Hindi Sad XXX Story
मेरा नाम रागिनी सिंह है। मैं एक शादीशुदा महिला हूँ। गुजरात में सूरत के पास एक टेक्सटाइल इंडस्ट्री में मेरे पति मिस्टर राजीव इंजीनियर के पद पर काम करते हैं। उनके टेक्सटाइल मिल में हमेशा लेबर प्रॉब्लम रहती है। मजदूरों का नेता अय्यूब बहुत ही काइयाँ टाइप का आदमी है। Hindi Sad XXX Story
ऑफिसर लोगों को उस आदमी को हमेशा पटा कर रखना पड़ता है। मेरे पति की उससे बहुत पटती थी। मुझे उनकी दोस्ती फूटी आँख भी नहीं सुहाती थी। शादी के बाद मैं जब नई-नई आई थी, वह पति के साथ अक्सर आने लगा। उसकी आँखें मेरे बदन पर फिरती रहती थीं। मेरा बदन वैसे भी काफी सेक्सी था।
वह पूरे बदन पर नजरें फेरता रहता था। ऐसा लगता था मानो वह कल्पना में मुझे नग्न कर रहा हो। शादी के बाद मुझे किसी को यह बताने के बाद बहुत शर्म आती थी। फिर भी मैंने राजीव को समझाया कि ऐसे आदमियों से दोस्ती छोड़ दे, मगर वह तर्क देता था कि प्राइवेट कंपनी में नौकरी करने पर थोड़ा-बहुत ऐसे लोगों से बना कर रखना पड़ता ही है।
उनके तर्क के आगे मैं चुप हो जाती थी। मैंने कहा भी कि वह आदमी मुझे बुरी नजरों से घूरता रहता है। मगर वह मेरी बात पर कोई तवज्जो नहीं देते थे। अय्यूब कोई ४५ साल का भैंसे की तरह काला आदमी था। उसका काम हर वक्त कोई न कोई खुराफात करना रहता था। उसकी पहुंच ऊपर तक थी।
उसका दबदबा आस-पास की कई कंपनी में चलता था। बाजार के नुक्कड़ पर उसकी कोठी थी जिसमें वह अकेला ही रहता था। कोई फैमिली नहीं थी, मगर लोग बताते हैं कि वह बहुत ही रंगीला आदमी है और अक्सर उसके घर में लड़कियाँ भेजी जाती थीं। हर वक्त कई चमचों से घिरा रहता था।
वे सब देखने में गुंडों से लगते थे। सूरत और इसके आस-पास काफी टेक्सटाइल के छोटे-मोटे फैक्ट्री हैं। इन सब में अय्यूब की आज्ञा के बिना एक पत्ता भी नहीं हिलता था। उसकी पहुंच यहाँ के एमएलए से भी ज्यादा है। राजीव के सामने ही कई बार मेरे साथ गंदे मजाक भी करता था। मैं गुस्से से लाल हो जाती थी, मगर राजीव हँस कर टाल देता था। बाद में मेरी शिकायत करने पर मुझे बाँहों में लेकर मेरे होंठों को चूम कर कहता,
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“रागिनी, तुम हो ही ऐसी कि किसी का भी मन डोल जाए तुम पर। अगर कोई तुम्हें देख कर ही खुश हो जाता हो तो हमें क्या फर्क पड़ता है।”
घर के मेन डोर की चिटकनी में कोई नुक्स था। दरवाजे को जोर से धक्का देने पर चिटकनी अपने आप गिर जाती थी। होली से दो दिन पहले एक दिन पहले किसी काम से अय्यूब हमारे घर पहुँचा। दिन का वक्त था। मैं उस समय बाथरूम में नहा रही थी। बाहर से काफी आवाज लगाने पर भी मुझे सुनाई नहीं दिया था।
शायद उसने घंटी भी बजाई होगी, मगर अंदर पानी की आवाज में मुझे कुछ भी सुनाई नहीं दिया। मैं अपने धुन में गुनगुनाती हुई नहा रही थी। उसने दरवाजे को हल्का सा धक्का दिया तो दरवाजे की चिटकनी गिर गई और दरवाजा खुल गया। अय्यूब ने बाहर से आवाज लगाई, मगर कोई जवाब न पाकर दरवाजा खोल कर झाँका।
कमरा खाली पाकर वह अंदर प्रवेश कर गया। उसे शायद बाथरूम से पानी गिरने की एवं मरे गुनगुनाने की आवाज आई तो पहले तो वह वापस जाने के लिए मुड़ा, मगर फिर कुछ सोच कर धीरे से दरवाजे को अंदर से बंद कर लिया। और मुड़ कर बेडरूम में प्रवेश कर गया।
मैंने पूरे घर में अकेले होने के कारण कपड़े बाहर बेड पर ही रख रखे थे। उन पर उसकी नजर पड़ते ही आँखों में चमक आ गई। उसने सारे कपड़े समेट कर अपने पास रख लिए। मैं इन सब से अनजान गुनगुनाती हुई नहा रही थी। नहाना खत्म कर के बदन तौलिए से पोंछ कर पूरी तरह नग्न बाहर निकली।
वह दरवाजे के पीछे छुपा हुआ था इसलिए उसपर नजर नहीं पड़ी। मैंने पहले ड्रेसिंग टेबल के सामने खड़े होकर अपने हुस्न को निहारा। फिर बदन पर पाउडर छिड़क कर कपड़ों की तरफ हाथ बढ़ाया। मगर कपड़ों को बिस्तर पर न पाकर चौंक गई। तभी दरवाजे के पीछे से अय्यूब लपक कर मेरे पीछे आया.
और मेरे नग्न बदन को अपनी बाँहों की गिरफ्त में ले लिया। मैं एक दम सन्नाटे में आ गई। समझ में नहीं आ रहा था कि क्या करें। उसके हाथ मेरे बदन पर फिर रहे थे। मेरे एक निप्पल को अपने मुँह में ले लिया और दूसरे को हाथों से मसल रहा था।
एक हाथ मेरी योनि पर फिर रहे थे। अचानक उसकी दो उँगलियाँ मेरी योनि में प्रवेश कर गईं। मैं एकदम से चिहुँक उठी और उसे एक जोर से झटका दिया और उसकी बाँहों से निकल गई। मैं चीखते हुए मेन डोर की तरफ दौड़ी, मगर कुंडी खोलने से पहले फिर उसकी गिरफ्त में आ गई। वह मेरे स्तनों को बुरी तरह मसल रहा था।
“चोर कमीने, नहीं तो मैं शोर मचाऊँगी,” मैंने चीखते हुए कहा।
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तभी हाथ चिटकनी तक पहुँच गए। और दरवाजा खोल दिया। मेरे इस हरकत की उसे शायद उम्मीद नहीं थी। मैंने एक जोरदार झप्पड़ उसके गाल पर लगाया और अपने नग्न हालत की परवाह न करते हुए मैंने दरवाजे को खोल दिया। शेरनी की तरह चीखी, “निकल जा मेरे घर से।” और उसे धक्के मार कर घर से निकाल दिया।
उसकी हालत चोट खाए शेर की तरह हो रही थी। चेहरा गुस्से से लाल-लाल हो रहा था। उसने फुँफकारते हुए कहा, “साली बड़ी सती-सावित्री बन रही है। अगर तुझे अपने नीचे न लिटाया तो मेरा नाम भी अय्यूब नहीं। देखना एक दिन तू आएगी मेरे पास मेरे लंड को लेने। उस समय अगर तुझे अपने इस लंड पर न चढ़वाया तो देखना।”
मैंने भड़क से उसके मुँह पर दरवाजा बंद कर दिया। मैं वहीं दरवाजे से लग कर रोने लगी। शाम को जब राजीव आया तो उसपर भी फट पड़ी। मैंने उसे सारी बात बताई और ऐसे दोस्त रखने के लिए उसे भी खूब खरी-खोटी सुनाई। पहले तो राजीव ने मुझे मनाने की काफी कोशिश की। कहा कि ऐसे बुरे आदमी से क्या मुँह लगना।
मगर मैं तो आज उसकी बातों में आने वाली नहीं थी। आखिर वह उससे भिड़ने निकला। अय्यूब से झगड़ा करने पर अय्यूब ने भी खूब गालियाँ दीं। उसने कहा, “तेरी बीवी नंगी होकर दरवाजा खोल कर नहाए तो इसमें सामने वाले की क्या गलती है। अगर इतनी ही सती-सावित्री है तो बोला कर कि बुर्के में रहे।”
उसके आदमियों ने धक्के देकर राजीव को बाहर निकाल दिया। पुलिस में कम्प्लेन लिखाने गए, मगर पुलिस ने कम्प्लेन लिखने से मना कर दिया। सब उससे घबराते थे। खैर खून का घूँट पीकर चुप हो जाना पड़ा। बदनामी का भी डर था। और राजीव की नौकरी का भी सवाल था। ये कहानी आप हमारी वासना डॉट नेट पर पढ़ रहे है.
धीरे-धीरे समय गुजरने लगा। चौहाने पर अक्सर अय्यूब अपने चेले-चपाटों के साथ बैठा रहता था। मैं जब कभी वहाँ से गुजरती तो मुझे देख कर अपने साथियों से कहता, “राजीव की बीवी बड़ी कँटीली चीज है। उसकी चातियों को मसल-मसल कर मैंने लाल कर दिया था। चूत में भी उँगली डाली थी। नहीं मानते हो तो पूछ लो।”
“क्यों रागिनी रानी, याद है न मेरे हाथों का स्पर्श?”
“कब आ रही है मेरे बिस्तर पर?”
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मैं ये सब सुन कर चुपचाप सिर झुकाए वहाँ से गुजर जाती थी। दो महीने बाद की बात है। अचानक शाम को राजीव के फैक्ट्री से फोन आया,
“मैडम, आप मिसेज सिंह बोल रही हैं?”
“हाँ बोलिए,” मैंने कहा।
“मैडम पुलिस फैक्ट्री आई थी और सिंह साहब को गिरफ्तार कर ले गई।”
“क्या? क्यों?” मेरी समझ में ही नहीं आया कि सामने वाला क्या बोल रहा है।
“मैडम कुछ ठीक से समझ में नहीं आ रहा है। आप तुरंत यहाँ आ जाइए।”
मैं जैसी थी वैसी ही दौड़ी गई राजीव के ऑफिस। मैं एक सूती की साड़ी पहनी हुई थी।
वहाँ के मालिक पटेल साहब से मिली तो उन्होंने बताया कि दो दिन पहले उनके फैक्ट्री में कोई एक्सीडेंट हुआ था जिसे पुलिस मर्डर का केस बना कर राजीव के खिलाफ चार्जशीट तैयार कर दी थी। मैं एकदम चकित रह गई। ऐसा कुछ भी नहीं हुआ था।
“लेकिन आप तो जानते हैं कि राजीव ऐसा आदमी नहीं है। वह आपके पास पिछले कई सालों से काम कर रहा है। कभी आपको उनके खिलाफ कोई भी शिकायत मिली है क्या?” मैंने मिस्टर पटेल से पूछा।
“देखिए मिसेज सिंह मैं भी जानता हूँ कि इसमें राजीव का कोई भी हाथ नहीं है, मगर मैं कुछ भी कहने में असमर्थ हूँ।”
“आखिर क्यों?”
“क्योंकि उसका एक चश्मदीद गवाह है—अय्यूब।”
मेरे सिर पर जैसे बम फट पड़ा। मेरी आँखों के सामने सारी बातें साफ होती चली गईं।
“वह कहता है कि उसने राजीव को जान-बूझकर उस आदमी को मशीन में धक्का देते देखा था।”
“ये सब सरासर झूठ है। वह कमीना जान-बूझकर राजीव को फँसा रहा है,” मैंने लगभग रोते हुए कहा।
“देखिए मुझे आपसे हमदर्दी है, मगर मैं आपको कोई भी मदद नहीं कर पा रहा हूँ। इंस्पेक्टर शाह का भी अय्यूब से अच्छी दोस्ती है। सारे वर्कर्स राजीव के खिलाफ हो रहे हैं। मेरी मानो तो आप अय्यूब से मिल लो। वह अगर अपना बयान बदल ले तो ही राजीव बच सकता है।”
“थूकती हूँ मैं उस कमीने पर,” कहकर मैं वहाँ से पैर पटकती हुई निकल गई।
मगर मेरे समझ में नहीं आ रहा था कि मैं क्या करूँ। मैं पुलिस स्टेशन पहुँची। वहाँ काफी देर बाद राजीव से मिलने दिया गया। उसकी हालत देख कर तो मुझे रोना आ गया। बाल बिखरे हुए थे। आँखों के नीचे कुछ सूजन थी, शायद पुलिस वालों ने मारपीट भी की होगी। मैंने उससे बात करने की कोशिश की, मगर वह कुछ ज्यादा नहीं बोल पाया। उसने बस इतना ही कहा,
“अब कुछ नहीं हो सकता। अब तो अय्यूब ही कुछ कर सकता है।”
मुझे किसी और से आशा की कोई किरण नहीं दिखाई दे रही थी। आखिरकार मैंने अय्यूब से मिलने का निर्णय किया। शायद उसे मुझ पर रहम आए। शाम के लगभग आठ बज गए थे। मैं अय्यूब के घर पहुँची। गेट पर दरबान ने रोका तो मैंने कहा, “साहब को कहना मिसेज सिंह आई हैं।”
गार्ड अंदर चला गया। कुछ देर बाद बाहर आकर कहा, “अभी साहब अभी बिजी हैं, कुछ देर इंतजार कीजिए।”
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पंद्रह मिनट बाद मुझे अंदर जाने दिया। मकान काफी बड़ा था। अंदर ड्रॉइंग रूम में अय्यूब दीवान पर अधा लेटा हुआ था। उसके तीन चमचे कुर्सियों पर बैठे हुए थे। सबके हाथों में शराब के ग्लास थे। सामने टेबल पर एक बोतल खुली हुई थी। मैंने कमरे की हालत देखते हुए झिझकती हुई अंदर प्रवेश किया।
“आ बैठ,” अय्यूब ने अपने सामने एक खाली कुर्सी की तरफ इशारा किया।
“वो-वो मैं आपसे राजीव के बारे में बात करना चाहती थी,” मैं जल्दी वहाँ से भागना चाहती थी।
“ये अपनी सुंदर कपड़ा मिल के इंजीनियर की बीवी है। बड़ी सेक्सी चीज है,” उसने अपने ग्लास से एक घूँट लेते हुए कहा।
सारे मुझे वासना भरी नजरों से देखने लगे। उनकी आँखों में लाल डोरे तैर रहे थे।
“हाँ बोल, क्या चाहिए?”
“राजीव ने कुछ भी नहीं किया,” मैंने उससे मिन्नत की।
“मुझे मालूम है।”
“पुलिस कहते हैं कि आप अपना बयान बदल लेंगे तो वह छूट जाएँगे।”
“क्यों? क्यों बदलूँ मैं अपना बयान?”
“प्लीज, हम पूरे…”
“सड़ने दो साले को बीस साल जेल में। आया था मुझसे लड़ने।”
“प्लीज आप ही एकमात्र आशा हो।”
“लेकिन क्यों? क्यों बदलूँ मैं अपना बयान? मुझे क्या मिलेगा?” अय्यूब ने अपनी मोटी जीभ पर होंठ फेरते हुए कहा।
“आप कहिए आपको क्या चाहिए। अगर बस में हुआ तो हम जरूर देंगे,” कहते हुए मैंने अपनी आँखें झुका लीं। मुझे पता था कि अब क्या होने वाला है। अय्यूब अपनी जगह से उठा। अपना ग्लास टेबल पर रख कर चलता हुआ मेरे पीछे आ गया। मैं आँखें सख्ती से बंद कर उसके पैरों के पदचाप सुन रही थी। ये कहानी आप हमारी वासना डॉट नेट पर पढ़ रहे है.
मेरी हालत उस खरगोश की तरह हो गई थी जो अपना सिर झाड़ियों में डाल कर सोचता है कि भेड़िये से वह बच जाएगा। उसने मेरे पीछे आकर साड़ी के आँचल को पकड़ा और उन्हें छातियों पर से हटा दिया। फिर उसके हाथ आगे आए और सख्ती से मेरी छातियों को मसलने लगे।
“मुझे तुम्हारा जिस्म चाहिए पूरे एक दिन के लिए,” उसने मेरे कानों के पास धीरे से कहा। मैंने सहमति में अपना सिर हिलाया।
“ऐसे नहीं, अपने मुँह से बोल,” उसने मेरे ब्लाउज के अंदर अपने हाथ डाल कर सख्ती से छातियों को निचोड़ने लगा। इतने लोगों के सामने मैं शर्म से गड़ी जा रही थी। मैंने सिर हिलाया।
“मुँह से बोल।”
“हाँ,” मैंने धीरे से बुदबुदाया।
“जोर से बोल। कुछ सुनाई नहीं दिया। तुझे सुनाई दिया रे चपलू?” उसने एक से पूछा।
“नहीं,” जवाब आया।
“मुझे मंजूर है,” मैंने इस बार कुछ जोर से कहा।
“क्यों फूलनदेवी जी, मैंने कहा था न तू खुद आएगी मेरे घर और कहेगी कि प्लीज मुझे चोदो। कहाँ गई तेरी अकड़? तू पूरे २४ घंटों के लिए मेरे कब्जे में रहेगी। मैं जैसा चाहूँगा तुझे वैसा ही करना होगा। तुझे अगले २४ घंटे बस अपनी योनि खोल कर रंडियों की तरह चुदवाना है। उसके बाद तू और तेरा मर्द दोनों आजाद हो जाओगे,” उसने कहा, “और नहीं तो तेरा मर्द तो २० साल के लिए अंदर होगा ही, तुझे भी वेश्यावृत्ति के लिए अंदर करवा दूँगा। फिर तो तू वैसे ही वहाँ से पूरी वेश्या बन कर ही बाहर निकलेगी।”
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“मुझे मंजूर है,” मैंने अपने आँसुओं पर काबू पाते हुए कहा। वह जाकर वापस अपनी जगह जाकर बैठ गया।
“चल शुरू हो जा। अपने सारे कपड़े उतार, मुझे औरतों के बदन पर कपड़े अच्छे नहीं लगते,” उसने ग्लास अपने होंठों से लगाया, “अब ये कपड़े कल शाम के दस बजे के बाद ही मिलेंगे। चल इनको भी दिखा तो सही कि तुझे अपने किस हुस्न पर इतना गर्व है।”
मैंने काँपते हाथों से ब्लाउज के बटन खोलना शुरू कर दिया। सारे बटन खोलकर ब्लाउज के दोनों हिस्सों को अपनी छातियों के ऊपर से हटाया तो ब्रा में कसे हुए मेरे दोनों युवन उन भूखी आँखों के सामने आ गए। मैंने ब्लाउज को अपने बदन से अलग कर दिया। चारों की आँखें चमक उठीं। मैंने बदन से साड़ी हटा दी। फिर मैंने झिझकते हुए पेटीकोट की डोरी खींच दी। पेटीकोट सरसराता हुआ पैरों पर ढेर हो गया। चारों की आँखों में वासना के सुरख डोरे तैर रहे थे। मैं उनके सामने ब्रा और पैंटी में खड़ी हो गई।
“मैंने कहा था सारे कपड़े उतारने को,” अय्यूब ने गुर्राते हुए कहा।
“प्लीज मुझे और जलील मत करो,” मैंने उससे मिन्नतें कीं।
“अबे राजे फोन लगा शाह को। बोल साले राजीव को रात भर हवाई जहाज बना कर डंडे मारे और इस रंडी को भी अंदर कर दे।”
“नहीं-नहीं, ऐसा मत करना। आप जैसा कहोगे मैं वैसा ही करूँगी,” कहते हुए मैं अपने हाथ पीछे ले जाकर ब्रा का हुक खोल दिया। ब्रा को आहिस्ता से बदन से अलग कर दिया। अब मैंने पूरी तरह से समर्पण का फैसला कर लिया। ब्रा के हटते ही मेरे दूधिया उरोज रोशनी में चमक उठे।
चारों अपनी-अपनी जगह पर कसमसाने लगे। तीनों गरम हो चुके थे। उनके पैंट पर उभार साफ नजर आ रहा था। अय्यूब लुंगी के ऊपर से ही अपने लंड पर हाथ फेर रहा था। लुंगी के ऊपर से ही उसके उभार को देख कर लग रहा था कि अब मेरी खैर नहीं।
मैंने अपनी उँगलियाँ पैंटी की इलास्टिक में फँसाई तो अय्यूब बोल उठा,
“ठहर जा। यहाँ आ मेरे पास।”
मैं उसके पास आकर खड़ी हो गई। उसने अपने हाथों से मेरी योनि को कुछ देर तक मसला, फिर पैंटी को नीचे करता चला गया। अब मैं पूरी तरह नंगी हो कर उसके सामने खड़ी थी।
“राजे जा और मेरा कैमरा उठा ला,” मैं घबरा गई।
“आपने जो चाहा मैं दे रही हूँ, फिर ये सब क्यों?”
“तुझे मुँह खोलने के लिए मना किया था न?”
एक आदमी एक मूवी कैमरा ले आया। उन्होंने सेंटर टेबल से सारा सामान हटा दिया। अय्यूब मेरी योनि पर हाथ फेर रहा था। मेरी योनि पर रेशमी घुंघराले बालों को सहला रहा था।
“चल बैठ यहाँ,” उसने सेंटर टेबल की ओर इशारा किया।
मैं सेंटर टेबल पर बैठ गई। उसने मेरी टाँगों को जमीन से उठाकर टेबल पर रखने को कहा। मैंने वैसा ही किया।
“अब टाँगें चौड़ी कर,” मैं शर्म से दूहरी हो गई, मगर मेरे पास और कोई रास्ता नहीं था। मैंने अपनी टाँगों को थोड़ा फैलाया।
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“और फैला,” मैंने टाँगों को उनके सामने पूरी तरह फैला दिया। मेरी योनि उनकी आँखों के सामने बेपर्दा थी। योनि के दोनों लब खुल गए थे। मैं चारों के सामने योनि फैला कर बैठी हुई थी। उनमें से एक मेरी योनि की तस्वीरें ले रहा था। ये कहानी आप हमारी वासना डॉट नेट पर पढ़ रहे है.
“अपनी चूत में उँगली डाल कर उसको चौड़ा कर,” अय्यूब ने कहा।
वह अब अपनी तहमद खोल कर अपने काले मूसल जैसे लंड पर हाथ फेर रहा था। मैं तो उसके लंड को देख कर ही सिहर गई। गधे जैसा इतना मोटा और लंबा लंड मैंने पहली बार देखा था। लंड भी पूरा का काला था। मैं अपनी योनि में उँगली डाल कर उसे सबके सामने फैला दिया। चारों हँसने लगे।
“देखा मुझसे पंगा लेने का अंजाम। बड़ा गर्व था इसको अपने रूप पर। देख आज मेरे सामने कैसे नंगी अपनी योनि फैला कर बैठी हुई है,” अय्यूब ने अपनी दो मोटी-मोटी उँगलियाँ मेरी योनि में घुसा दीं। मैं एक दम से सिहर उठी। मैं भी अब गरम होने लगी थी। मेरा दिल तो नहीं चाह रहा था, मगर जिस्म उसकी बात नहीं सुन रहा था।
उसकी उँगलियाँ कुछ देर तक अंदर खलबली मचाने के बाद बाहर निकलीं तो योनि रस से चुपड़ी हुई थी। वह अपनी उँगलियों को अपनी नाक तक ले जाकर सूँघा, फिर सब को दिखा कर कहा,
“अब ये भी गरम होने लगी है।” मेरे होंठों पर अपनी उँगलियाँ छुआ कर कहा, “ले चाट इसे।”
मैंने अपनी जीभ निकाल कर अपने कामरस को पहली बार चखा। सारे एक दम से मेरे बदन पर टूट पड़े। कोई मेरी छातियों को मसल रहा था, तो कोई मेरी योनि में उँगली डाल रहा था। मैं उनके बीच में चटपटा रही थी। अय्यूब ने सबको रुकने का इशारा किया। मैंने देखा उसके कमर से तहमद हटी हुई है। और काला भुजंग सा लंड तना हुआ खड़ा है। उसने मेरे सिर को पकड़ा और अपने लंड पर दाब दिया।
“इसे ले अपने मुँह में,” उसने कहा, “मुँह खोल।”
मैंने झिझकते हुए अपना मुँह खोला तो उसका लंड अंदर घुसता चला गया। बड़ी मुश्किल से ही उसके लंड के ऊपरी हिस्से को मुँह में ले पा रही थी। वह मेरे सिर को अपने लंड पर दबा रहा था। उसका लंड गले के द्वार पर जाकर फँस गया। मेरा दम घुटने लगा, मैं छटपटा रही थी। उसने अपने हाथों का जोर मेरे सिर से हटाया।
कुछ सेकंड के लिए कुछ राहत मिली तो मैंने अपना सिर ऊपर खींचा। लंड के कुछ इंच बाहर निकलते ही उसने वापस मेरा सिर दबा दिया। इस तरह वह मेरे मुँह में अपना लंड अंदर-बाहर करने लगा। मैंने कभी मुख मैथुन नहीं किया था इसलिए मुझे शुरू-शुरू में काफी दिक्कत हुई। उबकाई सी आ रही थी। धीरे-धीरे उसके लंड की आदी हो गई। अब मेरा शरीर भी गर्म हो गया था। मेरी योनि गीली होने लगी।
बाकी तीनों मेरे बदन को मसल रहे थे। मुख मैथुन करते-करते मुँह दर्द करने लगा था, मगर वह था कि छोड़ ही नहीं रहा था। कोई बीस मिनट तक मेरे मुँह को चोदने के बाद उसका लंड झटके खाने लगा। उसने अपना लंड बाहर निकाला।
“मुँह खोल कर रख,” उसने कहा। मैंने मुँह खोल दिया। ढेर सारा वीर्य उसकी लंड से तेज धार सी निकल कर मेरे मुँह में जा रहा था। जिसे एक आदमी मूवी कैमरा में कैद कर रहा था। जब मुँह में और न पाया तो काफी सारा वीर्य मुँह से छातियों पर टपकने लगा। उसने कुछ वीर्य मेरे चेहरे पर भी टपका दिया।
“बॉस का एक बूँद वीर्य भी बेकार नहीं जाए,” एक चमचे ने कहा। उसने अपनी उँगलियों से मेरी छातियों एवं मेरे चेहरे पर लगे वीर्य को समेट कर मेरे मुँह में डाल दिया। मुझे मन मार कर भी सारा गटकना पड़ा…
“इस रंडी को बेडरूम में ले चल,” अय्यूब ने कहा।
दो आदमी मुझे उठाकर लगभग खींचते हुए बेडरूम में ले गए। बेडरूम में एक बड़ा सा पलंग बिछा था। मुझे पलंग पर पटक दिया गया। अय्यूब अपने हाथों में ग्लास लेकर बिस्तर के पास एक कुर्सी पर बैठ गया।
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“चलो शुरू हो जाओ,” उसने अपने चमचों से कहा।
तीनों मुझ पर टूट पड़े। मेरी टाँगें फैला कर एक ने अपना मुँह मेरी योनि पर चिपका दिया। अपनी जीभ निकाल कर मेरी योनि को चूसने लगा। उसकी जीभ मेरे अंदर गर्मी फैला रही थी। मैंने उसके सिर को पकड़ कर अपनी योनि पर जोर से दबा रखा था। मैं छटपटाने लगी।
मुँह से “आआह्ह्ह ओओह्ह्ह ओओफ्फ्फ आआह्ह्ह उउईई” जैसी आवाजें निकल रही थीं। मैं अपना सिर झटक रही थी अपने ऊपर काबू रखने के लिए, मगर मेरा शरीर था कि बेकाबू होता जा रहा था। बाकी दोनों में से एक मेरे निप्पल्स पर दाँत गड़ा रहा था, तो एक ने मेरे मुँह में अपना लंड डाल दिया। सामूहिक संभोग का दृश्य था। और अय्यूब पास बैठा मुझे निचोड़ते हुए देख रहा था।
अय्यूब का लेने के बाद इस आदमी का लंड तो बच्चे जैसा लग रहा था। वह बहुत जल्दी झड़ गया। अब जो आदमी मेरी योनि चूस रहा था, वह मेरी योनि से अलग हो गया। मैंने अपनी योनि को जितना हो सकता था ऊँचा किया कि वह वापस अपनी जीभ अंदर डाल दे। मगर उसका इरादा कुछ और ही था।
उसने मेरी टाँगों को मोड़ कर अपने कंधे पर रख दिया और एक झटके में अपना लंड मेरी योनि में डाल दिया। इस अचानक हुए हमले से मैं छटपटा गई। अब वह मेरी योनि में तेज-तेज झटके मारने लगा। दूसरा जो मेरी छातियों को मसल रहा था, मेरी छाती पर सवार हो गया और मेरे मुँह में अपना लंड डाल दिया।
फिर मेरे मुँह को योनि की तरह चोदने लगा। उसके अंडकोष मेरी ठुड्डी से रगड़ खा रहे थे। दोनों जोर-जोर से धक्के लगा रहे थे। मेरी योनि पानी छोड़ने लगी। मैं चीखना चाह रही थी, मगर मुँह से सिर्फ “उम्म्म उम्फ्फ” जैसी आवाज ही निकल रही थी। दोनों एक साथ वीर्य निकाल कर मेरे बदन पर लुढ़क गए।
मैं जोर-जोर से साँसें ले रही थी। बुरी तरह थक गई थी, मगर आज मेरे नसीब में आराम नहीं लिखा था। उनके हटते ही अय्यूब उठा और मेरे पास आकर मुझे खींच कर उठाया और बिस्तर के कोने पर चौपाया बना दिया। फिर वह बिस्तर के पास खड़े होकर अपना लंड मेरी टपकती योनि पर लगाया और एक झटके से अंदर डाल दिया।
योनि गीली होने के कारण उसका मूसल जैसा लंड लेते हुए भी कोई दर्द नहीं महसूस हुआ। मगर ऐसा लग रहा था मानो वह मेरे पूरे शरीर को चीरता हुआ मुँह से निकल जाएगा। फिर वह धक्के देने लगा। मजबूत पलंग भी उसके धक्कों से चरमराने लगा। फिर मेरी क्या हालत हो रही होगी इसकी तो सिर्फ कल्पना ही की जा सकती है। मैं चीख रही थी। ये कहानी आप हमारी वासना डॉट नेट पर पढ़ रहे है.
“आआह्ह्ह ओओह्ह्ह प्लीज। प्लीज मुझे छोड़ दो। आआह्ह आआह्ह नााहीं प्लीज,” मैं तड़प रही थी, मगर वह था कि अपनी रफ्तार बढ़ाता ही जा रहा था। पूरे कमरे में फुच-फुच की आवाजें गूँज रही थीं। बाकी तीनों उठ कर मेरे करीब आए थे और मेरी चुदाई का नजारा देख रहे थे।
मैं बस दुआ कर रही थी कि उसका लंड जल्दी पानी छोड़ दे। मगर पता नहीं वह किस चीज का बना हुआ था कि उसकी रफ्तार में कोई कमी नहीं आ रही थी। कोई आधे घंटे तक मुझे चोदने के बाद उसने अपना वीर्य मेरी योनि में डाल दिया। मैं मुँह के बल बिस्तर पर गिर गई। मेरा पूरा शरीर बुरी तरह टूट रहा था। गला सूख रहा था।
“पानी,” मैंने पानी माँगा तो एक ने एक ग्लास पानी मेरे होंठों से लगा दिया। मेरे होंठ वीर्य से लिसड़े हुए थे। उन्हें पोंछ कर मैंने गटागट पूरा पानी पी लिया। पानी पीने के बाद शरीर में कुछ जान आई। तीनों वापस मेरे बदन से चिपक गए। अब मैं बिस्तर के किनारे पैर लटकाकर बैठ गई।
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एक का लंड अपनी दोनों छातियों के बीच ले रखी थी और बाकी दोनों के लंड को बारी-बारी से मुँह में लेकर चूस रही थी। वह मेरी छातियों को चोद रहा था। मैं अपने दोनों हाथों से अपनी छातियों को उसके लंड पर दोनों ओर से दबा रखी थी। उसने मेरी छातियों पर वीर्य गिरा दिया।
फिर बाकी दोनों मुझे बारी-बारी से चौपाया बनाकर चोदे। उनके वीर्य पट हो जाने के बाद वे चले गए। मैं बिस्तर पर चित पड़ी हुई थी। दोनों पैर फैले हुए थे। मेरी योनि से वीर्य चूकर बिस्तर पर गिर रहा था। मेरे बाल, चेहरा, छातियाँ सब पर वीर्य फैला हुआ था।
छातियों पर दाँत के लाल-नीले निशान नजर आ रहे थे। अय्यूब पास खड़ा मेरे बदन की तस्वीरें खींच रहा था, मगर मैं उसे मना करने की स्थिति में नहीं थी। गला भी दर्द कर रहा था। अय्यूब बिस्तर के पास आकर मेरे निप्पल्स को पकड़ कर उन्हें उमेठते हुए अपनी ओर खींचा। मैं दर्द के मारे उठती चली गई और उसके बदन से सट गई।
“जा किचन में। भीमा ने खाना बना लिया होगा। टेबल पर खाना लगा। और हाँ तू इसी तरह रहेगी,” मुझे कमरे के दरवाजे की तरफ धकेल कर मेरे नग्न नितंब पर एक चपत लगाई।
मैं अपने शरीर को सिकोड़ते हुए एक हाथ से अपने स्तन युगल को और एक हाथ से अपने टाँगों के जोड़ को ढकने की असफल कोशिश करती हुई किचन में प्रवेश हुई। अंदर ४५ साल का एक रसोइया था। जिसने मुझे देख कर एक सीटी बजाई। और मेरे पास आकर मुझे सीधा खड़ा कर दिया। मैं झुकी जा रही थी। मगर उसने मेरी नहीं चलने दी। जबरदस्ती मेरे सीने पर से हाथ हटा दिया।
“शानदार,” उसने कहा। मैं शर्म से दूहरी हो रही थी। एक निचले स्तर के गँवार के सामने अपनी इज्जत बचाने में असमर्थ थी। उसने फिर खींच कर योनि पर से दूसरा हाथ हटाया। मैंने टाँगें सिकोड़ लीं। यह देख कर उसने मेरे स्तनों को मसल दिया। स्तनों को उससे बचाने के लिए नीचे की ओर झुकी तो उसने अपनी दो उँगलियाँ मेरी योनि में पीछे की तरफ से डाल दीं। मेरी योनि वीर्य से गीली हो रही थी।
“खूब चुदाई हुई लगता है,” उसने कहा।
“शेर खुद खाने के बाद कुछ बोटियाँ गीदड़ों के लिए भी छोड़ देता है। एक-आध मौका साहब मुझे भी देंगे, तब तेरी खबर लूँगा,” कहकर उसने मुझे अपने बदन से लपेट लिया।
“अय्यूबजी ने खाना लगाने के लिए कहा है,” मैंने उसे धक्का देते हुए कहा। उसने मुझसे अलग होने से पहले मेरे होंठों को एक बार कस कर चूम लिया।
“चल तुझे तो तसल्ली से चोदेंगे, पहले साहब को जी भर के मसल लेने दो,” उसने कहा। फिर मुझे खाने का सामान पकड़ाने लगा।
मैंने टेबल पर खाना लगाया। फिर डिनर उसकी गोद में बैठ कर लेना पड़ा। वह भी नग्न बैठा था। उसका लंड सिकुड़ा हुआ था। मेरी योनि उसके नरम पड़े लंड को चूम रही थी। खाते हुए कभी मुझे मसलता, कभी चूमता जा रहा था। उसके मुँह से शराब की दुर्गंध आ रही थी। वह जब भी मुझे चूमता, मुझे उसपर गुस्सा आ जाता। खाते-खाते ही उसने मोबाइल पर शाह को रिंग किया।
“हैलो, कौन शाह?”
“क्या कर रहा है?”
“अबे इधर आ जा। घर पर बोल देना कि रात में कहीं गश्त पर जाना है। यहीं रात गुजारेंगे। हमारे राजीव साहब की जमानत यहीं है मेरी गोद में,” कहकर उसने मेरे एक निप्पल को जोर से उमेठा। दोनों निप्पल बुरी तरह दर्द कर रहे थे। नहीं चाहते हुए भी मैं चीख उठी।
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“सुना? अब झट्ट-झट आ जा, सारे काम छोड़ कर। रात भर अपन दोनों इसकी जाँच-पड़ताल करेंगे।”
मैं समझ गई कि अय्यूब ने इंस्पेक्टर शाह को रात में अपने घर बुलाया है। और दोनों रात भर मुझे चोदेंगे।
खाना खाने के बाद मुझे बाँहों में समेटे हुए ड्रॉइंग रूम में आ गया। मुझे अपनी बाँहों में लेकर मेरे होंठों पर अपने मोटे-मोटे भद्दे होंठ रख कर चूमने लगा। फिर अपनी जीभ मेरे मुँह में डाल दी। और मेरे मुँह का अपनी जीभ से मुआयना करने लगा। फिर वह सोफे पर बैठ गया और मुझे जमीन पर अपने कदमों पर बिठाया।
टाँगें खोल कर मुझे अपनी टाँगों की जोड़ पर खींच लिया। मैं उसका इशारा समझ कर उसके लंड को चूमने लगी। वह मेरे बालों पर हाथ फेर रहा था। फिर मैंने उसके लंड को मुँह में ले लिया। उसके लंड को चूसने लगी। जीभ निकाल कर उसके लंड के ऊपर फिराने लगी।
धीरे-धीरे उसका लंड हरकत में आता जा रहा था। वह मेरे मुँह में फूलने लगा। मैं और तेजी से उसके लंड पर अपना मुँह चलाने लगी। कुछ ही देर में लंड फिर से पूरी तरह तन कर खड़ा हो गया था। वापस उसे योनि में लेने की सोच कर ही झुरझुरी सी आ रही थी। योनि का तो बुरा हाल था। ये कहानी आप हमारी वासना डॉट नेट पर पढ़ रहे है.
ऐसा लग रहा था मानो अंदर से छिल गया हो। मैं इसलिए उसके लंड पर और तेजी से मुँह ऊपर-नीचे करने लगी जिससे उसका मुँह में ही निकल जाए। मगर वह तो पूरा सांड की तरह स्टैमिना रखता था। मेरी बहुत कोशिशों के बाद उसके लंड से प्रीकम निकलने लगा। मैं थक गई, मगर उसके लंड से वीर्य निकला ही नहीं। तभी दरबान ने आकर शाह के आने की सूचना दी।
“उसे यहीं भेज दे।” मैं उठने लगी तो उसने कंधे पर जोर लगा कर कहा,
“तू कहाँ उठ रही है। चल अपना काम करती रह।” कहकर उसने वापस मेरे मुँह से अपना लंड सटा दिया। मैंने भी मुँह खोल कर उसके लंड को वापस अपने मुँह में ले लिया।
तभी शाह अंदर आया। वह कोई छह फीट का लंबा कद्दावर बदन वाला आदमी है। मेरे ऊपर नजर पड़ते ही उसका मुँह खुला का खुला रह गया। मैंने कटार नजरों से उसकी तरफ देखा।
“वाह भाई अय्यूब, क्या नजारा है। इस हूर को कैसे वश में किया।”
शाह ने हँसते हुए कहा।
“आ बैठ। बड़ी शानदार चीज है। मक्खन की तरह मुलायम और भट्टी की तरह गरम,” अय्यूब ने मेरे सिर को पकड़ कर उसकी तरफ घुमाया, “ये है रागिनी सिंह। अपने राजीव की बीवी। इसने कहा मेरे पति को छोड़ दो, मैंने कहा रात भर के लिए मेरे लंड पर बैठक लगा, फिर देखेंगे। समझदार औरत है, मान गई। अब ये रात भर तेरे पहलू को गर्म करेगी। जितनी चाहे ठोको।”
शाह आकर पास में बैठ गया। अय्यूब ने मुझे उसकी ओर धकेल दिया। शाह मुझे खींच कर अपनी गोद में बिठा लिया। और मुझे चूमने लगा। मुझे तो अब अपने ऊपर घिन सी आने लगी थी। मगर इनकी बात तो माननी ही थी। वरना ये तो मुर्दे को भी नोच लेते हैं। मेरे बदन को अय्यूब ने साफ करने नहीं दिया था। इसलिए जगह-जगह वीर्य सूख कर सफेद पपड़ी की तरह दिख रही थी। दोनों स्तनों पर लाल-लाल दाग देख कर शाह ने कहा,
“तू तो लगता है काफी जमानत वसूल कर चुका है।”
“हाँ सोच पहले देखूँ तो सही अपने स्टैंडर्ड की है या नहीं,” अय्यूब ने कहा।
“प्लीज साहब मुझे छोड़ दीजिए, सुबह तक मैं मर जाऊँगी,” मैंने शाह से मिन्नतें कीं।
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“घबरा मत, सुबह तक तो तुझे वैसे ही छोड़ देंगे। जिंदगी भर तुझे अपने पास थोड़े ही रखना है,” शाह ने मेरे निप्पल्स को दो उँगलियों के बीच मसलते हुए कहा।
“तूने अगर अब एक भी बकवास की ना तो तेरा टेंटुआ दबा दूँगा,” अय्यूब ने गुर्राते हुए कहा, “तेरी अकड़ पूरी तरह गई नहीं है शायद,” कहकर उसने मेरी दोनों छातियों को पकड़ कर ऐसा उमेठा कि मेरी तो जान ही निकाल गई।
“ओउईई माँ मर गई,” मैं पूरी ताकत से चीख उठी।
“जा जाकर शाह के लिए शराब का एक पेग बना ला। और टेबल तक घुटनों के बल जाएगी समझी,” अय्यूब ने तेज आवाज में कहा। इतनी जालत तो शायद किसी को नहीं मिली होगी। मैं हाथों और घुटनों के बल डाइनिंग टेबल तक गई। मेरी छातियाँ पके अनारों की तरह झूल रही थीं। मैं उसके लिए एक पेग बना कर लौट आई।
“गुड, अब कुछ पालतू होती लग रही है।”
शाह ने मेरे हाथ से ग्लास लेकर मुझे खींच कर वापस अपनी गोद में बिठा लिया। फिर मेरे होंठों से ग्लास को छुआते हुए कहा, “ले एक सिप कर।” मैंने अपना चेहरा मोड़ लिया। मैंने जिंदगी में कभी शराब को हाथ भी नहीं लगाया था। हमारे घरों में ये सब चलता था, मगर मेरे राजीव ने भी कभी शराब को नहीं छुआ था। उसने वापस ग्लास मेरे होंठों से लगाया। मैंने साँस रोक कर थोड़ा सा अपने मुँह में लिया। बदबू इतनी थी कि उबकाई आने लगी। वे नाराज हो जाएँगे सोच कर जैसे-तैसे उसे पी लिया।
“और नहीं। प्लीज, मैं आप लोगों को कुछ भी करने से नहीं रोक रही। ये काम मुझसे नहीं होगा,” पता नहीं दोनों को क्या सूझा कि फिर उन्होंने मुझे पीने के लिए जोर नहीं किया।
शाह मेरे बदन पर हाथ फेर रहा था। मेरे स्तनों को चूम रहा था और अपना ग्लास खाली कर रहा था। मुझे फिर अपनी गोद से उतार कर जमीन पर बिठा दिया। मैंने उसकी पैंट की जिप खोली और उसके लंड को निकाल कर उसे मुँह में ले ली। अपने एक हाथ से अय्यूब के लंड को सहला रही थी।
बारी-बारी से दोनों लंड को मुँह में भर कर कुछ देर तक चूसती और दूसरे के लंड को मुट्ठी में भर कर आगे-पीछे करती। फिर यही काम दूसरे के साथ करती। काफी देर तक दोनों शराब पीते रहे, फिर शाह उठ कर मुझे एक झटके से गोद में उठा लिया और बेडरूम में ले गया। बेडरूम में आकर मुझे बिस्तर पर पटक दिया।
अय्यूब भी साथ-साथ आ गया था। वह तो पहले से ही नग्न था। शाह भी अपने कपड़े उतारने लगा। मैं बिस्तर पर लेटी उसको अपने कपड़े उतारते देख रही थी। मैंने उनके अगले कदम के बारे में सोच कर अपने आप अपने पैर फैला दिए। मेरी योनि बाहर दिखने लगी। शाह का लंड अय्यूब की तरह ही मोटा और काफी लंबा था।
उसने अपने कपड़े वहीं फेंक कर बिस्तर पर चढ़ गया। मैं उसके लंड को हाथ में लेकर अपनी योनि की ओर खींची। मगर वह आगे नहीं बढ़ा। उसने मुझे बाँहों से पकड़ कर उल्टा कर दिया और मेरे नितंबों से चिपक गया। अपने हाथों से दोनों नितंबों को अलग कर के छेद पर उँगली फिराने लगा। ये कहानी आप हमारी वासना डॉट नेट पर पढ़ रहे है.
मैं उसका इरादा समझ गई कि वह मेरे गुदा को फाड़ने का इरादा बनाए हुए है। मैं डर से चिहुँक उठी क्योंकि इस ओर मैं अभी तक अनजान थी। सुना था कि अप्राकृतिक मैथुन में बहुत दर्द होता है। और शाह का इतना मोटा लंड कैसे जाएगा, ये भी सोच रही थी।
अय्यूब ने उसकी ओर क्रीम का एक डिब्बा बढ़ाया। उसने ढेर सारा क्रीम लेकर मेरे पिछले छेद पर लगा दिया, फिर एक उंगली से उसे छेद के अंदर तक लगा दिया। उंगली के अंदर जाते ही मैं उछल पड़ी। पता नहीं आज मेरी क्या दुर्गति होने वाली थी। इन आदमखोरों से रहम की उम्मीद करना बेवकूफी थी।
अय्यूब मेरे चेहरे के सामने आकर मेरा मुँह जोर से अपने लंड पर दाब दिया। मैं छटपटा रही थी तो उसने मुझे सख्ती से पकड़ रखा था। मुँह से गूँ-गूँ की आवाज ही निकल पा रही थी। शाह ने मेरे नितंबों को फैला कर मेरे गुदा द्वार पर अपना लंड सटाया। फिर आगे की ओर एक तेज धक्का लगाया।
उसके लंड के आगे के हिस्से मेरे पिछले जगह बनाते हुए धँस गया। मेरी हालत खराब हो रही थी। आँखें बाहर की ओर उबल कर आ रही थीं। कुछ देर उसी पोजीशन में रुका रहा। दर्द हल्का सा कम हुआ तो उसने दुगुने वेग से एक और धक्का लगाया। मुझे लगा मानो कोई मोटा मूसल मेरे अंदर डाल दिया गया हो।
वह इसी तरह कुछ देर तक रुका रहा। फिर उसने अपने लंड को हरकत दे दी। मेरी जान निकाली जा रही थी। वह दोनों आगे और पीछे से अपने-अपने दंडों से मेरी कुटाई किए जा रहे थे। धीरे-धीरे दर्द कम होने लगा। फिर तो दोनों तेज-तेज धक्के मारने लगे। दोनों में मानो कॉम्पिटिशन हो रही थी कि कौन देर तक रुकता है। मगर मेरी हालत की किसे चिंता थी।
अय्यूब के स्टैमिना की तो मैं लोहा मानने लगी। तकरीबन घंटे भर बाद दोनों ने अपने-अपने लंड से पिचकारी छोड़ दी। मेरे दोनों छेद टपकने लगे। फिर तो रात भर न तो खुद सोए, न मुझे सोने दिया। सुबह तक तो मैं भाव-शून्य हालत में हो गई थी। सुबह दोनों मेरे जिस्म को जी भर कर नोचने के बाद चले गए। जाते-जाते अय्यूब अपने नौकर से कह गया,
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“इसे गर्म-गर्म दूध पिला। इसकी हालत थोड़ी ठीक हो तो घर पर छुड़वा देना। और तू भी कुछ देर चाहे तो मुँह मार ले।”
मैं बिस्तर पर बिना किसी हलचल के पड़ी थी। टाँगें दोनों फैली हुई थीं। तीनों छेदों पर वीर्य के निशान थे। पूरे बदन पर अंगिनत दाँतों के और वीर्य के निशान पड़े हुए थे। स्तन और निप्पल सूजे हुए थे। कुछ यही हालत मेरी योनि की भी हो रही थी। फटी-फटी आँखों से दोनों को देख रही थी।
“तू घर जा, तेरे पति को दो-एक घंटों में रिहा कर दूँगा,” शाह ने पैंट पहनते हुए कहा, “भाई अय्यूब मजा आ गया। क्या पटाखा ढूँढ लाया है। तबीयत खुश हो गई। हम अपनी बातों से फिरने वाले नहीं हैं। तुझे कभी भी मेरी जरूरत पड़े तो जान हाजिर है।”
अय्यूब मुस्कुरा दिया। फिर दोनों तैयार होकर निकल गए। मैं वैसी ही नग्न पड़ी रही बिस्तर पर। तभी भीमा दूध का ग्लास लेकर आया और मुझे सहारा देकर उठाया। मैंने उसके हाथों से दूध का ग्लास ले लिया। उसने मुझे एक पेनकिलर भी दिया। मैंने दूध का ग्लास खाली कर दिया।
उसने खाली ग्लास हाथ से लेकर मेरे होंठों पर लगे दूध को अपनी जीभ से चाट कर साफ कर दिया। कुछ देर तक मेरे होंठों को चूमता रहा और मेरे बदन पर आहिस्ता से हाथ फेरता रहा। फिर वह उठा और डेटॉल लाकर मेरे जख्मों पर लगा दिया। अब मैं शरीर में कुछ जान महसूस कर रही थी।
फिर कुछ देर बाद आकर मुझे सहारा देकर उठाया और मेरे बदन को बाँहों में भर कर मुझे उसी हालत में बाथरूम में ले गया। वहाँ काफी देर तक उसने मुझे गर्म पानी से नहलाया। बदन पोंछ कर मुझे बिस्तर पर ले गया। मुझे मेरे कपड़े लाकर दिए। वह जैसे ही जाने लगा, मैंने उसका हाथ पकड़ लिया।
मेरी आँखों में उसके लिए कृतज्ञता के भाव थे। मैं उसके करीब आकर उसके बदन से लिपट गई। मैं तब बहुत हल्का महसूस कर रही थी। मैं खुद ही उसका हाथ पकड़ कर बिस्तर पर ले गई। मैंने उससे लिपटे हुए ही उसकी पैंट की तरफ हाथ बढ़ाया। मैं उसके एहसानों का बदला चुकाना चाहती थी। वह मेरे होंठों को, मेरी गर्दन को, मेरे गालों को चूमने लगा। मेरे स्तनों पर हल्के से हाथ फिराने लगा।
“प्लीज मुझे प्यार करो। इतना प्यार करो कि कल रात की घटनाएँ मेरे दिमाग से हमेशा के लिए उतर जाएँ,” मैं बेतहाशा रोने लगी।
वह मेरे एक-एक अंग को चूम रहा था। एक-एक अंग को सहलाता प्यार करता। उसके होंठ फूलों की पंखुड़ियों की तरह पूरे बदन पर महसूस कर रही थी। अब मैं खुद ही गर्म होने लगी। मैं खुद ही उससे लिपटने लगी, उसे चूमने लगी। उसका हाथ मैंने अपने हाथों में लेकर अपनी योनि पर रख दिया।
वह मेरी योनि को सहलाने लगा। फिर उसने मुझे बिस्तर के कोने पर बिठा कर मेरे सामने घुटनों के बल मुड़ गया। मेरे दोनों पैरों को अपने कंधे पर चढ़ा कर मेरी योनि पर अपने होंठ चिपका दिए। उसकी जीभ साँप की तरह सरसराती हुई उसके मुँह से निकल कर मेरी योनि में प्रवेश कर गई।
मैंने उसके सिर को अपने हाथों में ले रखा था। उत्तेजना में मैं उसके बालों को सहला रही थी, उसके सिर को योनि पर दबा रही थी। मेरे मुँह से सिसकारियाँ निकल रही थीं। कुछ देर में मैं तो अपनी कमर उचकाने लगी। और उसके मुँह पर ही ढेर हो गई। मेरे शरीर से मेरा सारा विषाद मेरे वीर्य के रूप में निकलने लगा।
वह मेरे वीर्य को अपने मुँह में खींचता जा रहा था। कल से इतनी बार मेरे साथ संभोग हुआ कि मैं गिनती ही भूल गई, मगर आज भीमा की हरकतों से मेरा खुल कर वीर्यपात हुआ। भीमा के साथ मैं पूरे दिल से संभोग कर रही थी। इसलिए अच्छा भी लग रहा था। ये कहानी आप हमारी वासना डॉट नेट पर पढ़ रहे है.
मैंने उसे बिस्तर पर पटका और उसके ऊपर सवार हो गई। उसके बदन से कपड़ों को नोच कर हटा दी। उसका मोटा ताजा लंड तना हुआ खड़ा था। काफी बलिष्ठ बदन था। मैं उसके बदन को चूमने लगी। वह उठने की कोशिश किया तो मैंने गुर्राते हुए कहा, “चुपचाप पड़ा रह। मेरे बदन को भोगना चाहता था न, तो फिर भाग क्यों रहा है। ले भोग मेरे बदन को।”
मैंने उसे चित लिटा दिया और उसके लंड के ऊपर अपनी योनि रखी। अपने हाथों से उसके लंड को सेट किया और उसके लंड पर बैठ गई। उसका लंड मेरी योनि की दीवारों को चूमता हुआ अंदर चला गया। फिर तो मैं उसके लंड पर उठने-बैठने लगी। मैंने सिर पीछे की ओर झटक दिया और अपने हाथों को उसके सीने पर फिराने लगी। वह मेरे स्तनों को सहला रहा था।
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मेरे निप्पल्स को उँगलियों से इधर-उधर घुमा रहा था। निप्पल्स भी एक्साइटमेंट में खड़े हो गए थे। काफी देर तक इस पोजीशन में करने के बाद मुझे वापस नीचे लिटा कर मेरे टाँगों को अपने कंधे पर रख दिया। इससे योनि ऊपर की ओर हो गई। अब लंड योनि में जाता हुआ साफ दिख रहा था। हम दोनों उत्तेजित हो कर एक साथ झड़ गए। वह मेरे बदन पर ही लुढ़क गया और तेज-तेज साँसें लेने लगा। मैंने उसके होंठों पर एक प्यार भरा चुम्बन दिया। फिर नीचे उतर कर तैयार हो गई। भीमा मुझे घर तक छोड़ आया।
दोपहर तक मेरे पति रिहा होकर घर आ गए। अय्यूब ने अपना बयान बदल लिया था। मैंने उन्हें उनकी जमानत की कीमत नहीं बताई। मगर अगले दिन ही उस कंपनी को छोड़ कर वहाँ से वापस जाने का मैंने ऐलान कर दिया। राजीव ने भले ही कुछ नहीं पूछा, मगर शायद उसे भी उसकी रिहाई की कीमत की भनक पड़ गई थी। इसलिए उसने भी मुझे ना नहीं किया और हम कुछ ही दिन में अपना थोड़ा-बहुत सामान पैक करके वो शहर छोड़ कर वापस जालंधर आ गए।
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