Jija Sali Ka Suhagrat
मध्य प्रदेश की खूबसूरत राजधानी भोपाल को यूँ ही ‘झीलों का शहर’ नहीं कहा जाता। शाम के ढलते ही जब बड़े तालाब (अपर लेक) के शांत पानी को छूकर आने वाली सर्द, नम हवाएं शहर की तंग गलियों और ऊंचे मकानों से गुज़रती हैं, तो फिज़ा में अपने आप एक नशीली रूमानियत और अनकहा सन्नाटा घुल जाता है। यह हवाएं जिस्म को छूती हैं तो एक अजीब सी सिहरन पैदा कर देती हैं। Jija Sali Ka Suhagrat
इसी शहर के एक बेहद शांत और सलीके से सजे हुए पॉश इलाके के मकान में राघव और शिखा अपनी नई-नवेली शादीशुदा जिंदगी के हसीन पल बिता रहे थे। २८ साल का राघव बेहद स्मार्ट, कसरती बदन, चौड़े कंधे और तीखे फीचर्स वाला एक आकर्षक युवा था। वह भोपाल की ही एक बड़ी सॉफ्टवेयर कंपनी में सीनियर इंजीनियर के पद पर था.
स्वभाव से बेहद गंभीर, शांत, कम बोलने वाला और सिर्फ अपने काम से काम रखने वाला मर्यादित मर्द। वहीं उसकी २२ साल की पत्नी शिखा किसी परी जैसी कोमल, बेहद खूबसूरत और एक सुलझी हुई घरेलू महिला थी, जो राघव के इस शांत स्वभाव को अपनी सादगी से पूरा करती थी।
दोनों की ज़िंदगी बिना किसी हलचल के एक ढर्रे पर चल रही थी। लेकिन उनकी इस बेहद शांत और अनुशासित ज़िंदगी की सुस्ती को तोड़कर, एक कामुक उत्साह का तूफ़ान बनकर एंट्री हुई—काव्या की। काव्या महज़ २० वर्ष की थी, लेकिन उसका बदन किसी ढली हुई मूरत जैसा था।
छरहरा और सुडौल बदन, उभरता हुआ हुस्न, तीखे नैन-नक्श और उसकी आँखों में एक ऐसी चंचल, कामुक चमक थी जो किसी भी मर्द के सब्र को पल भर में आज़ाद कर दे। वह हुस्न की एक ऐसी युवा मल्लिका थी जिसे अपनी इस बेबाक जवानी का पूरा अंदाज़ा था।
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काव्या, शिखा की सगी छोटी बहन थी जो भोपाल के ही एक प्रतिष्ठित कॉलेज से एमबीए (MBA) की पढ़ाई करने आई थी। शुरुआत में जब काव्या भोपाल आई, तो शिखा ने उसे किसी हॉस्टल की अनजान और असुरक्षित दुनिया में भेजने के बजाय ज़िद करके अपने ही घर पर रख लिया।
शिखा इस बात से पूरी तरह अनजान थी कि हॉस्टल के खर्चों को बचाने की उसकी यह मासूम सी ज़िद, उसके अपने ही बेडरूम की शांति को एक ऐसे सुलगते हुए तनाव में बदल देगी, जहाँ राघव का गंभीर अनुशासन और काव्या की बेलगाम जवानी एक-दूसरे के आमने-सामने आकर टकराने वाले थे।
काव्या के आने के बाद से, उस घर की हवाओं में अब बड़े तालाब की ठंडक के साथ-साथ, एक कसी हुई झिझक, छुपकर देखी जाने वाली नज़रों और कशमकश की एक नई, गर्म महक घुलने लगी थी… काव्या के कदम क्या पड़े, उस अनुशासित घर का कोना-कोना जैसे किसी मादक खुशबू से खिलखिला उठा।
वह जितनी पढ़ाई में तेज़ थी, उतनी ही हाज़िर जवाब, बेबाक और नटखट थी। उसकी हर अदा में २० साल की अल्हड़ जवानी का वो नशा था जो न चाहते हुए भी ध्यान खींच लेता था। एक शनिवार की खुशनुमा सुबह, भोपाल की ठंडी हवा खिड़की के पर्दों को हिला रही थी।
राघव लिविंग रूम के सोफे पर बैठा लैपटॉप पर ऑफिस का कुछ ज़रूरी काम कर रहा था। तभी काव्या पैर पटकती हुई आई। उसने एक बेहद छोटा शॉर्ट्स और स्लीवलेस टॉप पहन रखा था, जिसमें से उसके गोरे, सुडौल पैर और छरहरी कमर साफ नुमायां हो रहे थे।
उसने अपने हाथ में कॉलेज की फाइल ले रखी थी और सीधे आकर राघव के लैपटॉप के आगे अपनी फाइल अड़ा दी। वह राघव के इतने करीब झुक गई कि उसके खुले हुए घने बाल राघव के गालों को छूने लगे और उसके बदन से उठती मखमली स्ट्रॉबेरी परफ्यूम की तीखी खुशबू सीधे राघव के नथुनों में समा गई। ये कहानी आप हमारी वासना डॉट नेट पर पढ़ रहे है.
“जीजा जी! ज़रा इस बेजान कंप्यूटर से अपनी ये कातिल नज़रें हटाइए और मेरी इस उलझन को सुलझाइए। ये इकोनॉमिक्स का ग्राफ मेरे सिर के ऊपर से जा रहा है,” काव्या ने अपने गुलाबी होंठों का एक बेहद कामुक पाउट बनाते हुए कहा। उसकी आँखें राघव के चेहरे पर टिकी थीं।
राघव ने अचानक हुई इस नज़दीकी से असहज होते हुए अपनी सांसों को संभाला और मुस्कुराकर अपना चश्मा उतारा, “काव्या, मैं सॉफ्टवेयर इंजीनियर हूँ, इकोनॉमिक्स का प्रोफेसर नहीं। और वैसे भी, सैटरडे को तो कम से कम मुझे बख्श दिया करो। अपनी दीदी से पूछो।”
तभी शिखा रसोई से गरमा-गरम पोहा और अदरक वाली चाय की ट्रे लेकर लिविंग रूम में आई, “क्या हुआ काव्या? सुबह-सुबह जीजाजी के सिर पर सवार होकर उन्हें तंग करना शुरू कर दिया?” “अरे दीदी, तुम तो चुप ही रहो। तुम्हारे इन सीधे-साधे जीजाजी को सिर्फ कंप्यूटर की कोडिंग आती है, अपनी इतनी हॉट और प्यारी साली की मदद करना नहीं,” काव्या ने राघव की तरफ देखकर एक शरारती आँख मारते हुए चिढ़ाया।
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उसने बिना किसी झिझक के राघव के लिए रखी हुई चाय का कप खुद अपने नाजुक हाथों से उठाया और राघव के देखते-देखते उसी कप से, जहाँ राघव के होंठ लगने थे, सीधे एक गहरा घूंट मार लिया। मानो उसने अनजाने में ही राघव को एक ‘अप्रत्यक्ष चुंबन’ दे दिया हो।
चाय का स्वाद लेते हुए उसने अपनी जीभ बाहर निकालकर होंठों पर फेरी और बोली, “वाह दीदी! पोहा तो लाजवाब है, लेकिन जीजाजी की चाय में चीनी थोड़ी कम है… शायद इसीलिए इनका मिजाज भी थोड़ा फीका और सूखा-सूखा रहता है। इन्हें थोड़े रोमांस की ज़रूरत है।”
काव्या की इस बेबाक और रसीली बात पर राघव का दिल ज़ोर से धड़क उठा, पर उसने खुद को संभालते हुए हंस दिया, “अच्छा जी! मेरी चाय फीकी है और मेरा मिजाज सूखा है? रुको, तुम्हारी दीदी से कहकर आज तुम्हारी शाम की वो गोलगप्पों और चाट की ट्रिप ही कैंसिल करवाता हूँ। फिर देखना तुम्हारी चीनी कहाँ जाती है।”
“अरे नहीं-नहीं मेरे प्यारे जीजाजी! आप तो दुनिया के सबसे बेस्ट, सबसे हैंडसम और सबसे कड़क जीजाजी हो… भला साली से ऐसा बदला कोई लेता है?” काव्या ने तुरंत अपने दोनों कान पकड़े और राघव के कंधे पर अपना सिर टिकाते हुए उसे मक्खन लगाना शुरू कर दिया।
जब उसका सुडौल बदन राघव के कसरती कंधे से रगड़ाया, तो राघव के पूरे शरीर में एक करंट सा दौड़ गया। उसकी छाती के कड़े निप्पलों का हल्का सा दबाव राघव को अपनी बांह पर महसूस हुआ। घर का यह हल्का-फुल्का और चुलबुला माहौल राघव और शिखा दोनों को बहुत पसंद था।
राघव अपनी मर्यादा में रहकर काव्या को अपनी ‘आधी घरवाली’ की तरह ही लाड-प्यार करता था, और काव्या भी अपने इस हैंडसम जीजाजी को भीतर ही भीतर बहुत पसंद करती थी। वह उनकी टांग खींचने और उनके करीब आने का कोई भी बहाना नहीं छोड़ती थी।
लेकिन उस सुबह, चाय के उस जूठे कप और कंधे की उस अनचाही छुअन ने राघव के मन में एक ऐसी अनकही तड़प और हवस का छोटा सा बीज बो दिया था, जो धीरे-धीरे मर्यादा की हर दीवार को ढहाने के लिए तैयार हो रहा था… कहते हैं कि इंसान अपनी बंद आँखों से भविष्य के हसीन ख्वाब बुनता है, लेकिन किस्मत की स्याही उसकी डायरी में कुछ और ही खौफनाक मंज़र लिख रही होती है।
वह राघव और शिखा की शादी की दूसरी सालगिरह का खूबसूरत दिन था। शाम के वक्त भोपाल की ठंडी हवाओं के बीच दोनों एक आलीशान रेस्टोरेंट में डिनर के लिए निकले थे। काव्या की अंतिम परीक्षाएं नज़दीक थीं, इसलिए उसने दीदी-जीजू को अकेले वक्त बिताने का मौका दिया और खुद घर पर ही रुककर पढ़ाई करने लगी।
रात के करीब दस बजे, नियति ने अपना क्रूर खेल खेला। हाईवे पर राघव की कार को सामने से आ रहे एक अनियंत्रित, तेज़ रफ्तार ट्रक ने सीधी और जोरदार टक्कर मार दी। वह हादसा इतना भयानक था कि धातु के उस मलबे में शिखा की मौके पर ही मौत हो गई, जबकि राघव को गंभीर चोटें आईं। ये कहानी आप हमारी वासना डॉट नेट पर पढ़ रहे है.
जब यह मनहूस खबर घर पहुँची, तो काव्या के पैरों तले से मानो ज़मीन ही खिसक गई। उसकी अपनी सगी दीदी—जो उसकी बड़ी बहन कम और माँ ज़्यादा थी—उसे इस मतलबी दुनिया में हमेशा के लिए तन्हा छोड़कर जा चुकी थी। अस्पताल से कुछ दिनों बाद जब राघव डिस्चार्ज होकर घर लौटा, तो वह एक ज़िंदा लाश बन चुका था।
उसकी चौड़ी छाती और मर्दाना रौब जैसे गायब हो चुके थे। दर्द इतना गहरा था कि उसकी आँखों से आँसू भी नहीं निकल रहे थे; वह बस पथराई आँखों से दीवार पर टंगी शिखा की हंसती हुई तस्वीरों को घंटों एकटक देखता रहता। उस चहकते हुए घर की रौनक और खुशबू हमेशा के लिए दफन हो चुकी थी।
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काव्या ने अपने भीतर उमड़ते आँसुओं के समंदर को अंदर ही दबा लिया, क्योंकि वह अच्छी तरह जानती थी कि अगर वह भी इस मोड़ पर टूट गई, तो राघव को इस गहरे डिप्रेशन से कौन निकालेगा। काव्या ने अपनी पढ़ाई के साथ-साथ अब घर की पूरी कमान संभाल ली।
वह रोज़ सुबह जल्दी उठती, राघव के लिए चाय बनाती और उसकी दवाइयों का वक्त पर ध्यान रखती। वह राघव के उस सूनेपन को दूर करने के लिए पुरानी बातें याद दिलाती, लेकिन राघव बस शून्य में ताकते हुए चुपचाप सिर हिला देता। एक सुबह, रसोई से पोहे की वही चिर-परिचित खुशबू उठी जो कभी शिखा के हाथों से आया करती थी।
काव्या ट्रे लेकर राघव के कमरे में आई। उसने बेहद धीमी और भर्राई हुई आवाज़ में कहा, “जीजाजी… देखिए, आज मैंने बिल्कुल दीदी जैसा पोहा बनाया है। आपकी पसंद की राई और मूंगफली भी डाली है। मेरे कहने से सिर्फ एक चम्मच खाकर तो देखिए।”
राघव ने धीरे से अपना सिर उठाया और काव्या की तरफ देखा। काव्या का वह २० साल का छरहरा बदन अब घर की जिम्मेदारियों के नीचे थोड़ा थक चुका था, उसकी खूबसूरत आँखें रोने के कारण सूजी हुई थीं, लेकिन उन आँखों में राघव के लिए जो बेइंतहा परवाह और समर्पण था, वह साफ़ दिख रहा था।
राघव ने काव्या के कांपते हाथों से प्लेट ली और जैसे ही पहला निवाला मुँह में रखा, उसके सब्र का बांध टूट गया। उसकी पथराई आँखों से गरम-गरम आँसू गालों पर बह निकले। यह शिखा की मौत के बाद पहली बार था जब राघव फूट-फूटकर रोया था। काव्या से उसका यह रोना देखा नहीं गया।
उसने अपनी मर्यादा भूलकर आगे बढ़कर राघव के तने हुए, कांपते कंधे पर अपना हाथ रख दिया। जैसे ही काव्या की उंगलियों की गर्माहट राघव के बदन को छुई, राघव ने खुद को रोक नहीं पाया और उसने काव्या को अपनी बाहों में भींच लिया। दोनों एक-दूसरे से लिपटकर कमरे के उस सन्नाटे में रो पड़े।
उस सुबह, दोनों के आंसुओं ने उनके भीतर के पुराने संकोच को थोड़ा कम कर दिया था। धीरे-धीरे समय का पहिया आगे बढ़ता गया। इस हादसे को पूरा एक साल बीत चुका था। राघव अब थोड़ा सामान्य हो चुका था, लेकिन उसकी ज़िंदगी में औरत की कमी और अकेलापन साफ़ झलकता था।
उधर काव्या की पढ़ाई पूरी हो चुकी थी और वह भी अब एक सयानी, मुकम्मल औरत के रूप में ढल चुकी थी। तभी एक शाम, दोनों परिवारों के बुजुर्गों ने मिलकर हवेली के आँगन में एक गंभीर बैठक बुलाई। राघव की तन्हाई और काव्या के भविष्य को देखते हुए बड़ों ने एक ऐसा फैसला लेने का मन बनाया, जिसने दोनों के बीच के उस सुप्त पड़े आकर्षण और मर्यादा के द्वंद्व को फिर से जगाने का इशारा कर दिया था…
ड्राइंग रूम का माहौल बेहद भारी और दमघोंटू हो चुका था। खिड़की से आती भोपाल की शाम की हवा भी जैसे थम सी गई थी। शिखा के बूढ़े माता-पिता ने कांपते हाथों से राघव के आगे अपनी झोली फैला दी। बाबूजी की आँखों से बहते आँसू उनके सफेद पड़ चुके गालों को भिगो रहे थे।
उन्होंने हाथ जोड़कर रुंधे हुए गले से कहा, “राघव बेटा… हमारी शिखा तो हमें बीच मझधार में छोड़कर चली गई, लेकिन हमारी काव्या का पूरा भविष्य और तुम्हारा यह जानलेवा अकेलापन… हम अपनी आँखों से अब और नहीं देख सकते। हम चाहते हैं कि काव्या तुम्हारी पत्नी बनकर इस सूने घर को फिर से संभाले और शिखा के छोड़े हुए उजाड़ आँगन को आबाद करे।” ये कहानी आप हमारी वासना डॉट नेट पर पढ़ रहे है.
यह सुनते ही राघव जैसे पैर से लेकर सिर तक कांप उठा। उसने झटके से अपनी नज़रें झुका लीं और बेहद सख्त लेकिन रुंधे हुए लहजे में साफ मना कर दिया, “नहीं बाबूजी… यह अनर्थ मुझसे नहीं होगा। काव्या मेरी साली है, शिखा के रहते मैंने उसे हमेशा एक बच्ची की तरह लाड-प्यार दिया है। मैं अपने दिल में शिखा की पवित्र जगह किसी और दूसरी औरत को कभी नहीं दे सकता, काव्या को तो बिल्कुल नहीं।”
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उधर अपने कमरे के दरवाजे के पीछे खड़ी काव्या के सीने में भी एक तूफ़ान उठ रहा था। वह भी इस रिश्ते के लिए किसी भी कीमत पर तैयार नहीं थी। उसका २३ साल का जवान मन चीख-चीखकर कह रहा था कि दीदी के जाने के बाद उनके ही पति के बिस्तर पर बैठना, अपनी उस स्वर्गीय दीदी की आत्मा के साथ सबसे बड़ा धोखा होगा।
राघव का कसरती बदन उसे आकर्षित ज़रूर करता था, पर दीदी का साया एक अभेद्य दीवार बनकर खड़ा था। लेकिन किस्मत अपना खेल तय कर चुकी थी। अगले कुछ दिनों में काव्या की माँ की तबीयत इस कदर बिगड़ी कि वे अस्पताल के आईसीयू (ICU) तक पहुँच गईं।
बुजुर्गों के गिरते स्वास्थ्य, समाज के तीखे तानों और परिवार की इज्जत के भारी दबाव के आगे आखिरकार राघव की मर्दानगी और काव्या की ज़िद, दोनों को घुटने टेकने ही पड़े। एक बेहद सादे, शांत और गिने-चुने लोगों की मौजूदगी वाले मंदिर के समारोह में राघव ने भारी मन से काव्या की मांग में सिंदूर भर दिया।
जब राघव की गर्म उंगलियाँ काव्या के माथे से छुईं, तो काव्या के पूरे बदन में एक सिहरन दौड़ गई। अग्नि के सात फेरे पूरे हो चुके थे। शाम ढल चुकी थी और दोनों एक बार फिर उसी भोपाल वाले मकान में लौट आए थे। लेकिन आज रात का माहौल अलग था। वह घर जिसे काव्या अब तक अपनी दीदी-जीजू का आशियाना समझती थी, आज उसी घर का मुख्य बेडरूम उसकी ‘सुहागरात’ का गवाह बनने जा रहा था।
राघव अपने कड़े नाइटसूट में और काव्या अपनी शादी की रेशमी लाल साड़ी के घूंघट में, एक-दूसरे के आमने-सामने आने वाले थे। दोनों के दिलों में झिझक, तड़प और वासना की एक ऐसी दबी हुई आग सुलग रही थी, जो मर्यादा की आखिरी कसमों को भस्म करने के लिए बेताब थी…
शादी के बाद की वह पहली भारी रात। राघव आज भी शिखा के उसी पुराने बेडरूम में बैठा था। आज उस कमरे की सजावट थोड़ी अलग थी, बेड पर ताज़ा चमेली के फूलों की चादर बिछी थी, लेकिन हवा में यादों की वही पुरानी महक थी। तभी काव्या लाल रेशमी जोड़े में घूंघट निकाले धीरे-धीरे कमरे के अंदर आई।
उसके हर कदम के साथ उसकी सोने की चूड़ियों की जो खनक गूँज रही थी, आज उसमें वह पुराना चुलबुलापन नहीं था, बल्कि एक अजीब सी कसी हुई हिचकिचाहट, डर और जवानी का भारीपन था। वह कमरे के दरवाज़े के पास ही थमी खड़ी रही, जैसे अंदर आने की अनुमति माँग रही हो।
राघव अपने कड़े सिल्क के कुर्ते में बेड से उठा और हौले-हौले चलकर उसके बिल्कुल करीब आ गया। दोनों एक-दूसरे की तरफ देख रहे थे, लेकिन दोनों की निगाहों के बीच ‘जीजा-साली’ का वो पुराना, पवित्र रिश्ता एक आख़िरी बार अपनी साँसें ले रहा था, जो अब ‘पति-पत्नी’ के एक बेहद कामुक और गहरे रिश्ते में बदलने के लिए बेताब था।
“काव्या…” राघव ने अपनी भारी, मर्दानी आवाज़ को थोड़ा धीमा करते हुए कहा, “तुम वहाँ दरवाज़े के पास सहमी हुई क्यों खड़ी हो? यह तुम्हारा ही घर है… और अब यह कमरा भी तुम्हारा ही है।”
“जीजाजी… मेरा मतलब है… मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा कि मैं कहाँ बैठूं, क्या करूँ,” काव्या ने अपनी नज़रें नीचे झुकाते हुए कहा। लाल बनारसी साड़ी के भारी ब्लाउज़ के अंदर उसकी सुडौल छाती डर और उत्तेजना के मारे तेज़ी से ऊपर-नीचे हो रही थी। उसकी आवाज़ से वो पुरानी साली वाली बेबाकी गायब थी, और उसकी जगह एक मुकम्मल औरत की लज्जा ने ले ली थी।
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राघव ने अपने चौड़े सीने को सिकोड़ते हुए एक गहरी सांस ली, “मैं सब समझता हूँ काव्या। तुम्हारे लिए मुझे अपने ‘जीजाजी’ के रूप से हटाकर एक ‘पति’ के रूप में स्वीकार करना इतना आसान नहीं है। और मेरे लिए भी यह रात एक बहुत बड़ी परीक्षा है। तुम बेझिझक इस बेड पर सो जाओ, मैं आज रात इस सोफे पर तकिया लगा लेता हूँ। हम इस पवित्र रिश्ते में खुद पर कोई दबाव नहीं बनाएंगे।”
इतना कहकर जैसे ही राघव सोफे की तरफ बढ़ने लगा, काव्या के मन में एक तीखी कसक उठी। उसने देखा कि राघव का कुर्ता पीछे से कंधे के पास थोड़ा मुड़ा हुआ था, बिल्कुल वैसे ही जैसे वह अक्सर ऑफिस से थके-हारे आते वक्त मोड़कर रखता था और शिखा हमेशा डांटते हुए उसे ठीक करती थी। ये कहानी आप हमारी वासना डॉट नेट पर पढ़ रहे है.
उस एक पल ने काव्या के भीतर की बची-कुची झिझक को हमेशा के लिए भस्म कर दिया। उसका २० साल का सुडौल और कामुक बदन अब अपने इस हैंडसम पति की बाहों में टूटने के लिए मचल उठा। उसने बिना एक पल गंवाए आगे बढ़कर अपनी रेशमी, गोरी उंगलियों से राघव का मजबूत हाथ पीछे से पकड़ लिया, “नहीं… आज की रात आप इस ठंडे सोफे पर अकेले नहीं सोएंगे।”
राघव चौंककर पीछे घूमा। काव्या ने अपनी घनी पलकों को उठाकर सीधे राघव की सुलगती हुई आँखों में देखा। इस बार उसकी आँखों में कोई डर नहीं था, बल्कि एक अजीब सा दृढ़ कामुक संकल्प और अधिकार था। वह राघव का हाथ थामे हुए उसे वापस उस फूलों से सजे बेड की तरफ ले गई।
दोनों बेड के किनारे एक-दूसरे के बिल्कुल सटकर बैठ गए। कमरे में केवल एक नाइट लैंप जल रहा था, जिसकी मद्धम पीली रोशनी काव्या के गोरे चेहरे, उसकी सुराहीदार गर्दन और उसकी लाल साड़ी के कर्व्स को और भी अधिक भड़काऊ व कामुक बना रही थी।
“जीजाजी… क्या हम दोनों अपनी पूरी जिंदगी इसी संकोच और तड़प के सन्नाटे में जिएंगे?” काव्या ने धीरे से राघव की कसरती हथेली पर अपना नाजुक हाथ रखते हुए बेहद भारी और मादक आवाज़ में पूछा, “दीदी जहाँ भी होगी, वह अपनी इस छोटी बहन को.
और अपने इस हैंडसम पति को इस तरह अजनबियों की तरह एक ही छत के नीचे तड़पते हुए कभी नहीं देखना चाहेगी। मुझे आपके अतीत से, दीदी की यादों से कोई शिकायत नहीं है… लेकिन क्या आप मेरे इस सुलगते हुए वर्तमान को, अपनी इस नई नवेली बीवी को अपनी बाहों में स्वीकार नहीं करेंगे?”
काव्या के इन जोशीले और परिपक्व शब्दों में एक ऐसा तीखा आकर्षण था जिसने राघव के दिल और जिस्म की मर्दानगी को एक साथ झकझोर दिया। राघव ने काव्या के उस खूबसूरत चेहरे को देखा, जो इस समय डर, हवस और उम्मीद के मिले-जुले मिश्रण से एकदम लाल हो रहा था। उसके लाल होंठ वाइन की तरह मीठे लग रहे थे।
“काव्या… तुम सचमुच बहुत समझदार हो। मुझे तो बस इस बात का डर था कि कहीं शिखा की यादों के चक्कर में, मैं तुम्हारी इस खिलती हुई जवानी के साथ कोई नाइंसाफी न कर बैठूं,” राघव ने भावुक होते हुए कहा। उसने अपना हाथ आगे बढ़ाया और काव्या के घूंघट को धीरे से पीछे सरका दिया।
जैसे ही राघव की गर्म उंगलियाँ काव्या के गोरे गालों और कानों के पास छुईं, काव्या के मुँह से एक हल्की सी, रसीली आह निकल गई… राघव की सुलगती आँखों में अब अपनी इस नई-नवेली बीवी के लिए एक अजीब सी, भूखी और कटीली मर्दानी नज़र उभर आई थी। काव्या ने उसकी आँखों की उस तड़प को भाँप लिया।
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उसने अपनी मदहोश आवाज़ में कहा, “जीजू… आज इस बिस्तर पर अपनी दीदी की हर कमी को मैं हमेशा के लिए दूर कर दूँगी। आज से आपका यह बदन सिर्फ मेरा है।” इतना कहते ही काव्या ने अपनी बनारसी साड़ी का पल्लू पूरी तरह गिरा दिया और बेड के फूलों पर चित लेट गई।
उसने आगे बढ़कर राघव के चौड़े कसरती कंधों को अपनी गोरी बाहों में कसकर भींच लिया और उसकी छाती को अपने भरे हुए सीने से सटाकर दबा लिया। इस मदमस्त छुअन के बाद तो जैसे कमरे के भीतर सब कुछ अपने आप होने लगा। राघव का जो इंजन पिछले एक साल से शिखा की मौत के गम में पूरी तरह बंद पड़ा था, आज काव्या की जवानी के पेट्रोल ने उसमें फिर से आग लगा दी थी।
राघव ने बिना एक पल गंवाए काव्या को नीचे दबाया और खुद शेर की तरह उसके ऊपर आ गया। उसने सीधे झुककर काव्या के रसीले, कत्थई होंठों को अपने मुँह में भरा और पागलों की तरह चूसने लगा। काव्या ने भी अपनी जीभ उसके मुँह में डालकर उसका साथ दिया।
चूमते-चूमत राघव के हाथ काव्या के लहंगे की डोरी और चोली के हुक पर पहुँच गए। उसने एक-एक करके उसके ऊपर के सारे कपड़े बदन से अलग कर दिए। अब काव्या लाल रंग के लहंगे और चोली से मैच करती हुई एक बेहद कसी और सिडक्टिव लाल नेट की ब्रा में लेटी थी, जिसमें से उसका गोरा बदन और जवानी पूरी तरह छलक रही थी।
काव्या के ३4 इंच के पुष्ट, रसीले और कड़े स्तन उस लाल ब्रा को फाड़कर बाहर आने को मचल रहे थे। जैसे ही राघव ने अपनी भारी हथेलियों को उन बड़े-बड़े स्तनों पर रखा और उन्हें ब्रा के ऊपर से ही बेरहमी से भींचना शुरू किया, तो काव्या उत्तेजना के मारे अपनी आँखें भींचकर बेड की चादर को उंगलियों में समेटने लगी। ये कहानी आप हमारी वासना डॉट नेट पर पढ़ रहे है.
उसके मुँह से सेक्सी सिसकारियां गूँज उठीं—“……अई…अई….अई……अई….इसस्स्स्स्स्स्स्स्…….उहह्ह्ह्ह…..ओह्ह्ह्हह्ह… जीजू!” कुछ देर तक राघव ऊपर से ही उन कड़े और मांसल गोलों का मज़ा लेता रहा। फिर उससे रहा नहीं गया, उसने अपना मुँह नीचे झुकाया और काव्या के एक बड़े स्तन को ब्रा के कपड़े समेत पूरा अपने मुँह में भर लिया और ज़ोर-ज़ोर से खींचकर चूसने लगा।
कमरे का समां अब पूरी तरह गर्म और वासना से सराबोर हो चुका था। काव्या का बदन इस कदर सुलग उठा कि उसने खुद अपने ही नाजुक हाथों से अपनी ब्रा का पीछे का हुक खोलकर उसे फेंक दिया। ब्रा के हटते ही उसके दोनों नंगे, मखमली और चमचमाते हुए ३४ इंच के मस्त-मस्त स्तन आज़ाद होकर बाहर आ गिरे।
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काव्या ने अपनी दोनों हथेलियों से अपने उन उभरे हुए स्तनों को पकड़ा और उन्हें हिला-हिलाकर अपने हैंडसम जीजू के मुँह के आगे अड़ाने लगी, ताकि उनका मूड और ज़्यादा कड़क हो जाए। उसने राघव की आँखों में अपनी कामुक आँखें डालीं और चढ़ती हुई आवाज़ में कहा, “क्यों मेरे प्यारे जीजू!! क्या अब भी अपनी स्वर्गीय बीवी की याद में देवदास बने रहोगे या आज रात अपनी इस जवान साली के साथ ज़िंदगी का असली मज़ा लूटोगे??”
काव्या का अपने तने हुए चूचकों को इस तरह हाथ से हिला-हिलाकर दिखाना राघव के पुरुषत्व को ललकार गया। राघव का पारा सातवें आसमान पर पहुँच गया और उसकी रगों का खून खौल उठा। उसने झटके से बेड पर खड़े होकर अपने नाइटसूट का कुर्ता और पैंट उतारकर फेंक दिया और सिर्फ जोकी (Jockey) की एक कसी हुई फ्रेंच अंडरवियर में आ गया।
उस पतली चड्डी के भीतर से राघव का ९ इंच का कड़ा, लंबा लंड और उसके भारी आंड पूरी तरह उभरकर काव्या की आँखों के ठीक सामने आ चुके थे। मूसल की वह कड़क मोटाई देखकर काव्या की साँसें भी थम गईं। “काव्या… सच कह रही है तू! आज तेरी यह कातिल जवानी ही मुझे पूरी तरह ठीक कर सकती है!!!”
राघव ने हांफते हुए कहा और भूखे भेड़िये की तरह दोबारा काव्या के ऊपर चढ़ गया। उसने काव्या के दोनों मदमस्त चूचकों को अपनी मजबूत हथेलियों में दबोचा और उन्हें बेरहमी से मसलने लगा। काव्या मारे सुख और दर्द के बिस्तर पर तड़प उठी—“अई…..अई….अई… अहह्ह्ह्हह…..सी सी सी सी….हा हा हा… ज़ोर से जीजू… और ज़ोर से भींचो!”
राघव पागलों की तरह अपनी उंगलियों से उसके स्तनों को हिला-हिलाकर उनके भारी साइज़ और कड़ेपन का अंदाज़ा लेने लगा। वह पूरी तरह से चुदासा और दीवाना हो चुका था। काव्या का रंग दूध जैसा गोरा था, जिस वजह से उसके स्तनों के निप्पल गुलाबी और बेहद सम्मोहक दिख रहे थे।
राघव ने अब अपने दाहिने हाथ से उसके एक स्तन को कसकर दबाया और अपना मुँह सीधे उसके बाएँ स्तन के गुलाबी निप्पल पर लगा दिया। वह उसे अपने हलक के अंदर खींचकर किसी भूखे बच्चे की तरह चूसने और दांतों से हल्का-हल्का काटने लगा।
काव्या इस दोहरे वार से आनंद के समंदर में डूब गई और उसकी कमर बेड से ऊपर उठने लगी—”सी सी …..आह आह ऊ ऊ… जीजू… मज़ा आ गया!” पर राघव अब रुकने वाला नहीं था; वह बिना थमे लगातार उसके स्तनों का रस चूसता चला गया। इस तीखे घर्षण और चूसने की ‘लप-लप’ आवाज़ों से काव्या का पूरा जिस्म भीतर तक आग की भट्टी की तरह गर्म हो चुका था। ये कहानी आप हमारी वासना डॉट नेट पर पढ़ रहे है.
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उसकी जाँघों के बीच छिपी हुई रसीली, साफ़ और पूरी तरह से सफाचट (Shaved) चूत अब पानी छोड़ने लगी थी और वह अंदर ही अंदर राघव के उस ९ इंच के लोहे जैसे कड़े लंड की ज़बरदस्त डिमांड करने लगी थी… कमरे के भीतर की हवा अब पूरी तरह से हवस और वासना के भारी दबाव से सुलग उठी थी। काव्या का २० साल का कुँआरा बदन राघव के मुँह के तीखे वैक्यूम के नीचे पूरी तरह बेकाबू हो चुका था। वह बेड की चादर को अपनी उंगलियों में भींचती हुई किसी बेशर्म, मदहोश कामुक अप्सरा की तरह ज़ोर-ज़ोर से बड़बड़ाने लगी,
“चूसो!! जीजा जी!! You are so sexy! और बेरहमी से चूसो मेरे इन रसीले आमों को!!” राघव काव्या के बूब्स जोर जोर से चूसने लगा, उसने १० मिनट तक लगातार चूसा. फिर उसने काव्या को झुका कर घोड़ी बना दिया और अपने लंड पर थूक लगा कर अपना लंड अपनी साली की चूत के मुंह पर रखा. काव्या बोली पेल दो जीजा अब और मत तडपाओ आपकी साली आपका लंड लेना चाहती है पेल दो अपनी रंडी को. राघव ने जोरदार झटका मार कर पूरा लंड चूत में उतर दिया और 25 मिनट तक चोदता रहा.
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