुकी थी। शरीर हल्का हुआ और एक मीठी नींद मेरी पलकें बुझा दी।
अगले दिन, पति ऑफ़िस जा चुके थे और भांजा कॉलेज। सब काम निपटाकर मैं सोफ़े पर बैठी टीवी देख रही थी कि अचानक मुझे रात की किस्से का ख़याल आया। मैं उठकर भांजे के कमरे में गई और छानबीन की। अलमारी से कुछ नहीं मिला। बिस्तर के नीचे कुछ नहीं था। लेकिन गद्दे के नीचे कुछ मैगज़ीन मिले।
साथ में कंडोम की कुछ पैकेट भी। मेरा सर चकराने लगा। कई ख़याल एक साथ आने लगे, दिल धड़क रहा था और ऐसा लग रहा था कि मैं कोई जासूस की तरह किसी दुश्मन के घर में छानबीन कर रही थी और कभी भी पकड़ी जा सकती। लेकिन मैं घर में अकेली थी। मेरे हाथ में सेक्स की किताबें थीं और मर्दों वाली कंडोम।
मन चंचल हो उठा। उसी बिस्तर पर लेटकर मैंने कंडोम की एक पैकेट खोलकर अंदर का पदार्थ बाहर निकाला। पहली बार एक कंडोम को हाथ में ले रही थी। इससे पहले कभी क़रीब से देखा नहीं। अजीब सा लग रहा था एक छोटी सी टोपी की तरह। पैकेट पर लिखे इंस्ट्रक्शन पढ़ी और तुरंत एक ख़याल आया।
अपने कमरे में जाकर उसी मोमबत्ती को ले आई जिससे मैंने अपने आप को शांत किया रात में। मोमबत्ती मर्द की कामांग की तरह ही था। इंस्ट्रक्शन दोबारा पढ़कर कंडोम को मोमबत्ती पर चढ़ा दी और देखने लगी। ऊपर एक छोटी सी गुब्बारे की तरह था। शायद यहीं वीर्य जमा होता है। काफ़ी उत्तेजना हुई मुझे।
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कैंडल को बगल में रखी और किताबों के पन्ने घुमाने लगी। 3 मैगज़ीन जैसे पतली किताबें थीं। एक में सेक्स आसनों में लीन विदेशी प्रेमियों के सेक्सी नंगे चित्र थे और उनके हरकतों का संक्षिप्त वर्णन। ऐसा लग रहा था जैसे बहुत सारे फ़ोटो के सहारे कहानी दर्शाई जा रही हो।
शुरू से अंत तक एक दफ़्तर के बड़े बाबू और उसकी सेक्रेटरी के बीच की शर्मनाक संभोग कली का गहरा और खास वर्णन हो रहा था। सेक्रेटरी अपने बॉस की गर्मी बढ़ाने के लिए कैसी कामुक प्रसंग कर रही है और बॉस तैश में आकर सेक्रेटरी से अपनी दिल की बात और मिल रहे सुख का खुलासा वर्णन कैसे कर रहा है… यही था।
सब हिंदी में थी और ऐसे-ऐसे शब्दों का प्रयोग हुआ जो काफ़ी अश्लील और लैंगिक थे। लड़की बॉस के मोटे तगड़े लिंग की प्रशंसा काफ़ी अश्लील और रंगीन शब्दों में कर रही थी और उसके साथ क्या करना चाहती है इसका भी खुल्लमखुल्ला वर्णन कर रही थी। बॉस लड़की की मादक स्थान को दबा-दबाकर उनका गुण गा रहा था।
कुछ पन्नों के बाद ऐसी गंदी हरकत पढ़ी और देखी कि मेरा मन वासना से झूमने लगा। सभी चित्र सच्चे थे… . यानी लड़का-लड़की सचमुच सेक्स कर रहे थे जब उनकी फ़ोटो खींची गई हो। सेक्रेटरी अपनी बॉस की कड़रे लिंग को चूस रही थी। इस दृश्य को देखकर मेरे पेट में अजीब सी हरकत होने लगी।
पहले काफ़ी घिनौना और गंदा लगा और उल्टी होने वाली थी। लेकिन अपने आप को संभाली और गौर से उस चित्र को देख रही थी। इसके बारे में पढ़ी तो थी लेकिन पहली बार सचित्र देख रही थी। वासना की ऐसी लहर दौड़ी मेरी दिमाग़ में कि मैं चीखने लगी और मादक सीत्कारी भरने लगी।
मैं अपने आप को संभाल नहीं पा रही थी। और पन्ने मोड़े तो और भी अश्लील फ़ोटो थे। अब आदमी औरत की योनि चूस रहा था। अंत में वीर्य स्खलन का भी चित्र था। बॉस अपने सेक्रेटरी के उन्नत वक्षजों पर वीर्य छोड़ा जो साफ़ नज़र आ रहा था किसी क्रीम की तरह। थोड़ी देर के लिए मैं लेट गई और आँखें मूँदकर भारी साँसें लेने लगी।
अपने आप पर काबू पाई और उठकर चली गई उन गंदी किताबों से। लेकिन जो चस्का एक बार लगा सो लगा। मैं रह नहीं पाई और एक घंटे के बाद वापस आई और गद्दे के नीचे से किताब निकाली। दूसरे दो किताब काफ़ी किफ़ायती किस्म के प्रिंट में थे। एक में चित्र बिल्कुल नहीं थे।
दूसरे में दो-चार ब्लैक एंड व्हाइट फ़ोटो थे नंगी लड़कियों की और एक संभोग रात लड़का-लड़की के चित्र। मैं लेटकर दोनों किताबों में छपी कहानियाँ पढ़ने लगी। दोनों के लेखक कोई मस्तराम था। नाम से लग रहा था कोई अय्याश होगा। पहली कहानी बिल्कुल वैसी थी जैसे मैंने शादी से पहले पत्रिकाओं में पढ़ा करती थी।
मेरे अंदर कामवासना बढ़ने लगी। योनि से स्राव निकल रहे थे और गर्मी बढ़ रही थी। अपने पैरों को एक दूसरे से रगड़-रगड़कर अपने आप को काबू में लाने की बेकार सी कोशिश कर रही थी। दूसरी कहानी जैसे पढ़ने लगी मेरे मस्तिष्क में दोबारा बिजली चलने लगी। सेक्स की कहानी तो थी लेकिन औरत और मर्द के कामांगों का ज़िक्र एकदम गंदी और अश्लील भाषा की शब्दों से की गई थी।
लंड, चूत इत्यादि। घिनौनेपन के बजाय एक अजीब सी मस्ती छा गई मुझमें। ऐसे शब्दों को पढ़-पढ़कर काफ़ी अच्छा लग रहा था। ऊपर से कहानी एक देवर और भाभी की अवैध सेक्स संबंध के शर्मनाक कर्मों के बारे में थी। कहानी के अंत में दोनों काफ़ी खुश हैं अपनी पाप से। तीसरी कहानी ने तो मेरी दिमाग़ की बत्ती लगभग बुझा ही डाली।
उसी की सेक्सी और वासना भरी कुमारी मौसी ने की। इसका वर्णन पूरे डिटेल के साथ हुआ है। मौसी और दीदी के बेटे के बीच की सेक्स किस्सा कितनी चाव से लिखा मस्तराम साहब ने। जैसे-जैसे कहानियाँ पढ़ती गई, ऐसे ही अवैध और अप्राकृतिक शारीरिक संबंधों का खुला वर्णन होता गया।
यहाँ तक कि सौतेली माँ और बेटे के गंदे सेक्स की हरकत भी वर्णित थे। सब कहानी पढ़ने पर ऐसा लग रहा था कि मस्तराम जी अप्राकृतिक संबंधों को ज़ोर दे रहे थे और उनका समर्थन कर रहे थे। सेक्स कली की डिटेल्ड वर्णन गंदे शब्दों के साथ काफ़ी दिलचस्पी से किए। औरत के गुप्त बातें जैसे माहवारी, सैनिटरी नैपकिन, इत्यादि के बारे में खुलकर लिखा उसने।
मस्तराम औरत और मर्द के बीच का पहला संपर्क और उसके बाद उस परिचय का धीरे-धीरे सेक्स संबंध में बदलने की किस्से बड़े हुनर से लिखे। अब तो मैं पूरी तरह सेक्स की दासी हो गई। अनेक ख़याल आ रहे थे। अवैध संबंध के बारे में कई ख़याल एक साथ आ रहे थे। मस्ती में सब अच्छा लग रहा था।
उन किताबों की एक कहानी में वर्णित एक महिला की हस्त मैथुन के किस्से से मुझमें प्रेरणा जाग उठी। कंडोम में भरी कैंडल को लिंग बनाकर अपनी योनि में लगाई और हाथ हिला-हिलाकर वही सेक्स अनुभव पाई जो सचमुच किसी मर्द के अंग से मिलता हो। जब तन की प्यास बुझी तो सब कुछ बदल सा गया। ये कहानी आप हमारी वासना डॉट नेट पर पढ़ रहे है.
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पहले जब भी रात के अंधेरे में ऐसी हरकत करती और चरम सुख के सनसनाते हुए पल जब बीत जाते तो ऐसा लगता कि अचानक मेरा मन पूरा साफ़ हो गया है। कुछ ही पल पहले की करतूत बुरा और अश्लील लगता था? अपने कुकर्म पर पछतावा होता था। लेकिन अब मुझे कोई पछतावा नहीं था। बल्कि एक ऐसी चंचल मस्ती छाई थी कि दोबारा करने को जी चाह रहा था।
सेक्स की प्यासी तो थी लेकिन इस तरह अश्लील साहित्य के सहारे जलती आग में और भी घी डाल दी मैंने। भारी साँसें भरती हुई मैंने दोबारा उन किताबों के अंदर झाँका। गंदे अश्लील चित्रों को देखते ही एक नयी उमंग मेरे अंदर दौड़ी। बहुत सारे सनसनीखेज़ विचार मन में जन्म ले रहे थे।
उन विचारों में एक विचार था कि भांजा जब इन किताबों को पढ़ता तो उसके दिमाग़ में कैसे ख़याल आते? किसी लड़की के साथ ये सब कुछ करता हुआ सपना देखता था क्या? दिमाग़ की ट्रेन का ब्रेक फेल हो गया और मेरे मन में ऐसी-ऐसी विचार आने लगे कि मानो कोई बड़ा सा बाँध टूट पड़ा हो और बाँध में कैद पानी उछल-उछलकर बहता जा रहा हो।
चंदर (भांजे का नाम) की नंगी जिस्म का दृश्य मेरे मन में आने लगा। थोड़ी ही देर में, ख़यालों में अपने आप को भांजे के साथ संभोग करती हुई देखने लगी। बस! ट्रेन पटर से उतर गई और ख़यालों की दुनिया से असल जगत में आ पहुँची। लाज और शर्म बे दोब गई। छी! कितना गंदा ख़याल है! उठकर सब कुछ ठीक कर दी और ठंडे पानी से नहा ली ताकि जिस्म की गर्मी मिटा सकूँ।
नहाने के बाद नाइटी पहन ली और खाना खाकर बेडरूम में लेट गई। एक बार चस्का जो लगा सो लगा। यह तो पहले ही बता चुकी हूँ। मन जब काबू में ना हो तो दौड़ पड़ता है। और मेरा मन फिर से ट्रेन की तरह दौड़ने लगा। वही अश्लील विचार फिरसे तंग करने लगे मुझे।
मस्तराम जी के अवैध संबंध वाले कहानियों में मामी-भांजे की एक सनसनीखेज़ सेक्स की कहानी थी जिसमें मामी सब हद पर करते हुए भांजे के साथ ऐसी हरकतें कर बैठती जो एक पति-पत्नी भी एकांत में करने से शर्माते। मामी की जगह अपने आप को देखने लगी और भांजे की जगह चंदर को।
शरीर में करंट सा दौड़ रहा था और मैं बेहताश हो रही थी। आँखें मूँदी तो यही दृश्य, आँखें खोलती तो फिर से बंद करके वही सपना देखने की इच्छा! मन में शर्म और लाज ने मस्ती और वासना से जंग छेड़ रहे थे! आख़िर बेहकता हुआ मन शर्म और लाज को अपने आप से मिटा डाला।
आख़िर कब तक अपनी जिस्म को ऐसी दंड देती रहूँगी। 32 साल की उमर औरत के लिए एक नयी जन्म है। शादीशुदा औरतें जब बच्चे पैदा करती तो उनकी परवरिश में 10 साल काट लेती। जब बच्चे कुछ बड़े हो जाते और माँ की ममता और सहारे से मुक्ति पाकर पढ़ाई और खेल-कूद की ओर ध्यान बढ़ाते तो औरत का मन निश्चित हो जाता और पति के प्यार के लिए दोबारा तरसने लगता।
शादी के तुरंत बाद लड़कियाँ शर्म और लाज के साथ पति से मिलन करती और सेक्स की दुनिया में पहला कदम रखती। तब उनकी आलोचना और अनुभव बहुत नादान सा होता है। 30 साल की उमर के बाद, औरत अनुभवी और पक्के इरादे वाली हो जाती। सेक्स में दोबारा जब दिलचस्पी जागती तो शर्म के बजाय कार्यशीलता से संभोग में भाग लेती और लाज को छोड़कर नयी-नयी तरीकों से पति के साथ बिस्तर का खेल आज़माने की कोशिश करती है।
पति भी अनुभवी हो जाता है और पत्नी को खूब मदद करता है। इस तरह 30 साल की उमर के बाद पति-पत्नी सेक्स की ज़िंदगी में एक नयी उमंग लेकर कूद पड़ते और सेक्स का भरपूर आनंद लेते। बच्चे तो नहीं हुए और 18 साल से ज़्यादा तड़पी थी। 32 साल की उमर में मेरा मन भी इसी उमर के बाकी औरतों के तरह सेक्सी हो गया। और मुरादें न पूरा होने के कारण कुछ ज़्यादा ही तड़प रहा था।
इसलिए जो लाज और शर्म मुझे 19 साल पहले पाप करने से रोकी आज वही लाज और शर्म को मेरा मन बाहर फेंक दी और इच्छाओं का दरवाज़ा खोल दी। पति की नाकामयाबी मेरे साथ एक धोखा सा था। पति को धोखा देना कोई पाप नहीं लग रहा था। अगर वह कामयाब और नॉर्मल होते तो आज उनके साथ खुश रहती लेकिन उनकी बारह साल की बेवफाई के सामने पराए मर्द के साथ सेक्स की आलोचना पाप नहीं लग रहा था।
और तो और, भांजे के साथ सेक्स करने से इस पाप को घर के अंदर तक सीमित रख सकती हूँ। किसी को कुछ पता नहीं लगेगा। वैसे भी मैं सिर्फ़ सेक्स चाहती हूँ… . रिश्ता नहीं। इन सब बातों से मन और भी निश्चित हो गया और मैं मन ही मन चंदर से संभोग करने का इरादा बनाई। अपनी इस नयी रूप से मैं खुद चंचल हो उठी।
बिस्तर से उठकर मैंने आइने के सामने खड़ी हुई और नाइटी निकालकर अपनी ही जिस्म की जाँच करने लग गई। काफ़ी सेक्सी लग रही थी मेरी ही छवि मुझे। आप लोगों को बता दूँ कि अब मेरे स्तन बहुत ही बड़े थे। ब्रा 36c की साइज़ की पहनती हूँ। उनको जितना भी ब्लाउज़, ब्रा और साड़ी के पल्लू के सहारे ढक दूँ, उनकी गोलाई और उभार को छिपा नहीं सकती।
जो भी मुझे देखता, मेरी वक्ष-संपदा से तुरंत परिचित हो जाता। उमर के लिहाज से नितंब भी काफ़ी उभर आए और कमर चौड़ी और जाँघ भरी और मांसल लग रहे थे। जिस्म का रंग काफ़ी गोरा था… माँ की देन थी। बड़ी सेक्सी लगती हूँ। उन दिनों मायके में मोहल्ले के लड़के बहुत सारे मेरे दीवाने थे।
आख़िर चंदर से मेरी जिस्म की करारापन कैसे छिपती? ज़रूर मेरी यौवन पर गौर किया होगा। शायद मेरी नग्न अवस्था को मन में बसा कर हस्त प्रयोग करता होगा! चंदर को पटाने के लिए ये सेक्सी जिस्म ही काफ़ी है। शाम को जब चंदर कॉलेज से लौट आया। चाय देने के बहाने उसके कमरे में गई और बातचीत छेड़ने की प्रयास की। ये कहानी आप हमारी वासना डॉट नेट पर पढ़ रहे है.
चंदर बड़ा ही शर्मीला था। मेरी तरफ़ देख भी नहीं रहा था और नज़र बचाते हुए बात कर रहा था। मैं एक पीले रंग की पारदर्शी साड़ी और सफ़ेद रंग की पारदर्शी ब्लाउज़ पहनी हुई थी। ब्लाउज़ काफ़ी सेक्सी किस्म की थी और मेरी स्तन की गोलाई ब्लाउज़ के बीचों-बीच से बाहर निकले थे।
अंदर की ब्रा भी काफ़ी सेक्सी किस्म की थी और जिस तरह से उनमें मेरी गोलाइयाँ सिमटी हुई थीं साफ़-साफ़ नज़र आ रहा था। लेकिन जिसको दिखाना चाहती हूँ वह तो नज़र भी नहीं मिला रहा था। यूँ ही कॉलेज के बारे में कुछ बातें करने लगी। शर्माते हुए वह कुछ जवाब भी दे रहा था।
बातों-बातों में उसे पूछ पड़ी “क्या तुम्हारे कॉलेज में लड़कियाँ पढ़ती नहीं?” उसने कहा “पढ़ती हैं लेकिन बहुत कम। इंजीनियरिंग में आर्ट्स और कॉमर्स के मुकाबले कम लड़कियाँ हैं”। फिर मैंने पूछा “कोई स्पेशल फ्रेंड इन लड़कियों में?” चंदर शर्मा गया और अपने मुँह और भी नीचे कर दिया।
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शर्माते हुए कहा ” नहीं… ऐसा कोई नहीं”। मैंने और पूछा… ”क्या कोई भी गर्लफ्रेंड नहीं? तुम्हारे उमर के लड़कों के लिए ये तो मामूली बात है” चंदर और भी शर्माता रहा और मैं धीरे-धीरे हमारे बीच की दूरी मिटाती गई। “चंदर, शर्माते क्यों हो? गर्लफ्रेंड होना कोई बुरी बात नहीं बल्कि आजकल तो ये ही जायज़ है कि लड़का-लड़की अपने जीवन साथी खुद चुन ले।”
“बताओ… कभी लड़कियों के बारे में सोचते नहीं क्या? उनके ओर आकर्षित नहीं होते क्या?” चंदर शर्म से पानी-पानी हो गया। बड़ी मुश्किल से जवाब दिया “जी मामी, ऐसी कोई बात नहीं… मेरी ध्यान तो पढ़ाई में है। कॉम्पिटिशन ज़्यादा है। इन सब बातों के लिए वक़्त ही कहाँ… मैं ऐसे मामलों में बहुत पीछे हूँ.”
मैंने एक और तीर छोड़ी “तो क्या ये सब बेकार की बातें हैं? अरे हमारे ज़माने में इस उमर के लड़के लड़कियों की शादी हो जाती और वह तो सुहागरात भी मना डालते और बच्चे पैदा कर लेते। तुम्हारा जेनरेशन तो फास्ट है और तुम कहते हो कि लड़कियों के बारे में सोचते नहीं हो… क्या किसी लड़की को देखकर आकर्षण सा नहीं होता?
कुछ नहीं लगता तुम्हें? और आजकल की लड़कियाँ ऐसे-ऐसे ड्रेस पहनती हैं… कुछ तो महसूस होता होगा… उनके क़रीब जाने की इच्छा… उनसे बात करने की इच्छा… छूने की इच्छा… किस करने की इच्छा… कुछ और करने की इच्छा… ” चंदर की आँखें एकदम बड़ी हो गईं। शर्म तो आ रही थी उसे लेकिन मेरी बात सुनकर उसे आश्चर्य भी हुआ..
“मामी! प्लीज़!” उसने ज़ोर से कहा और शर्म से मुस्कुराते हुए मुँह मोड़ लिया “ऐसा कुछ सोचता नहीं हूँ… मैं सीधा-सादा लड़का हूँ… ” मैं मुस्कुरा उठी…. चंदर कितना सीधा-सादा सा था उस रात की हरकत ने खूब दिखाया मुझे। ऐसी सेक्सी किताबें पढ़ता है और देखो कैसा नाटक कर रहा है! मैं हार नहीं मानी… बड़ा मज़ा आ रहा था… मेरे अंदर भी बहुत कुछ हो रहा था.. बेशर्मी बढ़ रही थी।”
इतने भी सीधे-सादे मत बनो कि सुहागरात के दिन पत्नी को छूना दूर मुँह भी देखने से शर्माओ। अरे इस उमर में तो सबको सेक्स की जिज्ञासा होती है… ये तो एक सहज बात है। झिझक छोड़ो और खुलकर बात करो। तुम बड़े हो गए हो… शर्माने से स्मार्ट नहीं बन सकते”। चंदर फिर भी मुँह मोड़े हुए शर्म से मुस्कुरा रहा था।
“ठीक है भाई… और नहीं पूछती… लेकिन गर्लफ्रेंड होना, लड़कियों के ओर आकर्षित होना या सेक्स की बारे में सोचना… ये सब बुरी बात नहीं है। अरे आजकल तुम्हारे उमर के लड़के लड़की एक दूसरे के साथ सेक्स भी कर लेते हैं। सब चलता है” ये कहते हुए मैं कमरे से निकल गई। कल शनिवार है। पति देर से घर आते और वह भी शराब के नशे में।
हर शनिवार अपने निकम्मे दोस्तों के साथ पीते और घर लौटकर चुपचाप सो जाते। चंदर की कॉलेज सिर्फ़ आधे दिन के लिए खुलती और वह दोपहर को लौट आता। मेरी प्लान के मुताबिक उसके लौटने के बाद हम दोनों के पास 10 घंटों का एकांत समय होता। ये कहानी आप हमारी वासना डॉट नेट पर पढ़ रहे है.
इसी दौरान मैं उसके साथ कुछ और सनसनीखेज़ बातें छेड़कर गद्दे के नीचे रखी किताब और कंडोम उसके सामने निकालती और उसे प्रलोभित करके अपने वश में ले लेती और सेक्स करने पर मजबूर करती। शर्म और लाज से वह पूरी तरह मेरे वश में होगा। मेरी जवान जिस्म को देख उसकी नियत तो बदलेगी ही… उसके बाद… आप समझ सकते हो…
पति ऑफ़िस से लौटे और हम तीनों डिनर कर रहे थे। चंदर अभी भी शर्मा रहा था। शायद शाम की बातें उसे अभी भी तंग कर रही होंगी। मैं कुछ नहीं बोली लेकिन जब भी मेरी तरफ़ देखता मैं मुस्कुराती थी और वह और भी पानी-पानी हो जाता। डिनर के बाद वह अपने कमरे में गया और मैं जल्दी सोने चली गई।
पति तो वैसे भी मेरे साथ न बैठने का बहाना ढूँढते रहते और मुझसे जल्दी सो गए। कल को रचाने वाली कांड के बारे में सोचती-सोचती सो गई। आधी रात को झट से उठी पसीने में भीगी हुई। एक सपने से जाग उठी जिसमें मैं चंदर के साथ संभोग रात पाई। ठीक संभोग संपन्न करने के क्षण,,, यानी कामांग से कामांग मिलाने के समय सपना टूट गया और मैं जाग उठी।
साँस तेज़ी से चल रही थी। जाँघों के बीच वही गीलापन जो हर कामुक औरत को सताती है। स्तन भारी और कमसिन लग रहे थे। जिस्म पूरा गरम हो उठा। मैं दोबारा सोने की कोशिश की लेकिन तन की ताप मुझे सोने नहीं दे रहा था। वासना की आग में जलती रही और जितना भी मन को काबू में लाने की कोशिश करूँ बेकार था।
सेक्स की इच्छा प्रबल हो गई और मैं तड़पती रही। इतनी तड़पी कि आँखों से पानी बहने लगा। अब और नहीं रहा जा रहा था। हस्त प्रयोग करने की कोशिश की लेकिन सफल नहीं हो पाई। अपने हाथों से अपनी ही योनि को सहलाने में कोई आराम नहीं मिल रहा था। अब तो सिर्फ़ एक मर्द ही मुझे ठंडा कर सकता था।
जिसे करना चाहिए वह तो नींद में डूबा हुआ था। उठाऊँ तो गाली देने लगेगा। इस घर में तो सिर्फ़ एक और मर्द है। शनिवार की दोपहर तक उसका इंतज़ार नहीं कर सकती। वासना से अंधी, मेरे मन में सेक्स की लत लग चुकी थी और मैं उठ गई और सीधे चंदर की कमरे की ओर चली गई।
ऐसी माया में कैद थी कि मुझे समझ में नहीं आ रहा था मैं क्या कर रही हूँ… बस दिल की बात सुनती जा रही थी। कमरे के अंदर अंधेरा छाई थी। लगता है चंदर अपना कार्य समाप्त कर सो गया। मैं धीरे-धीरे उसकी बिस्तर तक पहुँची। कंबल ओढ़े गहरी नींद में सो रहा था। उसके बगल में बैठ गई।
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शरीर पूरा तप रहा था… दिल ज़ोरों से धड़क रही थी। वासना से अंधी हो गई थी… कुछ भी सूझ नहीं रहा था। यूँ ही बैठी उसके ओर देखती गई। कब तक ऐसी बैठी रहूँ ये सोचके धीरे से अपनी हाथ उसके हाथ पर रखी और सहलाने लगी। असर होने में देर नहीं लगा। चंदर ने आँखें खोली और मुझे देखकर झट से उठा और बैठा।
“म्म… मामी… क्या हुआ?” मैं कुछ बोल नहीं पा रही थी। बस काम ज्वर से भरे आँखों से उसे बेचैनी से घूर रही थी। चंदर टेबल लैंप जलाया और मेरी तरफ़ देखा। दिल बहुत ज़ोरों से धड़क रहा था और छाती ऊपर-नीचे हो रही थी। साँसें बहुत गहरी ले रही थी। “मामी… क्या हुआ? कुछ चाहिए? तबीयत ठीक तो है” उसने पूछा।
मैं यूँ ही बैठी उसकी ओर देखती रही… एक तरफ़ से डर लग रहा था तो दूसरी तरफ़ बेचैन हो रही थी। चंदर को थोड़ी घबराहट हुई और मेरे कंधे पर हाथ रखकर हिलाया और कहा “मामी जी… ये क्या हुआ आपको… कुछ बोलिए तो!” उसके स्पर्श से मानो बिजली चल पड़ी और बंद दिमाग़ को चला डाली। झट से मैं उसे बाहों में भर ली और पागलों की तरह चूमने लगी।
“मेरे साथ कुछ करो… आह! चंदर, मुझे प्यार दो… मुझे ले लो और कर डालो” कहते हुए उस पर पूरी तरह छा गई और अपनी उन्नत छाती उसके छाती से रगड़ने लगी। चंदर हक्का-बक्का सा हो गया और मेरे जकड़ से अपने आप को छुड़ाने का प्रयास करने लगा। “ये क्या कर रही हैं आप… छोड़िए… ये क्या हो गया है आपको… प्लीज़ मामी… छोड़ दीजिए मुझे”। ये कहानी आप हमारी वासना डॉट नेट पर पढ़ रहे है.
लेकिन मेरी पकड़ एकदम सख्त थी और मैं उसकी गालों पर चुम्मे बरसाती हुई बोल पड़ी। “चंदर… मेरी प्यास बुझाओ.. मैं तड़प रही हूँ… तुम्हारे मामा नपुंसक हैं… मुझे छूते भी नहीं… तुम तो मर्द हो… सेक्स क्या है जानते हो… .मुझे सेक्स की खुशी दो मेरे राजा..” मैं पूरी तरह से बेहक गई थी, मुँह से निकल रहे शब्द मेरे मन के किसी कोने से निकल रहे थे जिस पर कोई काबू नहीं था।
“मामी… क्या कह रही हैं आप… छोड़ो!” और चंदर ने ज़ोर से झटककर मुझसे अलग हो गया। तुरंत खड़ा हो गया और गहरी साँसें लेते हुए मेरी तरफ़ देखकर गुस्से से बोला “ये पाप है। हमारे बीच एक रिश्ता है… आप मेरी मामी हैं।” मैं होश में आई और अपनी करतूत पर पछताई… पर जो होना था हो गया… अब पछताने में क्या रखा है, हद तो पार कर चुकी थी।
नाइटी पहनी हुई थी और गले के नीचे सारे हुक खुले हुए थे। मैं रात को ब्रा नहीं पहनती और मेरी चुची उभरकर बाहर झाँक रही थी। फिर भी मैं उसे ठीक नहीं की और चुपचाप बैठी रोने लगी। मेरी आँसू को देखकर उसका गुस्सा उतर गया और शांत स्वर में बोला “मामी… सॉरी… लेकिन ये नहीं हो सकता… मामाजी क्या सोचेंगे… मैं आपको इस नज़रिए से नहीं देख सकता।”
मैं सिसकियाँ भरते हुए बोल पड़ी “तुम्हें क्या मालूम मेरे साथ क्या हो रहा है। तुम तो अभी जवान हुए। बारह साल से जो सुख हर पत्नी अपने पति से पाती है वह मैं नहीं पाई। अतृप्त शरीर की ताप क्या होती है तुम्हें मालूम नहीं। मैं किस आग में जल रही हूँ क्या मालूम तुम्हें? तुम तो उन गंदी किताबों की गंदी कहानियों को पढ़कर खुश हो जाते हो…
असल में किसी औरत की जिस्म की माँग क्या है तुम्हें पता नहीं… मैंने यही सोचा कि तुम जवान हो… अच्छे हो… तुम्हारे साथ सेक्स करके तुम्हारी अंदर उभरती हुई कामेच्छा को शांत करूँगी और अपनी जलन को भी कम करूँगी… यही सोचकर तुम्हें पाने आ चली। तुम उन किताबों की गंदी तस्वीरों को देखकर और सेक्स की कहानी पढ़कर सिर्फ़ स्वयं तृप्ति पा रहे हो…
लेकिन औरत की जिस्म की मिठास तुम्हें मालूम नहीं। मैंने सोचा तुम्हें इसका स्वाद दिखा दूँ… आख़िर कितने दिन तक इस बिस्तर से अपनी अंग रगड़ते रहोगे… असली चीज़ के लिए तड़प जाओगे! थोड़ी देर चुप रही और सिसकियाँ भरती रही। चंदर सर झुकाए खड़ा रहा। उसकी चोरी पकड़ी गई। इसी बात से उसकी बोलती भी बंद हो गई।
मैं अपने आप को संभाली और फिर बोल पड़ी “ख़ैर, तुम इन बातों को समझ नहीं पाओगे। अभी तुम नादान सा हो। मैं जा रही हूँ। घबराओ नहीं, मैं गद्दे के नीचे की किताबों और कंडोम के बारे में किसी से नहीं कहूँगी और तुमको नहीं रोकूँगी। तुम शौक से उन्हें लाकर पढ़ सकते हो और अपने आप को संतुष्ट कर सकते हो।
अगली बार हस्त मैथुन करने से पहले दरवाज़ा अच्छी तरह से बंद करो। मामाजी देख लिए तो अनर्थ हो जाएगा। मगर एक बात समझ लो। जिस दिन तुम किसी लड़की के जिस्म से पहली बार संभोग करोगे, उस दिन तुम समझ जाओगे कि आज की रात तुमने क्या खोया”। मैं यह सब कहकर वापस अपनी बेडरूम में चली गई।
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रात कैसे कटी यह मैं ही जानती हूँ। नींद बिल्कुल नहीं आई। तड़प-तड़पकर बिताई। रो-रोकर बुरा हाल था मेरा। लेकिन अंत में मैंने निश्चय कर ही डाली कि किसी न किसी तरह चंदर को वश में करके रहूँगी। सुबह मैंने ऐसी बन बैठी जैसे रात को कुछ हुआ ही नहीं। नाश्ते पर चंदर चोर की नज़रों से मेरी तरफ़ बार-बार देख रहा था।
मैं कुछ भी नहीं बोली उससे। पति काम के लिए निकल पड़े और जैसे ही चंदर कॉलेज के लिए जा रहा था उसे रोककर अपनी बात कह डाली “चंदर, आज कॉलेज सिर्फ़ आधे दिन का है… घर जल्दी आ जाओ और खाना यहीं खाओ। रात की बात को लेकर घर से मुँह मत मोड़ो। रात की बात रात को ही ख़त्म समझो। धूप तेज़ है आजकल। दोपहर को घर पर ही सो जाओ।” चंदर कुछ नहीं बोला।
सिर्फ़ मेरी बात का हाँ जवाब सर हिलाते हुए देकर निकल पड़ा। मैं थोड़ी सी शॉपिंग के लिए बाहर गई। आज अपनी रोज़ की सुपर मार्केट को छोड़ घर से काफ़ी दूर एक डिपार्टमेंटल स्टोर से शॉपिंग की। कुछ ऐसी चीज़ खरीदनी थी जो पहचान वालों से खरीद नहीं सकती। घर वापस लौट आई और खाना जल्दी खाली।
चंदर एक घंटा देर से आया। शायद शर्म और लाज के कारण मेरे साथ अकेला घर में रहना उचित नहीं समझा और बाद में मेरी बात को मानकर लौट आया। मैं जानती थी कि वह घर से दूर रहना चाहेगा और इसी कारण सुबह उससे लौटने के लिए कह दिया। मैं उसके लिए खाना परोस दी और वह चुपचाप खाना खाकर अपने कमरे में चला गया।
थोड़ी देर के बाद, मैं उसके दरवाज़े पर खटखटाई। कुछ देर बाद वह दरवाज़ा खोला। थोड़ा शर्मा रहा था। मैंने उसके हाथ में कंडोम की एक नयी पैकेट थमा दी। “मैं तुम्हारे लिए ये खरीदकर लाई… कुछ अच्छे क्वालिटी के हैं। बीच में फट नहीं जाएँगे। एंजॉय करो।” चंदर यूँ ही देखता रहा… कुछ बोलने की हिम्मत नहीं हो रही थी उसे।
मैंने एक मैगज़ीन भी उसे दे दी “इनमें फिल्मी हीरोइन के सेक्सी तस्वीर हैं… शायद तुम्हें उत्तेजित करने में काम आएंगे। अपनी फ़ेवरेट हीरोइन के तस्वीर को देखकर करो… वो जो तुम रात को करते हो…” मैं थोड़ी मुस्कुराकर बोली। चंदर भूत की तरह खड़ा रहा… मैंने उसके हाथ में दोनों चीज़ थमा दी और उसके मुट्ठी बंद कर दी। ये कहानी आप हमारी वासना डॉट नेट पर पढ़ रहे है.
“एक बात बताओ… लड़कियों के साथ तुम्हारा कोई शारीरिक संपर्क है क्या? अगर नहीं तो कंडोम क्यों लेकर आते हो?… देखो चंदर… अब बात मेरे सामने आ गई और मैं इसका बुरा नहीं मानती। इस उमर में सब लड़के ऐसी हरकत करते हैं… इसके बारे में खुलकर बात कर सकते हो, कोई परेशानी नहीं।”
चंदर थोड़ा नॉर्मल हुआ और शर्माते हुए बोला “जी… कोई लड़की नहीं… मैं तो यूँ ही पहन लेता हूँ इसे। बिस्तर ख़राब हो जाएगा.. इसलिए इसे पहनकर करता हूँ… बाद में फेंक देता हूँ”। मैं थोड़ी हँसी और बोली “शुक्र है… मैं तो समझ रही थी कि जिस तरह से तुम… ‘वो’… करते हो, सब गद्दे में ही छोड़ देते हो… कोई बात नहीं… इनका उपयोग करो… ज़रूरत पड़े तो मैं और लाकर दूँगी… बस इधर-उधर मत डालो… .इस पैकेट को भी और अपनी… .उस ‘पदार्थ’ को भी”।
मेरी खुल्लमखुल्ला बात सुनकर चंदर का रंग शर्म से लाल हो गया। तुरंत शर्माते हुए दरवाज़ा बंद किया। “अरे थैंक्स तो बोलो..” मैं चिल्लाई। दरवाज़ा आधा खोला और शर्माते हुए “थ… थैंक्स … मामी” कहकर फिर से बंद किया। वाह! इतनी जल्दी ऐसा असर होगा मुझे पता भी नहीं।
मैं सोच रही थी कि चंदर फिर से मेरी हरकतों का विरोध करने लगेगा। मैं प्लान नंबर 2 को अमल में लाने में और देरी नहीं करना चाहती। थोड़ी देर के बाद मैं बाथरूम में गई और दरवाज़ा बंद करके अपनी साड़ी और पेटीकोट उतार दी। “चंदर… ओ चंदर” कहकर चिल्लाने लगी।
तीन बार चिल्लाने पर चंदर जल्दी से बाथरूम की ओर आ पड़ा। मैंने दरवाज़ा थोड़ा सा खोलकर उसके पीछे खड़ी होकर उसे ये पर्ची दी। जानबूझकर एक नंगी टाँग दरवाज़े से सटाकर रख दी ताकि पैर से घुटने के ऊपर थोड़ी भाग तक उसे नज़र आए। “चंदर… एक मजबूरी है… प्लीज़! मदद कर दो न… ” मैंने बोला।
पर्ची पढ़ते ही चंदर का रंग फिर से लाल हो गया और नासमझी में मेरी तरफ़ देखा। नंगी टाँग को देखकर मुँह नीचे किया और बोला… “क्या बात है? और ये क्या है?” पर्ची में मैंने साफ़-साफ़ लिखा ‘व्हिस्पर अल्ट्रा एक्सएल विंग्स – सैनिटरी पैड्स’।
“चंदर… बड़ी समस्या है मेरी… अचानक बहाव शुरू हो गया और घर में पैड्स नहीं है। सोच रही थी तीन-चार दिन तक टाइम है लेकिन अचानक शुरू हो गई… प्लीज़… मैं बाहर आ नहीं सकती। समझने की कोशिश करो… इन्हें जल्दी किसी मेडिकल दुकान से ला दो… प्लीज़। वरना मैं बाथरूम से बाहर आ नहीं सकती”।
चंदर वैसे का वैसे ही खड़ा रहा और हाथों में पर्ची मसल रहा था… बड़ा शर्मीला हो गया था। बिल्कुल जैसे मैं चाहती थी। “मगर… ये लेडीज़ मामला है… मैं कैसे… ?” कहता हुआ वहीं खड़ा-खड़ा पानी-पानी हो रहा था। “प्लीज़ चंदर… घर में पुराने कपड़े भी नहीं जिनके साथ काम चला लूँ। और इस हाल में मैं दुकान नहीं जा सकती… लेडीज़ मामला है… प्लीज़… इस बार थोड़ी बेशर्मी दिखाकर मेरी मदद करो”।
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बेवकूफ़ की तरह चंदर मुंडी हिलाई और धीरे-धीरे घर से बाहर निकल गया। मैं तुरंत नहाई, कपड़े बदलकर उसके कमरे में पहुँची। मेरे हाथ में व्हिस्पर पैड्स की खाली पैकेट थी। उसे चंदर के बिस्तर पर रखकर मैंने गद्दे के नीचे सारी किताबें और कंडोम निकाली और चाव से एक किताब पढ़ने लगी।
जैसे मैंने सोचा वैसे ही चंदर आने में बड़ी देर कर दी। हाथ में व्हिस्पर की पैकेट थी। उसके तो पसीने छूट रहे थे। मुझसे अमरे में उन किताबों के साथ देखकर और भी पसीना छोड़ने लगा। “मामी… आप यहाँ? मैंने समझा आप बाथरूम में…” मैंने उसकी बात को काटते हुए बोली… “हाँ… मगर तुम बहुत देर कर रहे थे तो मैंने थोड़ी और ढूँढने लगी तो एक पैड मिल गया मुझे…” कहते हुए खाली पैकेट दिखाई उसे।
“बस उसे पहन लगा ली… पर तू बता… मेडिकल दुकान तो यहीं है..फिर इतनी देर क्यों?” चंदर शर्माता हुआ बोला… “जी… पहले कभी ऐसी चीज़ खरीदी नहीं… कैसे पूछूँ… ये समझ में नहीं आ रहा था… और फिर पहचान वाले दुकान से बेहतर किसी नयी दुकान से लेना ठीक समझा… .बस पर्ची दिखाई तो खुद दे दिया… .बड़ा शर्म लग रहा था”।
मैंने एक छोटी सी हँसी हँस दी और कंडोम की पैकेट उठाकर बोली… “इस चीज़ को खरीदने के लिए मुझे कोई शर्म नहीं लगा… देखो चंदर… कल तुम्हारी बीवी के लिए तुम्हें पैड खरीदने होंगे तो क्या करोगे? वह भी बाथरूम में मेरी तरह नंगी खड़ी होगी और तुम्हें पैड लाने को कहेगी। अगर तुमने इनकार कर दिया तो वह तुम्हें सेक्स करने नहीं देगी… बस तड़प जाओगे… मेरी तरह.”
मैंने ये बात हँसते-हँसते कह दिया पर आख़िरी बात कहते वक़्त हँसना बंद कर दिया और थोड़ी मायूसी के साथ बात ख़त्म की। “ये सब तो लेडीज़ वाली बातें हैं… मैं मर्द भला इनमें कैसे उलझने लगूँ?” उसने कहा थोड़ी शर्म छोड़कर। “देखो चंदर… औरत की ऐसी कई बात है जो तुम्हें समझना होगा… उनमें माहवारी एक विषय है।
तुम तैश में आकर बीवी की कपड़े निकाल फेंको और तुम्हें वहाँ एक सैनिटरी पैड दिखाई दे तो क्या तुम सेक्स कर डालोगे? बेहतर है इन बातों के बारे में थोड़ा जान लो। देख मैंने कैसे तुम्हारे मर्दों वाली बात समझ ली” कहते हुए मैंने कंडोम और किताब दिखाई उसे। चंदर की शर्म वापस आ गई। “मामी… अब बस… ऐसी बातें और न करो… आप बहुत ज़्यादा कर रहे हैं आज”।
“अरे भोले राजा… जब सारी बातें खुल गई और मैं तुम्हारे हरकतों को प्रोत्साहित कर रही हूँ फिर कैसी शर्म… खुलकर सेक्स की बातें करो और सेक्स की शिक्षा पाओ।” मैंने उसे बिस्तर पर खींचकर बैठाते हुए बोली। “अरे इन किताबों में तो सिर्फ़ ऐसी बातें हैं जिससे तुम उत्तेजित हो जाओगे… असली सेक्स की शिक्षा इनमें कहाँ?
कल को जब बीवी के साथ पहली बार करने को उस पर चढ़ जाओगे तो उत्तेजना से जल्दी ही पानी छोड़ोगे। और फिर इन किताबों में थोड़ी लिखा है लड़की की जिस्म कैसी है, उसके साथ पहली बार कैसे पेश आओगे और अंग प्रवेश कैसे करोगे इत्यादि” असल में इन किताबों में काफ़ी विषय छापे गए लेकिन मैं जानबूझकर चंदर से खेलती रही।”
सेक्स एक कला है… सीखोगे नहीं तो ज़िंदगी भर पछताओगे। औरत के साथ मिलने से पहले उसे समझना चाहिए… इसलिए मैं शादी से पहले सेक्स की खिलाफ़ नहीं हूँ… ” चंदर कुछ नहीं बोला… बस हाथों में हाथ डाले बैठा रहा और हाथ मलते रहा। मैंने अपनी पल्लू हटा दी। काली रंग की ब्लाउज़ पहनी थी जो मेरे वक्षजों को पूरी तरह ढक न सके।
ब्लाउज़ के बीचों-बीच मेरे वक्ष बाहर झाँक रहे थे और उनके बीच की “गहरी खाई” साफ़ नज़र आ रहा था। अंदर ब्रा नहीं पहनी थी और पारदर्शी ब्लाउज़ में वक्षजों का गोरापन साफ़ नज़र आ रहा था। चंदर मेरी इस हरकत से और भी टेंशन में आ गया और बड़ी कमज़ोर आवाज़ में बोल पड़ा “मामी… प्लीज़ … ये सब क्या है… आप फिर से ज़बरदस्ती कर रही हैं… ये पाप है”।
पर मैंने निश्चय कर ही लिया कि आज मैं चंदर से मिलन करके रहूँगी। चंदर के दोनों हाथ पकड़ ली और पकड़ सख्त कर दी। “पाप और पुण्य के चक्कर में मत पड़ो। मेरी जवानी तुम्हें पुकार रही है। मौके का फायदा उठाओ… औरत को समझ लो”। मैंने कामुक स्वर में बोला। “आओ चंदर… .अब ज़िद न करो… मेरी वासना की आग को और हवा मत दो। मेरी प्यास बुझाओ!”
कहती हुई मैंने उसके हाथ अपने स्तन पर रख दी और धीरे-धीरे सहलाने लगी। चंदर हाथ छुड़ाने की कोशिश की लेकिन मेरी पकड़ मजबूत थी। पूरे स्तन से उसके हाथ लगा ली और ज़ोरों से रगड़ने लगी… दिल को बड़ी सुकून मिल रही थी… अंदर ही अंदर एक उत्तेजना की लहर दौड़ रही थी। “इन्हें आज़माओ चंदर… ये तुम्हारे लिए हैं… अब शर्म और लाज छोड़ो… मेरी जिस्म से नाता जोड़ो… तुम्हें स्वर्ग का आनंद मिलेगा”।
कहते ही मैं तुरंत उसके ऊपर चढ़ पड़ी और अपनी वक्षजों को उसके चेहरे से लगाई और सर पकड़के अपनी वक्ष संपदा उसके मुँह से सहलाने लगी। “आह … .म्म्म्ह! हाय! ” करती हुई उसके कमर से अपनी जाँघें सटाई और उसके गोद में बैठी अपनी यौवन को उस पर परोसती गई। ये कहानी आप हमारी वासना डॉट नेट पर पढ़ रहे है.
चंदर धीमे स्वर में विरोध करता रहा लेकिन अब मुझे यक़ीन हो गया कि वह धीरे-धीरे पिघल रहा है… आख़िर कब तक औरत की जवानी से मुँह मोड़ता रहेगा? अपनी ब्लाउज़ की हुक खोल डाली और ब्लाउज़ से वक्षजों को मुक्त कर डाली। ब्लाउज़ फेंक दी और अपने नग्न वक्षजों को चंदर के चेहरे के सामने परोस दी। बस! चंदर की तबीयत तुरंत लौट आई।
ऐसे उन्नत और करारे स्त्री संपदा उसने आज तक देखी नहीं। मेरे बड़े-बड़े गोलाइयों को देखकर उसकी साँसें तेज़ हो गईं। आज तक इन्हें लाज से ढककर रखती आई। अपनी ही इस हरकत से तैश में आ गई। अपने ही स्तन को किसी ग़ैर मर्द के चेहरे के सामने पाकर पागल सा हो गई और पूरी तरह से चंदर पर छा गई।
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चंदर मेरे वजन से पीछे बिस्तर पर गिर पड़ा। मैं उस पर गिर पड़ी और मेरे स्तन उसके मुँह से लगकर चपाट हो गए। अपने कमसिन नग्न वक्षों पर मर्दानी का स्पर्श पाते ही मेरे अंदर के काम लहर एक तूफ़ान का रूप ले लिए। मैं बेहताशा चंदर से लिपट गई और कामुक स्वर में सीत्कारी भरते हुए अपने आप को चंदर के जिस्म से रगड़ती गई।
बेहताशी में मेरे हाथ उसके जिस्म पर दौड़ती जा रही थी और उसके अंग पर जा पहुँचे। उसका लिंग एकदम दंडे की तरह सख्त हो गया था। लिंग के स्पर्श पाते ही मैंने उसे पकड़ ली और मुठियाने लगी। चंदर में सहनशीलता ख़त्म हो गई और वह भी पूरी तरह से वासना की लपेट में आ गया।
मेरी पीठ पर उसके हाथ फिसलते-फिसलते मेरे नितंब पर आ रुके और दोनों हाथों में मेरे पिछवाड़े के मांसल गोलाइयों को मसलने लगा। इस हरकत से मैं बहुत उत्तेजित हो गई और चंदर के होंठों से अपनी होंठ लगा ली और उसके जीभ को अपने मुँह में लेकर चूसने लगी। मेरी साड़ी और पेटीकोट काफ़ी ऊपर तक सरक गए और मेरी नंगी जाँघ उसके जाँघ पर मसल रहे थे।
हम दोनों के बीच लाज और शर्म की दीवार गिर गई। दोनों के हाथ एक दूसरे के मर्मांगों को तलाशकर उनसे परिचय कर रहे थे। मैंने दोनों हाथों में चंदर का सर लेकर होंठ से होंठ मिला-मिला कर काम क्रीड़ा की पहली पड़ाव पर पहुँच गई। जाँघों के बीच मेरी कामांग पानी-पानी हो रही थी।
चंदर के खड़े अंग से उसे रगड़ती हुई अपनी उत्तेजना को और बढ़ा रही थी। वक़्त रुक सा गया और मैं किसी सपने में खो सा गई। आख़िर होश में तब आई जब अचानक चंदर के मुँह से “निकली। मामी… मामी… प्लीज़… निकल गया… प्लीज़” हड़बड़ाते हुए चंदर बोलने लगा। उठकर नीचे देखी तो चंदर के पजामे के ऊपर एक गीला सा दाग़ था।
मुझे तुरंत समझ आया कि क्या हुआ लेकिन अपने आप को यक़ीन दिलाने के लिए दाग़ पर उँगली फेरी तो कुछ गाढ़ा सा चिपचिपा पदार्थ लग रहा था। उँगली नाक तक लाई और सूँघने लगी तो यक़ीन हुआ कि चंदर का वीर्य है। आख़िर चंदर में उत्तेजना ज़्यादा हो गई जिससे वीर्य स्खलन हो गया।
मैं उठकर चंदर के पजामे के नाड़े की गाँठ खोलने लगी तो चंदर शर्माते हुए अपने आप को छुड़ा लिया और उठकर खड़ा हो गया और पछतावे से मेरी ओर देखता गया। मैं हँस पड़ी और बोली… “इतनी जल्दी? क्या हुआ… टेंशन ज़्यादा हो रहा था क्या?” चंदर थोड़ी देर पहले की झिझक और शर्मीलापन त्याग चुका था और अब अपने शीघ्र स्खलन से शर्मा रहा था।
मेरे सवाल का जवाब ज़रा लाज से दी “जी..मामी… हाँ… टेंशन ज़्यादा हो गई… पहली बार ऐसा किया न…” मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा था.. इसलिए उससे और भी कई सवाल किए। इन सवालों से एक नयी बात मालूम पड़ी। चंदर रोज़ हस्त प्रयोग नहीं करता। सिर्फ़ दो हफ़्तों में या दस दिन में एक बार करता था और वह भी तब जब उसकी टेंशन ज़्यादा हो जाती है।
उसने यह भी कह डाला कि अक्सर नींद में उसकी वीर्य स्खलन हो जाती थी। हस्त प्रयोग उसने कभी भी हाथों से नहीं किया था। उसे हस्त प्रयोग के बारे में कुछ मालूम ही नहीं। किसी दोस्त ने इसकी नादानी के बारे में जानकर उसे वो गंदी किताबें दी ताकि इस बुद्धू को सेक्स के बारे में ज्ञान प्राप्ति हो।
बस उन किताबों के नंगी तस्वीरों को देखकर उसकी अंग जब खड़ी होती तो उसे अपने आप से छिपाने और सख्ती को कम करने के प्रयास में बिस्तर के गद्दे से दबाता रहा और इसी दौरान रगड़-रगड़कर स्खलन कर डाला। बिस्तर जब गंदा हो गया तो डर गया और फिर उसी दोस्त से मश्विरा किया जिसने किताबें दी।
दोस्त ने सलाह दी कि कंडोम पहनकर ये काम करे और इसमें कोई आपत्ति नहीं। दोस्त ने कहा यही काम दो हफ़्तों में एक बार करो तो वीर्य निकल जाएगी और टेंशन ख़त्म हो जाएगी। वीर्य को निकालने के लिए किताबें पढ़ो और उत्तेजना पैदा करो। वीर्य निकालने पर रात की स्खलन बंद हो जाएगी।
पूछताछ से पता चला कि चंदर सचमुच सेक्स के विषय में नादान था। उन गंदी किताबों में उसने सिर्फ़ चित्रों वाली किताब पढ़ी थी। मस्तराम की कहानियाँ उसे बहुत ही घिनौना और अश्लील लग रहे थे और इसलिए आज तक उन्हें पूरा नहीं पढ़ा। वाह! मैं इसके बारे में क्या सोच रही थी और यह क्या निकला… और मैं तो इसे कंडोम भी दे दी। और उसके पास कंडोम भी उसके दोस्त के बदौलत पहुँचे।
दोस्त ने कहा था जब स्खलन होने का डर हो तो इन्हें पहन लो… गद्दा या बिस्तर गंदा नहीं होगा। अपनी साड़ी निकाल फेंकी और सिर्फ़ पेटीकोट में बिस्तर पर बैठी और चंदर को भी बिठाई। “अब मैं समझी कि तुम मुझसे दूर हो रहे थे कल की रात को। तुम्हें इन बातों का कोई अनुमान ही नहीं। ख़ैर… अब तो तुम रास्ते पे आ गए… मैं सब कुछ सिखा दूँगी। घबराओ नहीं… मैं तुम्हारी मदद करूँगी” मैंने उसके चेहरे को सहलाती हुई बोली।
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चंदर अब मेरी तरफ़ बे धड़क देखने लगा। सारा शर्म दूर हुआ। अब तो उसे मेरी जिस्म की नग्नावस्था अच्छी लग रही थी। मेरे चुची की ओर प्यासी नज़रों से देख रहा था। मन हल्का हो गया तो बातें उगलने लगा। “मामी… आप से एक सच्ची बात कहूँ… ?” “हाँ बोलो… कुछ भी बोलो… अब हमारे बीच कोई दीवार नहीं… किसी बात का ज़रा भी बुरा नहीं मानूँगी” मैंने प्यार से उसे कहा उसके और उसके हाथ अपने गोल-गोल दूधनियों पर दोबारा लगाई।
“मामी… आप के बारे में मेरे विचार बहुत पहले से ही अश्लील थे!” उसने शर्म से सर झुकाते हुए बोला। इन बातों को सुनते ही मैं अपनी होश खो गई… क्या बोल रहा है ये… सुनने पर यक़ीन ही नहीं हो रहा है… मैंने उसे थोड़ा सा उकसाते हुए बोली… ”अच्छा… .ये तो मैं जानती तक नहीं… पूरी बात कहो… और बेधड़क कहो… मैं बुरा नहीं मानती”।
चंदर थोड़ा नॉर्मल हुआ और खुलके अपने नॉर्मल आवाज़ में बात करने लगा “जब मैं यहाँ नया-नया आया था तो एक दिन आपको कपड़े बदलते देख लिया… आपको ब्रा और पेटीकोट में जब देखा तो वह तस्वीर बार-बार मेरे मन में आ रही थी। मैं जितना भी प्रयास करूँ मन को काबू में कर नहीं पा रहा था। ये कहानी आप हमारी वासना डॉट नेट पर पढ़ रहे है.
आपके ये दोनों (मेरे स्तन की ओर इशारा करते हुए) चीज़ को देखते ही मुझे कुछ हो जाता था… चोरी-छिपे नज़रों से आपके इन दोनों को देखा करता था। निग्रहण की कोशिश करूँ तो रात को सपने में आपके अर्ध नग्न जिस्म देखता और कभी-कभी पूरी नंगी जिस्म। सुबह उठता तो पजामे पर गीलापन पाता।
आपके बारे में सपने देख-देखकर मेरी अंग से नींद में ही निकल जाता ये (अपने पजामे के गीले दाग़ की ओर इशारा करते हुए)। आप मुझसे काफ़ी सेक्सी लग रही थीं… आप के साथ सेक्स करते हुए सपने आने लगे तो और भी बुरा हाल था। पहले काशी रमेश्वर स्वामी के यहाँ गया जो हमारे शहर के माने हुए गुरु जी थे।
उनसे मैंने कह दिया कि उमर में मुझसे काफ़ी बड़ी एक नारी के बारे में अप्राकृतिक विचार आ रहे हैं तो उन्होंने मुझे निग्रहण करने और योग आसन के ज़रिए मन को काबू में लाने की सलाह दी। मगर काम नहीं आया। दोस्तों से भी इस बात का ज़िक्र किया लेकिन उन्हें आप के बारे में कुछ नहीं बोला और सिर्फ़ रात के स्राव के बारे में कहा तो उन्होंने कंडोम और किताब दे दी मुझे।
बस तबसे अपने मन को काबू में लाने की कोशिश कर रहा था। कल रात जब आप मुझे वश में करना चाहा तो मन से काफ़ी कुश्ती लड़ी थी मैंने। जी चाह रहा था कि आपसे लिपट जाऊँ लेकिन गुरु जी की बातें याद आई। उन्होंने अवैध सेक्स और शादी से पहले यौनाचार को घोर पाप बताते हुए मुझे चेतावनी दी कि इस दलदल में न फँसूँ और अपने मन को पूजा-पाठ से पवित्र करूँ।”
बेचारा चंदर… अच्छा-बुरा के चक्कर में पड़कर पीस रहा था आज तक। मैंने तुरंत हालात को अपने काबू में लाना ठीक समझा और उससे बोल पड़ी “देखो चंदर..स्वामी-संन्यास के पास वो लोग जाते जिन्होंने ज़िंदगी देख ली… इन स्वामी-संन्यासों को सेक्स पाप लगता है और स्त्री द्वेषी ब्रह्मचर्य को सही मानते।
इन्हें क्या मालूम सेक्स क्या है। ये हर प्राणी की ज़रूरत है। ये स्वामी लोग भी रात के अंधेरे में संन्यासिनियों और रंडियों के साथ मनचाहा सेक्स करते हैं और दिन में धर्म और नीति की बातें करते। तुम इन सब चीज़ों के बारे में सोचना नहीं”।
“लेकिन मामी… किसी पराए लड़की के साथ सेक्स करना एक बात है… आप तो मेरे रिश्तेदार हैं… ये तो अपवित्र और अप्राकृतिक यौनाचार है। शादीशुदा औरत हैं आप… मेरी माँ समान मामी हैं, उमर में मुझसे बड़ी हैं… इन सब बातों का ख़याल कैसे नहीं करूँ?” चंदर ने बोला।
मैंने तुरंत जवाब दी ” शादीशुदा औरत के साथ सेक्स तब ग़लत है जब वह अपने पति के साथ खुश है। ऐसी औरत को वश में करना बलात्कार कहलाता है और ऐसी औरत का पराए मर्द के साथ सेक्स के लिए राज़ी होना उसकी चीनाड़पन और आवारापन का संकेत है। मेरी कहानी तो अलग है। मैं एक विवश औरत हूँ जिसका पति उसे 19 साल तक छुआ नहीं और कामाग्नि में जलने को छोड़ दिया।
जो शादीशुदा औरत पति से सुख नहीं पाती उसे पूरा हक़ है कि किसी पराए मर्द से सुख पाए। मैं कमज़ात नहीं… एक विवश और पति से वंचित औरत हूँ। मेरी कामाग्नि बुझाना पाप नहीं… एक तरह की सेवा है। फिर रिश्ते क्या हैं… सिर्फ़ मेरे और तुम्हारे मामा के बीच एक-दो घंटों का रिवाज या रस्म है। अगर रस्म को नाता तो मैं तुम्हारे रिश्ते में एक परायी नारी ही हूँ।
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सिर्फ़ रस्म से मैं तुम्हारी मामी नहीं बनी क्योंकि तुम्हारे मामा ने पूरी तरह से मुझे अपनी पत्नी स्वीकारा नहीं। अगर मामा मुझसे नित्य संभोग करते और मुझे एक बच्चे की माँ बनाते तो तब मुझे अपनी पत्नी कहलाते और इस नज़रिए से मैं तुम्हारी माँ समान मामी होती। लेकिन हमारे जिस्म ही जब नहीं मिले तो हम दो अलग-अलग इंसान हैं और मेरा तुम्हारे साथ कोई वास्ता नहीं।
तुम बेधड़क मुझे भोग सकते हो। और आख़िर उमर क्या है… ये कायदे किसने बनाए? जीव-जंतु क्या उमर का लिहाज़ करके सेक्स करते? मैं जवान हूँ तुम भी जवान हो… फिर हमारे शारीरिक मिलन में उमर का क्या काम? इन सब बेकार की बातें भूल जाओ और सिर्फ़ अपनी दिल की बात सुनो… क्या अब मैं तुम्हें उतनी ही सेक्सी और आकर्षक लग रही हूँ?
चंदर पर इन बातों का क्या असर हुआ मुझे मालूम नहीं लेकिन अब देर करना उचित नहीं समझा। “तुम्हारे शीघ्र स्खलन की दवा मेरे पास है..” मैंने उसके हाथ अपने हाथ में लेते हुए कहा। उसके हाथ को पेटीकोट में छिपे अपनी योनि पर रखकर ज़ोर से दबाई और बोल पड़ी “ये है इसकी दवा… रोज़ दो खुराक ले लो तो 3 दिन में माहिर हो जाओगे।
बोलो… दो बार रोज़ करोगे न मेरे साथ… बोलो न… मुझे दो बार रोज़ चोदोगे न? अपने खड़े लंड को मेरी बुर में डाल-डालकर मुझे चोदोगे ना?” मस्तराम की किताबों की गंदी भाषा मेरे होंठ पर कैसे आए मुझे नहीं पता मगर मेरी हालत बिगड़ चुकी थी। चंदर के सामने ब्लाउज़ खोलकर उससे लिपट गई तो सारे मान और मर्यादा के हद पार कर ली और अब इन गंदी बातों से मेरे मन की गहराई में छिपी बेशर्मी और मदमस्ती को बाहर ले आई।
चंदर मेरी इस दबाव से बोल पड़ा… ”हाँ… हाँ… जैसे आप कहें”। चंदर भी मर्यादा की हद पार कर ली लेकिन इतनी जल्दी इतनी अश्लील हालत में अपने आप को पाकर थोड़ा झिझक रहा था। मैंने चंदर को लिटाकर उसके क़रीब जा लेटी और अपनी उन्नत वक्ष दोबारा उसके मुँह से लगाई।
स्तन के निप्पल एकदम कड़े और सख्त थे। “आओ चंदर… मेरे चुचू चूसो… इनका स्वाद चखो” ये कहते ही मैंने एक निप्पल उसके होंठों से लगाई। भूखे बच्चे की तरह चंदर निप्पल को मुँह में ले लिया और चूसने लगा। उसके हाथ मेरे स्तन को मसल रहे थे। इन हरकतों से बड़ा सुकून मिल रहा था मुझे। मैं आँखें मूँद ली और हल्की सी सीत्कारियाँ भरने लगी।
चंदर जैसे भूखे बच्चे की तरह मेरी दोनों चूचियों को बारी-बारी से मुँह में लेकर चूसने लगा। उसकी जीभ मेरे कड़े निप्पलों पर घुम रही थी और दाँत हल्के-हल्के काट रहे थे। मेरे शरीर में करंट सा दौड़ रहा था। मैंने उसका सर पकड़कर अपनी छातियों में और गहराई से दबाया और मादक स्वर में बोली, “हाँ राजा…और चूसो…जोर से चूसो अपनी मामी की चूचियाँ…इन्हें तुम्हारे लिए ही तो इतना बड़ा किया है।”
चंदर की साँसें तेज़ हो गईं। उसने मेरी एक चूची को मुँह से छोड़ा और दूसरी को और ज़ोर से चूसने लगा। उसका एक हाथ मेरी कमर पर था और दूसरा धीरे-धीरे नीचे सरककर मेरी जाँघों के बीच में पहुँच गया। जब उसकी उँगलियाँ मेरी गीली चूत को छुईं तो मैंने झटके से कमर उठाई और कराह उठी, “आह…चंदर…उँगली डालो अंदर…मेरी चूत बहुत प्यासी है।”
उसने दो उँगलियाँ मेरी चूत में डाल दीं और अंदर-बाहर करने लगा। मैं पागलों की तरह तड़पने लगी। मेरी चूत से रस बह रहा था और उसकी उँगलियों को चिकना बना रहा था। मैंने उसे अपने ऊपर खींचा और उसके होंठों को चूमने लगी। हमारी जीभें एक-दूसरे से लड़ रही थीं। मैंने उसका पजामा खींचकर नीचे किया। उसका लंड पहले से ही पत्थर की तरह खड़ा था और नोक से पानी टपक रहा था।
मैंने उसे पकड़कर हिलाने लगी और कान में फुसफुसाई, “राजा…बहुत बड़ा और मोटा है तेरा लंड…मेरी चूत फाड़ देगा आज।” चंदर अब पूरी तरह से उत्तेजित हो चुका था। उसने मेरी टाँगें चौड़ी कीं और अपना लंड मेरी चूत पर रगड़ने लगा। मैंने अधीर होकर कहा, “अब मत तड़पाओ…डाल दो…पूरी तरह डाल दो।”
चंदर ने एक ज़ोरदार धक्का मारा और उसका आधा लंड मेरी चूत में घुस गया। मैंने चीख मारी, “आआह…मर गई…धीरे राजा…बहुत मोटा है।” लेकिन चंदर रुका नहीं। उसने और ज़ोर से धक्का दिया और पूरा लंड मेरी चूत में उतार दिया। मेरी चूत पहली बार इतने मोटे और लंबे लंड से भरी गई थी। मुझे लगा जैसे कोई गर्म लोहा अंदर घुसा हो। ये कहानी आप हमारी वासना डॉट नेट पर पढ़ रहे है.
फिर शुरू हुई असली चुदाई। चंदर तेज़-तेज़ धक्के मारने लगा। हर धक्के पर मेरी छातियाँ उछल रही थीं और मैं सीत्कारियाँ भर रही थी, “हाँ…और ज़ोर से…चोदो अपनी मामी को…फाड़ दो मेरी चूत…आह…राजा…बहुत मज़ा आ रहा है।” चंदर भी अब बोलने लगा, “मामी…आपकी चूत बहुत टाइट और गर्म है…मैं रोज़ चोदूँगा आपको।”
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करीब दस मिनट तेज़ चुदाई के बाद मैं पहली बार झड़ गई। मेरा पूरा शरीर काँप उठा और चूत ने उसके लंड को कसकर पकड़ लिया। लेकिन चंदर अभी नहीं रुका। उसने मुझे कुत्ते की मुद्रा में किया और पीछे से फिर से घुसा दिया। अब वो मेरी गाँड पकड़कर ज़ोर-ज़ोर से धक्के मार रहा था। मैंने तकिए में मुँह दबाकर चीखा, “आह…मर गई…गाँड फट जाएगी…लेकिन मत रुको…चोदते रहो।” उस रात उसने मुझे चार बार चोदा। हर बार नई मुद्रा में। आखिरी बार जब वो मेरी गाँड में झड़ने वाला था तो मैंने उसे रोका नहीं।
वो गरम-गरम वीर्य मेरी गाँड में छोड़कर मेरे ऊपर ढेर हो गया। हम दोनों पसीने से तर थे और हाँफ रहे थे। उसके बाद हम अक्सर मौका देखकर एक-दूसरे को चोदते। कभी स्टडी रूम में, कभी छत पर, कभी रात को जब पति सो जाते। मैं अब उसकी पूरी गुलाम बन चुकी थी। वो मुझे हर तरीके से चोदता – चूत, मुँह, गाँड – सब जगह। और मैं भी उसे पूरा सुख देती। आज भी जब वो आता है तो मैं अपनी जवानी की सारी प्यास बुझाती हूँ। मेरी प्यारी कुमारी बहनों, जीवन में मौके आने पर कभी मत छोड़ना। चाहे रिश्ता कैसा भी हो, अगर दोनों को मज़ा आ रहा हो तो ज़रूर करो।
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