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दीदी ने भाई से ब्रा का हुक लगवाया

अप्रैल 22, 2026 by hamari Leave a Comment

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ये मेरी कहानी है। मेरा नाम शशांक है और मैं 20 साल का एक युवक हूँ। मेरी दीदी का नाम दीक्षा है और उसकी उम्र करीब 26 साल है। दीदी मुझसे 6 साल बड़ी हैं। हम लोग एक मिडिल-क्लास फैमिली हैं और एक छोटे से फ्लैट में मुंबई में रहते हैं। हमारे घर में एक छोटा सा हॉल, डाइनिंग रूम, दो बेडरूम और एक किचन है। बाथरूम एक ही था और उसको सभी लोग इस्तेमाल करते थे। हमारे पिताजी और माँ दोनों नौकरी करते हैं। दीदी मुझे प्यार से सोनू बुलाती है. Hot Didi Sexy Bra Porn

शुरू-शुरू में मुझे सेक्स के बारे में कुछ नहीं मालूम था क्योंकि मैं बॉयज़ हाई स्कूल में पढ़ता था और हमारे बिल्डिंग में भी अच्छी मेरी उम्र की कोई लड़की नहीं थी। इसलिए मैंने अभी तक सेक्स का मजा नहीं लिया था और न ही मैंने कभी कोई नंगी लड़की देखी थी। हाँ, मैं कभी-कभी पोर्नो मैगजीन में नंगी तस्वीरें देख लिया करता था।

जब मैं चौदह साल का हुआ तो मुझे लड़कियों की तरफ और सेक्स के लिए इंटरेस्ट होना शुरू हुआ। मेरे नजरों के आसपास अगर कोई लड़की थी तो वो दीक्षा दीदी ही थी। दीदी की लंबाई करीब-करीब मेरे तरह ही थी, उनका रंग बहुत गोरा था और उनका चेहरा और बॉडी स्ट्रक्चर हिंदी सिनेमा की तम्मना भाटिया जैसा था। हाँ, उनकी चूचियाँ तम्मना भाटिया जैसी बड़ी-बड़ी नहीं थीं।

मुझे अभी तक याद है कि मैं अपना पहला मुठ मेरी दीदी के लिए ही मारा था। एक संडे सुबह-सुबह जैसे ही मेरी दीदी बाथरूम से निकली मैं बाथरूम में घुस गया। मैं बाथरूम का दरवाजा बंद किया और अपने कपड़े खोलना शुरू किया। मुझे जोर की पेशाब लगी थी। पेशाब करने के बाद मैं अपने लंड से खेलने लगा।

एकाएक मेरी नजर बाथरूम के किनारे दीदी के उतारे हुए कपड़ों पर पड़ी। वहाँ पर दीदी ने अपनी नाइटगाउन उतारकर छोड़ गई थी। जैसे ही मैंने दीदी की नाइटगाउन उठाई तो देखा कि नाइटगाउन के नीचे दीदी की ब्लैक ब्रा पड़ी हुई थी। जैसे ही मैंने दीदी का काले रंग का ब्रा उठाया तो मेरा लंड अपने आप खड़ा होने लगा।

मैंने दीदी की नाइटगाउन उठाई तो उसमें से दीदी के नीले रंग का पैंटी भी गिरकर नीचे गिर गया। मैंने पैंटी भी उठा लिया। अब मेरे एक हाथ में दीदी की पैंटी थी और दूसरे हाथ में दीदी का ब्रा था। ओह भगवान! दीदी के अंदर वाले कपड़े छूने से ही कितना मजा आ रहा है।

ये वोही ब्रा है जो कि कुछ देर पहले दीदी की चूचियों को जकड़ रखा था और ये वोही पैंटी है जो कि कुछ देर पहले तक दीदी की चूत से लिपटा था। ये सोच-सोचकर मैं हैरान हो रहा था और अंदर ही अंदर गर्म हो रहा था। मैं सोच नहीं पा रहा था कि मैं दीदी के ब्रा और पैंटी को लेकर क्या करूँ।

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मैं दीदी के ब्रा और पैंटी को लेकर हर तरफ से छुआ, सूँघा, चाटा और पता नहीं क्या-क्या किया। मैं उन कपड़ों को अपने लंड पर मला। ब्रा को अपनी छाती पर रखा। मैंने अपने खड़े लंड के ऊपर दीदी की पैंटी को पहना और वो लंड के ऊपर तना हुआ था। फिर बाद में मैं दीदी की नाइटगाउन को बाथरूम की दीवार के पास एक हैंगर पर टाँग दिया।

फिर कपड़े टाँगने वाला पिन लेकर ब्रा को नाइटगाउन के ऊपरी भाग में फँसा दिया और पैंटी को नाइटगाउन के कमर के पास फँसा दिया। अब ऐसा लग रहा था कि दीदी बाथरूम में दीवार के सहारे खड़ी हैं और मुझे अपनी ब्रा और पैंटी दिख रही हैं। मैं झट से जा कर दीदी की नाइटगाउन से चिपक गया और उनकी ब्रा को चूसने लगा और मन ही मन सोचने लगा कि मैं दीदी की चूचियाँ चूस रहा हूँ।

मैं अपना लंड को दीदी की पैंटी के पास रगड़ने लगा और सोचने लगा कि मैं दीदी को चोद रहा हूँ। मैं इतना गर्म हो गया था कि मेरा लंड फूलकर पूरा का पूरा तन गया था और थोड़ी देर के बाद मेरे लंड ने पानी छोड़ दिया और मैं झड़ गया। मेरे लंड ने पहली बार अपना पानी छोड़ा था और मेरे पानी से दीदी की पैंटी और नाइटगाउन भीग गया था।

मुझे पता नहीं कि मेरे लंड ने कितना वीर्य निकाला था लेकिन जो कुछ निकला था वो मेरे दीदी के नाम पर निकला था। मेरा पहला-पहला झड़ना इतना तेज था कि मेरे पैर जवाब दे दिए और मैं पैरों पर खड़ा नहीं हो पा रहा था और मैं चुपचाप बाथरूम के फर्श पर बैठ गया। ये कहानी आप हमारी वासना डॉट नेट पर पढ़ रहे है.

थोड़ी देर के बाद मुझे होश आया और मैं उठकर नहाने लगा। शॉवर के नीचे नहाकर मुझे कुछ ताजगी महसूस हुई और मैं फ्रेश हो गया। नहाने के बाद मैं दीवार से दीदी की नाइटगाउन, ब्रा और पैंटी उतारा और उसमें से अपना वीर्य धोकर साफ किया और नीचे रख दिया।

उस दिन के बाद से मेरा ये मुठ मारने का तरीका मेरा सबसे फेवरेट हो गया। हाँ, मुझे इस तरह से मुठ मारने का मौका सिर्फ इतवार-इतवार को ही मिलता था। क्योंकि इतवार के दिन ही मैं दीदी के नहाने के बाद नहाता था। इतवार को चुपचाप अपने बिस्तर पर पड़ा-पड़ा देखा करता था कि कब दीदी बाथरूम में घुसे और दीदी के बाथरूम में घुसते ही मैं उठ जाया करता था.

और जब दीदी बाथरूम से निकलती तो मैं बाथरूम में घुस जाया करता था। मेरी माँ और पिताजी सुबह-सुबह उठ जाया करते थे और जब मैं उठता था तो माँ रसोई में नाश्ता बनाती होती और पिताजी बाहर बालकनी में बैठकर अखबार पढ़ते होते या बाजार गए होते कुछ न कुछ सामान खरीदने।

इतवार को छोड़कर मैं जब भी मुठ मारता तो तब यही सोचता कि मैं अपना लंड दीदी की रस भरी चूत में पेल रहा हूँ। शुरू-शुरू में मैं ये सोचता था कि दीदी जब नंगी होंगी तो कैसी दिखेंगी? फिर मैं ये सोचने लगा कि दीदी की चूत चोदने में कैसा लगेगा। मैं कभी-कभी सपने में दीदी को नंगी करके चोदता था और जब मेरी आँख खुलती तो मेरा शॉर्ट भीगा हुआ होता था।

मैंने कभी भी अपना सोच और अपना सपना किसी को भी नहीं बताया था और दीदी को भी इसके बारे में जानने दिया। मैं अपनी स्कूल की पढ़ाई खत्म करके कॉलेज जाने लगा। कॉलेज में मेरी कुछ गर्लफ्रेंड भी हो गईं। उन गर्लफ्रेंड में से मैंने दो-चार के साथ सेक्स का मजा भी लिया।

मैं जब कोई गर्लफ्रेंड के साथ चुदाई करता तो मैं उसको अपने दीदी के साथ कम्पेयर करता और मुझे कोई भी गर्लफ्रेंड दीदी के बराबर नहीं लगती। मैं बार-बार ये कोशिश करता था कि मेरा दिमाग दीदी पर से हट जाए, लेकिन मेरा दिमाग घूम-फिर कर दीदी पर ही आ जाता। मैं हमेशा 24 घंटे दीदी के बारे में और उसको चोदने के बारे में ही सोचता रहता।

मैं जब भी घर पर होता तो दीदी को ही देखता रहता, लेकिन इसकी जानकारी दीदी को नहीं थी। दीदी जब भी अपने कपड़े बदलती थीं या माँ के साथ घर के काम में हाथ बटाती थीं तो मैं चुपके-चुपके उन्हें देखा करता था और कभी-कभी मुझे सुडौल चूचियाँ देखने को मिल जाती थीं (ब्लाउज के ऊपर से)।

दीदी के साथ अपने छोटे से घर में रहने से मुझे कभी-कभी बहुत फायदा हुआ करता था। कभी मेरा हाथ उनके शरीर से टकरा जाता था। मैं दीदी के दो भरे-भरे चूचियों और गोल-गोल चूतड़ों को छूने के लिए मरा जा रहा था। मेरा सबसे अच्छा पासटाइम था अपने बालकनी में खड़े होकर सड़क पर देखना और जब दीदी पास होतीं तो धीरे-धीरे उनकी चूचियों को छूना।

हमारे घर की बालकनी कुछ ऐसी थी कि उसकी लंबाई घर के सामने गली के बराबर में थी और उसकी संकरी सी चौड़ाई के सहारे खड़े होकर हम सड़क देख सकते थे। हमारी बालकनी की चौड़ाई इतनी थी कि दो आदमी एक साथ सटकर खड़े होकर सड़क को देख सकें। ये कहानी आप हमारी वासना डॉट नेट पर पढ़ रहे है.

मैं जब भी बालकनी पर खड़े होकर सड़क को देखता तो अपने हाथों को अपनी छाती पर मोड़कर बालकनी की रेलिंग के सहारे खड़ा रहता था। कभी-कभी दीदी आतीं तो मैं थोड़ा हटकर दीदी के लिए जगह बना देता और दीदी आकर अपने बगल खड़ी हो जातीं। मैं ऐसे घूमकर खड़ा होता कि दीदी को बिल्कुल सटकर खड़ा होना पड़ता।

दीदी की भरी-भरी चूचियाँ मेरी छाती से सट जाती थीं। मेरे हाथों की उँगलियाँ, जो कि बालकनी की रेलिंग के सहारे रहतीं, दीदी की चूचियों से छू जाती थीं। मैं अपनी उँगलियों को धीरे-धीरे दीदी की चूचियों पर हल्के-हल्के चलाता था और दीदी को ये बात नहीं मालूम थी।

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मैं उँगलियों से दीदी की चूचियों को छूकर देखता कि उनकी चूचियाँ कितनी नरम और मुलायम हैं लेकिन फिर भी तनी-तनी रहती हैं। कभी-कभी मैं दीदी के चूतड़ों को भी धीरे-धीरे अपने हाथों से छूता था। मैं हमेशा ही दीदी के सेक्सी शरीर को इसी तरह से छूता था। मैं समझता था कि दीदी मेरे हाथों और मेरे इरादों से अनजान हैं।

दीदी इस बात का पता भी नहीं था कि उनका छोटा भाई उनके नंगे शरीर को चाहता है और उनके नंगे शरीर से खेलना चाहता है। लेकिन मैं गलत था। फिर एक दिन दीदी ने मुझे पकड़ लिया। उस दिन दीदी किचन में जाकर अपने कपड़े चेंज कर रही थीं। हॉल और किचन के बीच का पर्दा थोड़ा खुला हुआ था।

दीदी दूसरी तरफ देख रही थीं और अपनी कुर्ता उतार रही थीं और उसकी ब्रा में छुपा हुआ चूचियाँ मेरे नजरों के सामने था। रोज की तरह मैं टीवी देख रहा था और दीदी को भी कनखियों से देख रहा था। दीदी ने तब एकाएक सामने वाले दीवार पर टँगा मिरर को देखा और मुझे आँखें फाड़-फाड़कर घूरते हुए पाई।

दीदी ने देखा कि मैं उनकी चूचियों को घूर रहा हूँ। फिर एकाएक मेरी और दीदी की आँखें मिरर में टकरा गईं। मैं शर्मा गया और अपनी आँखें टीवी की तरफ कर लिया। मेरा दिल धड़क रहा था। मैं समझ गया कि दीदी जान गई हैं कि मैं उनकी चूचियों को घूर रहा था। अब दीदी क्या करेंगी? क्या दीदी माँ और पिताजी को बता देंगी? क्या दीदी मुझसे नाराज होंगी?

इसी तरह से हजारों प्रश्न मेरे दिमाग में घूम रहे थे। मैं दीदी की तरफ फिर से देखने का साहस जुटा नहीं पाया। उस दिन सारा दिन और उसके बाद 2-3 दिनों तक मैं दीदी से दूर रहा, उनके तरफ नहीं देखा। इन 2-3 दिनों में कुछ नहीं हुआ। मैं खुश हो गया और दीदी को फिर से घूरना चालू कर दिया।

दीदी ने मुझे 2-3 बार फिर घूरते हुए पकड़ लिया, लेकिन फिर भी कुछ नहीं बोलीं। मैं समझ गया कि दीदी को मालूम हो चुका है मैं क्या चाहता हूँ और वो हमें कुछ नहीं बोलेंगी। दीदी हमसे इस बारे में कोई नहीं बात की और न ही किसी से कुछ बोलीं। ये मेरे लिए बहुत आश्चर्य की बात थी।

खैर जब तक दीदी को कोई एतराज नहीं तो मुझे क्या लेना-देना और बड़े मजे से दीदी घूरने लगा। एक दिन मैं और दीदी अपने घर की बालकनी में पहले जैसे खड़े थे। दीदी मेरे हाथों से सटकर खड़ी थीं और मैं अपनी उँगलियों को दीदी की चूचियों पर हल्के-हल्के चला रहा था। ये कहानी आप हमारी वासना डॉट नेट पर पढ़ रहे है.

मुझे लगा कि दीदी को शायद ये बात नहीं मालूम कि मैं उनकी चूचियों पर अपनी उँगलियों को चला रहा हूँ। मुझे इस लिए लगा क्योंकि दीदी मुझसे फिर भी सटकर खड़ी थीं। लेकिन मैं ये तो समझ रहा था क्योंकि दीदी ने पहले भी नहीं टोका था, तो अब भी कुछ नहीं बोलेंगी और मैं आराम से दीदी की चूचियों को छू सकता हूँ।

हम लोग अपने बालकनी में खड़े थे और आपस में बातें कर रहे थे। हम लोग कॉलेज और स्पोर्ट्स के बारे में बातें कर रहे थे। चूँकि हमारी बालकनी के सामने एक गली थी तो हम लोगों की बालकनी में कुछ अँधेरा था। करते-करते दीदी ने मेरी उँगलियों को, जो उनकी चूचियों पर घूम रही थी, अपने हाथों से पकड़कर अपनी चूचियों से हटा दिया।

दीदी को अपनी चूचियों पर मेरी उँगली का एहसास हो गया था और वो थोड़ी देर के लिए बात करना बंद कर दिया और उनकी शरीर कुछ अकड़ गई। लेकिन दीदी अपने जगह से हिली नहीं और मेरे हाथों से सटकर खड़ी रहीं। दीदी ने मुझसे कुछ नहीं बोलीं तो मेरा हौसला बढ़ गया और मैं अपना पूरा का पूरा पंजा दीदी की एक मुलायम और गोल-गोल चूची पर रख दिया।

मैं बहुत डर रहा था। पता नहीं दीदी क्या बोलेंगी? मेरा पूरा का पूरा शरीर काँप रहा था। लेकिन दीदी कुछ नहीं बोलीं। दीदी सिर्फ एक बार मुझे देखीं और फिर से सड़क पर देखने लगीं। मैं भी दीदी की तरफ डर के मारे नहीं देख रहा था। मैं भी सड़क पर देख रहा था और अपना हाथ से दीदी की एक चूची को धीरे-धीरे सहला रहा था।

मैं पहले धीरे-धीरे दीदी की एक चूची को सहला रहा था और फिर थोड़ी देर के बाद दीदी की एक मुलायम गोल-गोल, नरम लेकिन तनी चूची को अपने हाथ से जोर-जोर से मसलने लगा। दीदी की चूचियाँ काफी बड़ी थीं और मेरे पंजे में नहीं समा रही थीं। मुझे पहले दीदी की चूची को नीचे पकड़ना पड़ रहा था और धीरे-धीरे मैं अपने हाथ को ऊपर ले जा रहा था।

थोड़ी देर बाद मुझे दीदी की कुर्ता और ब्रा के ऊपर से लगा कि चूची के निप्पल तन गए और मैं समझ गया कि मेरे चूची मसलने से दीदी गर्म हो गई हैं। दीदी की कुर्ता और ब्रा के कपड़े बहुत ही महीन और मुलायम थे और उनके ऊपर से मुझे दीदी की निप्पल तनने के बाद एक छोटा सा रबर जैसा लग रहा था।

ओह भगवान! मैं तो बिल्कुल स्वर्ग में था, दीदी की चूचियाँ छूने से मुझे जैसे स्वर्ग मिल गया था। किसी जवान लड़की की चूचियाँ छूने का मेरा ये पहला अवसर था। मुझे पता ही नहीं चला कि मैं कब तक दीदी की चूचियों को मसलता रहा। और दीदी ने भी मुझे एक बार के लिए मना नहीं किया।

दीदी चुपचाप खड़ी होकर मुझसे अपनी चूचियाँ मिजवाती रहीं। दीदी की चूचियाँ मसलते-मसलते मेरा लंड धीरे-धीरे खड़ा होने लगा था। मुझे बहुत मजा आ रहा था और मैं ये सोच-सोचकर और भी मजा ले रहा था कि मेरी बड़ी दीदी चुपचाप खड़ी रहकर मुझसे अपनी चूचियाँ मसलवा रही थीं।

मैं तो और पता नहीं कब तक दीदी की चूचियाँ को मसलता लेकिन एकाएक माँ की आवाज सुनाई दी। माँ की आवाज सुनते ही दीदी ने धीरे से मेरा हाथ अपनी चूचियों से हटा दिया और माँ के पास चली गईं। उस रात मैं सो नहीं पाया, मैं सारी रात दीदी की मुलायम-मुलायम चूचियों के बारे में सोचता रहा।

दूसरे दिन शाम को मैं रोज की तरह अपने बालकनी में खड़ा होकर सड़क की तरफ देख रहा था। थोड़ी देर के बाद दीदी बालकनी में आईं और मेरे बगल में 2-3 इंच दूर खड़ी हो गईं। मैं 2-3 मिनट तक चुपचाप खड़ा रहा और दीदी की तरफ देखता रहा। दीदी ने मेरी तरफ देखी। मैं धीरे से मुस्कुरा दिया, लेकिन दीदी नहीं मुस्कुराईं और चुपचाप सड़क पर देखने लगीं। ये कहानी आप हमारी वासना डॉट नेट पर पढ़ रहे है.

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मैं दीदी से धीरे से बोला, “दीदी और पास आ जाओ”।

“क्यों” दीदी ने मुझसे पूछा।

“मैं छूना चाहता हूँ” मैं साफ-साफ दीदी से कुछ नहीं कह पा रहा था।

“क्या छूना चाहते हो? साफ-साफ बताओ” दीदी ने फिर मुझसे पूछा।

तब मैं धीरे से दीदी से बोला, “मुझे तुम्हारी दूध छूना है”।

दीदी ने तब मुझसे तपाक से बोली, “अरे, क्या छूना है। साफ-साफ बोल।”

मैं तब दीदी से मुस्कुरा कर बोला, “मुझे तुम्हारी चूचियाँ छूना है, उनको मसलना है।”

“लेकिन अभी माँ आ सकती है” दीदी ने तब मुस्कुरा कर बोली।

मैं भी तब मुस्कुरा कर अपनी दीदी से बोला, “जब भी माँ आएगी हम लोगों को पता चल जाएगा।”

मेरी बातों को सुनकर दीदी कुछ नहीं बोलीं और चुपचाप खड़ी रहीं। तब मैंने फिर से दीदी से बोला, “प्लीज दीदी और नजदीक आ जाओ”। तब दीदी मेरे और पास आकर खड़ी हो गईं। दीदी मेरे बिल्कुल पास खड़ी थीं, लेकिन उनकी चूचियाँ कल की तरह मेरे हाथों से नहीं छू रही थीं।

मैं समझ गया कि दीदी आज मेरे से सटकर खड़ी होने से कुछ शरमा रही हैं। अब तक दीदी अनजाने में मुझसे सटकर खड़ी होती थीं। लेकिन आज जान-बूझकर मुझसे सटकर खड़ी होने से वो शरमा रही हैं, क्योंकि आज दीदी को मालूम था कि सटकर खड़ी होने से क्या होगा।

जैसे ही दीदी पास आ गईं और अपने हाथों से दीदी को और पास खींच लिया। अब दीदी की चूचियाँ मेरे हाथों को कल की तरह छू रही थीं। मैं करीब पाँच मिनट तक इंतजार किया और फिर अपना हाथ दीदी की चूचियों पर टिका दिया। दीदी की चूचियाँ छूने के साथ ही मैं मानो स्वर्ग पर पहुँच गया।

मैं दीदी की चूचियों को पहले धीरे-धीरे छुआ, फिर उन्हें कस-कसकर मिंजा और मसला। कल की तरह, आज भी दीदी का कुर्ता और उसके नीचे ब्रा बहुत महीन कपड़े का था, और उनमें से मुझे दीदी की निप्पल तनकर खड़े होना मालूम चल रहा था। मैं तब अपने एक उँगली और अँगूठे से दीदी की निप्पल को जोर-जोर से दबाने लगा।

मैं जितने बार दीदी की निप्पल को दबा रहा था, उतने बार दीदी कसमसा रही थीं और दीदी का मुँह शरम के मारे लाल हो रहा था। तब दीदी ने मुझसे धीरे से बोली, “धीरे-धीरे दबा, लगता है”। मैं तब दीदी की चूचियाँ मिंजाई थोड़ा धीरे-धीरे करने लगा। मैं और दीदी ऐसे ही फालतू बातें कर रहे थे और देखने वाले को यही दिखता कि मैं और दीदी कुछ गंभीर बातों पर बहस कर रहे थे।

लेकिन असल में मैं दीदी की चूचियों को अपने हाथों से कभी धीरे-धीरे और कभी जोर-जोर से मसल रहा था। थोड़ी देर माँ ने दीदी को बुला लिया और दीदी चली गईं। ऐसे ही 2-3 दिन तक चलता रहा। मैं रोज दीदी की चूचियों को अपने एक हाथ से मिंजता रहा और दीदी भी रोज शाम को मेरे बगल में खड़ी होकर मुझसे अपनी चूचियाँ मिंजवाती रहीं।

लेकिन एक समस्या थी मैं एक वक्त पर दीदी की सिर्फ एक चूची को मसल पाता था। मतलब जब दीदी मेरे बाईं तरफ खड़ी होती तो मैं दीदी की दाईं चूची मसलता और जब दीदी मेरे दाईं तरफ खड़ी होती तो मैं दीदी की बाईं चूची को दबा पाता। लेकिन असल में मैं दीदी की दोनों चूचियों को अपने दोनों हाथों से पकड़कर मसलना चाहता था।

लेकिन बालकनी में खड़े होकर ये मुमकिन नहीं था। मैं दो दिन तक इसके बारे में सोचता रहा। एक दिन शाम को मैं हॉल में बैठकर टीवी देख रहा था। माँ और दीदी किचन में डिनर की तैयारी कर रही थीं। कुछ देर के बाद दीदी ने अपना काम खत्म करके हॉल में आ गईं। ये कहानी आप हमारी वासना डॉट नेट पर पढ़ रहे है.

मैं हॉल में बिस्तर पर बैठा था और मेरा पीठ दीवार के सहारे था और पैर फैले हुए थे। दीदी किचन से आकर बिस्तर पर बैठ गईं। दीदी ने थोड़ी देर तक टीवी देखी और फिर अखबार उठाकर पढ़ने लगीं। थोड़ी देर तक अखबार के फ्रंट पेज की न्यूज पढ़ने के बाद दीदी ने अखबार खोलकर अंदर वाले पेज की न्यूज पढ़ने लगीं।

दीदी बिस्तर पर पेट के बल लेटकर बैठी थीं और अखबार अपने सामने उठाकर पढ़ रही थीं। मेरा पैर दीदी को छू रहा था। मैंने अपना पैरों को और थोड़ा सा आगे खिसका दिया और अब मेरा पैर दीदी की जाँघों को छू रहा था। माँ किचन में काम कर रही थीं और मैं उनको देख रहा था।

मैं दीदी की पीठ को देख रहा था। दीदी आज एक काले रंग का टी-शर्ट पहने हुए थीं और उस टी-शर्ट का कपड़ा बहुत ही झीना था। टी-शर्ट के ऊपर से मुझे दीदी की काले रंग का ब्रा भी दिख रहा था। मुझे दीदी की सेक्सी पीठ और काले रंग वाला ब्रा देखकर गर्म हो गया और मेरे दिमाग में कुछ सूझा।

मैं धीरे से अपना एक हाथ दीदी की पीठ पर रखा और टी-शर्ट के ऊपर से दीदी की पीठ पर चलाने लगा। जैसे ही मेरा हाथ दीदी की पीठ को छुआ दीदी की शरीर अकड़ गई। दीदी ने तब दबी जबान से मुझसे पूछा, “सोनू ये तुम क्या कर रहे हो?”

“कुछ नहीं, बस मैं तुम्हारी पीठ पर अपना हाथ रगड़ रहा हूँ” मैंने दीदी से बोला।

“तुम पागल तो नहीं हो गए? माँ अभी हम दोनों को किचन से देख लेगी”, दीदी ने दबी जबान से फिर मुझसे बोली।

“माँ कैसे देख लेगी?” मैंने दीदी से कहा।

“क्या मतलब है तुम्हारा?” दीदी ने मुझसे पूछा।

“मेरा मतलब ये है कि तुम्हारे सामने अखबार खुली हुई है। अगर माँ हमारी तरफ देखेगी तो उनको अखबार दिखलाई देगी।” मैंने दीदी से धीरे से कहा।

“तू बहुत स्मार्ट और शैतान है” दीदी ने धीरे से मुझसे बोली।

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फिर दीदी चुप हो गईं और अपने सामने अखबार को फैला कर अखबार पढ़ने लगीं। मैं भी चुपचाप अपना हाथ दीदी की चिकनी पीठ पर घुमाने लगा। मैं कभी-कभी अपनी उँगलियों से दीदी की ब्रा को उनके टी-शर्ट के ऊपर से छू रहा था। कुछ समय के बाद मैं अपना हाथ दीदी के दाहिने बगल की तरफ बढ़ा दिया और हाथ फेरने लगा।

मैं दीदी के दाहिने बगल के पास अपना हाथ 2-3 बार ऊपर-नीचे किया और फिर थोड़ा सा झुककर मैं अपना हाथ दीदी की दाहिनी चूची पर रख दिया। जैसे ही मैं अपना हाथ दीदी की दाहिनी चूची पर रखा दीदी थोड़ी सी काँप गईं। मैं भी तब इत्मीनान से दीदी की दाहिनी वाली चूची अपने हाथ से मसलने लगा।

थोड़ी देर दाहिनी चूची मसलने के बाद मैं अपना दूसरा हाथ से दीदी की बाईं तरफ वाली चूची पकड़ लिया और दोनों हाथों से दीदी की दोनों चूचियों को एक साथ मसलने लगा। दीदी कुछ नहीं बोलीं और वो चुपचाप अपने सामने अखबार फैलाए अखबार पढ़ती रहीं।

मेरा साहस कुछ बढ़ गया और थोड़ा सा सामने खिसककर दीदी की टी-शर्ट को पीछे से उठाने लगा। दीदी की टी-शर्ट दीदी के चूतड़ों के नीचे दबी थी और इसलिए वो ऊपर नहीं उठ रही थी। मैं थोड़ा सा जोर लगाया लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ। तब मैंने धीरे से दीदी से कहा, “प्लीज दीदी, थोड़ा सा…” दीदी को मेरे दिमाग की बात पता चल गई।

दीदी थोड़ी सी झुककर अपने चूतड़ को उठा दिया और मैंने उनका टी-शर्ट धीरे से उठा दिया। अब मैं फिर से दीदी की पीठ पर अपना ऊपर-नीचे घुमाना शुरू कर दिया और फिर अपना हाथ टी-शर्ट के अंदर कर दिया। वाह! क्या चिकना पीठ था दीदी का। मैं धीरे-धीरे दीदी की पीठ पर से उनका टी-शर्ट पूरा का पूरा उठा दिया और दीदी की पीठ पूरा की पूरा नंगी कर दिया।

अब मुझे दीदी की चूचियों का कुछ-कुछ हिस्सा उनके काले ब्रा के ऊपर से दिख रहा था। मैं अब अपने हाथ को दीदी की पीठ पर ब्रा के ऊपर घुमाना शुरू किया। जैसे ही मैंने ब्रा को छुआ दीदी काँपने लगीं। फिर मैं धीरे से अपने हाथ को ब्रा के सहारे-सहारे बगल के नीचे से आगे की तरफ बढ़ा दिया। ये कहानी आप हमारी वासना डॉट नेट पर पढ़ रहे है.

फिर मैं दीदी की ब्रा से ढकी दोनों चूचियों को अपने हाथ में पकड़ लिया और जोर-जोर से दबाने लगा। दीदी की निप्पल इस समय तनी-तनी थीं और मुझे उसे अपनी उँगलियों से दबाने में मजा आ रहा था। मैं तब आराम से दीदी की दोनों चूचियों को अपने हाथों से दबाने लगा और कभी-कभी निप्पल को अपनी उँगलियों से पकड़कर खींचने लगा।

माँ अभी भी किचन में खाना पका रही थीं। हम लोगों को माँ साफ-साफ किचन में काम करते दिखलाई दे रही थीं। माँ कभी-कभी हमारी तरफ देख लेतीं और उनको दीदी का अखबार पढ़ना दिखलाई दे रहा था। उनको ये समझ में ही आ रहा था कि कमरे में मैं दीदी की चूचियों को दबा-दबाकर सुख ले रहा हूँ और दीदी चूचियाँ मसलवा-मसलवा कर सुख ले रही हैं।

मैं ये सोच-सोचकर खुश हो रहा कि दीदी कैसे मुझे अपनी चूचियों से खेलने दे रही हैं और वो भी तब जब माँ घर में मौजूद हैं। मैं ऐसा सुनहरा अवसर खोना नहीं चाहता था। मैं तब अपना एक हाथ फिर से दीदी की पीठ पर ब्रा के हुक तक ले आया और धीरे-धीरे दीदी की ब्रा की हुक को खोलने लगा।

दीदी की ब्रा बहुत टाइट थी और इसलिए ब्रा का हुक आसानी से नहीं खुल रहा था। लेकिन जब तक दीदी को ये पता चलता कि मैं उनकी ब्रा की हुक खोल रहा हूँ, ब्रा की हुक खुल गया और ब्रा की स्ट्रैप उनकी बगल तक पहुँच गया। दीदी अपना सर घुमा कर मुझसे कुछ कहने वाली थीं कि माँ कमरे में फिर से आ गईं।

मैं जल्दी से अपना हाथ खींचकर दीदी की टी-शर्ट नीचे कर दिया और हाथ से टी-शर्ट को ठीक कर दिया। माँ हॉल में आकर बिस्तर के बगल से कुछ ले रही थीं और दीदी से बातें कर रही थीं। दीदी भी बिना सर उठाए अपनी नजर अखबार पर रखते हुए माँ से बातें कर रही थीं। माँ को हमारे कारनामों का पता नहीं चला और फिर से किचन में चली गईं। जब माँ फिर से किचन में चली गईं तो दीदी ने दबी जबान से मुझसे बोली, “चलो सोनू, मेरी ब्रा की हुक को लगा दो।”

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“क्या? मैं ये हुक नहीं लगा पाऊँगा,” मैं दीदी से बोला।

“क्यों, तू हुक खोल सकता और लगा नहीं सकता?” दीदी मुझे झिड़कते हुए बोली।

“नहीं, ये बात नहीं है दीदी। तुम्हारा ब्रा बहुत टाइट है मतलब! इट्स टू टाइट दीदी!” मैं फिर दीदी से कहा।

दीदी अखबार पढ़ते हुए बोली, “मुझे कुछ नहीं पता, तुमने ब्रा खोला है और अब तुम ही इसे लगाओगे।” दीदी हमसे नाराज होती बोली।

“लेकिन दीदी, ब्रा की हुक को तुम भी तो लगा सकती हो?” मैं दीदी से पूछा।

“बुद्धू, मैं नहीं लगा सकती, मुझे हुक लगाने के लिए अपने हाथ पीछे करने पड़ेंगे और माँ देख लेंगी तो उन्हें पता चल जाएगा कि हम लोग क्या कर रहे थे, समझे?” दीदी मुझसे बोली।

मुझे कुछ समझ में नहीं आ रहा था कि मैं क्या करूँ। मैं अपना हाथ दीदी की टी-शर्ट के नीचे से दोनों बगल की तरफ बढ़ा दिया और ब्रा के स्ट्रैप को खींचने लगा। जब स्ट्रैप थोड़ा आगे आया तो मैंने हुक लगाने की कोशिश करने लगा। लेकिन ब्रा बहुत ही टाइट था और मुझसे हुक नहीं लग रहा था।

मैं बार-बार कोशिश कर रहा था और बार-बार माँ की तरफ देख रहा था। माँ ने रात का खाना करीब-करीब पका लिया था और वो कभी भी किचन से हॉल आ सकती थीं। दीदी थोड़ी तक चुप बैठी रहीं और फिर मुझसे बोलीं, “चल बुद्धू, ये अखबार पकड़। अब मुझे ही ब्रा के स्ट्रैप को लगाना पड़ेगा।”

मैं बगल से हाथ निकालकर दीदी के सामने अखबार पकड़ लिया और दीदी अपनी हाथ पीछे करके ब्रा की हुक को लगाने लगीं। मैं पीछे से ब्रा का हुक लगाना देख रहा था। ब्रा इतनी टाइट थी कि दीदी को भी हुक लगाने में दिक्कत हो रही थी। आखिरकार दीदी ने अपनी ब्रा की हुक को लगा लिया।

जैसे ही दीदी ने ब्रा की हुक लगा कर अपने हाथ सामने किए माँ कमरे में फिर से आ गईं। माँ बिस्तर पर हम लोगों के बगल में बैठकर दीदी से बातें करने लगीं। मैं बिस्तर से उठकर टॉयलेट की तरफ चल पड़ा, क्योंकि मेरा लंड बहुत गर्म हो चुका था और मुझे उसे ठंडा करना था। ये कहानी आप हमारी वासना डॉट नेट पर पढ़ रहे है.

दूसरे दिन जब मैं और दीदी बालकनी पर खड़े थे तो दीदी मुझसे बोलीं, “सोनू, हम लोग कल रात करीब-करीब पकड़ लिए गए थे। मुझे बहुत शरम आ रही थी।”

“हाँ मुझे पता है और मैं कल रात की बात से बहुत शर्मिंदा हूँ। तुम्हारा ब्रा इतना टाइट था कि मुझसे उसकी हुक नहीं लगी” मैंने दीदी से कहा।

दीदी तब मुझसे बोलीं, “हाँ, मुझे भी बहुत दिक्कत हो रही थी और मुझे अपने हाथ पीछे करके ब्रा की स्ट्रैप लगाने में बहुत शरम आ रही थी।”

“लेकिन दीदी, तुम अपनी ब्रा रोज कैसे लगाती हो?” मैंने दीदी से धीरे से पूछा।

दीदी बोलीं, “वो हम लोग हमेशा……”

फिर दीदी समझ गईं कि मैं दीदी से मजाक कर रहा हूँ तब बोलीं, “वो तू बाद में अपने आप समझ जाएगा।

फिर मैंने दीदी से धीरे से कहा, “दीदी मैं तुमसे एक बात पूछूँ?”

“हाँ, हाँ पूछो” दीदी तपाक से बोलीं।

“दीदी तुम सामने हुक वाले ब्रा क्यों नहीं पहनतीं?” मैंने दीदी से पूछा।

दीदी तब मुस्कुरा कर बोलीं, “ये बिल्कुल प्राइवेट क्वेश्चन है। इसका जवाब मैं नहीं दूँगी।”

“दीदी तुम्हें पता है कि मैं कोई छोटा बच्चा नहीं हूँ, इसलिए तुम मुझे बता सकती हो” मैं दीदी से कहा।

“क्योंकि… क्योंकि… कोई खास वजह नहीं है! हाँ, एक वजह है। सामने हुक वाले ब्रा बहुत महँगे हैं” दीदी ने कुछ सोचकर बोलीं।

मैं तपाक से दीदी से कहा, “कोई बात नहीं। तुम पैसे के लिए मत घबराओ, मैं तुम्हें पैसे दूँगा।”

मेरी बातों को सुनकर दीदी मुस्कुराते हुए बोलीं, “अच्छा, तेरे पास इतने सारे पैसे हैं। चल मुझे एक 500 का नोट दे।”

मैं भी अपना पर्स निकालकर दीदी से बोला, “लो, तुम मुझसे 500 का नोट ले लो।”

दीदी मेरे हाथ में 500 का नोट देखकर बोलीं, “अरे नहीं, मुझे रुपया नहीं चाहिए। मैं तो यूँ ही मजाक कर रही थी।”

“लेकिन मैं मजाक नहीं कर रहा हूँ। दीदी तुम ना मत करो और ये रुपये तुम मुझसे ले लो” और मैं जबरदस्ती दीदी के हाथ में वो 500 का नोट थमा दिया। दीदी कुछ देर तक सोचती रहीं और वो नोट ले लिया और बोलीं, “ठीक है भाई, मैं तुम्हें उदास नहीं देख सकती और मैं ये रुपया ले रही हूँ। लेकिन याद रखना सिर्फ इस बार ही रुपये ले रही हूँ। ठीक है?”

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मैं भी दीदी से बोला, “थैंक्स दीदी” और मैं अंदर जाने लगा। अंदर जाते-जाते मैं दीदी से फिर बोला, “दीदी सिर्फ काले रंग की ब्रा खरीदना। मुझे काले रंग की ब्रा बहुत पसंद है।”

दीदी मुस्कुरा कर बोलीं, “शैतान!! तुझे अपनी दीदी के अंडरगारमेंट में बहुत दिलचस्पी है।”

मैं भी मुस्कुरा कर दीदी से कहा, “दीदी और एक बात याद रखना, काले रंग के ब्रा के साथ काले रंग की पैंटी भी खरीदना न भूलना।”

दीदी शर्मा गईं और मुझे मारने के लिए दौड़ीं लेकिन मैं अंदर भाग गया। अगले दिन शाम को मैं दीदी को अपने किसी सहेली के साथ फोन पर बातें करते हुए सुना। मैंने सुना कि दीदी अपनी सहेली को मार्केटिंग करने के लिए साथ चलने के लिए बोल रही हैं। दीदी की सहेली ने बाद में कन्फर्म करने के लिए बोली। ये कहानी आप हमारी वासना डॉट नेट पर पढ़ रहे है.

कुछ देर के बाद मैं दीदी को अकेला पाकर बोला, “दीदी, मैं भी तुम्हारे साथ मार्केटिंग करने के लिए जाना चाहता हूँ। क्या मैं तुम्हारे साथ जा सकता हूँ?”

दीदी थोड़ी देर तक कुछ सोचती रहीं और फिर बोलीं, “लेकिन सोनू, मैं अपनी सहेली से बात कर चुकी हूँ और वो शाम को हमारे घर पर आ रही है। और फिर मैंने माँ से भी अभी नहीं कही है कि मैं मार्केटिंग के लिए जा रही हूँ।”

मैं दीदी से कहा, “कोई बात नहीं है, तुम जा कर माँ से बोलो कि तुम मेरे साथ मार्केट जा रही हो और देखना माँ तुम्हें जाने देंगी। फिर हम लोग बाहर से तुम्हारी सहेली को फोन कर देंगे कि मार्केटिंग का प्रोग्राम कैंसल हो गया है और उसे आने की जरूरत नहीं है। ठीक है ना, दीदी?”

“हाँ, ये बात मुझे भी ठीक लगती है। मैं जा कर माँ से बात करती हूँ,” और ये कहकर दीदी माँ से बात करने अंदर चली गईं। माँ ने तुरंत दीदी को मेरे साथ मार्केट जाने के लिए हाँ कह दी। उस दिन शाम को मैं और दीदी साथ-साथ कपड़ों की मार्केट में गए।

जाते वक्त बस में बहुत भीड़ थी और मैं ठीक दीदी के पीछे खड़ा हुआ था और दीदी के चूतड़ मेरी जाँघों से टकरा रहे थे। मार्केट में भी बहुत भीड़ थी। मैं हमेशा दीदी के पीछे चल रहा था जिससे कि दीदी को कोई धक्का न मार दे। हम जब भी कोई फुटपाथ की दुकान में खड़े होकर कपड़े देखते तो दीदी मुझसे चिपककर खड़ी होती और उनकी चूचियाँ और जाँघें मुझसे छू रही होतीं।

अगर दीदी कोई दुकान पर कपड़े देखती तो मैं भी उनसे बिल्कुल सटकर खड़ा होता और अपना लंड कपड़ों के ऊपर से उनके चूतड़ से भिड़ा देता और कभी-कभी मैं उनके चूतड़ों को अपने हाथों से सहला देता। हम दोनों ऐसा कर रहे थे और बहाना मार्केट में भीड़ का था।

मुझे लगा कि मेरी इन सब हरकतों दीदी कुछ समझ नहीं पा रही हैं क्योंकि मार्केट में बहुत भीड़ थी। मैंने एक जींस का पैंट और एक टी-शर्ट खरीदा और दीदी ने एक गुलाबी रंग की पंजाबी ड्रेस, एक गर्मी के लिए स्कर्ट और टॉप और 2-3 टी-शर्ट खरीदीं। हम लोग मार्केट में और थोड़ी तक घूमते रहे।

अब करीब 7:30 बज गए थे। दीदी ने मुझे सारे शॉपिंग बैग थमा दिए और बोलीं, “तुम आगे जा कर मेरी इंतजार करो, मैं अभी आती हूँ” और वो एक दुकान जा कर खड़ी हो गईं। मैंने दुकान को देखा कि वो लेडीज के अंडरगारमेंट की दुकान है। मैं मुस्कुरा कर आगे बढ़ गया।

मैंने देखा कि दीदी के चेहरा शरम के मारे लाल हो चुका है और वो मेरी तरफ मुस्कुरा कर दुकानदार से बातें करने लगीं। कुछ देर के बाद दीदी दुकान पर से चलकर मेरे पास आईं और दीदी के हाथ में एक बैग था। मैं दीदी को देखकर मुस्कुरा दिया और कुछ बोलने वाला था कि दीदी बोलीं, “तुम अभी कुछ मत बोलो और चुपचाप चलते रहो।”

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हम लोग चुपचाप चल रहे थे। मैं अभी घर नहीं जाना चाहता था और आज मैं दीदी के अकेला था और मैं दीदी के साथ और टाइम बिताने के लिए बेचैन था। मैं दीदी से बोला, “दीदी चलो कुछ देर हम लोग समंदर के किनारे पर बैठते हैं और भेलपूरी खाते हैं।”

“नहीं, देर हो जाएगी” दीदी मुझसे बोलीं।

लेकिन मैं फिर दीदी से कहा, “अरे चलो भी दीदी। अभी सिर्फ 7:30 बजा है और हम लोग थोड़ी देर बैठकर घर चल देंगे और माँ जानती है कि हम दोनों साथ-साथ हैं इसलिए वो चिंता नहीं करेंगी।”

दीदी थोड़ी सोचकर बोलीं, “ठीक है, चल समंदर के किनारे चलते हैं।”

दीदी के राजी होने से मैं बहुत खुश हुआ और हम दोनों समंदर के किनारे, जो कि मार्केट से सिर्फ पैदल 10 मिनट का रास्ता था, चल दिए। हम लोग पहले जाकर एक भेलपूरी वाले से भेलपूरी लिया और एक मिनरल वॉटर का बोतल लिया और जा कर समंदर के किनारे बैठ गए।

हम लोग समंदर के किनारे पास-पास पैर फैलाकर बैठ गए। अभी समंदर का पानी पीछे था और हमारे चारों तरफ बड़े-बड़े पत्थर पड़े हुए थे। वहाँ खूब जोरों की हवा चल रही थी और समंदर की लहरें भी तेज थीं। समय बहुत सुहाना था। हम लोग भेलपूरी खा रहे थे और बातें कर रहे थे।

दीदी मुझसे सटकर बैठी थीं और मैं कभी-कभी दीदी के चेहरे को देख रहा था। दीदी आज काले रंग की एक स्कर्ट और ग्रे रंग का ढीला सा टॉप पहने हुए थीं। एक बार जब दीदी भेलपूरी खा रही थीं तो एक हवा का झोंका आया और दीदी की स्कर्ट उनकी जाँघ के ऊपर उठ गया और दीदी की जाँघें नंगी हो गईं।

दीदी ने अपने जाँघों को ढकने में कोई जल्दी नहीं किया। वो पहले भेलपूरी खा लीं और आराम से रुमाल में हाथ पोंछकर अपना स्कर्ट को जाँघों के नीचे किया और… समंदर की लहरों की आवाज के बीच हवा इतनी तेज थी कि दीदी की स्कर्ट बार-बार उड़ रही थी। मैंने देखा उनकी सफेद पैंटी साफ दिख रही है।

दीदी ने एक बार मुझे देखा और मुस्कुराकर बोलीं, “देख क्या रहा है?”

मैंने हिम्मत करके कहा, “दीदी… तुम बहुत सुंदर लग रही हो।”

दीदी ने कोई जवाब नहीं दिया, सिर्फ मेरी तरफ देखती रहीं। मैंने धीरे से अपना हाथ उनकी जाँघ पर रख दिया। दीदी काँपीं लेकिन हटाई नहीं। मैं धीरे-धीरे उनकी जाँघ सहलाने लगा। हवा के झोंके से उनकी स्कर्ट फिर ऊपर हो गई। मैंने हाथ बढ़ाकर उनकी पैंटी के ऊपर से चूत को छुआ। ये कहानी आप हमारी वासना डॉट नेट पर पढ़ रहे है.

दीदी ने आह भरी – “आह्ह्ह… सोनू…” लेकिन पैर बंद नहीं किए। मैंने दीदी को अपनी तरफ खींचा और उनके होंठों पर किस किया। दीदी ने पहले तो विरोध किया लेकिन फिर खुद ही मेरे होंठ चूसने लगीं। हम दोनों लंबे-लंबे किस कर रहे थे। मेरी जीभ उनकी जीभ से खेल रही थी।

मैंने उनका टॉप ऊपर किया, ब्रा के ऊपर से चूचियाँ दबाईं। दीदी की साँसें तेज हो गई थीं। मैंने ब्रा का हुक खोला और दोनों चूचियाँ बाहर निकालीं। गोरी-गोरी, भरी-भरी चूचियाँ, गुलाबी निप्पल। मैंने एक चूची मुँह में ले ली और चूसने लगा। दीदी ने मेरे सिर को दबाया और बोलीं, “हाय… चूसो… जोर से…” मैं दोनों चूचियाँ बारी-बारी चूसता रहा, काटता रहा, निप्पल खींचता रहा।

दीदी की चूत से पानी बहने लगा था, पैंटी गीली हो गई थी। मैंने उनकी स्कर्ट पूरी ऊपर की, पैंटी नीचे सरकाई। दीदी की चूत साफ, गुलाबी, थोड़ी-सी बालों वाली। मैंने घुटनों के बल बैठकर उनकी चूत चाटनी शुरू की। जीभ से क्लिटोरिस पर फिराया, चूत के अंदर घुसाया।

दीदी जोर-जोर से कराह रही थीं – “आह्ह्ह… सोनू… चाटो… अपनी दीदी की चूत चाटो… हाय… मैं पागल हो रही हूँ…” मैंने दो उँगलियाँ अंदर डालीं और अंदर-बाहर करने लगा। दीदी का पानी मेरे मुँह में आ रहा था। उन्होंने मेरे बाल पकड़े और चूत मेरे मुँह पर रगड़ने लगीं। कुछ ही देर में दीदी का पहला ऑर्गेज्म आ गया। उनका पूरा शरीर काँप उठा।

दीदी ने मुझे उठाया, मेरी पैंट खोली, मेरा खड़ा लंड बाहर निकाला। 7 इंच का मोटा लंड देखकर दीदी की आँखें चमक उठीं। उन्होंने लंड को हाथ में लिया, सहलाया, फिर मुँह में ले लिया। दीदी ने बहुत अच्छे से चूसा – ऊपर-नीचे, जीभ से चाटा, अंडों को चूसा। मैं दीदी के बाल पकड़े और उनका मुँह फक-फक करके चोदने लगा। फिर दीदी लेट गईं, पैर फैलाए। मैंने लंड उनकी चूत के मुँह पर रखा और धीरे से दबाया। चूत बहुत टाइट थी।

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सुपाड़ा अंदर गया तो दीदी चीखीं – “आह्ह्ह… फट गई…” लेकिन मैं रुका नहीं। धीरे-धीरे पूरा लंड अंदर डाल दिया। दीदी की आँखों में आँसू आ गए थे लेकिन चेहरे पर मजा था। मैंने धीरे-धीरे धक्के मारने शुरू किए। दीदी की चूत ने लंड को जकड़ रखा था। थोड़ी देर बाद स्पीड बढ़ाई। फच-फच की आवाजें आने लगीं। दीदी चिल्ला रही थीं – “जोर से… चोदो सोनू… अपनी दीदी की चूत फाड़ दो… हाय… बहुत मजा आ रहा है… चोदो… चोदो…” मैंने उनकी चूचियाँ दबाते हुए, चूमते हुए, जोर-जोर से चोदा।

करीब 25 मिनट तक चुदाई के बाद दीदी दूसरी बार झड़ गईं। मैं भी अपनी पूरी ताकत से धक्का मारकर दीदी की चूत के अंदर ही झड़ गया। गर्म-गर्म वीर्य दीदी की चूत में भरा। हम दोनों थककर एक-दूसरे से लिपटकर लेट गए। दीदी ने मेरे कान में कहा, “सोनू… आज से ये चूत सिर्फ तेरी है… जब चाहो चोद लेना… मैं तेरी हूँ।” उस रात हम घर लौटे तो माँ सो चुकी थीं। लेकिन अगले कई दिनों तक हमने घर में, बाथरूम में, बालकनी में, रात में चुपके से कई बार चुदाई की। दीदी अब मेरी अपनी सेक्सी रखैल बन चुकी हैं।

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