Garam Bahan Bathroom Chudai
दुनिया में कुछ बाते कब और कैसे हो जाती है ये कहना बहुत मुश्किल है. जिसके बारे में आपने कभी कल्पना भी नहीं की होती वैसी घटनाये आपके जीवन को पूरी तरह से बदल कर रख देती है. बात इधर उधर घुमाने की जगह सीधा कहानी पर आता हूँ. मैं मुंबई में रहता था और वही एक प्राइवेट फर्म में नौकरी करने के साथ कंप्यूटर कोर्स भी करता था. Garam Bahan Bathroom Chudai
मेरी बड़ी बहन भी वही रहती थी रहती थी. उसका पति एक प्राइवेट फर्म में काम करता था. अच्छा कमाता था, और उसने एक छोटा सा एक बेडरूम वाला फ्लैट ले रखा था. उनका घर छोटा होने के कारण मैं वहां नहीं रह सकता था. मगर उनके घर के पास ही मैंने भी एक कमरा किराये पर ले लिया था.
मेरी बहन का नाम कविता था. शादी के 4 साल बाद भी उसे कोई बच्चा नहीं था और शायद होने की सम्भावना भी नहीं थी. क्योंकि उसका पति थोड़ा सनकी किस्म का था . उसके दिमाग में पता नहीं कहाँ से अमीर बन ने का भूत सवार हो गया था. हालाँकि ये हमारे परिवार की जरुरत थी. वो हर समय दुबई जाने के बारे में बाते करता रहता था.
हालाँकि दीदी उसकी इन बातो से कभी-कभी चिढ जाती थी मगर फिर भी वो उसके विचारो से सहमत थी. फिर एक दिन ऐसा आया जब वो सच में दुबई चला गया. वहाँ उसे एक फर्म में नौकरी मिल गई थी. तब मैंने किराया बचाने और दीदी की सुविधा के लिए अपना किराये का कमरा छोड़ कर अपने आप को दीदी के एक बेडरूम फ्लैट में शिफ्ट कर लिया.
ड्राइंग रूम के एक कोने में रखा हुआ दीवान मेरा बिस्तर बना और मैं उसी पर सोने लगा . दीदी अपने बेडरूम में सोती थी. एक ओर साइड में रसोइ और दूसरी तरफ लैट्रीन और बाथरूम. रात में दीदी बेडरूम के दरवाजे को पूरी तरह बंद नहीं करती थी केवल सटा भर देती थी.
अगर दरवाजा थोड़ा सा भी अलग होता था तो उसके कमरे की नाईट बल्ब की रौशनी मुझे ड्राइंग रूम में भी आती थी. दरवाजे के खुले होने के कारण मुझे रात को जब मुठ मारने की तलब लगती थी तब मुझे बड़ी सावधानी बरतनी पड़ती थी. क्योंकि हमेशा डर लगा रहता था की पता नहीं दीदी कब बाहर आ जायेगी.
लड़कियो के प्रति आकर्षण तो शुरू से था. आस-पास की लड़कियो और शादी शुदा औरतो को देख-देख कर मूठ मारा करता था. दीदी के साथ रहते हुए मैंने इस बात को महसूस किया की मेरी दीदी वाकई बहुत ही खूबसूरत औरत है. ऐसा नहीं था की दीदी शादी के पहले खूबसूरत नहीं थी. दीदी एकदम गोरी चिट्टी और तीखे नाक-नक्शे वाली थी.
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पर दीदी और मेरे उम्र के बीच करीब 6 से 7 साल का फर्क था, इसलिए जब दीदी कुंवारी थी तो मेरी उतनी समझदारी ही नहीं थी की मैं उनकी सुन्दरता को समझ पाता या फिर उसका आकलन कर पाता. फिर शादी के बाद दीदी अलग रहने लगी थी. अब जब मैं जवान और समझदार हो गया था और हम दुबारा साथ रहने लगे तो मुझे अपनी दीदी को काफी नजदीक से देखने का अवसर मिल रहा था और यह अहसास हो रहा था की वाकई मेरी बहन लाखो में एक हैं.
शादी के बाद से उसका बदन थोड़ा मोटा हो गया था. मतलब उसमे भराव आ गया था. पहले वो दुबली पतली थी मगर अब उसका बदन गदरा गया था. शायद ये उम्र का भी असर था क्योंकि उसकी उम्र भी 31-32 के आस पास की हो गई थी . उसके गोरे सुडौल बदन में गजब का भराव और लोच था. चलने का अंदाज बेहद आकर्षक और क्या कह सकते है कोई शब्द नहीं मिल रहा शायद सेक्सी था.
कभी चुस्त सलवार कमीज़ तो कभी साडी ब्लाउज जो भी वो पहनती थी उसका बदन उसमे और भी ज्यादा निखर जाता था. चुस्त सलवार कुर्ती में तो हद से ज्यादा सेक्सी दिखती. दीदी जब वो पहनती थी उस समय सबसे ज्यादा आकर्षण उसकी टांगो में होता था . सलवार उसके पैरो से एकदम चिपकी हुई होती थी. जैसा की आप सभी जानते है ज्यादातर अपने यहाँ जो भी चुस्त सलवार बनती है वो झीने सूती कपड़ो की होती है.
इसलिए दीदी की सलवार भी झीने सूती कपड़े की बनी होती थी और वो उसके टांगो से एकदम चिपकी हुई होती. कमीज़ थोरी लम्बी होती थी मगर ठीक कमर के पास आकर उसमे जो कट होता था असल में वही जानलेवा होता था. कमीज़ का कट चलते समय जब इधर से उधर होता तो चुस्त सलवार में कसी हुई मांसल जांघे और चुत्तर दिख जाते थे.
कविता दीदी की जांघे एकदम ठोस, गदराई और मोटी कन्दली के खंभे जैसी थी फिर उसी अनुपात में चुत्तर भी थे. एकदम मोटे मोटे , गोल-मटोल गदराये, मांसल और गद्देदार जो चलने पर हिलते थे. सीढियों पर चढ़ते समय कई बार मुझे कविता दीदी के पीछे चलने का अवसर प्राप्त हुआ था. सीढियाँ चढ़ते समय जब साडी या सलवार कमीज में कसे हुए उनके चुत्तर हिलते थे, तो पता नहीं क्यों मुझे बड़ी शर्मिंदगी महसूस होती थी.
इसका कारण शायद ये था की मुझे उम्र में अपने से बड़ी और भरे बदन वाली लड़कियोँ या औरते ज्यादा अच्छी लगती थी. सीढियों पर चढ़ते समय जब कविता दीदी के तरबूजे के जैसे चुत्तर के दोनों फांक जब हिलते तो पता नहीं मेरे अन्दर कुछ हो जाता था. मेरी नज़रे अपने आप पर काबू नहीं रख पाती और मैं उन्हें चोर नजरो से देखने की कोशिश करता.
पीछे से देखते समय मेरा सामना चूँकि दीदी से नहीं होता था इसलिए शायद मैं उनको एक भरपूर जवान औरत के रूप में देखने लगता था और अपने आप को उनके हिलते हुए चूत्तरों को देखने से नहीं रोक पाता था. अपनी ही दीदी के चुत्तरों को देखने के कारण मैं अपराधबोध से ग्रस्त हो शर्मिंदगी महसूस करता था.
कई बार वो चुस्त सलवार पर शोर्ट कुर्ती यानि की छोटी जांघो तक की कुर्ती भी पहन लेती थी. उस दिन मैं उनसे नज़रे नहीं मिला पाता था. मेरी नज़रे जांघो से ऊपर उठ ही नहीं पाती थी. शोर्ट कुर्ती से झांकते चुस्त सलवार में कसे मोटे मोटे गदराये जांघ भला किसे अच्छे नहीं लगेंगे भले ही वो आपकी बहन के हो. पर इसके कारण आत्मग्लानी भी होती थी और मैं उनसे आंखे नहीं मिला पाता था.
दीदी की चुत्तर और जांघो में जो मांसलता आई थी वही उनकी चुचियों में भी देखने को मिलती थी. उनके मोटे चुत्तर और गांड के अनुपात में ही उनकी चुचियाँ भी थी. चुचियों के बारे में यही कह सकते है की इतने बड़े हो की आपकी हथेली में नहीं समाये पर इतने ज्यादा बड़े भी न हो की दो हाथो की हथेलियों से भी बाहर निकल जाये.
कुल मिला कर ये कहे तो शरीर के अनुपात में हो. कुछ १८-१९ साल की लड़कीयों जो की देखने में खूबसूरत तो होंगी मगर उनकी चुचियाँ निम्बू या संतरे के आकार की होती है. जवान लड़कियोँ की चुचियों का आकार कम से कम बेल या नारियल के फल जितना तो होना ही चाहिए. निम्बू तो चौदह-पंद्रह साल की छोकरियों पर अच्छा लगता है.
कई बार ध्यान से देखने पर पता चल पाता है की पुशअप ब्रा पहन कर फुला कर घूम रही है. इसी तरह कुछ की ऐसी ढीली और इतनी बड़ी-बड़ी होगी की देख कर मूड ख़राब हो जायेगा. लोगो का मुझे नहीं पता मगर मुझे तो एक साइज़ में ढली चूचियां ही अच्छी लगती है. शारीरिक अनुपात में ढली में हुई, ताकि ऐसा न लगे की पुरे बदन से भारी तो चूचियां है या फिर चूची की जगह पर सपाट छाती लिए घूम रही हो.
सुन्दर मुखड़ा और नुकीली चुचियाँ ही लड़कियों को माल बनाती है. एकदम तीर की तरह नुकीली चुचिया थी दीदी की. भरी-भरी, भारी और गुदाज़. गोल और गदराई हुई. साधारण सलवार कुर्ती में भी गजब की लगती थी. बिना चुन्नी के उनकी चूचियां ऐसे लगती जैसे किसी बड़े नारियल को दो भागो में काट कर उलट कर उनकी छाती से चिपका दिया गया है.
घर में दीदी ज्यादातर साड़ी या सलवार कमीज़ में रहती थी . गर्मियों में वो आम तौर पर साड़ी पहनती थी . शायद इसका सबसे बड़ा कारण ये था की वो घर में अपनी साड़ी उतार कर, केवल पेटीकोट ब्लाउज में घूम सकती थी. ये एक तरह से उसके लिए नाईटी या फिर मैक्सी का काम करता था. अगर कही जाना होता था तो वो झट से एक पतली सूती साड़ी लपेट लेती थी.
मेरी मौजूदगी से भी उसे कोई अंतर नहीं पड़ता था, केवल अपनी छाती पर एक पतली चुन्नी डाल लेती थी. पेटीकोट और ब्लाउज में रहने से उसे शायद गर्मी कम लगती थी. मेरी समझ से इसका कारण ये हो सकता है की नाईटी पहनने पर भी उसे नाईटी के अन्दर एक स्लिप और पेटीकोट तो पहनना ही पड़ता था, और अगर वो ऐसा नहीं करती तो उसकी ब्रा और पैन्टी दिखने लगते, जो की मेरी मौजूदगी के कारण वो नहीं चाहती थी.
जबकि पेटीकोट जो की आम तौर पर मोटे सूती कपड़े का बना होता है एकदम ढीला ढाला और हवादार. कई बार रसोई में या बाथरूम में काम समय मैंने देखा था की वो अपने पेटीकोट को उठा कर कमर में खोस लेती थी जिससे घुटने तक उसकी गोरी गोरी टांगे नंगी हो जाती थी. दीदी की पिंडलियाँ भी मांसल और चिकनी थी.
वो हमेशा एक पतला सा पायल पहने रहती थी. मैं कविता दीदी को इन्ही वस्त्रो में देखता रहता था मगर फिर भी उनके साथ एक सम्मान और इज्ज़त भरे रिश्ते की सीमाओं को लांघने के बारे में नहीं सोचता था. वो भी मुझे एक मासूम सा लड़का समझती थी और भले ही किसी भी अवस्था या कपड़े में हो, मेरे सामने आने में नहीं हिचकिचाती थी.
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ड्राइंग रूम में बैठे हुए रसोई में जहॉ वो खाना बनाती थी वो सब ड्राइंग रूम में रखे अल्मीराह में लगे आईने (mirror) में स्पष्ट दिखाई पड़ता था. कई बार दीदी पसीना पोछने के लिए लिए अपने पेटीकोट का इस्तेमाल करती थी. पेटीकोट के निचले भाग को ऊपर उठा कर चेहरे का पसीने के पोछते हुए मैंने कई बार मैंने आईने में देखा.
पेटीकोट के निचले भाग को उठा कर जब वो थोड़ा तिरछा हो कर पसीना पोछती थी तो उनकी गोरी, बेदाग, मोटी जांघे दिख जाती थी. एक दिन गर्मी बहुत ज्यादा थी और दीदी सफ़ेद रंग का पेटिकोट और लाल रंग का ब्लाउज पहन कर खाना बना रही थी उस दिन मैं रसोई में फ़्रिज से पानी लेने दो-तीन बार गया.
रसोई में दीदी को बहुत पसीना आ रहा था. उसके चेहरे और पेट पर पसीना साफ़ दिख रहा था. पसीने के कारण सफ़ेद रंग का पेटीकोट उनके चुत्तरो से चिपक गया था. ब्लाउज भी काफी भींग गया था और उसकी चुचियों से चिपक गया था. ध्यान से देखने पर मुझे ऐसा लगा जैसे उनकी चुचियों के निप्पल भी ब्लाउज के ऊपर से दिख रहे थे.
शायद दीदी ने गर्मी के कारण ब्रा नहीं पहना था. मैं फ्रीज से पानी निकाल कर पी रहा था तभी वो निचे झुक कर कुछ करने लगी, उनके चुत्तर मेरी आँखों के सामने पूरी तरह से उभर कर आ गए. पसीने से भीगा पेटीकोट पूरी तरह से चिपक गया था और दोनों चुत्तर दिखने लगे थे. नीले रंग की पैंटी और उसके किनारे साफ़ नज़र आ रहे थे.
पेटीकोट का कपड़ा भींग कर उनकी गांड की दरार में फस जाता अगर उन्होंने पैंटी नहीं पहनी होती. मैं एक दम से घबरा गया और भाग कर जल्दी से रसोई से निकल गया. शुक्रवार की रातो को मैं आमतौर पर बहुत देर से सोता था. क्योंकि अगले दिन शनिवार और रविवार मेरे ऑफिस में छुट्टी होती थी. ऐसे ही एक शनिवार के दिन मेरे जीवन में एक नया मोड़ आया.
शुक्रवार की रात थी और दीदी हमेशा की तरह 11 बजे रात को सोने चली गई थी. मैं देर रात तक केबल पर फिल्म देखता रहा. अगले दिन शनिवार को मेरी नींद बहुत देर से खुली . छुट्टी के दिनों में दीदी मुझे जगाती नहीं थी. क्योंकि घर में सभी जानते थे की मुझे देर तक सोना पसंद था. उस दिन ऐसा ही हुआ था. मैंने जब घड़ी देखी तो उस समय दिन के 10 बज रहे थे .
मैं घबरा कर जल्दी से उठा. अपने चारो तरफ देखते ही मुझे अहसास हो गया की दीदी बहुत पहले उठ चुकी है क्यों की, पुरे घर की सफाई हो चुकी थी . मुझे अपने देर से उठने की आदत पर शर्मिन्दगी हुई. जल्दी से ब्रश किया और चाय के लिए रसोई में जा कर खुद से चाय बना लिया और पेपर पढ़ते हुए चाय पिने लगा.
बिना चाय पिए मुझे सुबह में बाथरूम जाने में प्रॉब्लम होती थी. दीदी शायद घर में नहीं थी, पड़ोस में किसी के पास गई थी. चाय ख़तम कर के मैं लैट्रीन चला गया. ये लैट्रीन पहले सेपरेट नहीं था. मतलब बाथरूम के साथ ही मिला हुआ था और एक ही दरवाजा था. इसके कारण बहुत असुविधा होती थी. क्योंकि एक आदमी के घुसने से ही लैट्रीन और बाथरूम दोनों इंगेज हो जाते थे.
अगर घर में ज्यादा सदस्य न हो तब तो कोई प्रॉब्लम नहीं होती थी, मगर गेस्ट्स के आ जाने पर समस्या खड़ी हो जाती थी. लैट्रीन बाथरूम सेपरेट रहने पर दो आदमी एक साथ दो काम कर सकते थे. इसलिए लैट्रीन और बाथरूम दोनों को सेपरेट कर दिया गया. इसके लिए बाथरूम के बीच में लकड़ी के पट्टो की सहायता से एक दिवार बना दी गई. ये कहानी आप हमारी वासना डॉट नेट पर पढ़ रहे है.
ईट की दीवार बनाने में एक तो खर्च बहुत आता दूसरा वो ज्यादा जगह भी लेता, लकड़ी की दीवार इस बाथरूम के लिए एक दम सही थी. लैट्रीन के लिए एक अलग दरवाजा बना दिया गया. दस मिनट बाद जब मैंने फ्लश कर लिया और बाहर निकलने वाला ही था की तभी मुझे लगा की कोई बाथरूम का दरवाजा खोल कर अन्दर घुसा है.
पता नहीं क्यों मगर मेरे पैर जहाँ थे वही रुक गए. कौन हो सकता है, ये बात ज्यादा सोचने की नहीं थी. मैं थोड़ी देर तक वही दरवाजा बंद होने की आहट का इन्तेज़ार करता रहा. दीदी शायद कोई गीत गुनगुना रही थी. लैट्रीन में उसकी आवाज़ स्पष्ट आ रही थी.
बहुत आराम से उठ कर लकड़ी के पट्टो पर कान लगा कर ध्यान से सुन ने लगा. केवल चुड़ियो के खन-खनाने और गुन-गुनाने की आवाज़ सुनाई दे रही थी. फिर नल के खुलने पानी गिरने की आवाज़ सुनाई दी. मेरे अन्दर के शैतान ने मुझे एक आवाज़ दी, लकड़ी के पट्टो को ध्यान से देख.
मैंने अपने अन्दर के शैतान की आवाज़ को अनसुना करने की कोशिश की, मगर शैतान हावी हो गया था. दीदी जैसी एक खूबसूरत औरत लकड़ी के पट्टो के उस पार नहाने जा रही थी. मेरा गला सुख गया और मेरे पैर कांपने लगे. अचानक ही पजामा एकदम से आगे की ओर उभर गया.
दिमाग का काम अब लण्ड कर रहा था. मेरी आँखें लकड़ी के पट्टो के बीच ऊपर से निचे की तरफ घुमने लगी और अचानक मेरी मन की मुराद जैसे पूरी हो गई. लकड़ी के दो पट्टो के बीच थोड़ा सा गैप रह गया था. सबसे पहले तो मैंने धीरे से हाथ बढा का बाथरूम स्विच ऑफ किया फिर लकड़ी के पट्टो के गैप पर अपनी ऑंखें जमा दी.
दीदी की पीठ लकड़ी की दिवार की तरफ थी. वो सफ़ेद पेटिको़ट और काले ब्लाउज में नल के सामने खड़ी थी. नल खोल कर अपने कंधो पर रखे तौलिये को अपना एक हाथ बढा कर नल की बगल वाली खूंटी पर टांग दिया. फिर अपने हाथों को पीछे ले जा कर अपने खुले रेशमी बालो को समेट कर जुड़ा बना दिया.
बाथरूम के कोने में बने रैक से एक क्रीम की बोतल उठा कर उसमे से क्रीम निकाल-निकाल कर अपने चेहरे के आगे हाथ घुमाने लगी. पीछे से मुझे उनका चेहरा दिखाई नहीं दे रहा था मगर ऐसा लग रहा था की वो क्रीम निकाल कर अपने चेहरे पर ही लगा रही है.
लकड़ी के पट्टो के गैप से मुझे उनके सर से चुत्तरों के थोड़ा निचे तक का भाग दिखाई पड़ रहा था. क्रीम लगाने के बाद अपने पेटिको़ट को घुटनों के पास से पकर कर थोड़ा सा ऊपर उठाया और फिर थोड़ा तिरछा हो कर निचे बैठ गई. इस समय मुझे केवल उनका पीठ और सर नज़र आ रहा थे.
पर अचानक से सिटी जैसी आवाज़ जो की औरतो के पेशाब करने की एक विशिष्ट पहचान है वो सुनाई दी. दीदी इस समय शायद वही बाथरूम के कोने में पेशाब कर रही थी. मेरे बदन में सिहरन दौर गई. मैं कुछ देख तो सकता नहीं था मगर मेरे दिमाग ने बहुत सारी कल्पनाये कर डाली. पेशाब करने की आवाज़ सुन कर कुंवारे लण्ड ने झटका खाया. मगर अफ़सोस कुछ देख नहीं सकता था.
फिर थोड़ी देर में वो उठ कर खड़ी हो गई और अपने हाथो को कुहनी के पास से मोर कर अपनी छाती के पास कुछ करने लगी। मुझे लगा जैसे वो अपना ब्लाउज खोल रही है. मैं दम साधे ये सब देख रहा था. मेरा लण्ड इतने में ही एक दम खड़ा हो चूका था. दीदी ने अपना ब्लाउज खोल कर अपने कंधो से धीरे से निचे की तरफ सरकाते हुए उतार दिया.
उनकी गोरी चिकनी पीठ मेरी आँखों के सामने थी. पीठ पर कंधो से ठीक थोड़ा सा निचे एक काले रंग का तिल था और उससे थोड़ा निचे उनकी काली ब्रा का स्ट्रैप बंधा हुआ था. इतनी सुन्दर पीठ मैंने शायद केवल फ़िल्मी हेरोइनो की वो भी फिल्मो में ही देखी थी. वैसे तो मैंने दीदी की पीठ कई बार देखि थी मगर ये आज पहली बार था जब उनकी पूरी पीठ नंगी मेरी सामने थी, केवल एक ब्रा का स्ट्रैप बंधा हुआ था.
गोरी पीठ पर काली ब्रा का स्ट्रैप एक कंट्रास्ट पैदा कर रहा था और पीठ को और भी ज्यादा सुन्दर बना रहा था. मैंने सोचा की शायद दीदी अब अपनी ब्रा खोलेंगी मगर उन्होंने ऐसा नहीं किया. अपने दोनों हाथो को बारी-बारी से उठा कर वो अपनी कांख को देखने लगी. एक हाथ को उठा कर दुसरे हाथ से अपनी कांख को छू कर शायद अपने कांख के बालो की लम्बाई का अंदाज लगा रही थी.
फिर वो थोड़ा सा घूम गई सामने लगे आईने में अपने आप को देखने लगी. अब दीदी का मुंह बाथरूम में रखे रैक और उसकी बगल में लगे आईने की तरफ था. मैंने सोच रहा था काश वो पूरा मेरी तरफ घूम जाती मगर ऐसा नहीं हुआ. उनकी दाहिनी साइड मुझे पूरी तरह से नज़र आ रही थी.
उनका दाहिना हाथ और पैर जो की पेटिको़ट के अन्दर था पेट और ब्रा में कैद एक चूची, उनका चेहरा भी अब चूँकि साइड से नज़र आ रहा था इसलिए मैंने देखा की मेरा सोचना ठीक था और उन्होंने एक पीले रंग का फेसमास्क लगाया हुआ था. अपने सुन्दर मुखरे को और ज्यादा चमकाने के लिए.
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अब दीदी ने रैक से एक दूसरी क्रीम की बोतल अपने बाएं हाथ से उतार ली और उसमे से बहुत सारा क्रीम अपनी बाई हथेली में लेकर अपने दाहिने हाथ को ऊपर उठा दिया. दीदी की नंगी गोरी मांसल बांह अपने आप में उत्तेजना का शबब थी और अब तो हाथ ऊपर उठ जाने के कारण दीदी की कांख दिखाई दे रही थी.
कांख के साथ दीदी की ब्रा में कैद दाहिनी चूची भी दिख रही थी. ब्रा चुकी नोर्मल सा था इसलिए उसने पूरी चूची को अपने अन्दर कैद किया हुआ था इसलिए मुझे कुछ खास नहीं दिखा, मगर उनकी कांख कर पूरा नज़ारा मुझे मिल रहा था. दीदी की कांख में काले-काले बालों का गुच्छा सा उगा हुआ था.
शायद दीदी ने काफी दिनों से अपने कांख के बाल नहीं बनाये थे. वैसे तो मुझे औरतो के चिकने कांख ही अच्छे लगते है पर आज पाता नहीं क्या बात थी मुझे दीदी के बालों वाले कांख भी बहुत सेक्सी लग रहे थे. मैं सोच रहा था इतने सारे बाल होने के कारण दीदी की कांख में बहुत सारा पसीना आता होगा और उसकी गंध भी उन्ही बालों में कैद हो कर रह जाती होगी.
दीदी के पसीने से भीगे बदन को कई बार मैंने रसोई में देखा था. उस समय उनके बदन से आती गंध बहुत कामोउत्तेजक होती थी और मुझे हवा तैरते उसके बदन के गंध को सूंघना बहुत अच्छा लगता था. ये सब सोचते सोचते मेरा मन किया की काश मैं उसकी कांख में एक बार अपने मुंह को ले जा पाता और अपनी जीभ से एक बार उसको चाटता.
मैंने अपने लण्ड पर हाथ फेरा तो देखा की सुपाड़े पर हल्का सा गीलापन आ गया है. तभी दीदी ने अपने बाएं हाथ की क्रीम को अपनी दाहिने हाथ की कांख में लगा दिया और फिर अपने वैसे ही अपनी बाई कांख में भी दाहिने हाथ से क्रीम लगा दिया. शायद दीदी को अपने कान्खो में बाल पसंद नहीं थे.
कान्खो में हेयर रिमूविंग क्रीम लगा लेने के बाद दीदी फिर से नल की तरफ घूम गई और अपने हाथ को पीछे ले जाकर अपनी ब्रा का स्ट्रैप खोल दिया और अपने कंधो से सरका कर बहार निकाल फर्श पर दाल दिया और जल्दी से निचे बैठ गई. अब मुझे केवल उनका सर और थोड़ा सा गर्दन के निचे का भाग नज़र आ रहा था. अपनी किस्मत पर बहुत गुस्सा आया.
काश दीदी सामने घूम कर ब्रा खोलती या फिर जब वो साइड से घूमी हुई थी तभी अपनी ब्रा खोल देती मगर ऐसा नहीं हुआ था और अब वो निचे बैठ कर शायद अपनी ब्लाउज और ब्रा और दुसरे कपड़े साफ़ कर रही थी. मैंने पहले सोचा की निकल जाना चाहिए, मगर फिर सोचा की नहाएगी तो खड़ी तो होगी ही, ऐसे कैसे नहा लेगी.
इसलिए चुप-चाप यही लैट्रिन में ही रहने में भलाई है. मेरा धैर्य रंग लाया थोड़ी देर बाद दीदी उठ कर खड़ी हो गई और उसने पेटीकोट को घुटनों के पास से पकड़ कर जांघो तक ऊपर उठा दिया. मेरा कलेजा एक दम धक् से रह गया. दीदी ने अपना पेटिकोट पीछे से पूरा ऊपर उठा दिया था.
इस समय उनकी जांघे पीछे से पूरी तरह से नंगी हो गई थी. मुझे औरतो और लड़कियों की जांघे सबसे ज्यादा पसंद आती है. मोटी और गदराई जांघे जो की शारीरिक अनुपात में हो, ऐसी जांघे. पेटीकोट के उठते ही मेरे सामने ठीक वैसी ही जांघे थी जिनकी कल्पना कर मैं मुठ मारा करता था. एकदम चिकनी और मांसल.
जिन पर हलके हलके दांत गरा कर काटते हुए जीभ से चाटा जाये तो ऐसा अनोखा मजा आएगा की बयान नहीं किया जा सकता. दीदी की जांघे मांसल होने के साथ सख्त और गठी हुई थी उनमे कही से भी थुलथुलापन नहीं था. इस समय दीदी की जांघे केले के पेड़ के चिकने तने की समान दिख रही थी.
मैंने सोचा की जब हम केले पेड़ के तने को अगर काटते है या फिर उसमे कुछ घुसाते है तो एक प्रकार का रंगहीन तरल पदार्थ निकलता है शायद दीदी के जांघो को चूसने और चाटने पर भी वैसा ही रस निकलेगा. मेरे मुंह में पानी आ गया. लण्ड के सुपाड़े पर भी पानी आ गया था. सुपाड़े को लकड़ी के पट्टे पर हल्का सा सटा कर उस पानी को पोछ दिया और पैंटी में कसी हुई दीदी के चुत्तरों को ध्यान से देखने लगा.
दीदी का हाथ इस समय अपनी कमर के पास था और उन्होंने अपने अंगूठे को पैंटी के इलास्टिक में फसा रखा था. मैं दम साधे इस बात का इन्तेज़ार कर रहा था की कब दीदी अपनी पैंटी को निचे की तरफ सरकाती है. पेटीकोट कमर के पास जहा से पैंटी की इलास्टिक शुरू होती है वही पर हाथो के सहारे रुका हुआ था.
दीदी ने अपनी पैंटी को निचे सरकाना शुरू किया और उसी के साथ ही पेटीकोट भी निचे की तरफ सरकता चला गया. ये सब इतनी तेजी से हुआ की दीदी के चुत्तर देखने की हसरत दिल में ही रह गई. दीदी ने अपनी पैंटी निचे सरकाई और उसी साथ पेटीकोट भी निचे आ कर उनके चुत्तरों और जांघो को ढकता चला गया. अपनी पैंटी उतार उसको ध्यान से देखने लगी पता नहीं क्या देख रही थी.
छोटी सी पैंटी थी, पता नहीं कैसे उसमे दीदी के इतने बड़े चुत्तर समाते है. मगर शायद यह प्रश्न करने का हक मुझे नहीं था क्यों की अभी एक क्षण पहले मेरी आँखों के सामने ये छोटी सी पैंटी दीदी के विशाल और मांसल चुत्तरों पर अटकी हुई थी. कुछ देर तक उसको देखने के बाद वो फिर से निचे बैठ गई और अपनी पैंटी साफ़ करने लगी. ये कहानी आप हमारी वासना डॉट नेट पर पढ़ रहे है.
फिर थोड़ी देर बाद ऊपर उठी और अपने पेटीकोट के नाड़े को खोल दिया. मैंने दिल थाम कर इस नज़ारे का इन्तेज़ार कर रहा था. कब दीदी अपने पेटीकोट को खोलेंगी और अब वो क्षण आ गया था. लौड़े को एक झटका लगा और दीदी के पेटीकोट खोलने का स्वागत एक बार ऊपर-निचे होकर किया. मैंने लण्ड को अपने हाथ से पकर दिलासा दिया.
नाड़ा खोल दीदी ने आराम से अपने पेटीकोट को निचे की तरफ धकेला पेटीकोट सरकता हुआ धीरे-धीरे पहले उसके तरबूजे जैसे चुत्तरो से निचे उतरा फिर जांघो और पैर से सरक निचे गिर गया. दीदी वैसे ही खड़ी रही. इस क्षण मुझे लग रहा था जैसे मेरा लण्ड पानी फेंक देगा. मुझे समझ में नहीं आ रहा था मैं क्या करू.
मैंने आज तक जितनी भी फिल्में और तस्वीरे देखी थी नंगी लड़कियों की वो सब उस क्षण में मेरी नजरो के सामने गुजर गई और मुझे यह अहसास दिला गई की मैंने आज तक ऐसा नज़ारा कभी नहीं देखा. वो तस्वीरें वो लड़कियाँ सब बेकार थी. उफ़ दीदी पूरी तरह से नंगी हो गई थी. हालाँकि मुझे केवल उनके पिछले भाग का नज़ारा मिल रहा था, फिर भी मेरी हालत ख़राब करने के लिए इतना ही काफी था.
गोरी चिकनी पीठ जिस पर हाथ डालो तो सीधा फिसल का चुत्तर पर ही रुकेंगी. पीठ के ऊपर काला तिल, दिल कर रहा था आगे बढ़ कर उसे चूम लू. रीढ़ की हड्डियों की लाइन पर अपने तपते होंठ रख कर चूमता चला जाऊ. पीठ पीठ इतनी चिकनी और दूध की धुली लग रही थी की नज़र टिकाना भी मुश्किल लग रहा था. तभी तो मेरी नज़र फिसलती हुई दीदी के चुत्तरो पर आ कर टिक गई.
ओह, मैंने आज तक ऐसा नहीं देखा था. गोरी चिकनी चुत्तर. गुदाज और मांसल. मांसल चुत्तरों के मांस को हाथ में पकर दबाने के लिए मेरे हाथ मचलने लगे. दीदी के चुत्तर एकदम गोरे और काफी विशाल थे. उनके शारीरिक अनुपात में, पतली कमर के ठीक निचे मोटे मांसल चुत्तर थे. उन दो मोटे मोटे चुत्तरों के बीच ऊपर से निचे तक एक मोटी लकीर सी बनी हुई थी.
ये लकीर बता रही थी की जब दीदी के दोनों चुत्तरों को अलग किया जायेगा तब उनकी गांड देखने को मिल सकती है या फिर यदि दीदी कमर के पास से निचे की तरफ झुकती है तो चुत्तरों के फैलने के कारण गांड के सौंदर्य का अनुभव किया जा सकता है. तभी मैंने देखा की दीदी अपने दोनों हाथो को अपनी जांघो के पास ले गई फिर अपनी जांघो को थोड़ा सा फैलाया और अपनी गर्दन निचे झुका कर अपनी जांघो के बीच देखने लगी शायद वो अपनी चूत देख रही थी.
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मुझे लगा की शायद दीदी की चूत के ऊपर भी उसकी कान्खो की तरह से बालों का घना जंगल होगा और जरुर वो उसे ही देख रही होंगी. मेरा अनुमान सही था और दीदी ने अपने हाथ को बढा कर रैक पर से फिर वही क्रीम वाली बोतल उतार ली और अपने हाथो से अपने जांघो के बीच क्रीम लगाने लगी.
पीछे से दीदी को क्रीम लगाते हुए देख कर ऐसा लग रहा था जैसे वो मुठ मार रही है. क्रीम लगाने के बाद वो फिर से निचे बैठ गई और अपने पेटीकोट और पैंटी को साफ़ करने लगी. मैंने अपने लौड़े को आश्वाशन दिया की घबराओ नहीं कपरे साफ़ होने के बाद और भी कुछ देखने को मिल सकता है. ज्यादा नहीं तो फिर से दीदी के नंगे चुत्तर, पीठ और जांघो को देख कर पानी गिरा लेंगे.
करीब पांच-सात मिनट के बाद वो फिर से खड़ी हो गई. लौड़े में फिर से जान आ गई. दीदी इस समय अपनी कमर पर हाथ रख कर खड़ी थी. फिर उसने अपने चुत्तर को खुजाया और सहलाया फिर अपने दोनों हाथों को बारी बारी से उठा कर अपनी कान्खो को देखा और फिर अपने जांघो के बीच झाँकने के बाद फर्श पर परे हुए कपड़ो को उठाया.
यही वो क्षण था जिसका मैं काफी देर से इन्तेज़ार कर रहा था. फर्श पर पड़े हुए कपड़ो को उठाने के लिए दीदी निचे झुकी और उनके चुत्तर लकड़ी के पट्टो के बीच बने गैप के सामने आ गए. निचे झुकने के कारण उनके दोनों चुत्तर अपने आप अलग हो गए और उनके बीच की मोटी लकीर अब दीदी की गहरी गांड में बदल गई.
दोनों चुत्तर बहुत ज्यादा अलग नहीं हुए थे मगर फिर भी इतने अलग तो हो चुके थे की उनके बीच की गहरी खाई नज़र आने लगी थी. देखने से ऐसा लग रहा था जैसे किसी बड़े खरबूजे को बीच से काट कर थोड़ा सा अलग करके दो खम्भों के ऊपर टिका कर रख दिया गया है.
दीदी वैसे ही झुके हुए बाल्टी में कपड़ो को डाल कर खंगाल रही थी और बाहर निकाल कर उनका पानी निचोड़ रही थी. ताकत लगाने के कारण दीदी के चुत्तर और फ़ैल गए और गोरी चुत्तरों के बीच की गहरी भूरे रंग की गांड की खाई पूरी तरह से नज़र आने लगी. दीदी की गांड की खाई एक दम चिकनी थी.
गांड के छेद के आस-पास भी बाल उग जाते है मगर दीदी के मामले में ऐसा नहीं था उसकी गांड, जैसा की उसका बदन था, की तरह ही मलाई के जैसी चिकनी लग रही थी. झुकने के कारण चुत्तरों के सबसे निचले भाग से जांघो के बीच से दीदी की चूत के बाल भी नजर आ रहे थे. उनके ऊपर लगा हुआ सफ़ेद क्रीम भी नज़र आ रहा था.
चुत्तरो की खाई में काफी निचे जाकर जहा चूत के बाल थे उनसे थोड़ा सा ऊपर दीदी की गांड की सिकुरी हुई भूरे रंग की छेद थी. ऊँगली के अगले सिरे भर की बराबर की छेद थी. किसी फूल की तरह से नज़र आ रही थी. दीदी के एक दो बार हिलने पर वो छेद हल्का सा हिला और एक दो बार थोड़ा सा फुला-पिचका.
ऐसा क्यों हुआ मेरी समझ में नहीं आया मगर इस समय मेरा दिल कर रहा था की मैं अपनी ऊँगली को दीदी की गांड की खाई में रख कर धीरे-धीरे चलाऊ और उसके भूरे रंग की दुप-दुपाती छेद पर अपनी ऊँगली रख हलके-हलके दबाब दाल कर गांड की छेद की मालिश करू.
उफ़ कितना मजा आएगा अगर एक हाथ से चुत्तर को मसलते हुए दुसरे हाथ की ऊँगली को गांड की छेद पर डाल कर हलके-हलके कभी थोड़ा सा अन्दर कभी थोड़ा सा बाहर कर चलाया जाये तो. पूरी ऊँगली दीदी की गांड में डालने से उन्हें दर्द हो सकता था इसलिए पूरी ऊँगली की जगह आधी ऊँगली या फिर उस से भी कम डाल कर धीरे धीरे गोल-गोल घुमाते हुए अन्दर-बाहर करते हुए गांड की फूल जैसी छेद ऊँगली से हलके-हलके मालिश करने में बहुत मजा आएगा.
इस कल्पना से ही मेरा पूरा बदन सिहर गया. दीदी की गांड इस समय इतनी खूबसूरत लग रही थी की दिल कर रहा थी अपने मुंह को उसके चुत्तरों के बीच घुसा दू और उसकी इस भूरे रंग की सिकुरी हुई गांड की छेद को अपने मुंह में भर कर उसके ऊपर अपना जीभ चलाते हुए उसके अन्दर अपनी जीभ डाल दू.
उसके चुत्तरो को दांत से हलके हलके काट कर खाऊ और पूरी गांड की खाई में जीभ चलाते हुए उसकी गांड चाटू. पर ऐसा संभव नहीं था. मैं इतना उत्तेजित हो चूका था की लण्ड किसी भी समय पानी फेंक सकता था. लौड़ा अपनी पूरी औकात पर आ चूका था और अब दर्द करने लगा था. अपने अंडकोष को अपने हाथो से सहलाते हुए हलके से सुपाड़े को दो उँगलियों के बीच दबा कर अपने आप को सान्तवना दिया.
सारे कपड़े अब खंगाले जा चुके थे. दीदी सीधी खड़ी हो गई और अपने दोनों हाथो को उठा कर उसने एक अंगराई ली और अपनी कमर को सीधा किया फिर दाहिनी तरफ घूम गई. मेरी किस्मत शायद आज बहुत अच्छी थी. दाहिनी तरफ घूमते ही उसकी दाहिनी चूची जो की अब नंगी थी मेरी लालची आँखों के सामने आ गई.
उफ़ अभी अगर मैं अपने लण्ड को केवल अपने हाथ से छू भर देता तो मेरा पानी निकल जाता. चूची का एक ही साइड दिख रहा था. दीदी की चूची एक दम ठस सीना तान के खड़ी थी. ब्लाउज के ऊपर से देखने पर मुझे लगता तो था की उनकी चूचियां सख्त होंगी मगर 28-29 साल की होने के बाद भी उनकी चुचियों में कोई ढलकाव नहीं आया था.
इसका एक कारण ये भी हो सकता था की उनको अभी तक कोई बच्चा नहीं हुआ था. दीदी को शायद ब्रा की कोई जरुरत ही नहीं थी. उनकी चुचियों की कठोरता किसी भी 17-18 साल की लौंडिया के दिल में जलन पैदा कर सकती थी. जलन तो मेरे दिल में भी हो रही थी इतनी अच्छी चुचियों मेरी किस्मत में क्यों नहीं है. चूची एकदम दूध के जैसी गोरे रंग की थी.
चूची का आकार ऐसा था जैसे किसी मध्यम आकार के कटोरे को उलट कर दीदी की छाती से चिपका दिया गया हो और फिर उसके ऊपर किशमिश के एक बड़े से दाने को डाल दिया गया हो. मध्यम आकार के कटोरे से मेरा मतलब है की अगर दीदी की चूची को मुट्ठी में पकड़ा जाये तो उसका आधा भाग मुट्ठी से बाहर ही रहेगा.
चूची का रंग चूँकि हद से ज्यादा गोरा था इसलिए हरी हरी नसे उस पर साफ़ दिखाई पर रही थी, जो की चूची की सुन्दरता को और बढा रही थी. साइड से देखने के कारण चूची के निप्पल वन-डायेमेन्शन में नज़र आ रहे थे. सामने से देखने पर ही थ्री-डायेमेन्शन में नज़र आ सकते थे. तभी उनकी लम्बाई, चौड़ाई और मोटाई का सही मायेने में अंदाज लगाया जा सकता था मगर क्या कर सकता था मजबूरी थी मैं साइड व्यू से ही काम चला रहा था.
निप्पलों का रंग गुलाबी था, पर हल्का भूरापन लिए हुए था. बहुत ज्यादा बड़ा तो नहीं था मगर एक दम छोटा भी नहीं था किशमिश से बड़ा और चॉकलेट से थोड़ा सा छोटा. मतलब मुंह में जाने के बाद चॉकलेट और किशमिश दोनों का मजा देने वाला. दोनों होंठो के बीच दबा कर हलके-हलके दबा-दबा कर दांत से काटते हुए अगर चूसा जाये तो बिना चोदे झर जाने की पूरी सम्भावना थी
दाहिनी तरफ घूम कर आईने में अपने दाहिने हाथ को उठा कर देखा फिर बाएं हाथ को उठा कर देखा. फिर अपनी गर्दन को झुका कर अपनी जांघो के बीच देखा. फिर वापस नल की तरफ घूम गई और खंगाले हुए कपरों को वही नल के पास बनी एक खूंटी पर टांग दिया और फिर नल खोल कर बाल्टी में पानी भरने लगी.
मैं समझ गया की दीदी अब शायद नहाना शुरू करेंगी. मैंने पूरी सावधानी के साथ अपनी आँखों को लकड़ी के पट्टो के गैप में लगा दिया. मग में पानी भर कर दीदी थोड़ा सा झुक गई और पानी से पहले अपने बाएं हाथ फिर दाहिनी हाथ के कान्खो को धोया. पीछे से मुझे कुछ दिखाई नहीं पर रहा था मगर. दीदी ने पानी से अच्छी तरह से धोने के बाद कान्खो को अपने हाथो से छू कर देखा.
मुझे लगा की वो हेयर रेमोविंग क्रीम के काम से संतुष्ट हो गई और उन्होंने अपना ध्यान अब अपनी जांघो के बीच लगा दिया. दाहिने हाथ से पानी डालते हुए अपने बाएं हाथ को अपनी जांघो बीच ले जाकर धोने लगी. हाथों को धीरे धीरे चलाते हुए जांघो के बीच के बालों को धो रही थी. मैं सोच रहा था की काश इस समय वो मेरी तरफ घूम कर ये सब कर रही होती तो कितना मजा आता.
झांटों के साफ़ होने के बाद कितनी चिकनी लग रही होगी दीदी की चुत ये सोच का बदन में झन-झनाहट होने लगी. पानी से अपने जन्घो के बीच साफ़ कर लेने के बाद दीदी ने अब नहाना शुरू कर दिया. अपने कंधो के ऊपर पानी डालते हुए पुरे बदन को भीगा दिया. ये कहानी आप हमारी वासना डॉट नेट पर पढ़ रहे है.
बालों के जुड़े को खोल कर उनको गीला कर शैंपू लगाने लगी. दीदी का बदन भीग जाने के बाद और भी खूबसूरत और मदमस्त लगने लगा था. बदन पर पानी पड़ते ही एक चमक सी आ गई थी दीदी के बदन में. शैंपू से खूब सारा झाग बना कर अपने बालों को साफ़ कर रही थी.
बालो और गर्दन के पास से शैंपू मिला हुआ मटमैला पानी उनकी गर्दन से बहता हुआ उनकी पीठ पर चुते हुए निचे की तरफ गिरता हुआ कमर के बाद सीधा दोनों चुत्तरों के बीच यानी की उनके बीच की दरार जो की दीदी की गांड थी में घुस रहा था. क्योंकि ये पानी शैंपू लगाने के कारण झाग से मिला हुआ था और बहुत कम मात्रा में था इसलिए गांड की दरार में घुसने के बाद कहा गायब हो जा रहा था ये मुझे नहीं दिख रहा था.
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अगर पानी की मात्रा ज्यादा होती तो फिर वो वहां से निकल कर जांघो के अंदरूनी भागो से ढुलकता हुआ निचे गिर जाता. बालों में अच्छी तरह से शैंपू लगा लेने के बाद बालों को लपेट कर एक गोला सा बना कर गर्दन के पास छोड़ दिया और फिर अपने कंधो पर पानी डाल कर अपने बदन को फिर से गीला कर लिया.
गर्दन और पीठ पर लगा हुआ शैंपू मिला हुआ मटमैला पानी भी धुल गया था. फिर उन्होंने एक स्पोंज के जैसी कोई चीज़ रैक पर से उठा ली और उस से अपने पुरे बदन को हलके-हलके रगरने लगी. पहले अपने हाथो को रगरा फिर अपनी छाती को फिर अपनी पीठ को फिर बैठ गई. निचे बैठने पर मुझे केवल गर्दन और उसके निचे का कुछ हिस्सा दिख रहा था.
पर ऐसा लग रहा था जैसे वो निचे बैठ कर अपने पैरों को फैला कर पूरी तरह से रगर कर साफ़ कर रही थी क्योंकि उनका शरीर हिल रहा था. थोरी देर बाद खड़ी हो गई और अपने जांघो को रगरना शुरू कर दिया. मैं सोचने लगा की फिर निचे बैठ कर क्या कर रही थी. फिर दिमाग में आया की हो सकता है अपने पैर के तलवे और उँगलियों को रगर कर साफ़ कर रही होंगी.
मेरी दीदी बहुत सफाई पसंद है. जैसे उसे घर के किसी कोने में गंदगी पसंद नहीं है उसी तरह से उसे अपने शरीर के किसी भी भाग में गंदगी पसंद नहीं होगी. अब वो अपने जांघो को रगर रगर कर साफ़ कर रही थी और फिर अपने आप को थोड़ा झुका कर अपनी दोनों जांघो को फैलाया और फिर स्पोंज को दोनों जांघो के बीच ले जाकर जांघो के अंदरूनी भाग और रान को रगरने लगी.
पीछे से देखने पर लग रहा था जैसे वो जांघो को जोर यानि जहाँ पर जांघ और पेट के निचले हिस्से का मिलन होता और जिसके बीच में चूत होती है को रगर कर साफ़ करते हुए हलके-हलके शायद अपनी चूत को भी रगर कर साफ़ कर रही थी ऐसा मेरा सोचना है. वैसे चुत जैसी कोमल चीज़ को हाथ से रगर कर साफ़ करना ही उचित होता. वाकई ऐसा था या नहीं मुझे नहीं पता, पीछे से इस से ज्यादा पता भी नहीं चल सकता था.
थोड़ी देर बाद थोड़ा और झुक कर घुटनों तक रगर कर फिर सीधा हो कर अपने हाथों को पीछे ले जाकर अपने चुत्तरों को रगरने लगी. वो थोड़ी-थोड़ी देर में अपने बदन पर पानी डाल लेती थी जिस से शरीर का जो भाग सुख गया होता वो फिर से गीला हो जाता था और फिर उन्हें रगरने में आसानी होती थी.
चुत्तरों को भी इसी तरह से एक बार फिर से गीला कर खूब जोर जोर से रगर रही थी. चुत्तरों को जोर से रगरने से कोई फर्क नहीं पड़ने वाला था क्योंकि वहां का मांस बहुत मोटा था, पर जोर से रगरने के कारण लाल हो गया था और थल-थलाते हुए हिल रहा था. मेरे हाथों में खुजली होने लगी थी और दिल कर रहा था की थल-थलाते हुए चुत्तरों को पकड़ कर मसलते हुए हलके-हलके मारते हुए खूब हिलाउ.
चुत्तारों को रगरने के बाद दीदी ने स्पोंज को दोनों चुत्तरों की दरार के ऊपर रगरने लगी फिर थोड़ा सा आगे की तरफ झुक गैई जिस से उसके चुत्तर फ़ैल गए. फिर स्पोंज को दोनों चुत्तरों के बीच की खाई में डाल कर रगड़ने लगी. कोमल गांड की फूल जैसी छेद शायद रगड़ने के बाद लाल हो गुलाब के फूल जैसी खिल जायेगी.
ये सोच कर मेरे मन में दीदी की गांड देखने की तीव्र इच्छा उत्पन्न हो गई. मन में आया की इस लकड़ी की दिवार को तोड़ कर सारी दुरी मिटा दू, मगर, सोचने में तो ये अच्छा था, सच में ऐसा करने की हिम्मत मेरी गांड में नहीं थी. बचपन से दीदी का गुस्सैल स्वभाव देखा था, जानता था, की जब उस दुबई वाले को नहीं छोड़ती थी तो फिर मेरी क्या बिसात.
गांड पर ऐसी लात मारेगी की गांड देखना भूल जाऊंगा. हालाँकि दीदी मुझे प्यार भी बहुत करती थी और मुझे कभी भी परेशानी में देख तुंरत मेरे पास आ कर मेरी समस्या के बारे में पूछने लगती थी. स्पोंज से अपने बदन को रगड़ने के बाद. वापस स्पोंज को रैक पर रख दिया और मग से पानी लेकर कंधो पर डालते हुए नहाने लगी.
मात्र स्पोंज से सफाई करने के बाद ही दीदी का पूरा बदन चम-चमाने लगा था. पानी से अपने पुरे बदन को धोने के बाद दीदी ने अपने शैंपू लगे बालों का गोला खोला और एक बार फिर से कमर के पास से निचे झुक गई और उनके चुत्तर फिर से लकड़ी के पट्टो के बीच बने गैप के सामने आ गए. इस बार उनके गोरे चम-चमाते चुत्तरों के बीच की चमचमाती खाई के आलावा मुझे एक और चीज़ के दिखने को मिल रही थी.
वो क्या थी इसका अहसास मुझे थोड़ी देर से हुआ. गांड की सिकुरी हुई छेद से करीब चार अंगुल भर की दूरी पर निचे की तरफ एक लम्बी लकीर सी नज़र आ रही थी. मैं ये देख कर ताज्जुब में पर गया, पर तभी ख्याल आया की घोंचू ये तो शायद चूत है. पहले ये लकीर इसलिए नहीं नज़र आ रही थी क्योंकि यहाँ पर झान्ट के बाल थे, हेयर रिमुविंग क्रीम ने जब झांटो की सफाई कर दी तो चूत की लकीर स्पष्ट दिखने लगी.
इस बात का अहसास होते ही की मैं अपनी दीदी की चूत देख रहा हूँ, मुझे लगा जैसे मेरा कलेजा मुंह को आ जायेगा और फिर से मेरा गला सुख गया और पैर कांपने लगे. इस बार शायद मेरे लण्ड से दो बूँद टपक कर निचे गिर भी गया पर मैंने इस तरफ कोई ध्यान नहीं दिया.
लण्ड भी मारे उत्तेजना के काँप रहा था. बाथरूम में वैसे तो लाइट आँन थी मगर चूँकि बल्ब भी लकरी के पट्टो के सामने ही लगा हुआ था इसलिए दीदी की पीठ की तरफ रोशनी कम थी. फिर भी दोनों मोटी जांघो के बीच ऊपर की तरफ चुत्तरों की खाई के ठीक निचे एक गुलाबी लकीर सी दिख रही थी.
पट्टो के बीच से देखने से ऐसा लग रहा था जैसे सेब या पके हुए पपीते के आधे भाग को काट कर फिर से आपस में चिपका कर दोनों जांघो के बीच फिट कर दिया गया है. मतलब दीदी की चूत ऐसी दिख रही थी जैसे सेब को चार भागो में काट कर फिर दो भागो को आपस में चिपका कर गांड के निचे लगा दिया गया हो.
कमर या चुत्तरों के इधर-उधर होने पर दोनों फांकों में भी हरकत होती थी और ऐसा लगता जैसे कभी लकीर टेढी हो गई है कभी लकीर सीधी हो गई है. जैसे चूत के दोनों होंठ कभी मुस्कुरा रहे है कभी नाराज़ हो रहे है. दोनों होंठ आपस में एक दुसरे से एक दम सटे हुए दिख रहे थे. होंठो के आपस में सटे होने के मतलब बाद में समझ में आया की ऐसा चूत के बहुत ज्यादा टाइट होने के कारण था.
दोनों फांक एक दम गुलाबी और पावरोटी के जैसे फूले हुए थे. मेरे मन में आया की काश मैं चूत की लकीर पर ऊपर से निचे तक अपनी ऊँगली चला और हलके से दोनों फांकों को अलग कर के देख पाता की कैसी दिखती है, दोनों गुलाबी होंठो के बीच का अंदरूनी भाग कैसा है मगर ये सपना ही रह गया. दीदी के बाल धुल चुके थे और वो सीधी खड़ी हो गई.
बालो को अच्छी तरह से धोने के बाद फिर से उनका गोला बना कर सर के ऊपर बाँध लिया और फिर अपने कंधो पर पानी डाल कर अपने आप को फिर से गीला कर पुरे बदन पर साबुन लगाने लगी। पहले अपने हाथो पर अच्छी तरह से साबुन लगाया फिर अपने हाथो को ऊपर उठा कर वो दाहिनी तरफ घूम गई और अपने कान्खो को आईने में देख कर उसमे साबुन लगाने लगी.
पहले बाएं कांख में साबुन लगाया फिर दाहिने हाथ को उठा कर दाहिनी कांख में जब साबुन लगाने जा रही थी तो मुझे हेयर रिमुविंग क्रीम का कमाल देखने को मिला. दीदी की कांख एक दम गोरी, गुलाबी और चिकनी हो गई थी। जीभ लगा कर चाटो तो जीभ फिसल जाये ऐसी चिकनी लग रही थी. दीदी ने खूब सारा साबुन अपनी कान्खो में लगाया और फिर वैसे ही अपनी छाती पर रगर-रगर कर साबुन लगाने लगी.
छाती पर साबुन का खूब सारा झाग उत्पन्न हो रहा था. दीदी का हाथ उसमे फिसल रहा था और वो अपनी ही चुचियों के साथ खिलवार करते हुए साबुन लगा रही थी. कभी निप्पल को चुटकियों में पकर कर उन पर साबुन लगाती कभी पूरी चूची को दोनों हाथो की मुट्ठी में कस कर साबुन लगाती. साबुन लगाने के कारण दीदी की चूची हिल रही थी और थलथला रही थी.
चुचियों के हिलने का नज़ारा लण्ड को बेकाबू करने के लिए काफी था. तभी दीदी वापस नल की तरफ घूम गई और फिर निचे झुक कर पैरों पर साबुन लगाने के बाद सीधा हो कर अपनी जांघो पर साबुन लगाने लगी. दोनों जांघो पर साबुन लगाने के बाद अपने हाथो में ढेर सारा साबुन का झाग बना कर अपनी जांघो को फैला कर उनके बीच अपने हाथों को घुसा दिया.
हाथ चलाते हुए अपनी चूत पर साबुन लगाने लगी. अच्छी तरह से चूत पर साबुन लगा लेने के बाद जैसा की मैंने सोचा था गांड की बारी आई और फिर पहले अपने चुतरों पर साबुन लगा लेने के बाद अपने हाथो में साबुन का ढेर सारा झाग बना कर अपने हाथो को चुत्तरों की दरार में घुसा दिया और ऊपर से निचे चलाती हुई अपनी गांड की खाई को रगरते हुए उसमे साबुन लगाने लगी.
गांड में साबुन लगाने से भी खूब सारा झाग उत्पन्न हो रहा था. खूब अच्छी तरह से साबुन लगा लेने के बाद. नल खोल कर मग से पानी उठा-उठा कर दीदी ने अपना बदन धोना शुरू कर दिया. पानी धीरे-धीरे साबुन को धो कर निचे गिराता जा रहा था और उसी के साथ दीदी के गोरे बदन की सुन्दरता को भी उजागर करता जा रहा था.
साबुन से धुल जाने के बाद दीदी का गोरा बदन एक दम ढूध का धुला लग रहा था. जैसे बाथरूम के उस अंधियारे में चांदनी रौशन हो गई थी. ऊपर से निचे तक दीदी का पूरा बदन चम-चमा रहा था. मेरी आंखे चुंधिया रही थी और मैं अपनी आँखों को फार कर ज्यादा से ज्यादा उसके मद भरे यौवन का रस अपनी आँखों से पी जाना चाहता था.
मेरे पैर थक चुके थे और कमर अकड़ चूँकि थी मगर फिर भी मैं वह से हिल नहीं पा रहा था. अपने पुरे बदन को धो लेने के बाद दीदी ने खूंटी पर टंगा तौलिया उतारा और अपने बदन को पोछने लगी. पुरे बदन को तौलिये से हौले-हौले दबा कर पोछने के बाद अपने सर को बालों को तौलिये से हल्के से पोछा और तौलिये को बालों में लपेट कर एक गोला बना दिया.
फिर दाहिनी तरफ घूम कर आईने के सामने आ गई. दाहिनी चूची जो की मुझे इस समय दिख रही थी थोड़ी लाल या फिर कहे तो गुलाबी लग रही थी. ऐसा शायद रगर का सफाई करने के कारण हुआ होगा, निप्पल भी थोड़ी काली लग रही थी ऐसा शायद उनमे खून भर जाने के कारण हुआ होगा.
दीदी ने अपने आप को आईने अच्छी तरह से देखा फिर अपने दोनों हाथो को उठा कर बारी-बारी से अपनी कान्खो को देखा और सुंघा भी, फिर अपने दोनों जांघो के बीच अच्छी तरह से देखा, अपने चेहरे का हर कोण से अच्छी तरह से आईने में देखा और फिर अपनी नजरो को निचे ले जा कर अपने पैरों आदि को देखने लगी. मैं समझ गया की अब दीदी बाहर निकलेंगी. ये कहानी आप हमारी वासना डॉट नेट पर पढ़ रहे है.
इस से पहले की वो बाहर निकले मुझे चुप चाप निकल जाना चाहिए. मैं जल्दी से बाहर निकला और साइड में बने बेसीन पर अपना हाथ धोया और एक शर्ट पहन कर चुपचाप बाहर निकल गया. मैं किसी भी तरह का खतरा नहीं मोलना चाहता चाहता था इसलिए बाहर निकल पहले अपने आप को सयंत किया, अपने उखरे हुए सांसो पर काबू पाया और फिर करीब पंद्रह मिनट के बाद घर में फिर से दाखील हुआ.
घर में घुसने पर देखा की दीदी अपने कपड़े पहन कर बालकनी में खरी हो कर अपने बालों को सुखा रही थी. पीली साडी और ब्लाउज में आसमान से उतरी परी की तरह लग रही थी. गर्दन पीछे की तरफ कर के बालों को तौलिये से रगर कर पोछते हुए शायद उसे ध्यान नहीं था की टाइट ब्लाउज में बाहर की ओर उसकी चुचियाँ निकल जाएँगी.
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देखने से ऐसा लग रहा था जैसे अभी फार कर बाहर निकल आएगी. उसने शायद थोड़ा मेकअप भी कर लिया था. बाल सुखाते हुए उसकी नज़र मेरे ऊपर पड़ी तो बोली “कहाँ था, बोलके जाता… मैं कम से कम दरवाजा तो बंद कर लेती”. मैंने कहा “सॉरी दीदी वो मुझे ध्यान नहीं रहा…”. फिर बाल सुखाने के बाद दीदी अपने कमरे में चली गई. मैं वही बाहर बैठ कर टेलिविज़न देखने लगा.
अब मैं एक चोर बन चूका था, एक ऐसा चोर जो अपनी बड़ी बहन की खूबसूरती को चोरी छुपे हर समय निहारने की रहता था की जब दीदी अस्त-व्यस्त अवस्था में लेटी हो या कुछ काम कर रही हो तो उसकी एक झलक ले लू. दफ्तर खुल चूका था सो बाथरूम में फिर से दीदी की जवानी को निहारने का मौका नहीं मिल रहा था.
सुबह-सुबह नहा कर लोकल पकर कर ऑफिस जाता और फिर शाम में ही घर पर वापस आ पाता था. नया शनिवार और रविवार आया, उस दिन मैं काफी देर तक लैट्रिन में बैठा रहा पर दीदी बाथरूम में नहाने नहीं आई. फिर मैंने मौका देख कर दीदी जब नहाने गई तो लैट्रिन में कोशिश में लगा रहता था.
एक चोर की तरह मैं डरता भी था की कही मेरी चोरी पकरी न जाये. हर समय कोशिश करता चोरी से घुसने की कोशिश की पर उस काम में भी असफल रहा परोस से कोई आ कर दरवाज़ा खटखटाने लगा और दीदी ने बाथरूम में से मुझे जोर से आवाज़ देकर कहा की “देख कौन है दरवाजे पर”, मजबूरन निकलना पड़ा.
ऐसे ही हमेशा कुछ न कुछ हो जाता था और अपने प्रयासों में मुझे असफलता हाथ लगती. फिर मुझे मौका भी केवल शनिवार और रविवार को मिलता था. अगर इन दो दिनों में कुछ हो पाता तो ठीक है नहीं तो फिर पुरे एक सप्ताह तक इंतजार करना परता था. उस दिन की घटना को याद कर कर के मैंने न जाने कितनी बार मुठ मारी होगी इसका मुझे खुद अहसास नहीं था.
इसी तरह एक रात जब मैं अपने लण्ड को खड़ा करके हलके हलके अपने लण्ड की चमरी को ऊपर निचे करते हुए अपनी प्यारी दीदी को याद करके मुठ मारने की कोशिश करते हुए, अपनी आँखों को बंद कर उसके गदराये बदन की याद में अपने को डुबाने की कोशिश कर रहा था तो मेरी आँखों में पड़ती हुई रौशनी की लकीर ने मुझे थोड़ा बैचैन कर दिया और मैंने अपनी आंखे खोल दी.
दीदी के कमरे का दरवाज़ा थोड़ा सा खुला हुआ था. दरवाजे के दोनों पल्लो के बीच से नाईट बल्ब की रौशनी की एक लकीर सीधे मेरे तकिये के ऊपर जहाँ मैं अपना सर रखता हूँ पर आ रही थी. मैं आहिस्ते से उठा और दरवाजो के पास जा कर सोचा की इसके दोनों पल्लो को अच्छी तरह से आपस में सटा देता हूँ. चोरी तो मेरे मन में थी ही. दोनों पल्लो के बीच से अन्दर झाँकने के लोभ पर मैं काबू नहीं रख पाया.
दीदी के गुस्सैल स्वाभाव से परिचित होने के कारण मैं जानता था, अगर मैं पकड़ा गया तो शायद इस घर में मेरा आखिरी दिन होगा. दोनों पल्लो के बीच से अन्दर झांक कर देखा की दीदी अपने पलंग पर करवट होकर लेटी हुई थी. उसका मुंह दरवाजे के विपरीत दिशा में था. यानि की पैर दरवाजे की तरफ था.
पलंग एक साइड से दीवाल सटा हुआ था, दीदी दीवाल की ओर मुंह करके केवल पेटिकोट और ब्लाउज में जैसा की गर्मी के दिनों में वो हमेशा करती है लेटी हुई थी. गहरे नीले रंग का ब्लाउज और पेटिकोट दीदी के गोरे रंग पर खूब खिलता था. मुझे उनका पिछवारा नज़र आ रहा था. कई बार सोई हुई अवस्था में पेटिकोट इधर उधर हो जाने पर बहुत कुछ देख पाने का मौका मिल जाता है ऐसा मैंने कई कहानियों में पढ़ा था मगर यहाँ ऐसा कुछ भी नहीं था.
पेटिकोट अच्छी तरह से दीदी के पैरों से लिपटा हुआ था और केवल उनकी गोरी पिंडलियाँ ही दिख रही थी. दीदी ने अपने एक पैर में पतली सी पायल पहन रखी थी. दीदी वैसे भी कोई बहुत ज्यादा जेवरों की शौकीन नहीं थी. हाथो में एक पतली से सोने की चुड़ी. गोरी पिंडलियों में सोने की पतली से पायल बहुत खूबसूरत लग रही थी.
पेटिकोट दीदी के भारी चुत्तरो से चिपके हुए थे. वो शायद काफी गहरी नींद में थी. बहुत ध्यान से सुन ने पर हलके खर्राटों की आवाज़ आ रही थी. मैंने हलके से दरवाजे के पल्लो को अलग किया और दबे पाँव अन्दर घुस गया. मेरा कलेजा धक्-धक् कर रहा था मगर मैं अपने कदमो को रोक पाने असमर्थ था. मेरे अन्दर दीदी के प्रति एक तीव्र लालसा ने जन्म ले लिया था.
मैं दीदी के पास पहुँच कर एक बार सोती हुई दीदी को नजदीक से देखना चाहता था. दबे कदमो से चलते हुए मैं पलंग के पास पहुँच गया. दीदी का मुंह दूसरी तरफ था. वो बाया करवट हो कर लेटी हुई थी. कुछ पलो के बाद पलंग के पास मैं अपनी सोई हुई प्यारी बहन के पीछे खड़ा था. मेरी सांस बहुत तेज चल रही थी.
दम साध कर उन पर काबू करते हुए मैं थोड़ा सा आगे की ओर झुका. दीदी की सांसो के साथ उनकी छाती धीरे-धीरे उठ बैठ रही. गहरे नीले रंग के ब्लाउज का ऊपर का एक बटन खुला हुआ था और उस से गोरी छातियों दिख रही थी. थोड़ा सा उनके सर की तरफ तिरछा हो कर झुकने पर दोनों चुचियों के बीच की गहरी घाटी का उपरी भाग दिखने लगा.
मेरे दिमाग इस समय काम करना बंद कर चूका था. शायद मैंने सोच लिया था की जब ओखली में सर दे दिया तो मुसल से क्या डरना. मैंने अपने दाहिने हाथ को धीरे से आगे बढाया. इस समय मेरा हाथ काँप रहा था फिर भी मैंने अपने कांपते हाथो को धीरे से दीदी की दाहिनी चूची पर रख दिया. गुदाज चुचियों पर हाथ रखते ही लगा जैसे बिजली के नंगे तार को छू दिया हो.
ब्लाउज के ऊपर से चूची पर हाथो का हल्का सा दबाब दिया तो पुरे बदन में चीटियाँ रेंगने लगी. किसी लड़की या औरत की चुचियों को पहली बार अपने हाथो से छुआ था. दीदी की चूची एकदम सख्त थी. ज्यादा जोर से दबा नहीं सकता था. क्योंकि उनके जग जाने का खतरा था, मगर फिर भी इतना अहसास हो गया की नारियल की कठोर खोपरी जैसी दिखने वाली ये चूची वास्तव में स्पोंज के कठोर गेंद के समान थी.
जिस से बचपन में मैंने खूब क्रिकेट खेली थी. मगर ये गेंद जिसको मैं दबा रहा था वो एक जवान औरत के थे जो की इस समय सोई हुई थी. इनके साथ ज्यादा खेलने की कोशिश मैं नहीं कर सकता था फिर भी मैं कुछ देर तक दीदी की दाहिनी चूची को वही खड़े-खड़े हलके-हलके दबाता रहा. दीदी के बदन में कोई हरकत नहीं हो रही थी.
वो एकदम बेशुध खर्राटे भर रही थी. ब्लाउज का एक बटन खुला हुआ था, मैंने हलके से ब्लाउज के उपरी भाग को पकर कर ब्लाउज के दोनों भागो को अलग कर के चूची देखने के लिए और अन्दर झाँकने की कोशिश की मगर एक बटन खुला होने के कारण ज्यादा आगे नहीं जा सका. निराश हो कर चूची छोर कर मैं अब निचे की तरफ बढा.
दीदी की गोरी चिकनी पेट और कमर को कुछ पलो तक देखने के बाद मैंने हलके से अपने हाथो को उनकी जांघो पर रख दिया. दीदी की मोटी मदमस्त जांघो का मैं दीवाना था. पेटिकोट के कपरे के ऊपर से जांघो को हलके से दबाया तो अहसास हुआ की कितनी सख्त और गुदाज जांघे है.
काश मैं इस पेटिकोट के कपड़े को कुछ पलो के लिए ही सही हटा कर एक बार इन जांघो को चूम पाता या थोड़ा सा चाट भर लेता तो मेरे दिल को करार आ जाता. दीदी की मोटी जांघो को हलके हलके दबाते हुए मैं सोचने लगा की इन जांघो के बीच अपना सर रख कर सोने में कितना मजा आएगा. तभी मेरी नज़र दीदी की कमर के पास पड़ी जहाँ वो अपने पेटिकोट का नाड़ा बांधती है.
पेटिकोट का नाड़ा तो खूब कस कर बंधा हुआ था, मगर जहाँ पर नाड़ा बंधा होता है ठीक वही पर पेटिकोट में एक कट बना हुआ था. ये शायद नाड़ा बाँधने और खोलने में आसानी हो इसलिए बना होता है. मैं हलके से अपने हाथो को जांघो पर से हटा कर उस कट के पास ले गया और एक ऊँगली लगा कर कट को थोड़ा सा फैलाया.
ओह…वहां से सीधा दीदी की बुर का उपरी भाग नज़र आ रहा था. मेरा पूरा बदन झन-झना गया. लण्ड ने अंगराई ली और फनफना कर खड़ा हो गया. ऐसा लगा जैसे पानी एक दम सुपाड़े तक आ कर अटक गया है और अब गिर जायेगा. मैंने उस कट से दीदी के पेरू (पेट का सबसे निचला भाग) के थोड़ा निचे तक देख पा रहा था.
चूँकि दीदी को बाथरूम में नहाते हुए देखने के बाद से तीन हफ्ते बीत चुके थे और शायद दीदी ने दुबारा फिर से अपने अंदरूनी बालों की सफाई नहीं की थी इसलिए उनकी चुत पर झांटे उग गई थी. मुझे वही झांटे दिख रही थी. वासना और उत्तेजना में अँधा हो कर मैंने धीरे से अपनी ऊँगली पेटिकोट के कट के अन्दर सरका दी.
मेरी उँगलियों को पेरू की कोमल त्वचा ने जब छुआ तो मैं काँप गया और मेरी उँगलियाँ और अन्दर की तरफ सरक गई. चुत की झांटे मेरी उँगलियों में उलझ चुकी थी. मैं बहुत सावधानी से अपनी उँगलियों को उनके बीच चलाते हुए और अन्दर की तरफ ले जाना चाहता था. इसलिए मैंने पेटिकोट के कट को दुसरे हाथ की सहायता से थोड़ा सा और फैलाया और फिर अपनी ऊँगली को थोड़ा और अन्दर घुसाया और यही मेरी सबसे बड़ी गलती साबित हो गई.
मुझे ज्यादा लालच नहीं करना चाहिए था मगर गलती हो चुकी थी. दीदी अचानक सीधी होती हुई उठ कर बैठ गई. अपनी नींद से भरी आँखों को उन्होंने ऐसे खोल दिया जैसे वो कभी सोई ही नहीं थी. सीधा मेरे उस हाथ को पकर लिया जो उनके पेटिकोट के नाड़े के कट के पास था. मैं एक दम हक्का बक्का सा खड़ा रह गया.
दीदी ने मेरे हाथो को जोर से झटक दिया और एक दम सीधी बैठती हुई बोली “हरामी… सूअर…क्या कर रहा…. था… शर्म नहीं आती तुझे….” कहते हुए आगे बढ़ कर चटक से मेरी गाल पर एक जोर दार थप्पड़ रशीद कर दिया. इस जोरदार झापड़ ने मुझे ऊपर से निचे तक एक दम झन-झना दिया.
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मेरे होश उर चुके थे. गाल पर हाथ रखे वही हतप्रभ सा खड़ा मैं निचे देख रहा था. दीदी से नज़र मिलाने का तो सवाल ही पैदा नहीं होता था. दीदी ने एक बार फिर से मेरा हाथ पकर लिया और अपने पास खींचते हुए मुझे ऊपर से निचे तक देखा. मैं काँप रहा था. मुझे लग रहा था जैसे मेरे पैरों की सारी ताकत खत्म हो चुकी है और मैं अब निचे गिर जाऊंगा.
तभी दीदी ने एक बार फिर कड़कती हुई आवाज़ में पूछा “कमीने… क्या कर रहा था… जवाब क्यों नहीं देता….” फिर उनकी नज़रे मेरे हाफ पैंट पर पड़ी जो की आगे से अभी भी थोड़ा सा उभरा हुआ दिख रहा था. हिकारत भरी नजरो से मुझे देखते हुए बोली “यही काम करने के लिए तू…. मेरे पास…. छि…. उफ़…. कैसा सूअर…..”. ये कहानी आप हमारी वासना डॉट नेट पर पढ़ रहे है.
मेरे पास बोलने के लिए कुछ भी नहीं था मगर फिर भी हिम्मत करके हकलाते हुए मैं बोला “वो दीदी… माफ़.. मैं….. मुझे… माफ़… मैं अब… आ…. आगे…” पर दीदी ने फिर से जोर से अपना हाथ चलाया. चूँकि वो बैठी हुई थी और मैं खड़ा था इसलिए उनका हाथ सीधा मेरे पैंट के लगा.
ऐसा उन्होंने जान-बूझ कर किया था या नहीं मुझे नहीं पता मगर उनका हाथ थोड़ा मेरे लण्ड पर लगा और उन्होंने अपना हाथ झटके से ऐसे पीछे खिंच लिया जैसे बिजली के नंगे तारो ने उन को छू लिया हो और एकदम दुखी स्वर में रुआंसी सी होकर बोली “उफ़…. कैसा लड़का है….. अगर माँ सुनेगी…. तो क्या बोलेगी… ओह… मेरी तो समझ में नहीं आ रहा… मैं क्या करू…”.
बात माँ तक पहुँचेगी, ये सुनते ही मेरी गांड फट गई। घबरा कर, कैसे भी बात को संभालने के इरादे से हकलाता हुआ बोला, “दीदी… प्लीज़… माफ़ कर दो… प्लीज़… अब कभी ऐसा नहीं होगा… मैं बहक गया था… आज के बाद… प्लीज़ दीदी… प्लीज़… मैं कहीं मुँह नहीं दिखा पाऊँगा… मैं आपके पैर…”
कहते हुए मैं दीदी के पैरों पर गिर पड़ा। दीदी इस समय एक पैर घुटनों के पास से मोड़ कर बिस्तर पर पालथी मारने के अंदाज़ में रखे हुई थीं और दूसरा पैर घुटना मोड़ कर सामने सीधा रखे हुई थीं। मेरी आँखों से सच में आँसू निकलने लगे थे और वो दीदी के पैर के तलवे के ऊपरी भाग को भिगो रहे थे। मेरी आँखों से निकलते इन प्रायश्चित के आँसुओं ने शायद दीदी को पिघला दिया और उन्होंने धीरे से मेरे सिर को ऊपर की तरफ उठाया।
हालाँकि उनका गुस्सा अभी भी कम नहीं हुआ था और वो उनकी आँखों में दिख रहा था, मगर अपनी आवाज़ में थोड़ी कोमलता लाते हुए बोलीं, “ये क्या कर रहा था तू… तुझे लोकलाज, मान-मर्यादा किसी भी चीज़ की चिंता नहीं… मैं तेरी बड़ी बहन हूँ… मेरी और तेरी उम्र के बीच नौ साल का फासला है… ओह, मैं क्या बोलूँ, मेरी समझ में नहीं आ रहा… ठीक है, तू बड़ा हो गया है… मगर… क्या यही तरीका मिला था तुझे… उफ़…”
दीदी की आवाज़ की कोमलता ने मुझे कुछ शांति प्रदान की, हालाँकि अभी भी मेरे गाल उनके तगड़े थप्पड़ से झनझना रहे थे और शायद दीदी की उँगलियों के निशान भी मेरे गालों पर उग आए थे।
मैं फिर से रोते हुए बोला, “प्लीज़ दीदी, मुझे माफ़ कर दो… मैं अब दोबारा ऐसी गलती…”
दीदी मुझे बीच में काटते हुए बोलीं, “मुझे तो तेरे भविष्य की चिंता हो रही है… तूने जो किया सो किया, पर मैं जानती हूँ… तू अब बड़ा हो चुका है… तू क्या करता है… कहीं तू अपने शरीर को बर्बाद तो नहीं कर रहा है…”
मैंने इसका मतलब नहीं समझ पाया। हक्का-बक्का सा दीदी का मुँह ताकता रहा।
दीदी ने मुझसे फिर पूछा, “कहीं… तू… अपने हाथ से तो नहीं…”
अब दीदी की बात मेरी समझ में आ गई। दीदी का ये सवाल पूछना वाजिब था क्योंकि मेरी हरकतों से उन्हें इस बात का अहसास तो हो ही चुका था कि मैंने आज तक किसी लड़की के साथ कुछ किया नहीं था और उन्हें ये भी पता था कि मेरे जैसे लड़के अपने हाथों से काम चलाते हैं। पर मैं ये सवाल सुन कर हक्का-बक्का सा रह गया। मेरे होंठ सूख गए और मैं कुछ बोल नहीं पाया।
दीदी ने फिर से मेरी बाँहों को पकड़ मुझे झकझोरा और पूछा, “बोलता क्यों नहीं है… मैं क्या पूछ रही हूँ… तू अपने हाथों से तो नहीं करता…”
मैंने नासमझ होने का नाटक किया और बोला, “हाथों से दीदी… मैं समझा नहीं…”
“देख… इतना तो मैं समझ चुकी हूँ कि तू लड़कियों के बारे में सोचता है… इसलिए पूछ रही हूँ, तू अपने आपको शांत करने के लिए… जैसे तू अभी मेरे साथ… उफ़, बोलने में भी शर्म आ रही, पर… अभी जब तेरा… ये तन जाता है तो अपने हाथों से शांत करता है क्या… इसे…” मेरे पैंट के उभरे हुए भाग की तरफ इशारा करते हुए बोलीं।
अब दीदी अपनी बात को पूरी तरह स्पष्ट कर चुकी थीं। मैं कोई बहाना नहीं कर सकता था। गर्दन झुका कर बोला, “दी… दीदी… वो वो… मुझे माफ़ कर… माफ़…”
एक बार फिर दीदी का हाथ चला और मेरी गाल फिर से लाल हो गई। “क्या दीदी-दीदी कर रहा है… जो पूछ रही हूँ साफ़-साफ़ क्यों नहीं बताता… हाथ से करता है… यहाँ ऊपर पलंग पर बैठ… बता मुझे…” कहते हुए दीदी ने मेरे कंधों को पकड़ ऊपर उठाने की कोशिश की।
दीदी को एक बार फिर गुस्से में आता देख मैं धीरे से उठ कर दीदी के सामने पलंग पर बैठ गया और एक गाल पर हाथ रखे हुए अपनी गर्दन नीचे किये हुए धीरे से बोला, “हाँ… हाथ से… हाथ से करता…” मैं इतना बोल कर चुप हो गया। हम दोनों के बीच कुछ पल की चुप्पी छाई रही। फिर दीदी गहरी साँस लेते हुए बोलीं, “इसी बात का मुझे डर था… मुझे लग रहा था कि इन सब चक्करों में तू अपने आपको बर्बाद कर रहा है…”
फिर मेरी ठोड़ी पकड़ कर मेरे चेहरे को ऊपर उठा कर ध्यान से देखते हुए बोलीं, “मैंने… तुझे मारा… उफ़… देख कैसा निशान पड़ गया है… पर क्या करती, मुझे गुस्सा आ गया था… खैर, मेरे साथ जो किया सो किया… पर भाई… सच में मैं बहुत दुखी हूँ… तुम जो ये काम करते हो ये… ये तो…”
मेरे अंदर ये जान कर थोड़ी सी हिम्मत आ गई कि मैंने दीदी के बदन को देखने की जो कोशिश की थी, उस बात से दीदी अब नाराज़ नहीं हैं, बल्कि वो मेरे मुठ मारने की आदत से परेशान हैं। मैं दीदी की ओर देखते हुए बोला, “सॉरी दीदी… मैं अब नहीं करूँगा…”
“भाई, मैं तुम्हारे भले के लिए ही बोल रही हूँ… तुम्हारा शरीर बर्बाद कर देगा ये काम… ठीक है, इस उम्र में लड़कियों के प्रति आकर्षण तो होता है… मगर… ये हाथ से करना सही नहीं है… ये ठीक नहीं है… राजू, तुम ऐसा मत करो आगे से…”
“ठीक है दीदी… मुझे माफ़ कर दो, मैं आगे से ऐसा नहीं करूँगा… मैं शर्मिंदा हूँ…” मैंने अपनी गर्दन और ज्यादा झुकाते हुए धीरे से कहा।
दीदी एक पल को चुप रहीं, फिर मेरी ठोड़ी पकड़ कर मेरे चेहरे को ऊपर उठाती हुई हल्का सा मुस्कुराते हुए बोलीं, “मैं तुझे अच्छी लगती हूँ क्या…”
मैं एकदम से शर्मा गया, मेरे गाल लाल हो गए और झेंप कर गर्दन फिर से नीचे झुका ली। मैं दीदी के सामने बैठा हुआ था। दीदी ने हाफ पैंट के बाहर झांकती मेरी जाँघों पर अपना हाथ रखा और उसे सहलाती हुई धीरे से अपने हाथ को आगे बढ़ा कर मेरे पैंट के उभरे हुए भाग पर रख दिया।
मैं शर्मा कर अपने आप में सिमटते हुए दीदी के हाथ को हटाने की कोशिश करते हुए अपने दोनों जाँघों को आपस में सटाने की कोशिश की, ताकि दीदी मेरे उभार को नहीं देख पाएँ। दीदी ने मेरी जाँघ पर दबाव डालते हुए उन्हें सीधा कर दिया और मेरे पैंट के उभार को पैंट के ऊपर से पकड़ लिया और बोलीं, “रुक… आराम से बैठा रह… देखने दे… साले, अभी शर्मा रहा है… चुपचाप मेरे कमरे में आकर मुझे छू रहा था, तब शर्म नहीं आ रही थी तुझे… कुत्ते!”
दीदी ने फिर से अपना गुस्सा दिखाया और मुझे गाली दी। मैं सहम कर चुपचाप बैठ गया। दीदी मेरे लौड़े को छोड़ कर मेरे हाफ पैंट का बटन खोलने लगीं। मेरे पैंट के बटन खोल कर कड़कती आवाज़ में बोलीं, “चुत्तर उठा तो… तेरा पैंट निकालूँ…”
मैंने हल्का विरोध किया, “ओह दीदी, छोड़ दो…”
“फिर से मार खाएगा क्या… जैसा कहती हूँ वैसा कर…” कहती हुई थोड़ा आगे खिसक कर मेरे पास आईं और अपने पेटीकोट को खींच कर घुटनों से ऊपर करते हुए पहले जैसे बैठ गईं। मैंने चुपचाप अपने चुत्तरों को थोड़ा सा ऊपर उठा दिया। दीदी ने सटाक से मेरे पैंट को खींच कर मेरी कमर और चुत्तरों के नीचे कर दिया, फिर मेरे पैरों से होकर मेरे पैंट को पूरा निकाल कर नीचे कारपेट पर फेंक दिया। ये कहानी आप हमारी वासना डॉट नेट पर पढ़ रहे है.
मैं नीचे से पूरा नंगा हो गया था और मेरा ढीला लौड़ा दीदी की आँखों के सामने था। मैंने हाल ही में अपने लौड़े के ऊपर उगे बालों को ट्रिम किया था, इसलिए झाँटें बहुत कम थीं। मेरे ढीले लौड़े को अपनी मुट्ठी में भरते हुए दीदी ने सुपाड़े की चमड़ी को थोड़ा सा नीचे खींचते हुए मेरे मरे हुए लौड़े पर जब हाथ चलाया तो मैं सनसनी से भर आह किया। दीदी ने मेरी इस आह पर कोई ध्यान नहीं दिया और अपने अंगूठे को सुपाड़े पर चलाती हुई सक-सक मेरे लौड़े की चमड़ी को ऊपर-नीचे किया।
दीदी के कोमल हाथों का स्पर्श पा कर मेरे लौड़े में जान वापस आ गई। मैं डरा हुआ था, पर दीदी जैसी खूबसूरत औरत की हथेली ने लौड़े को अपनी मुट्ठी में दबोच कर मसलते हुए, चमड़ी को ऊपर-नीचे करते हुए सुपाड़े को गुदगुदाया तो अपने आप मेरे लौड़े की तरफ खून की रफ्तार तेज हो गई। लौड़ा फुफकार उठा और अपनी पूरी औकात पर आ गया।
मेरे खड़े होते लौड़े को देख दीदी का जोश दुगुना हो गया और दो-चार बार हाथ चला कर मेरे लौड़े को अपने बित्ते से नापती हुई बोलीं, “बाप रे बाप… कैसा हल्ला बी लौड़ा है… ओह… हाय… भाई, तेरा तो सच में बहुत बड़ा है… मेरी इतनी उम्र हो गई… आज तक ऐसा नहीं देखा था… ओह… ये पूरा नौ इंच का लग रहा है… इतना बड़ा तो तेरे बहनोई का भी नहीं… हाय… ये तो उनसे बहुत बड़ा लग रहा है… और काफी शानदार है… उफ़… मैं तो… मैं तो… हाय… ये तो गधे के लौड़े जितना बड़ा है… उफ़्फ़्फ़…”
बोलते हुए मेरे लौड़े को जोर से मरोड़ दिया और सुपाड़े को अपनी उँगली और अंगूठे के बीच कस कर दबा दिया। दर्द के मारे छटपटा कर जाँघ सिकोड़ते हुए दीदी का हाथ हटाने की कोशिश करते हुए पीछे खिसका तो दीदी मेरे लौड़े को पकड़ कर अपनी तरफ खींचती हुई बोलीं, “हरामी… साले… मैं जब सो रही होती हूँ तो मेरी चूची दबाता है, मेरी चूत में उँगली करता है… आग लगाता है… इतना मोटा लौड़ा लेकर घूमता है…” और बाएँ गाल पर तड़ाक से एक थप्पड़ जड़ दिया।
मैं हतप्रभ सा हो गया। मेरी समझ में नहीं आ रहा था मैं क्या करूँ। दीदी मुझसे क्या चाहती हैं, ये भी समझ में नहीं आ रहा था। एक तरफ तो वो मेरे लौड़े को सहलाते हुए मुठ मार रही थीं और दूसरी तरफ गाली देते हुए बात कर रही थीं और मार रही थीं। मैं उदास और डरी हुई नज़रों से दीदी को देख रहा था। दीदी मेरे लौड़े की मुठ मारने में मशगूल थीं।
एक हाथ में लौड़े को पकड़े हुए दूसरे हाथ से मेरे अंडकोष को अपनी हथेली में लेकर सहलाती हुई बोलीं, “…हाथ से करता है… राजू… अपना शरीर बर्बाद मत कर… तेरा शरीर बर्बाद हो जाएगा तो मैं माँ को क्या मुँह दिखाऊँगी…”
कहते हुए जब अपनी नजरें ऊपर उठाईं तो मेरे उदास चेहरे पर दीदी की नज़र पड़ी। मुझे उदास देख लौड़े पर हाथ चलाती हुई दूसरे हाथ से मेरे गाल को चुटकी में पकड़ मसलते हुए बोलीं, “उदास क्यों है… क्या तुझे अच्छा नहीं लग रहा है… हाय राजू, तेरा लौड़ा बहुत बड़ा और मजेदार है… तेरा हाथ से करने लायक नहीं है… ये किसी छेद घुसा कर किया कर…”
मैं दीदी की ऐसी खुल्लम-खुल्ला बातों को सुन कर एकदम से भौचक्क रह गया और उनका मुँह ताकता रहा। दीदी मेरे लौड़े की चमड़ी को पूरा नीचे उतार कर सुपाड़े की गोलाई के चारों तरफ उँगली फेरती हुई बोलीं, “ऐसे क्या देख रहा है… तू अपना शरीर बर्बाद कर लेगा तो मैं माँ को क्या मुँह दिखाऊँगी… मैंने सोच लिया है, मुझे तेरी मदद करनी पड़ेगी… तू घबरा मत…”
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दीदी की बातें सुन कर मुझे खुशी हुई। मैं हकलाते हुए बोला, “हाय दीदी, मुझे डर लगता है… आपसे…”
इस पर दीदी बोलीं, “राजू मेरे भाई… डर मत… मैंने तुझे गाली दी, इसकी चिंता मत कर… मैं तेरा मज़ाक़ खराब नहीं करना चाहती… ले… मेरा मुँह मत देख, तू भी मज़े कर…” और मेरा एक हाथ पकड़ कर अपनी ब्लाउज़ में कसी चूचियों पर रखती हुई बोलीं, “…तू इनको दबाना चाहता था ना… ले… दबा… तू भी मज़े कर… मैं ज़रा तेरे लौड़े की… कितना पानी भरा है इसके अंदर…”
मैंने डरते हुए दीदी की चूचियों को अपनी हथेली में थाम लिया और हल्के-हल्के दबाने लगा। अभी दो-तीन बार ही दबाया था कि दीदी मेरे लौड़े को मरोड़ती हुई बोलीं, “साले… कब मर्द बनेगा… ऐसे औरतों की तरह चूची दबाएगा तो… इतना तगड़ा लौड़ा हाथ से ही हिलाता रह जाएगा… अरे मर्द की तरह दबाना… डर मत… ब्लाउज़ खोल के दबाना चाहता है तो खोल दे… हाय कितना मजेदार हथियार है तेरा… देख… इतनी देर से मुठ मार रही हूँ मगर पानी नहीं फेंक रहा…”
मैंने मन ही मन सोचा कि आराम से मुठ मारेगी तभी तो पानी फेंकेगा, यहाँ तो जैसे ही लौड़ा अपनी औकात पर आया था वैसे ही एक थप्पड़ मार कर उसको ढीला कर दिया। इतनी देर में ये समझ में आ गया कि अगर मुझे दीदी के साथ मज़े करना है तो बर्दाश्त करना ही पड़ेगा।
चूँकि दीदी ने अब खुली छूट दे दी थी, इसलिए अपने मज़े के अनुसार दोनों चूचियों को दबाने लगा, ब्लाउज़ के बटन भी साथ ही साथ खोल दिए और नीले रंग की छोटी सी ब्रा में कसी दीदी की दोनों रसभरी चूचियों को दोनों हाथों में भर कर दबाते हुए मज़ा लूटने लगा। मज़ा बढ़ने के साथ लौड़े की औकात में भी बढ़ोतरी होने लगी।
सुपाड़ा गुलाबी से लाल हो गया था और नसों की रेखाएँ लौड़े के ऊपर उभर आई थीं। दीदी पूरी कोशिश करके अपनी हथेली की मुट्ठी बना कर पूरे लौड़े को कसते हुए अपना हाथ चला रही थीं। फिर अचानक उन्होंने लौड़े को पकड़े हुए ही मुझे पीछे की तरफ धकेला, मेरी पीठ पलंग की पुश्त से जाकर टकराई।
मैं अभी संभल भी नहीं पाया था कि दीदी ने थोड़ा पीछे की तरफ खिसकते हुए जगह बनाते हुए अपने सिर को नीचे झुका दिया और मेरे लाल आलू जैसे चमचमाते सुपाड़े को अपने होंठों के बीच कसते हुए जोर से चूसा। मुझे लगा जैसे मेरी जान सुपाड़े से निकल कर दीदी के मुँह के अंदर समा गई हो। गुदगुदी और मज़े ने बेहाल कर दिया था।
अपने नौजवान सुपाड़े को चमड़ी हटा कर पहले कभी पंखे के नीचे हवा लगाता था तो इतनी जबरदस्त सनसनी होती थी कि मैं जल्दी से चमड़ी ऊपर कर लेता था। यहाँ दीदी की गरम मुँह के अंदर उनके कोमल होंठ और जीभ ने जब अपना कमाल सुपाड़े पर दिखाना शुरू किया तो मैं सनसनी से भर उठा। लगा कि लौड़ा पानी छोड़ देगा।
घबरा कर दीदी के मुँह को अपने लौड़े पर से हटाने के लिए चूची छोड़ कर उनके सिर को पकड़ ऊपर उठाने की कोशिश की तो दीदी मेरे हाथ को झटक लौड़े पर से मुँह हटाती हुई बोलीं, “हाय राजू… तेरा लौड़ा तो बहुत स्वादिष्ट है… खाने लायक है… तुझे मज़ा आएगा… चूसने दे… देख, हाथ से करने से ज्यादा मज़ा मिलेगा…”
मैं घबराता हुआ बोला, “पर… पर… दीदी, मेरा निकल जाएगा… बहुत गुदगुदी होती है… जब चूसती हो… हाय…”
इस पर दीदी खुश होती हुई बोलीं, “कोई बात नहीं भाई… ऐसा होता है… आज से पहले कभी तूने चुसवाया है…”
“हाय… नहीं दीदी… कभी नहीं…”
“ओह… हो… मतलब किसी के साथ भी किसी तरह का मज़ा नहीं लिया है…”
“हाय… नहीं दीदी… कभी किसी के साथ… नहीं…”
“कभी किसी औरत या लड़की को नंगा नहीं देखा है…”
मैं दीदी की इस बात पर शर्मा गया और हकलाते हुए बोला, “जी कभी नहीं…”
“हाय, तभी तू इतना तरस रहा है… और छुपकर देखने की कोशिश कर रहा था… कोई बात नहीं राजू… मुझे भी माँ को मुँह दिखाना है… चिंता मत कर… पहले मैं ये तेरा चूस कर इसकी मलाई एक बार निकाल देती हूँ… फिर तुझे दिखा दूँगी…”
मैं ज्यादा कुछ समझ नहीं पाया कि क्या दिखा दूँगी। मेरा ध्यान तो मेरे तने हुए लौड़े पर ही अटका पड़ा था। मैं बहुत ज्यादा उत्तेजित हो चुका था और अब किसी भी तरह से लौड़े का पानी निकलना चाहता था। मैंने अपने लौड़े को हाथ से पकड़ा तो दीदी ने मेरा हाथ झटक दिया और अपनी चूची पर रखती हुई बोलीं, “ले, इसको पकड़” और मेरे लौड़े को अपनी मुट्ठी में भर कर ऊपर-नीचे करते हुए सुपाड़े को अपने मुँह में भर कर चूसने लगीं।
मैं सीत्कारते हुए दोनों हाथों में दीदी की कठोर चूचियों को मसलते हुए अपनी गांड बिस्तर से उछालते हुए चुसाई का मज़ा लेने लगा। मेरी समझ में नहीं आ रहा था कि मैं क्या-क्या करूँ। सनसनी के मारे मेरा बुरा हाल हो गया था। दीदी मेरे सुपाड़े के चारों तरफ जीभ फिराते हुए मेरे लौड़े को लॉलीपॉप की तरह चूस रही थीं।
कभी वो पूरे लौड़े पर जीभ फिराते हुए मेरे अंडकोष को अपनी हथेली में लेकर सहलाते हुए चूसतीं, कभी मेरे लौड़े के सुपाड़े को अपने होंठों के बीच दबा कर इतनी जोर-जोर से चूसतीं कि गोल सुपाड़ा पिचक कर चपटा होने लगता था। चूची छोड़ कर मैं दीदी के सिर को पकड़ गिरगिड़ाते हुए बोला, “हाय दीदी, मेरा… निकल जाएगा… ओह… सी… दीदी अपना मुँह हटा लो… ओह दीदी… बहुत गुदगुदी हो रही है… प्लीज़ दीदी… ओह मुँह हटा लो… देखो मेरा पानी निकल रहा है…”
मेरे इतना कहते ही मेरे लौड़े ने एक तेज पिचकारी छोड़ी। कविता दीदी ने जल्दी से अपना मुँह हटाया, मगर तब भी मेरे लौड़े की तेज धार के साथ निकली हुई वीर्य की पिचकारी का पहला धार तो उनके मुँह में ही गिरा, बाकी धीरे-धीरे पुच-पुच करते हुए उनके पेटीकोट एवं हाथ पर गिरने लगा, जिससे उन्होंने लौड़ा पकड़ रखा था।
मैं डरते हुए दीदी का मुँह देखने लगा कि कहीं वो इस बात के लिए नाराज़ तो नहीं हो गईं कि मैंने अपना पानी उनके मुँह में गिरा दिया है। मगर मैंने देखा कि दीदी अपने मुँह को चलाती हुई जीभ निकल कर अपने होंठों के कोने पर लगे मेरे सफेद रंग के गाढ़े वीर्य को चाट रही थीं।
मेरी तरफ मुस्कुरा कर देखते हुए बोलीं, “हाय राजू… बहुत अच्छा पानी निकला… बहुत मज़ा आया… तेरा हथियार बहुत अलबेला है… भाई… बहुत पानी छोड़ता है… मज़ा आया कि नहीं… बोल… कैसा लगा अपनी दीदी के मुँह में पानी छोड़ना… हाय… तेरा लौड़ा जिस बूर में पानी छोड़ेगा वो तो एकदम लबालब भर जाएगी…”
दीदी एकदम खुल्लम-खुल्ला बोल रही थीं। दीदी के ऐसे बोलने पर मैं झरने के बाद भी सनसनी से भर शरमाया तो दीदी मेरे झरे लौड़े को मुट्ठी में कसती हुई बोलीं, “अनचुदे लौड़े की सही पहचान यही है… कि उसका औजार एक पानी निकालने के बाद कितनी जल्दी खड़ा होता है…” कहते हुए मेरे लौड़े को अपनी हथेली में भर कर सहलाते हुए सुपाड़े पर उँगली चलाने लगीं। मेरे बदन में फिर से सनसनाहट होने लगी। झरने के कारण मेरे पैर अभी भी काँप रहे थे।
दीदी मेरी ओर मुस्कुराते हुए देख रही थीं और बोलीं, “इस बार जब तेरा निकलेगा तो और ज्यादा टाइम लगाएगा… वैसे भी तेरा काफी देर में निकलता है… साला बहुत दमदार लौड़ा है तेरा…”
मैं शरमाते हुए दीदी की तरफ देखा और बोला, “हाय… फिर से मत करो… हाथ से…”
इस पर दीदी बोलीं, “ठहर जा… पहले खड़ा कर लेने दे… हाय देख, खड़ा हो रहा है लौड़ा… वाह… बहुत तेजी से खड़ा हो रहा है तेरा तो…” कहते हुए दीदी और जोर से अपने हाथों को चलाने लगीं।
“हाय दीदी, हाथ से मत करो… फिर निकल जाएगा…” मैं अपने खड़े होते लौड़े को देखते हुए बोला।
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इस पर दीदी ने मेरे गाल पकड़ खींचते हुए कहा, “साले, हाथ से करने के लिए तो मैंने खुद रोका था… हाथ से मैं कभी नहीं करूँगी… मेरे भाई राजा का शरीर मैं बर्बाद नहीं होने दूँगी…” फिर मेरे लौड़े को छोड़ कर अपने हाथ को साइड से अपनी पेटीकोट के अंदर ले जा कर जाँघों के बीच पता नहीं क्या.
शायद अपनी बूर को छुआ और फिर हाथ निकाल कर उँगली दिखाती हुई बोलीं, “हाय देख… मेरी चूत कैसे पानी आ गई… बड़ा मस्त लौड़ा है तेरा… जो भी देखेगी उसकी पानी आ जाएगी… एकदम घोड़े के जैसा है… अनचुदी लौंडिया की तो फाड़ देगा तू… मेरे जैसी चुदी चूतों के लायक लौड़ा है… कभी किसी औरत की नंगी नहीं देखी है…”
दीदी के इस तरह से बिना किसी लाज-शर्म के बोलने के कारण मेरे अंदर भी हिम्मत आ रही थी और मैं भी अपने आपको दीदी के साथ खोलना चाह रहा था। दीदी के ये बोलने पर मैंने शर्माने का नाटक करते हुए कहा, “हाय दीदी, किसी की नहीं… बस एक बार वो ग्वालिन बाहर मुनिसिपैलिटी के नल पर सुबह-सुबह नहा रही थी… तब…”
दीदी चहकती हुई बोलीं, “हाँ… तब क्या भाई… तब…”
मैं गर्दन नीचे करते हुए बोला, “वो… वो… तो दीदी कपड़े पहन कर नहा रही थी… बैठ कर… पैर मोड़ कर… तो उसकी साड़ी बीच में से हट गई… पर… काला-काला दिख रहा था… जैसे बाल हों…”
दीदी हँसने लगीं और बोलीं, “अरे… वो तो झाँटें होंगी… उसकी चूत की… बस इतना सा देख कर ही तेरा काम हो गया… मतलब तूने आज तक असल में किसी की नहीं देखी है…”
मैं शरमाते हुए बोला, “अब पता नहीं दीदी… मुझे… लगा वही होगी… इसलिए…”
दीदी इस पर मुस्कुराते हुए बोलीं, “ओह हो… मेरा प्यारा छोटा भाई… बेचारा… फिर तुझे और कोई नहीं मिली देखने के लिए जो मेरे कमरे में घुस गया…”
मैं इस पर दीदी का थोड़ा सा विरोध करते हुए बोला, “नहीं दीदी… ऐसी बात नहीं है… वो तो… तो मैं… मेरे ऑफिस में भी बहुत सारी लड़कियाँ हैं मगर… मगर… मुझे नहीं पता… ऐसा क्यों है… मगर मुझे आपसे ज्यादा सुंदर कोई नहीं… कोई भी नहीं लगती… मुझे वो लड़कियाँ अच्छी नहीं लगतीं, प्लीज़ दीदी मुझे माफ़ कर दो… मैं… मैं आगे से ऐसा… नहीं…”
इस पर दीदी हँसने लगीं और मुझे रोकते हुए बोलीं, “अरे… रे… इतना घबराने की ज़रूरत नहीं है… मैं तो तुमसे इसलिए नाराज़ थी कि तुम अपना शरीर बर्बाद कर रहे थे… मेरे भाई को मैं इतनी अच्छी लगती हूँ कि उसे कोई और लड़की अच्छी नहीं लगती… ये मेरे लिए गर्व की बात है, मैं बहुत खुश हूँ… मुझे तो लग रहा था कि मेरी उम्र बहुत ज्यादा हो चुकी है इसलिए… पर… इक्कीस साल का मेरा नौजवान भाई मुझे इतना पसंद करता है, ये तो मुझे पता ही नहीं था…”
कहते हुए आगे बढ़ कर मेरे होंठों पर एक जोरदार चुम्मा लिया और फिर दोबारा अपने होंठों को मेरे होंठों से सटा कर मेरे होंठों को अपने होंठों से दबोच कर अपना जीभ मेरे मुँह में ठेलते हुए चूसने लगीं। उसके होंठ चूसने के अंदाज़ से लगा जैसे मेरे कमसिन जवान होंठों का पूरा रस दीदी चूस लेना चाहती हों। होंठ चूसते-चूसते वो मेरे लौड़े को अपनी हथेली के बीच दबोच कर मसल रही थीं। कुछ देर तक ऐसा करने के बाद जब दीदी ने अपने होंठ अलग किए तो हम दोनों की साँसें फूल गई थीं।
मैं अपनी तेज़ बहकी हुई साँसों को काबू करता हुआ बोला, “हाय दीदी, आप बहुत अच्छी हो…”
“अच्छा… बेटा मक्खन लगा रहा है…”
“नहीं दीदी… आप सच में बहुत अच्छी हो… और बहुत सुंदर हो…”
इस पर दीदी हँसते हुए बोलीं, “मैं सब मक्खनबाज़ी समझती हूँ, बड़ी बहन को पटाकर नीचे लिटाने के चक्कर में… है तू…”
मैं इस पर थोड़ा शर्माता हुआ बोला, “हाय… नहीं दीदी… आप…”
दीदी ने गाल पर एक प्यार भरा चपत लगाते हुए कहा, “हाँ… हाँ… बोल…”
मैं इस पर झिझकते हुए बोला, “वो दीदी… दीदी… आप बोल रही थीं कि मैं… दि… दि… दिखा दूँगी…”
दीदी मुस्कुराते हुए बोलीं, “दिखा दूँगी… क्या मतलब हुआ… क्या दिखा दूँगी…”
मैं हकलाता हुआ बोला, “वो… वो… दीदी आपने खुद बोला था… कि मैं… वो ग्वालिन वाली चीज़…”
“अरे ये ग्वालिन वाली चीज़ क्या होती है… ग्वालिन वाली चीज़ तो ग्वालिन के पास होगी… मेरे पास कहाँ से आएगी… खुल के बता ना राजू… मैं तुझे कोई डाँट रही हूँ जो ऐसे घबरा रहा है… क्या देखना है…”
“दीदी… वो… वो मुझे… चू… चू…”
“अच्छा तुझे चूची देखनी है… वो तो मैं तुझे दिखा दिया ना… यही तो है… ले देख…” कहते हुए अपनी ब्रा में कसी दोनों चूचियों के नीचे हाथ लगा उनको उठा कर उभारते हुए दिखाया। छोटी सी नीले रंग की ब्रा में कसी दोनों गोरी गदराई चूचियाँ और ज्यादा उभर कर नज़रों के सामने आईं तो लौड़े ने एक ठुनकी मारी, मगर दिल में करार नहीं आया।
एक तो चूचियाँ ब्रा में कसी थीं, नंगी नहीं थीं, दूसरा मैं चूत दिखाने की बात कर रहा था और दीदी यहाँ चूची उभार कर दिखा रही थीं। होंठों पर जीभ फेरते हुए बोला, “हाय… नहीं… दीदी आप समझ नहीं रही… वो वो दू… सरी वाली चीज़ चू… चू… चूत दिखाने… के लिए…” ये कहानी आप हमारी वासना डॉट नेट पर पढ़ रहे है.
“ओह हो… तो ये चक्कर है… ये है ग्वालिन वाली चीज़… साले ग्वालिन की नहीं देखने को मिली तो अपनी बड़ी बहन की देखेगा… मैं सोच रही थी तुझे शरीर बर्बाद करने से नहीं रोकूँगी तो माँ को क्या बोलेगी… यहाँ तो उल्टा हो रहा है… देखो माँ… तुमने कैसा लाडला पैदा किया है… अपनी बड़ी बहन को बूर दिखाने को बोल रहा है… हाय कैसा बहनचोद भाई है मेरा… मेरी चूत देखने के चक्कर में है… उफ़्फ़… मैं तो फँस गई हूँ… मुझे क्या पता था कि मुठ मारने से रोकने की इतनी बड़ी कीमत चुकानी पड़ेगी…”
दीदी की ऐसे बोलने पर मेरा सारा जोश ठंडा पड़ गया। मैं सोच रहा था अब मामला फिट हो गया है और दीदी खुशी-खुशी सब कुछ दिखा देंगी। शायद उनको भी मज़ा आ रहा है, इसलिए कुछ और भी करने को मिल जाएगा, मगर दीदी के ऐसे अफसोस करने से लग रहा था जैसे कुछ भी देखने को नहीं मिलने वाला। मगर तभी दीदी बोलीं, “ठीक है, मतलब तुझे चूत देखनी है… अभी बाथरूम से आती हूँ तो तुझे अपनी बूर दिखाती हूँ” कहती हुई बेड से नीचे उतर ब्लाउज़ के बटन बंद करने लगीं।
मेरी कुछ समझ में नहीं आया कि दीदी अपना ब्लाउज़ क्यों बंद कर रही हैं। मैं दीदी के चेहरे की तरफ देखने लगा तो दीदी आँख नचाते हुए बोलीं, “चूत ही तो देखनी है… वो तो मैं पेटीकोट उठा कर दिखा दूँगी…” फिर तेजी से बाहर निकल बाथरूम चली गईं।
मैं सोच में पड़ गया। मैं दीदी को पूरा नंगा देखना चाहता था। मैं उनकी चूची और चूत दोनों देखना चाहता था और साथ में उनको चोदना भी चाहता था, पर वो तो बाद की बात थी। पहले यहाँ दीदी के नंगे बदन को देखने का जुगाड़ लगाना बहुत ज़रूरी था। मैंने सोचा कि मुझे कुछ हिम्मत से काम लेना होगा।
दीदी जब वापस रूम में आकर अपने पेटीकोट को घुटनों के ऊपर तक चढ़ा कर बिस्तर पर बैठने लगीं तो मैं बोला, “दीदी… दीदी… मैं… चू… चू… चूची भी देखना चाहता हूँ”।
दीदी इस पर चौंकने का नाटक करती बोलीं, “क्या मतलब… चूची भी देखनी है… चूत भी देखनी है… मतलब तू तो मुझे पूरा नंगा देखना चाहता है… हाय… बड़ा बेशर्म है… अपनी बड़ी बहन को नंगा देखना चाहता है… क्यों, मैं ठीक समझी ना… तू अपनी दीदी को नंगा देखना चाहता है… बोल… ठीक है ना…”
मैं भी शरमाते हुए हिम्मत दिखाते बोला, “हाँ दीदी… मुझे आप बहुत अच्छी लगती हो… मैं… मैं आपको पूरा नंगा देखना चाहता…”
“बड़ा अच्छा हिसाब है तेरा… अच्छी लगती हो… अच्छी लगने का मतलब तू नंगी होकर दिखाऊँ… कपड़ों में अच्छी नहीं लगती हूँ क्या…”
“हाय दीदी, मेरा वो मतलब नहीं था… वो तो आपने कहा था… फिर मैंने सोचा… सोचा…”
“हाय भाई… तूने जो भी सोचा सही सोचा… मैं अपने भाई को दुखी नहीं देख सकती… मुझे खुशी है कि मेरा इक्कीस साल का नौजवान भाई अपनी बड़ी बहन को इतना पसंद करता है कि वो नंगा देखना चाहता है… हाय… मेरे रहते तुझे ग्वालिन जैसी औरतों की तरफ देखने की कोई ज़रूरत नहीं है… राजू, मैं तुझे पूरा नंगा होकर दिखाऊँगी… फिर तुम मुझे बताना कि तुम अपनी दीदी के साथ क्या-क्या करना चाहते हो…”
मेरी तो जैसे लॉटरी लग गई। चेहरे पर मुस्कान और आँखों में चमक वापस आ गई।
दीदी बिस्तर से उतर कर नीचे खड़ी हो गईं और हँसते हुए बोलीं, “पहले पेटीकोट ऊपर उठाऊँ या ब्लाउज़ खोलूँ…”
मैंने मुस्कुराते हुए कहा, “हाय दीदी, दोनों… खोलो… पेटीकोट भी और ब्लाउज़ भी…”
“इस… स… स… बेशर्म, पूरा नंगा करेगा… चल, तेरे लिए मैं कुछ भी कर दूँगी… अपने भाई के लिए कुछ भी… पहले ब्लाउज़ खोल लेती हूँ फिर पेटीकोट खोलूँगी… चलेगा ना…” गर्दन हिला कर दीदी ने पूछा तो मैंने भी सहमति में गर्दन हिलाते हुए अपने गालों को शर्म से लाल कर दीदी को देखा।
दीदी ने चटाक-चटाक ब्लाउज़ के बटन खोले और फिर अपने ब्लाउज़ को खोल कर पीछे की तरफ घूम गईं और मुझे अपनी ब्रा का हुक खोलने के लिए बोला। मैंने काँपते हाथों से उनका ब्रा का हुक खोल दिया। दीदी फिर सामने की तरफ घूम गईं।
दीदी के घूमते ही मेरी आँखों के सामने दीदी की मदमस्त, गदराई हुई मस्तानी कठोर चूचियाँ आ गईं। मैं पहली बार अपनी दीदी के इन गोरे गुब्बारों को पूरा नंगा देख रहा था। इतने पास से देखने पर गोरी चूचियाँ और उनकी ऊपर की नीली नसें, भूरापन लिए हुए गाढ़े गुलाबी रंग की उनकी निप्पलें और उनके चारों तरफ का गुलाबी घेरा जिन पर छोटे-छोटे दाने जैसे उगे हुए थे, सब नज़र आ रहा था।
मैं एकदम कूद कर हाय करते हुए उछला तो दीदी मुस्कुराती हुई बोलीं, “अरे रे, इतना उतावला मत बन, अब तो नंगा कर दिया है, आराम से देखना… ले… देख…” कहती हुई मेरे पास आईं।
मैं बिस्तर पर बैठा हुआ था और वो नीचे खड़ी थीं, इसलिए मेरा चेहरा उनके चूचियों के पास आराम से पहुँच रहा था। मैं चूचियों को ध्यान से देखते हुए बोला, “हाय… दीदी पकड़ें…”
“हाँ… हाँ… पकड़ ले जकड़… ले अब जब नंगा कर के दिखा रही हूँ तो… छूने क्यों नहीं दूँगी… ले आराम से पकड़ कर मज़े कर… अपनी बड़ी बहन की नंगी चूचियों से खेल…”
मैंने अपने दोनों हाथ बढ़ा कर दोनों चूचियों को आराम से दोनों हाथों में थाम लिया। नंगी चूचियों के पहले स्पर्श ने ही मेरे होश उड़ा दिए। उफ़्फ़ दीदी की चूचियाँ कितनी गठीली और गुदगुद थीं, इसका अंदाज़ा मुझे इन मस्तानी चूचियों को हाथ में पकड़ कर ही हुआ। मेरा लौड़ा फड़फड़ाने लगा।
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दोनों चूचियों को दोनों हथेली में कस, हल्के दबाव के साथ मसलते हुए चुटकी में निप्पल को पकड़ हल्के से दबाया जैसे किशमिश के दाने को दबाते हैं। दीदी के मुँह से एक हल्की सी आह निकल गई। मैंने घबरा कर चूची छोड़ी तो दीदी ने मेरा हाथ पकड़ फिर से अपनी चूचियों पर रखते हुए दबाया.
तो मैं समझ गया कि दीदी को मेरा दबाना अच्छा लग रहा है और मैं जैसे चाहूँ इनकी चूचियों के साथ खेल सकता हूँ। गर्दन उचका कर चूचियों के पास मुँह लगा कर एक हाथ से चूची को पकड़ दबाते हुए दूसरी चूची को जैसे ही अपने होंठों से छुआ, मुझे लगा जैसे दीदी गनगना गईं, उनका बदन सिहर गया।
मेरे सिर के पीछे हाथ लगा बालों में हाथ फेरते हुए मेरे सिर को अपनी चूचियों पर जोर से दबाया। मैंने भी अपने होंठों को खोलते हुए उनकी चूचियों के निप्पल सहित जितना हो सकता था उतना उनकी चूचियों को अपने मुँह में भर लिया और चूसते हुए अपनी जीभ को निप्पल के चारों तरफ घुमाते हुए चुमलाया.
तो दीदी सिसियाते हुए बोलीं, “आह… आ… हा… सी… सी… ये क्या कर रहा है… उफ़्फ़्फ़्फ़्फ़… मार डाला… साले मैं तो तुझे अनारी समझती थी… मगर… तू तो खिलाड़ी निकला रे… हाय… चूची चूसना जानता है… मैं सोच रही थी सब तेरे को सिखाना पड़ेगा… हाय… चूस भाई… सीईई… ऐसे ही निप्पल को मुँह में लेकर चूस और चूची दबा… हाय रस निकाल, बहुत दिन हो गए…”
अब तो मैं जैसे भूखा शेर बन गया और दीदी की चूचियों को मुँह में भर ऐसे चूसने लगा जैसे सच में उसमें से रस निकल कर खा जाऊँगा। कभी बाईं चूची को कभी दाहिनी चूची को मुँह में भर-भर कर लेते हुए निप्पलों को अपने होंठों के बीच दबा-दबा कर चूसते हुए रबर की तरह खींच रहा था। चूचियों के निप्पल के चारों तरफ के घेरे में जीभ चलाते हुए जब दूसरे हाथ से दीदी की चूची को पकड़ कर दबाते हुए निप्पल को चुटकी में पकड़ कर खींचा.
तो मस्ती में लहराते हुए दीदी लड़खड़ाती आवाज़ में बोलीं, “हाय राजू… सीईई… ई… उफ़्फ़्फ़्फ़्फ़… चूस ले… पूरा रस चूस… मज़ा आ रहा है… तेरी दीदी को बहुत मज़ा आ रहा है भाई… हाय तू तो चूची को क्रिकेट की गेंद समझ कर दबा रहा है… मेरे निप्पल क्या मुँह में ले चूस…
तू बहुत अच्छा चूसता है… हाय मज़ा आ गया भाई… पर क्या तू चूची ही चूसता रहेगा… बूर नहीं देखेगा अपनी दीदी की चूत नहीं देखनी है तुझे… हाय उस समय से मरा जा रहा था और अभी जब चूची मिल गई तो उसी में खो गया है… हाय चल बहुत दूध पी लिया… अब बाद में पीना…”
मेरा मन अभी भरा नहीं था इसलिए मैं अभी भी चूची पर मुँह मारे जा रहा था। इस पर दीदी ने मेरे सिर के बालों को पकड़ कर पीछे की तरफ खींचते हुए अपनी चूची से मेरा मुँह अलग किया और बोलीं, “साले… हरामी… चूची छोड़… कितना दूध पीएगा… हाय अब तुझे अपनी नीचे की सहेली का रस पिलाती हूँ… चल हट माधरचोद…”
गाली देने से मुझे अब कोई फर्क नहीं पड़ता था क्योंकि मैं समझ गया था कि ये तो दीदी का शगल है और शायद मार भी सकती हैं अगर मैं उनके मन मुताबिक ना करूँ तो। पर दुधारू गाय की लत्थ तो सहनी ही पड़ती है। इसकी चिंता मुझे अब नहीं थी। दीदी लगता था अब गरम हो चुकी थीं और चुदवाना चाहती थीं। ये कहानी आप हमारी वासना डॉट नेट पर पढ़ रहे है.
मैं पीछे हट गया और दीदी के पेट पर चुम्मा ले कर बोला, “हाय दीदी बूर का रस पिलाओगी… हाय जल्दी से खोलो ना…”
दीदी पेटीकोट के नाड़े को झटके के साथ खोलती हुई बोलीं, “हा राजा मेरे प्यारे भाई… अब तो तुझे पिलाना ही पड़ेगा… ठहर जा अभी तुझे पिलाती अपनी चूत पूरा खोल कर उसकी चटनी चटाऊँगी फिर… देखना तुझे कैसा मज़ा आता है…”
पेटीकोट सरसराते हुए नीचे गिरता चला गया। पैंटी तो पहनी नहीं थी इसलिए पेटीकोट के नीचे गिरते ही दीदी पूरी नंगी हो गईं। मेरी नज़र उनके दोनों जाँघों के बीच के तिकोने पर गई। दोनों चिकनी मोटी-मोटी रानों के बीच में दीदी की बूर का तिकोना नज़र आ रहा था। चूत पर हल्की झाँटें उग आई थीं।
मगर इसे झाँटों का जंगल नहीं कह सकते थे। ये तो चूत की खूबसूरती को और बढ़ा रहा था। उसके बीच दीदी की गोरी गुलाबी चूत की मोटी फाँके झाँक रही थीं। दोनों जाँघ थोड़ा अलग थे फिर भी चूत की फाँके आपस में सटी हुई थीं और जैसा कि मैंने बाथरूम में पीछे से देखा था, एक वैसा तो नहीं मगर फिर भी एक लकीर सी बना रही थीं दोनों फाँके।
दीदी की कमर को पकड़ सिर को झुकाते हुए चूत के पास ले जा कर देखने की कोशिश की तो दीदी अपने आपको छुड़ाते हुए बोलीं, “हाय… भाई ऐसे नहीं… ऐसे ठीक से नहीं देख पाओगे… दोनों जाँघ फैला कर अभी दिखाती हूँ… फिर आराम से बैठ कर मेरी बूर को देखना और फिर तुझे उसके अंदर का माल खिलाऊँगी… घबरा मत भाई… मैं तुझे अपनी चूत पूरा खोल कर दिखाऊँगी और… उसकी चटनी भी चटाऊँगी… चल छोड़” कहते हुए पीछे मुड़ीं।
पीछे मुड़ते ही दीदी गदराई चुत्तर और गांड मेरी आँखों के सामने नज़र आ गए। दीदी चल रही थीं और उनके दोनों चुत्तर थिरकते हुए हिल रहे थे और आपस में चिपके हुए हिलते हुए ऐसे लग रहे थे जैसे बात कर रहे हों और मेरे लौड़े को पुकार रहे हों। लौड़ा दोबारा अपनी पूरी औकात पर आ चुका था और फनफना रहा था।
दीदी ड्रेसिंग टेबल के पास रखे गद्देदार सोफे वाली कुर्सी पर बैठ गईं और हाथों के इशारे से मुझे अपने पास बुलाया और बोलीं, “हाय… भाई… आजा, तुझे मज़े करवाती हूँ… अपने माल पूए का स्वाद चखाती हूँ… देख भाई, मैं इस कुर्सी के दोनों हत्थों पर अपनी दोनों टाँगों को रख कर जाँघ टिका कर फैलाऊँगी ना तो मेरी चूत पूरी उभर कर सामने आ जाएगी,
और फिर तुम उसके दोनों फाँकों को अपने हाथ से फैला कर अंदर का माल चाटना… इस तरह से तुम्हारी जीभ पूरा बूर के अंदर घुस जाएगी… ठीक है भाई… आजा… जल्दी कर… अभी एक पानी तेरे मुँह में गिरा देती हूँ फिर तुझे पूरा मज़ा दूँगी…”
मैं जल्दी से बिस्तर छोड़ दीदी की कुर्सी के पास गया और ज़मीन पर बैठ गया। दीदी ने अपने दोनों पैरों को सोफे के हत्थों के ऊपर चढ़ा कर अपनी दोनों जाँघों को फैला दिया। रानों के फैलते ही दीदी की चूत उभर कर मेरी आँखों के सामने आ गई।
उफ़्फ़्फ़्फ़्फ़्फ़… क्या खूबसूरत चूत थी। गोरी गुलाबी… काले-काले झाँटों के जंगल के बीच में से झाँकती ऐसी लग रही थी जैसे बादलों के पीछे से चाँद मुस्कुरा रहा हो। एकदम पावरोटी के जैसी फूली हुई चूत थी। दोनों पैर कुर्सी के हत्थों के ऊपर चढ़ा कर फैला देने के बाद भी चूत के दोनों होंठ अलग नहीं हुए थे। चूत पर ऊपर के हिस्से में झाँटें थीं मगर नीचे गुलाबी कचौड़ी जैसे होंठों के आसपास एकदम बाल नहीं थे।
मैं ज़मीन पर बैठ कर दीदी के दोनों रानों पर दोनों हाथ रख कर गर्दन झुका कर एकदम ध्यान से दीदी की चूत को देखने लगा। चूत के सबसे ऊपर में किसी तोते के लाल चोंच की तरह बाहर की तरफ निकली हुई दीदी के चूत का भागनाशा था।
कचौड़ी के जैसी चूत के दोनों फाँकों पर अपना हाथ लगा कर दोनों फाँकों को हल्का सा फैलाती हुई दीदी बोलीं, “राजू… ध्यान से देख ले… अच्छी तरह अपनी दीदी की बूर को देख बेटा… चूत फैला के देखेगा तो तुझे… पानी जैसा नज़र आएगा… उसको चाट का अच्छी तरह से खाना… चूत की असली चटनी वही है…”
दीदी के चूत के दोनों होंठ फैल और सिकुड़ रहे थे। मैंने अपनी गर्दन को झुका दिया और जीभ निकल कर सबसे पहले चूत के आसपास वाले भागों को चाटने लगा। रानों के जोड़ और जाँघों को भी चाटा। जाँघों को हल्का-हल्का काटा भी, फिर जल्दी से दीदी की चूत पर अपने होंठों को रख कर एक चुम्मा लिया और जीभ निकाल कर पूरी दरार पर एक बार चलाया।
जीभ छुलाते ही दीदी सिसिया उठीं और बोलीं, “सीईई… बहुत अच्छा भाई… तुम्हें आता है… मुझे लग रहा था कि सिखाना पड़ेगा मगर तू तो बहुत होशियार है… हाय… बूर चाटना आता है… ऐसे ही… राजू तूने शुरुआत बहुत अच्छी की है… अब पूरी चूत पर अपनी जीभ फिराते हुए…
मेरी बूर की टीट को पहले अपने होंठों के बीच दबा कर चूस… देख मैं बताना भूल गई थी… चूत के सबसे ऊपर में जो लाल-लाल निकला हुआ है ना… उसी को होंठों के बीच दबा के चूसेगा… तब मेरी चूत में रस निकलने लगेगा… फिर तू आराम से चाट कर चूसना… सीईईई… राजू मैं जैसा बताती हूँ वैसा ही कर…”
मैं तो पहले से ही जानता था कि टीट या भागनाशा क्या होती है। मुझे बताने की ज़रूरत तो नहीं थी पर दीदी ने ये अच्छा किया था कि मुझे बता दिया था कि कहाँ से शुरुआत करनी है। मैंने अपने होंठों को खोलते हुए टीट को मुँह में भर कर चूसना शुरू कर दिया। टीट को होंठों के बीच दबा कर अपनी दाँतों से हल्के-हल्के काटते हुए मैं उस पर अपने होंठ रगड़ रहा था।
टीट और उसके आसपास ढेर सारा थूक लग गया था और एक पल के लिए जब मैंने वहाँ से अपना मुँह हटाया तो देखा कि मेरी चुसाई के कारण टीट चमकने लगी है। एक बार और जोर से टीट को पूरा मुँह में भर कर चुम्मा लेने के बाद मैंने अपनी जीभ को करा करके पूरी चूत की दरार में ऊपर से नीचे तक चलाया और फिर चूत के एक फाँक को अपने दाहिने हाथ की उँगलियों से पकड़ कर हल्का सा फैलाया।
चूत की गुलाबी छेद मेरी आँखों के सामने थी। जीभ को टेढ़ा कर चूत के मोटे फाँक को अपने होंठों के बीच दबा कर चूसने लगा। फिर दूसरी फाँक को अपने मुँह में भर कर चूसा, उसके बाद दोनों फाँकों को आपस में सटा कर पूरी चूत को अपने मुँह में भर कर चूसने लगा। ये कहानी आप हमारी वासना डॉट नेट पर पढ़ रहे है.
चूत से रिस-रिस कर पानी निकल रहा था और मेरे मुँह में आ रहा था। चूत का नमकीन पानी शुरू में तो उतना अच्छा नहीं लगा पर कुछ देर के बाद मुझे कोई फर्क नहीं पड़ रहा था और मैं दुगुने जोश के साथ पूरी चूत को मुँह में भर कर चाट रहा था। दीदी को भी मज़ा आ रहा था और वही कुर्सी पर बैठे-बैठे अपने चुत्तरों को ऊपर उछालते हुए वो जोश में आ कर मेरे सिर को अपने दोनों हाथों से अपनी चूत पर दबाते हुए
बोलीं, “हाय राजू… बहुत अच्छा कर रहा है… राजा… हाय… सीईई… बड़ा मज़ा आ रहा है… हाय मेरी चूत के कीड़े… मेरे सैयाँ… ऊऊऊउ… सीईईइ… खाली ऊपर-ऊपर से चूस रहा है… बहनचोद… जीभ अंदर घुसा कर चाटना… बूर में जीभ पेल दे और अंदर-बाहर कर के जीभ से मेरी चूत चोदते हुए अच्छी तरह से चाट… अपनी बड़ी बहन की चूत अच्छी तरह से चाट मेरे राजा… माधरचोद… ले ले… ऊऊऊऊ… इस्स्स्स्स्स… घुसा चूत में जीभ… मथ दे…”
कविता दीदी बहुत जोश में आ चुकी थीं और लग रहा था कि उनको काफी मज़ा आ रहा है। उनके इतना बोलने पर मैंने दोनों हाथों की उँगलियों से दोनों फाँकों को अलग कर के अपनी जीभ को कड़ा करके चूत में पेल दिया। जीभ को चूत के अंदर-बाहर करते हुए लिबलिबाने लगा और बीच-बीच में बूर से चूते रस को जीभ टेढ़ा करके चूसने लगा।
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दीदी की दोनों जाँघें हिल रही थीं और मैं दोनों जाँघों को कस कर हाथ से पकड़ कर चूत में जीभ पेल रहा था। जाँघों को मसलते हुए बीच-बीच में जीभ को आराम देने के लिए मैं जीभ निकल कर जाँघों और उसके आसपास चुम्मा लेने लगता था। मेरे ऐसा करने पर दीदी जोर से गुर्रातीं और फिर से मेरे बालों को पकड़ कर अपनी चूत के ऊपर मेरा मुँह लगा देतीं।
दीदी मेरी चुसी से बहुत खुश थीं और चिल्लाती हुई बोल रही थीं, “हाय… राजा… जीभ बाहर मत निकालो… हाय बहुत मज़ा आ रहा है… ऐसे ही… बूर के अंदर जीभ डाल के मेरी चूत मथते रहो… हाय चोद दे माधरचोद… अपनी जीभ से अपनी दीदी की बूर चोद दे… हाय सैयाँ… बहुत दिनों के बाद ऐसा मज़ा आया है… इतने दिनों से तड़पती घूम रही थी…
हाय हाय… अपनी दीदी की बूर को चाटो… मेरे राजा… मेरे बालम… तुझे बहुत अच्छे इनाम दूँगी… भोसड़ीवाले… तेरा लौड़ा अपनी चूत में लूँगी… आज तक तूने किसी की चोदी नहीं है ना… तुझे चोदने का मौका दूँगी… अपनी चूत तेरे से मरवाऊँगी… मेरे भाई… मेरे सोना मोना… मन लगा कर दीदी की चूत चाट… मेरा पानी निकलेगा… तेरे मुँह में… हाय जल्दी जल्दी चाट… पूरी जीभ अंदर डाल कर सीईई…”
दीदी पानी छोड़ने वाली हैं ये जान कर मैंने अपनी पूरी जीभ चूत के अंदर पेल दी और अंगूठे को टीट के ऊपर रख कर रगड़ते हुए जोर-जोर से जीभ अंदर-बाहर करने लगा। दीदी अब और तेज़ी के साथ गांड उछल रही थीं और मैं लप-लप करते हुए जीभ को अंदर-बाहर कर रहा था।
कुत्ते की तरह से दीदी की बूर चाटते हुए टीट को रगड़ते हुए कभी-कभी दीदी की चूत पर दाँत भी गड़ा देता था, मगर इन सब चीज़ों का दीदी के ऊपर कोई असर नहीं पड़ रहा था और वो मस्ती में अब गांड को हवा में लहराते हुए सिसिया रही थीं।
“हाय मेरा निकल रहा है… हाय भाई… निकल रहा है मेरा पानी… पूरी जीभ घुसा दे… साले… बहुत अच्छा… ऊऊऊऊऊ… सीईईईईईइ… मज़ा आ गया राजा… मेरे चूत चाटूस सैयाँ… मेरी चूत पानी छोड़ रही है… इस्स्स्स्स्स्स्स्स… मज़ा आ गया… बहनचोद… पी ले अपनी दीदी के बूर का पानी… हाय चूस ले अपनी दीदी की जवानी का रस… ऊऊऊऊ… गांडू…”
दीदी अपनी गांड को हवा में लहराते हुए झरने लगीं और उनकी चूत से पानी बहता हुआ मेरी जीभ को गीला करने लगा। मैंने अपना मुँह दीदी की चूत पर से हटा दिया और अपनी जीभ और होंठों पर लगे चूत के पानी को चाटते हुए दीदी को देखा। वो अपनी आँखों को बंद किए शांत पड़ी हुई थीं और अपनी गर्दन को कुर्सी के पुश्त पर टिका कर ऊपर की ओर किए हुए थीं।
उनकी दोनों जाँघें वैसे ही फैली हुई थीं। पूरी चूत मेरी चुसाई के कारण लाल हो गई थी और मेरे थूक और लार के कारण चमक रही थी। दीदी आँखें बंद किए गहरी साँसें ले रही थीं और उनके माथे और छाती पर पसीने की छोटी-छोटी बूँदें चमक रही थीं। मैं वही ज़मीन पर बैठा रहा और दीदी की चूत को गौर से देखने लगा। दीदी को सुस्त पड़े देख मुझे और कुछ नहीं सूझा तो मैं उनके जाँघों को चाटने लगा।
चूँकि दीदी ने अपने दोनों पैरों को मोड़ कर जाँघों को कुर्सी के पुश्त से टिका कर रखा हुआ था इसलिए वो एक तरह से पैर मोड़ कर अधलेटी सी अवस्था में बैठी हुई थीं और दीदी की गांड मेरा मतलब है चुत्तर आधी कुर्सी पर और आधी बाहर की तरफ लटकी हुई थी। ऐसे बैठने के कारण उनका गांड की भूरी छेद मेरी आँखों के सामने थी। छोटी सी भूरे रंग की सिकुड़ी हुई छेद किसी फूल की तरह लग रही थी।
मेरे लिए अपना सपना पूरा करने का इससे अच्छा अवसर नहीं था। मैं हल्के से अपनी एक उँगली को दीदी की चूत के मुँह के पास ले गया और चूत के पानी में अपनी उँगली गीली कर के चुत्तरों के दरार में ले गया। दो-तीन बार ऐसे ही करके पूरी गांड की खाई को गीला कर दिया फिर अपनी उँगली को पूरी खाई में चलाने लगा। धीरे-धीरे उँगली को गांड की छेद पर लगा कर हल्के-हल्के केवल छेद की मालिश करने लगा।
कुछ देर बाद मैंने थोड़ा सा जोर लगाया और अपनी उँगली के एक पोर को गांड की छोटी सी छेद में घुसाने की कोशिश की। ज्यादा तो नहीं मगर बस थोड़ी सी उँगली घुस गई। मैंने फिर ज्यादा जोर नहीं लगाया और उतना ही घुसा कर अंदर-बाहर करते हुए गांड की छेद का मालिश करने लगा। बड़ा मज़ा आ रहा था।
मेरे दिल की तमन्ना पूरी हो गई। बाथरूम में नहाते समय जब दीदी को देखा था तभी से सोच रहा था कि एक बार इस गांड की दरार में उँगली चलाऊँगा और इसकी छेद में उँगली डाल कर देखूँगा कैसा लगता है इस सिकुड़ी हुई भूरे रंग की छेद में उँगली पेलने पर। मस्त राम की किताबों में तो लिखा होता है कि लौड़ा भी घुसेड़ा जाता है।
पर गांड की सिकुड़ी हुई छेद इतनी टाइट लग रही थी कि मुझे विश्वास नहीं हो रहा था कि लौड़ा उसके अंदर घुसेगा। खैर दो-तीन मिनट तक ऐसे ही मैं करता रहा। दीदी की बूर से पानी बाहर की निकल कर धीरे-धीरे रिस रहा था। मैंने दो-तीन बार अपना मुँह लगा कर बाहर निकलते रस को भी चाट लिया और गांड में धीरे-धीरे उँगली करता रहा। ये कहानी आप हमारी वासना डॉट नेट पर पढ़ रहे है.
तभी दीदी ने मुझे पीछे धकेला, “हट… माधरचोद… क्या कर रहा है… गांड मारेगा क्या…” फिर अपने पैर से मेरी छाती को पीछे धकेलती हुई उठ कर खड़ी हो गईं। मैं हड़बड़ा कर पीछे की तरफ गिरा फिर जल्दी से उठ कर खड़ा हो गया। मेरा लौड़ा पूरा खड़ा हो कर नब्बे डिग्री का कोण बनाते हुए लप-लप कर रहा था मगर दीदी के इस अचानक हमले ने फिर एक झटका दिया।
मैं डर कर दो कदम पीछे हट गया। दीदी नंगी ही बाहर निकल गईं, लगता था फिर से बाथरूम गई थीं। मैं वहीं खड़ा सोचने लगा कि अब क्या होगा। थोड़ी देर बाद दीदी फिर से अंदर आईं और बिस्तर पर बैठ गईं। मुस्कुराते हुए मेरी तरफ देखा, फिर मेरे लपलपाते लौड़े को देखा.
और अंगड़ाई लेती हुई बोलीं, “हाय राजू, बहुत मज़ा आया… अच्छा चूसता है तू… मुझे लग रहा था कि तू अनाड़ी होगा, मगर तूने तो अपने बहनोई को भी मात कर दिया… उस साले को चुसवाना नहीं आता था… खैर, उसका क्या… उस भोसड़ीवाले को तो चोदना भी नहीं आता था… तूने चाट कर अच्छा मज़ा दिया… इधर आ… आ ना… वहाँ क्यों खड़ा है भाई… आ यहाँ बिस्तर पर बैठ…”
दीदी के इस तरह बोलने पर मुझे शांति मिली कि चलो, नाराज़ नहीं हैं। मैं बिस्तर पर आ कर बैठ गया। दीदी मेरे लौड़े की तरफ देखती बोलीं, “हूँ… खड़ा हो गया है… इधर आ तो पास में… देखूँ…”
मैं खिसक कर पास में गया तो दीदी ने मेरे लौड़े को मुट्ठी में कस कर सक-सक ऊपर-नीचे किया। लाल-लाल सुपाड़े पर से चमड़ी खिसका दी। उस पर उँगली चलाती हुई बोलीं, “अब कभी हाथ से मत करना… समझा? अगर मैंने पकड़ लिया तो तेरी खैर नहीं… मारते-मारते गांड फुला दूँगी… समझा…”
मैं दीदी की इस धमकी को सुन नासमझ बनने का नाटक करता हुआ बोला, “तो फिर कैसे करूँ… मेरी तो शादी भी नहीं हुई है…” फिर गर्दन झुका कर शरमाने का नाटक किया। दीदी ने मेरी ठोड़ी पकड़ कर गर्दन को ऊपर उठाते हुए कहा, “जानता तो तू सब कुछ है… फिर कोई लड़की क्यों नहीं पटाता? अभी तो तेरी शादी में टाइम है… अपने लिए कोई छेद ढूँढ ले…”
मैं बुरा सा मुँह बनाता हुआ बोला, “हुह… मुझे कोई अच्छी नहीं लगती… सब बस ऐसे ही हैं…”
दीदी इस पर थोड़ा सा खुँदक खाती हुई बोलीं, “अजीब लड़का है… बहनचोद… तुझे अपनी बहन के अलावा और कोई अच्छी नहीं लगती क्या…”
मैं इस पर शर्माता हुआ बोला, “…मुझे सबसे ज्यादा आप अच्छी लगती हो… मैं…”
“आये… हाय… ऐसा तो लड़का ही नहीं देखा… बहन को चोदने के चक्कर में… भोसड़ीवाले को सबसे ज्यादा बहन अच्छी लगती है… मैं नहीं मिली तो… मुठ मारता रह जाएगा…” दीदी ने आँख नचाते हुए भौं उचका कर प्रश्न किया।
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मैंने मुस्कुराते हुए गाल लाल करते हुए गर्दन हिला कर हाँ किया। मेरी इस बात पर रीझती हुई दीदी ने मुझे अपनी बाँहों में भर लिया और अपनी छाती से लगाती हुई बोलीं, “हाय रे मेरा सोना… मेरे प्यारे भाई… तुझे दीदी सबसे अच्छी लगती है… तुझे मेरी चूत चाहिए… मिलेगी मेरे प्यारे भाई, मिलेगी…
मेरे राजा… आज रात भर अपने हलब्बी लौड़े से अपनी दीदी की बूर का बाजा बजाना… अपने भाई राजा का लौड़ा अपनी चूत में लेकर मैं सोऊँगी… हाय राजा… अपने मुसल से अपनी दीदी की ओखली को रात भर खूब कूटना… अब मैं तुझे तरसने नहीं दूँगी… तुझे कहीं बाहर जाने की ज़रूरत नहीं है… चल आजा… आज की रात तुझे जन्नत की सैर करा दूँ…”
फिर दीदी ने मुझे धकेल कर नीचे लिटा दिया और मेरे ऊपर चढ़ कर मेरे होंठों को चूसती हुई अपनी गठीली चूचियों को मेरी छाती पर रगड़ते हुए मेरे बालों में अपना हाथ फेरते हुए चूमने लगीं। मैं भी दीदी के होंठों को अपने मुँह में भरने का प्रयास करते हुए अपनी जीभ को उनके मुँह में घुसा कर घुमा रहा था।
मेरा लौड़ा दीदी की दोनों जाँघों के बीच में फँस कर उनकी चूत के साथ रगड़ खा रहा था। दीदी भी अपना गांड नाचते हुए मेरे लौड़े पर अपनी चूत को रगड़ रही थीं और कभी मेरे होंठों को चूम रही थीं, कभी मेरे गालों को काट रही थीं। कुछ देर तक ऐसे ही करने के बाद दीदी मेरे होंठों को छोड़ कर उठ कर मेरी कमर पर बैठ गईं।
फिर आगे की ओर सरकते हुए मेरी छाती पर आकर अपनी गांड को हवा में उठा लिया और अपनी हल्की झाँटों वाली गुलाबी खुश्बुदार चूत को मेरे होंठों से सटाती हुई बोलीं, “ज़रा चाट के गीला कर… बड़ा तगड़ा लौड़ा है तेरा… सुखा लूँगी तो… साली फट जाएगी मेरी तो…”
एक बार मुझे दीदी की चूत का स्वाद मिल चुका था, इसके बाद मैं कभी भी उनकी गुदगुदी कचौड़ी जैसी चूत को चाटने से इंकार नहीं कर सकता था। मेरे लिए तो दीदी की बूर रस का खजाना थी। तुरंत अपनी जीभ निकाल कर दोनों चुत्तरों पर हाथ जमा कर लप-लप करता हुआ चूत चाटने लगा।
इस अवस्था में दीदी को चुत्तरों को मसलने का भी मौका मिल रहा था और मैं दोनों हाथों की मुट्ठी में चुत्तर के मांस को पकड़ते हुए मसल रहा था और चूत की लकीर में जीभ चलाते हुए अपनी थूक से बूर के छेद को गीला कर रहा था। वैसे दीदी की बूर भी ढेर सारा रस छोड़ रही थी।
जीभ डालते ही इस बात का अंदाज़ा हो गया कि पूरी चूत पसीज रही है। इसलिए दीदी की ये बात कि वो चटवा कर गीला करवा रही थीं, हज़म तो नहीं हुई, मगर मेरा क्या बिगड़ रहा था। मुझे तो जितनी बार कहतीं उतनी बार चाट देता। कुछ ही देर में दीदी की चूत और उसकी झाँटें भी मेरी थूक से गीली हो गईं।
दीदी दोबारा से गरम भी हो गईं और पीछे खिसकते हुए वो एक बार फिर से मेरी कमर पर आ कर बैठ गईं। अपने हाथ से मेरे तनतनाए हुए लौड़े को अपनी मुट्ठी में कस कर हिलाते हुए अपने चुत्तरों को हवा में उठा लिया और लौड़े को चूत के होंठों से सटा कर सुपाड़े को रगड़ने लगीं। सुपाड़े को चूत के फाँकों पर रगड़ते हुए चूत के रिसते पानी से लौड़े की मुंडी को गीला कर रगड़ती रहीं।
मैं बेताबी से दम साधे इस बात का इंतज़ार कर रहा था कि कब दीदी अपनी चूत में मेरा लौड़ा लेती हैं। मैं नीचे से धीरे-धीरे गांड उछाल रहा था और कोशिश कर रहा था कि मेरा सुपाड़ा उनके बूर में घुस जाए। मुझे गांड उछालते देख दीदी मेरे लौड़े के ऊपर मेरे पेट पर बैठ गईं और चूत की पूरी लंबाई को लौड़े की औकात पर चलाते हुए रगड़ने लगीं.
तो मैं सिसियाते हुए बोला, “दीदी प्लीज़… ओह… सीईई… अब नहीं रहा जा रहा है… जल्दी से अंदर कर दो ना… उफ़्फ़्फ़्फ़्फ़… ओह दीदी… बहुत अच्छा लग रहा है… और तुम्हारी चु… चु… चु… चूत मेरे लौड़े पर बहुत गर्म लग रही है… ओह दीदी… जल्दी करो ना… क्या तुम्हारा मन नहीं कर रहा है…”
अपनी गांड नचाते हुए लौड़े पर चूत रगड़ते हुए दीदी बोलीं, “हाय… भाई, जब इतना इंतज़ार किया है तो थोड़ा और इंतज़ार कर लो… देखते रहो… मैं कैसे करती हूँ… मैं कैसे तुम्हें जन्नत की सैर कराती हूँ… मज़ा नहीं आया तो अपना लौड़ा मेरी गांड में घुसेड़ देना… माधरचोद…
अभी देखो मैं तुम्हारा लौड़ा कैसे अपनी बूर में लेती हूँ… लौड़े सारा पानी अपनी चूत से पी लूँगी… घबराओ मत… राजू अपनी दीदी पर भरोसा रखो… ये तुम्हारी पहली चुदाई है… इसलिए मैं खुद से चढ़ कर करवा रही हूँ… ताकि तुम्हें सीखने का मौका मिल जाए… देखो… मैं अभी लेती हूँ…”
फिर अपनी गांड को लौड़े की लंबाई के बराबर ऊपर उठा कर एक हाथ से लौड़ा पकड़ सुपाड़े को बूर की दोनों फाँकों के बीच लगा दिया। दूसरे हाथ से अपनी चूत के एक फाँक को पकड़ कर फैला कर लौड़े के सुपाड़े को उसके बीच फिट कर ऊपर से नीचे की तरफ कमर का जोर लगाया। चूत और लौड़ा दोनों गीले थे।
मेरे लौड़े का सुपाड़ा वो पहले ही चूत के पानी से गीला कर चुकी थीं इसलिए सट से मेरा पहाड़ी आलू जैसा लाल सुपाड़ा अंदर दाखिल हुआ। तो उसकी चमड़ी उलट गई। मैं आह करके सिसियाया तो दीदी बोलीं, “बस हो गया भाई… हो गया… एक तो तेरा लौड़ा इतना मोटा है… मेरी चूत एकदम टाइट है… घुसाने में… ये ले बस दो-तीन और… उईईईइ माँ… सीईईईई… बहनचोद का… इतना मोटा… हाय… ययय… उफ़्फ़्फ़्फ़…”
करते हुए गप-गप दो-तीन धक्का अपनी गांड उचकाते चुत्तर उछालते हुए लगा दिए। पहले धक्के में केवल सुपाड़ा अंदर गया था, दूसरे में मेरा आधा लौड़ा दीदी की चूत में घुस गया था, जिसके कारण वो उईईई माँ करके चिल्लाई थीं। मगर जब उन्होंने तीसरा धक्का मारा था तो सच में उनकी गांड भी फट गई होगी, ऐसा मेरा सोचना है।
क्योंकि उनकी चूत एकदम टाइट मेरे लौड़े के चारों तरफ कस गई थी और खुद मुझे थोड़ा दर्द हो रहा था और लग रहा था जैसे लौड़े को किसी गरम भट्टी में घुसा दिया हो। मगर दीदी अपने होंठों को अपने दाँतों तले दबाए हुए कच-कच कर गांड तक जोर लगाते हुए धक्का मारती जा रही थीं। ये कहानी आप हमारी वासना डॉट नेट पर पढ़ रहे है.
तीन-चार और धक्के मार कर उन्होंने मेरा पूरा नौ इंच का लौड़ा अपनी चूत के अंदर धाँस लिया और मेरी छाती के दोनों तरफ हाथ रख कर धक्का लगाती हुई चिल्लाईं, “उफ़्फ़्फ़्फ़… बहन के लौड़े… कैसा मुस्टंडा लौड़ा पाल रखा है… ईई… हाय… गांड फट गई मेरी तो… हाय पहले जानती कि…
ऐसा बूर फाड़ू लौड़ा है तो… सीईईईइ… भाई आज तूने… अपनी दीदी की फाड़ दी… ओह सीईईई… लौड़ा है कि लोहे का रॉड… उईईइ माँ… गई मेरी चूत आज के बाद… साला किसी के काम की नहीं रहेगी… है… हाय बहुत दिन संभाल के रखा था… फट गई… रे मेरी तो हाय मरी…”
इस तरह से बोलते हुए वो ऊपर से धक्का भी मारती जा रही थीं और मेरा लौड़ा अपनी चूत में लेती भी जा रही थीं। तभी अपने होंठों को मेरे होंठों पर रखती हुई जोर-जोर से चूमती हुई बोलीं, “हाय… माधरचोद… आराम से नीचे लेट कर बूर का मज़ा ले रहा है… भोसड़ी के… मेरी चूत में गरम लोहे का रॉड घुसा कर गांड उचका रहा है…
उफ़्फ़्फ़्फ़्फ़… भाई अपनी दीदी को कुछ आराम दो… हाय मेरी दोनों लटकती हुई चूचियाँ तुम्हें नहीं दिख रही हैं क्या… उफ़्फ़्फ़्फ़… उनको अपने हाथों से दबाते हुए मसलो और… मुँह में लेकर चूसो भाई… इस तरह से मेरी चूत पसीजने लगेगी और उसमें और ज्यादा रस बनेगा… फिर तुम्हारा लौड़ा आसानी से अंदर-बाहर होगा… हाय राजू ऐसे करो मेरे राजा… तभी तो दीदी को मज़ा आएगा और… वो तुम्हें जन्नत की सैर कराएगी… सीईई…”
दीदी के ऐसा बोलने पर मैंने दोनों हाथों से दीदी की दोनों लटकती हुई चूचियों को अपनी मुट्ठी में कैद करने की कोशिश करते हुए दबाने लगा और अपने गर्दन को थोड़ा नीचे की तरफ झुकाते हुए एक चूची को मुँह में भरने की कोशिश की। हो तो नहीं पाया मगर फिर भी निप्पल मुँह में आ गया। उसी को दाँत से पकड़ कर खींचते हुए चूसने लगा।
दीदी अपनी गांड अब नहीं चला रही थीं, वो पूरा लौड़ा घुसा कर वैसे ही मेरे ऊपर लेटी हुई अपनी चूची दबवा और निप्पल चुसवा रही थीं। उनके माथे पर पसीने की बूँदें छलछला आई थीं। मैंने चूची का निप्पल छोड़ दीदी के चेहरे को अपने दोनों हाथों से पकड़ कर उनका माथा चूमने लगा और जीभ निकाल कर उनके माथे के पसीने को चाटते हुए उनकी आँखों को चूमते हुए नाक पर जीभ फिरते हुए चाटा।
दीदी अपनी गांड अब नहीं चला रही थीं, वो पूरा लौड़ा घुसा कर वैसे ही मेरे ऊपर लेटी हुई अपनी चूची दबवा और निप्पल चुसवा रही थीं। उनके माथे पर पसीने की बूँदें छलछला आई थीं। मैंने चूची का निप्पल छोड़ दीदी के चेहरे को अपने दोनों हाथों से पकड़ कर उनका माथा चूमने लगा.
और जीभ निकाल कर उनके माथे के पसीने को चाटते हुए उनकी आँखों को चूमते हुए नाक और उसके नीचे होंठों के ऊपर जो पसीने की छोटी-छोटी बूँदें जमा हो गई थीं, उसके नमकीन पानी को जीभ फिराते हुए चाटा और फिर होंठों को अपने होंठों से दबोच कर चूसने लगा। दीदी भी इस काम में मेरा पूरा सहयोग कर रही थीं और अपनी जीभ को मेरे मुँह में पेल कर घुमा रही थीं।
कुछ देर में मुझे लगा कि मेरे लौड़े पर दीदी की चूत का कसाव थोड़ा ढीला पड़ गया है। लगा जैसे एक बार फिर से दीदी की चूत से पानी रिसने लगा है। दीदी भी अपनी गांड उचकाने लगी थीं और चुत्तर उछालने लगी थीं। ये इस बात का सिग्नल था कि दीदी की चूत में अब मेरा लौड़ा एडजस्ट हो चुका है।
धीरे-धीरे उनके कमर हिलाने की गति में तेज़ी आने लगी। थप-थप आवाज़ करते हुए उनकी जाँघें मेरी जाँघों से टकराने लगीं और मेरा लौड़ा सटासट अंदर-बाहर होने लगा। मुझे लग रहा था जैसे चूत की दीवारें मेरे लौड़े को जकड़े हुए मेरे लौड़े की चमड़ी को सुपाड़े से पूरा नीचे उतार कर रगड़ती हुई अपने अंदर ले रही हैं। मेरा लौड़ा शायद उनकी चूत की अंतिम छोर तक पहुँच जाता था।
दीदी पूरा लौड़ा सुपाड़े तक बाहर खींच कर निकाल लेतीं फिर अंदर ले लेती थीं। दीदी की चूत वाकई में बहुत टाइट लग रही थी। मुझे अनुभव तो नहीं था मगर फिर भी गज़ब का आनंद आ रहा था। ऐसा लग रहा था जैसे किसी बोतल में मेरा लौड़ा एक कॉर्क की तरह फँसा हुआ अंदर-बाहर हो रहा है।
दीदी को अब बहुत ज्यादा अच्छा लग रहा था, ये बात उनके मुँह से फूटने वाली सिसकारियाँ बता रही थीं। वो सिसियाते हुए बोल रही थीं, “आआआ… सीईईईइ… भाई बहुत अच्छा लौड़ा है तेरा… हाय एकदम टाइट जा रहा है… सीईईइ हाय मेरी… चूत… ओह हो… ऊउउऊ… बहुत अच्छा से जा रहा है… हाय… गरम लोहे के रॉड जैसा है… हाय… कितना तगड़ा लौड़ा है…
हाय राजू मेरे प्यारे… तुमको मज़ा आ रहा है… हाय अपनी दीदी की टाइट चूत को चोदने में… हाय भाई बताना… कैसा लग रहा है मेरे राजा… क्या तुम्हें अपनी दीदी की बूर की फाँकों के बीच लौड़ा डाल कर चोदने में मज़ा आ रहा है… हाय मेरे चोदू… अपनी बहन को चोदने में कैसा लग रहा है… बताना… अपनी बहन को… साले मज़ा आ रहा… सीईईई… ऊऊऊऊ…”
दीदी गांड को हवा में लहराते हुए जोर-जोर से मेरे लौड़े पर पटक रही थीं। दीदी की चूत में ज्यादा से ज्यादा लौड़ा अंदर डालने के इरादे से मैं भी नीचे से गांड उचका-उचका कर धक्का मार रहा था। कच-कच बूर में लौड़ा पलथते हुए मैं भी सिसियाते हुए बोला,
“ओह सीईईइ… दीदी… आज तक तरसता… ओह बहुत मज़ा… ओह आई… ईईईइ… मज़ा आ रहा है दीदी… उफ़्फ़्फ़्फ़्फ़… बहुत गरम है आपकी चूत… ओह बहुत कसी हुई… है… बाप रे… मेरे लौड़े को छील… देगी आपकी चूत… उफ़्फ़्फ़्फ़… एकदम गद्देदार है… चूत है दीदी आपकी… हाय टाइट है…
हाय दीदी आपकी चूत में मेरा पूरा लौड़ा जा रहा है… सीईईइ… मैंने कभी सोचा नहीं था कि मैं आपकी चूत में अपना लौड़ा पेल पाऊँगा… हाय… उफ़्फ़्फ़्फ़… कितनी गरम है… मेरी सुंदर… प्यारी दीदी… ओह बहुत मज़ा आ रहा है… ओह आप… ऐसे ही चोदती रहो… ओह… सीईईई… हाय सच में दीदी आपने मुझे जन्नत दिखा दिया… सीईईई… चोद दो अपने भाई को…”
मैं सिसिया रहा था और दीदी ऊपर से लगातार धक्के पर धक्का लगाए जा रही थीं। अब चूत से फच-फच की आवाज़ भी आने लगी थी और मेरा लौड़ा सटा-सट बूर के अंदर जा रहा था। पूरे सुपाड़े तक बाहर निकल कर फिर अंदर घुस जा रहा था। मैंने गर्दन उठा कर देखा कि चूत के पानी में मेरा चमकता हुआ लौड़ा लप से बाहर निकलता और बूर की दीवारों को कुचलता हुआ अंदर घुस जाता।
दीदी की गांड हवा लहराती हुई थिरक रही थी और वो अब अपनी चुत्तरों को नचाती हुई नीचे की तरफ लाती थीं और लौड़े पर जोर से पटक देती थीं फिर पेट अंदर खींच कर चूत को कसती हुई लौड़े के सुपाड़े तक बाहर निकाल कर फिर से गांड नचातीं नीचे की तरफ धक्का लगाती थीं।
बीच-बीच में मेरे होंठों और गालों को चूमतीं और गालों को दाँत से काट लेती थीं। मैं भी दीदी के दोनों चुत्तरों को दोनों हाथ की हथेली से मसलते हुए चुदाई का मज़ा लूट रहा था। दीदी गांड नचाती धक्का मारती बोलीं, “राजू… मज़ा आ रहा है… हाय… बोल ना… दीदी को चोदने में कैसा लग रहा है भाई… हाय बहनचोद… बहुत मज़ा दे रहा है तेरा लौड़ा… मेरी चूत में एकदम टाइट जा रहा है…
सीईईइ… माधरचोद… इतनी दूर तक आज तक… मेरी चूत में लौड़ा नहीं गया… हाय… खूब मज़ा दे रहा है… बड़ा बूर फाड़ू लौड़ा है रे… तेरा… हाय मेरे राजा… तू भी नीचे से गांड उछाल ना… हाय… अपनी दीदी की मदद कर… सीईईईइ… मेरे सैयाँ… ज़ोर लगा के धक्का मार… हाय बहनचोद… चोद दे अपनी दीदी को… चोद दे… साले… चोद, चोद… चोद चोद… के मेरी चूत से पसीना निकाल दे… भोसड़ीवाले… ओह आई… ईईईइ…”
दीदी एकदम पसीने से लथपथ हो रही थीं और धक्का मारे जा रही थीं। लौड़ा गचा-गच उसकी चूत के अंदर-बाहर हो रहा था और अनाप-शनाप बकते हुए दाँत पीसते हुए पूरा गांड तक का जोर लगा कर धक्का लगाए जा रही थीं। कमरे में थप-थप… गच-गच… फच-फच की आवाज़ गूँज रही थी। दीदी के पसीने की मादक गंध का अहसास भी मुझे हो रहा था।
तभी हाँफते हुए दीदी मेरे बदन पर पसर गईं। “हाय… थका दिया तूने तो… मेरी तो एक बार निकल भी गई साले, तेरा एक बार भी नहीं निकला… हाय… अब साले मुझे नीचे लिटा कर चोद… जैसे मैंने चोदा था वैसे ही… पूरा लौड़ा डाल कर… मेरी चूत ले… ओह…”
कहते हुए मेरे ऊपर से नीचे उतर गईं। मेरा लौड़ा सटाक से पुच्च की आवाज़ करते हुए बाहर निकल गया। दीदी अपनी दोनों टाँगें उठा कर बिस्तर पर लेट गईं और जाँघों को फैला दिया। चुदाई के कारण उनकी चूत गुलाबी से लाल हो गई थी। दीदी ने अपनी जाँघों के बीच आने का इशारा किया। मेरा लपलपाता हुआ खड़ा लौड़ा दीदी की चूत के पानी में गीला हो कर चमचमा रहा था।
मैं दोनों जाँघों के बीच पहुँचा तो मुझे रोकते हुए दीदी ने पास में पड़े अपने पेटीकोट के कपड़े से मेरा लौड़ा पोछ दिया और उसी से अपनी चूत भी पोछ ली फिर मुझे डालने का इशारा किया। ये बात मुझे बाद में समझ में आई कि उन्होंने ऐसा क्यों किया। उस समय तो मैं जल्दी से जल्दी उनकी चूत के अंदर घुस जाना चाहता था।
दोनों जाँघों के बीच बैठ कर मैंने अपना लौड़ा चूत के गुलाबी छेद पर लगा कर कमर से जोर लगाया। सट से मेरा सुपाड़ा अंदर घुसा। बूर एकदम गरम थी। तमतमाए लौड़े को एक और ज़ोरदार झटका दे कर पूरा-पूरा चूत में उतारता चला गया। लौड़ा सूखा था, चूत भी सूखी थी।
सुपाड़े की चमड़ी फिर से उलट गई और मुँह से आह निकल गई मगर मज़ा आ गया। चूत जो अभी दो मिनट पहले थोड़ी ढीली लग रही थी फिर से किसी बोतल की तरह टाइट लगने लगी। एक ही झटके से लौड़ा पेलने पर दीदी कोकियाने लगी थीं। मगर मैंने इस बात पर कोई ध्यान नहीं दिया और तरातर लौड़े को ऊपर खींचते हुए सटासट चार-पाँच धक्के लगा दिए।
दीदी चिल्लाते हुए बोलीं, “माधरचोद… साले दिखाई नहीं देता कि चूत को पोछ के सूखा दिया था… भोसड़ी के सूखा लौड़ा डाल कर दुखा दिया… तेरी बहन को चोदू… हरामी… साले… अभी भी… चोदना नहीं आया… ऊपर चढ़ के सिखाया था… फिर साले तूने…” ये कहानी आप हमारी वासना डॉट नेट पर पढ़ रहे है.
मैं रुक कर दीदी का मुँह देखने लगा तो फिर बोलीं, “अब मुँह क्या देख रहा है… मार ना… धक्का… ज़ोर लगा के मार… हाय मेरे राजा… मज़ा आ गया… इसलिए तो पोछ दिया था… हाय देख क्या टाइट जा रहा है… इस्स्स्स्स…”
मैं समझ गया अब फुल स्पीड में चालू हो जाना चाहिए। फिर क्या था, मैंने गांड उछाल-उछाल कर कमर नचा कर जब धक्का मारना शुरू किया तो दीदी की चीखें निकलनी शुरू हो गईं। चूत फच-फच कर पानी फेंकने लगी। गांड हवा में लहरा कर लौड़ा लीलने लगी।
“हाय पेल दे… भाई ऐसे ही बेदर्दी से… चोद अपनी कविता दीदी की चूत को… ओह माँ… कैसा बेदर्दी भाई है… हाय कैसे चोद रहा है… अपनी बड़ी बहन को… हाय माँ देखो… मैंने मुठ मारने से मना किया तो साले ने मुझे चोद डाला… चोदाई इसके लिए कोई बात नहीं… मगर कमीने को ऐसे बेदर्दी से चोदने में पता नहीं क्या मज़ा मिल रहा है उफ़्फ़्फ़्फ़्फ़्फ़… मर गई… हाय बड़ा मज़ा आ रहा है… सीईईईई… मेरे चोदू सैयाँ… मेरे बालम… हाय मेरे चोदू भाई… बहन के लौड़े… चोद दे अपनी चुदक्कड़ बहन को… सीईईईई…”
मैं लगातार धक्के पर धक्का लगाता जा रहा था। मेरा जोश भी अपनी चरम सीमा पर पहुँच चुका था और मैं अपनी गांड तक का जोर लगा कर कमर नचाते हुए धक्का मार रहा था। दीदी की चूची को मुट्ठी में दबोच-दबोच कर गच-गच धक्का मारते हुए मैं भी जोश में सिसिया हुए बोला, “ओह मेरी प्यारी बहन ओह… सीईईईइ… कितनी मस्त हो तुम…
हाय… सीईईई तुम नहीं होती तो… मैं ऐसे ही मुठ मारता… हो सीईई… दीदी बहुत मज़ा आ रहा है… हाय सच में दीदी आपकी गद्देदार चूत में लौड़ा डाल कर ऐसा लग रहा है जैसे… जन्नत… हाय… पुच्च… पुच्च ओह दीदी मज़ा आ गया… ओह दीदी तुम गाली भी देती हो तो मज़ा आता है…
हाय… मैं नहीं जानता था कि मेरी दीदी इतनी बड़ी चुदक्कड़ है… हाय मेरी चुदैल बहना… सीईईईई हमेशा अपने भाई को ऐसे ही मज़ा देती रहना… ऊऊऊऊउ… दीदी मेरी जान… हाय… मेरा लौड़ा हमेशा तुम्हारे लिए खड़ा रहता था… हाय आज… मन की मुराद… सीईईई…”
मेरा जोश अब अपने चरम पर पहुँच चुका था और मुझे लग रहा था कि मेरा पानी निकल जाएगा। दीदी भी अब बेतहाशा अंट-शंट बक रही थीं और गांड उचकाते हुए दाँत पीसते बोलीं, “हाय साले… चोदने देर ही हुई तभी खूबसूरत लग रही हूँ…
माधरचोद मुझे सब पता है… चुदैल बोलता है… साले चुदक्कड़ नहीं होती… मुठ मारता रह जाता… हाय ज़ोर… अक्क्क्क्क… ज़ोर से मारता रह माधरचोद… मेरा अब निकलेगा… हाय भाई मैं झरने वाली हूँ… सीईईईई… और ज़ोर से पेल… चोद चोद… चोद चोद… राजू… बहनचोद… बहन के लौड़े…”
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कहते हुए मुझे छिपकली की तरह से चिपक गईं। उनकी चूत से छलछला कर पानी बहने लगा और मेरे लौड़े को भिगोने लगा। तीन-चार तगड़े धक्के मारने के बाद मेरा लौड़ा भी झरने लगा और वीर्य का एक तेज़ फौव्वारा दीदी की चूत में गिरने लगा। दीदी ने मुझे अपने बदन से कस कर चिपका लिया और आँखें बंद करके अपनी दोनों टाँगों को मेरे चुत्तरों पर लपेट मुझे बाँध लिया। ज़िंदगी में पहली बार किसी चूत के अंदर लौड़ा झाड़ा था।
वाकई मज़ा आ गया था। ओह दीदी ओह दीदी करते हुए मैंने भी उनको अपनी बाँहों में भर लिया था। हम दोनों इतनी तगड़ी चुदाई के बाद एकदम थक चुके थे मगर हमारे गांड अभी भी फुदक रहे थे। गांड फुदकाती हुई दीदी अपनी चूत का रस निकल रही थीं और मैं गांड फुदकाते हुए लौड़े को बूर की जड़ तक ठेल कर अपना पानी उनकी चूत में झार रहा था।
सच में ऐसा मज़ा मुझे आज के पहले कभी नहीं मिला था। अपनी खूबसूरत बहन को चोदने की दिली तमन्ना पूरी होने के कारण पूरे बदन में एक अजीब सी शांति महसूस हो रही थी। करीब दस-पंद्रह मिनट तक वैसे ही पड़े रहने के बाद मैं धीरे से दीदी के बदन से नीचे उतर गया। मेरा लौड़ा ढीला हो कर पुच्च से दीदी की चूत से बाहर निकल गया।
मैं एकदम थक गया था और वहीं उनके बगल में लेट गया। दीदी ने अभी भी अपनी आँखें बंद कर रखी थीं। मैं भी अपनी आँखें बंद कर के लेट गया और पता नहीं कब नींद आ गई। सुबह अभी नींद में ही था कि लगा जैसे मेरी नाक को दीदी की चूत की खुश्बू का अहसास हुआ। एक रात में मैं चूत के चटोरे में बदल चुका था।
अपने आप मेरी जीभ बाहर निकली चाटने के लिए… ये क्या… मेरी जीभ पर गीलापन महसूस हुआ। मैंने जल्दी से आँखें खोली तो देखा दीदी अपने पेटीकोट को कमर तक ऊँचा किए मेरे मुँह के ऊपर बैठी हुई थीं और हँस रही थीं। दीदी की चूत का रस मेरे होंठों और नाक ऊपर लगा हुआ था।
हर रोज़ सपना देखता था कि दीदी मुझे सुबह-सुबह ऐसे जगा रही हैं। झटके के साथ लौड़ा खड़ा हो गया और पूरा मुँह खोल दीदी की चूत को मुँह भरता हुआ जोर से काटते हुए चूसने लगा। उनके मुँह से चीखें और सिसकारियाँ निकलने लगीं। उसी समय सुबह-सुबह पहले दीदी को एक पानी चोदा और चोद कर उनको ठंडा करके बिस्तर से नीचे उतर बाथरूम चला गया।
फ्रेश होकर बाहर निकला तो दीदी उठ कर रसोई में जा चुकी थीं। रविवार का दिन था, मुझे भी कहीं जाना नहीं था। कविता दीदी ने उस दिन लाल रंग की टाइट कमीज़ और काले रंग की चुस्त सलवार पहन रखी थी। नाश्ता करते समय पैर फैला कर बैठीं तो मैं उनकी टाइट सलवार से उनके मोटे गुदगुदे जाँघों और मस्तानी चूचियों को देखता चौंक गया।
दोनों फैली हुई जाँघों के बीच मुझे कुछ गोरा सा, उजला सफ़ेद सा चमकता हुआ नज़र आया। मैंने जब ध्यान से देखा तो पाया कि दीदी की सलवार उनके जाँघों के बीच से फटी हुई थी। मेरी आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहा। मैं सोचने लगा कि दीदी तो इतनी बेढब नहीं हैं कि फटी सलवार पहनें, फिर क्या बात हो गई।
तभी दीदी अपनी जाँघों पर हाथ रखते हुए फटी सलवार के बीच उँगली चलाती बोलीं, “क्या देख रहा है बे… साले… अभी तक शांति नहीं मिली क्या… घूरता ही रहेगा… रात में और सुबह में भी पूरा खोल कर तो दिखाया था…”
मैं थोड़ा सा झेंपता हुआ बोला, “नहीं दीदी वो… वो आपकी… सलवार बीच से… फटी…”
दीदी ने तभी उँगली डाल फटी सलवार को फैलाया और मुस्कुराती हुई बोलीं, “तेरे लिए ही फाड़ा है… दिन भर तरसता रहेगा… सोचा बीच-बीच में दिखा दूँगी तुझे…”
मैं हँसने लगा और आगे बढ़ कर दीदी को गले से लगा कर बोला, “हाय… दीदी तुम कितनी अच्छी हो… ओह… तुमसे अच्छा और सुंदर कोई नहीं है… ओह दीदी… मैं सच में तुम्हारे प्यार में पागल हो जाऊँगा…” कहते हुए दीदी के गाल को चूमा, उनकी चूची को हल्के से दबाया।
दीदी ने भी मुझे बाँहों में भर लिया और अपने तपते होंठों के रस का स्वाद मुझे दिया। उस दिन फिर दिन भर हम दोनों भाई-बहन दिन भर आपस में खेलते रहे और आनंद उठाते रहे। दीदी ने मुझे दिन में दोबारा चोदने तो नहीं दिया मगर रसोई में खाना बनाते समय अपनी चूत चटवाई और दोपहर में भी मेरे ऊपर लेट कर चूत चटवाया और लौड़ा चूसा।
टेलीविज़न देखते समय भी हम दोनों एक-दूसरे के अंगों से खेलते रहे। कभी मैं उनकी चूची दबा देता, कभी वो मेरा लौड़ा खींच कर मरोड़ देती। मुझे कभी माधरचोद कह कर पुकारतीं, कभी बहनचोद कह कर। इसी तरह रात होने पर हमने टेलीविज़न देखते हुए खाना खाया और फिर वो रसोई में बर्तन आदि साफ़ करने चली गईं और मैं टीवी देखता रहा।
थोड़ी देर बाद वो आईं और कमरे के अंदर घुस गईं। मैं बाहर ही बैठा रहा। तभी उन्होंने पुकारा, “राजू वहाँ बैठ कर क्या कर रहा है… भाई आजा… आज से तेरा बिस्तर यहीं लगा देती हूँ…” मैं तो इसी इंतज़ार में पता नहीं कब से बैठा हुआ था। कूद कर दीदी के कमरे में पहुँचा तो देखा दीदी ड्रेसिंग टेबल के सामने बैठ कर मेकअप कर रही थीं और फिर परफ्यूम निकाल कर अपने पूरे बदन पर लगाया और आईने में अपने आपको देखने लगीं।
मैं दीदी के चुत्तरों को देखता सोचता रहा कि काश मुझे एक बार इनकी गांड का स्वाद चखने को मिल जाता तो बस मज़ा आ जाता। मेरा मन अब थोड़ा ज्यादा बहकने लगा था। ऊँगली पकड़ कर गर्दन तक पहुँचना चाहता था। दीदी मेरी तरफ घूम कर मुझे देखती मुस्कुराते हुए बिस्तर पर आ कर बैठ गईं।
वो बहुत खूबसूरत लग रही थीं। बिस्तर पर तकिए के सहारे लेट कर अपनी बाँहें फैलाते हुए मुझे प्यार से बुलाया। मैं कूद कर बिस्तर पर चढ़ गया और दीदी को बाँहों में भर उनके होंठों का चुम्बन लेने लगा। तभी लाइट चली गई और कमरे में पूरा अँधेरा फैल गया। मैं और दीदी दोनों हँसने लगे।
फिर उन्होंने कहा, “हाय राजू… ये तो एकदम टाइम पर लाइट चली गई… मैंने भी दिन में नहीं चुदवाया था कि… रात में आराम से मज़ा लूँगी… चल एक काम कर, अँधेरे में बूर चाट सकता है… देखूँ तो सही… तू मेरी चूत की सुगंध को पहचानता है या नहीं… सलवार नहीं खोलनी ठीक है…”
इतना सुनते ही मैं होंठों को छोड़ नीचे की तरफ लपका। उनके दोनों पैरों को फैला कर सूँघते हुए उनकी फटी सलवार के पास उनकी चूत के पास पहुँच गया। सलवार के फटे हुए भाग को फैला कर चूत पर मुँह लगा कर लपलप चाटने लगा।
थोड़ी देर चाटने पर ही दीदी एकदम सिसियाने लगीं और मेरे सिर को अपनी चूत पर दबाते हुए चिल्लाने लगीं, “हाय राजू… बूर चाटू… राजा… हाय सच में तू तो कमाल कर रहा है… एकदम एक्सपर्ट हो गया है… अँधेरे में भी सूँघ लिया… सीईईईइ बहनचोद… साला बहुत उस्ताद हो गया है… है… हाय मेरे राजा… सीईईईइ”
मैं पूरी चूत को अपने मुँह में भरने के चक्कर में सलवार की म्यानी को और फाड़ दिया, यहाँ तक कि दीदी की गांड तक म्यानी फट चुकी थी और मैं चूत पर जीभ चलाते हुए बीच-बीच में उनकी गांड को भी चाट रहा था और उसकी खाई में भी जीभ चला रहा था। तभी लाइट वापस आ गई।
मैंने मुँह उठाया तो देखा मैं और दीदी दोनों पसीने से लथपथ हो चुके थे। होंठों पर से चूत का पानी पोछते हुए मैं बोला, “हाय दीदी देखो आपको कितना पसीना आ रहा है… जल्दी से कपड़े खोलो…” दीदी भी उठ के बैठते हुए बोलीं, “हाँ बहुत गर्मी है… उफ़्फ़्फ़्फ़्फ़… लाइट आ जाने से ठीक रहा नहीं तो मैं सोच रही थी… साली…” कहते हुए अपने कमीज़ को खोलने लगीं।
कमीज़ खुलते ही दीदी कमर के ऊपर से पूरी नंगी हो गईं। उन्होंने ब्रा नहीं पहन रखी थी, ये बात मुझे पहले से पता थी क्योंकि दिन भर उनकी कमीज़ के ऊपर से उनके चूचियों के निप्पल को मैं देखता रहा था। दोनों चूचियाँ आज़ाद हो चुकी थीं और कमरे में उनके बदन से निकल रही पसीने और परफ्यूम की मादक गंध फैल गई।
मेरे से रुका नहीं गया। मैंने झपट कर दीदी को अपनी बाँहों में भरा और नीचे लिटा कर उनके होंठों, गालों और माथे को चूमते हुए चाटने लगा। मैं उनके चेहरे पर लगी पसीने की हर बूँद को चाट रहा था और अपनी जीभ से चाटते हुए उनके पूरे चेहरे को गीला कर रहा था। दीदी सिसकते हुए मुझसे अपने चेहरे को चटवा रही थीं।
चेहरे को पूरा गीला करने के बाद मैं गर्दन को चाटने लगा फिर वहाँ से छाती और चूचियों को अपनी जीभ से पूरा गीला कर मैंने दीदी के दोनों हाथों को पकड़ झटके के साथ उनके सिर के ऊपर कर दिया। उनकी दोनों काँखें मेरे सामने आ गईं। काँखों के बाल अभी भी बहुत छोटे-छोटे थे। हाथ के ऊपर होते ही काँखों से निकलती भीनी-भीनी खुश्बू आने लगी।
मैं अपने दिल की इच्छा पूरी करने के चक्कर में सीधा उनके दोनों छाती को चाटता हुआ काँखों की तरफ मुँह ले गया और उसमें अपना मुँह गाड़ दिया। काँखों के मांस को मुँह में भरते हुए चूमने लगा और जीभ निकाल कर चाटने लगा। काँख में जमा पसीने का नमकीन पानी मेरे मुँह के अंदर जा रहा था मगर मेरा इस तरफ कोई ध्यान नहीं था।
मैं तो काँख के पसीने के सुगंध को सूँघते हुए मदहोश हुआ जा रहा था। मुझे एक नशा सा हो गया था। मैंने चाटते-चाटते पूरी काँख को अपने थूक और लार से भींगा दिया था। दीदी चिल्लाते हुए गाली दे रही थीं, “हाय हरामी… सीईईइ… ये क्या कर रहा है… चूतखोर… सीई… बेशर्म…
काँख चाटने का तुझे कहाँ से सूझा… उफ़्फ़्फ़्फ़्फ़… पूरा पसीने से भरा हुआ था… साला मुझे भी गंदा कर रहा है… हाय पूरा थूक से भींगा दिया… हाय माधरचोद… ये क्या कर रहा है… उफ़्फ़्फ़्फ़्फ़… हाय मेरे पूरे बदन को चाट रहा है… हाय भाई… तुझे मेरे बदन से रस टपकता हुआ लगता है क्या… हाय… उफ़्फ़्फ़्फ़्फ़…”
मुझे इस बात की चिंता नहीं थी कि दीदी क्या बोल रही हैं। मैं दूसरी काँख को चाटते हुए बोला, “हाय दीदी… तेरा बदन नशीला है… उम्म्म्म्म्म्म्म्म… बहुत मज़ेदार है… तू तो रसवंती है… रसवंती… तेरे बदन को चाटने से जितना मज़ा मुझे मिलता है उतना एक बार बियर पी थी तब भी नहीं आया था…
हाय… दीदी तुम्हारी काँखों में जो पसीना रहता है उसकी गंध ने मुझे बहुत बार पागल किया है… हाय आज मौका मिला है तो नहीं छोड़ूँगा… तुम्हारे पूरे बदन को चाटूँगा… गांड में भी अपनी जीभ डालूँगा… हाय दीदी आज मत रोकना मुझे… मैं पागल हो गया हूँ… उम्म्म्म्म्म्म्म्म…” ये कहानी आप हमारी वासना डॉट नेट पर पढ़ रहे है.
दीदी समझ गईं कि मैं सच में आज उनको नहीं छोड़ने वाला। उनको भी मज़ा आ रहा था। उन्होंने अपना पूरा बदन ढीला छोड़ दिया था और मुझे पूरी आज़ादी दे दी थी। मैं आराम से उनके काँखों को चाटने के बाद धीरे-धीरे नीचे की तरफ बढ़ता चला गया और पेट की नाभि को चाटते हुए दाँतों से सलवार के नाड़े को खोल कर खींचने लगा। इस पर दीदी बोलीं, “फाड़ दे ना… बहनचोद… पूरी तो पहले ही फाड़ चुका है… और फाड़ दे…”
पर मैंने खींचते हुए पूरी सलवार को नीचे उतार दिया और दोनों टाँगें फैला कर उनके बीच बैठ एक पैर को अपने हाथ से ऊपर उठा कर पैर के अंगूठे को चाटने लगा। धीरे-धीरे पैर की उँगलियों और टखने को चाटने के बाद पूरे तलवे को जीभ लगा कर चाटा। फिर वहाँ से आगे बढ़ते हुए उनके पूरे पैर को चाटते हुए घुटने और जाँघों को चाटने लगा।
जाँघों पर दाँत गड़ाते हुए मांस को मुँह में भरते हुए चाट रहा था। दीदी अपने हाथ-पैर पटकते हुए छटपटा रही थीं। मेरी चटाई ने उनको पूरी तरह से गरम कर दिया था। वो मदहोश हो रही थीं। मैं जाँघों के जोड़ को चाटते हुए पैर को हवा में उठा दिया और लप-लप करते हुए कुत्ते की तरह कभी बूर कभी उसके चारों तरफ चाटने लगा।
फिर अचानक से मैंने जाँघ पकड़ कर दोनों पैर हवा में ऊपर उठा दिया। इससे दीदी की गांड मेरी आँखों के सामने आ गई और मैं उस पर मुँह लगा कर चाटने लगा। दीदी एकदम गरमा गईं और तड़पते हुए बोलीं, “क्या कर रहा है… हाय गांड के पीछे हाथ धो कर पड़ गया… है… सीईईई गांड मारेगा क्या… जब देखो तब चाटने लगता है… उस समय भी चाट रहा था… हाय हरामी… कुत्ते… सीई… चाट ना है तो ठीक से चाट… मज़ा आ रहा है… रुक मुझे पलटने दे…”
कहते हुए पलट कर पेट के बल हो गईं और गांड के नीचे तकिया लगा कर ऊपर उठा दिया और बोलीं, “ले अब चाट… कुत्ते… अपनी कुतिया दीदी की गांड… को… बहनचोद… बहन की गांड… खा रहा है… उफ़्फ़्फ़्फ़्फ़्फ़ बेशर्म…” मेरे लिए अब और आसान हो गया था। दीदी की गांड को उनके दोनों चुत्तरों को दोनों हाथ से फैला कर मसलते हुए खोल कर उनकी पूरी गांड की खाई में जीभ डाल कर चलाने लगा।
गांड का छोटा सा भूरे रंग का छेद पकपका रहा था। होंठों को गांड के छेद के होंठों से मिलाता हुआ चूमने लगा। तभी दीदी अपने दोनों हाथों को गांड के छेद के पास ला कर अपनी गांड की छेद को फैलाती हुई बोलीं, “हाय ठीक से चाट… चाटना है तो… छेद पूरा फैला कर… चाट…
मेरा भी मन करता था चटवाने को… तेरी जो वो मस्त राम की किताब है ना, उसमें लिखा है… हाय राजू… मुझे सब पता है… बेटा… तू क्या-क्या करता है… इसलिए चौंक मत… बस वैसे ही जैसे किताब में लिखा है वैसे चाट… हाय… जीभ अंदर डाल कर चाट… हाय सीईईईईई…”
मैं समझ गया कि अब जब दीदी से कुछ छुपा ही नहीं है तो शर्माना कैसा। अपनी जीभ को करा कर के उनकी गांड की भूरी छेद में डाल कर नचाते हुए चाटने लगा। गांड के छेद को अपने अंगूठे से पकड़ फैलाते हुए मस्ती में चाटने लगा। दीदी अपनी गांड को पूरा हवा में उठा कर मेरी जीभ पर नचा रही थीं और मैं गांड को अपनी जीभ डाल कर चोदते हुए पूरी खाई में ऊपर से नीचे तक जीभ चला रहा था।
दीदी की गांड का स्वाद भी एकदम नशीला लग रहा था। कसी हुई गांड के अंदर तक जीभ डालने के लिए पूरा जीभ सीधा खड़ा कर के गांड को पूरा फैला कर पेल कर जीभ नचा रहा था। सक-सक गांड के अंदर जीभ आ-जा रही थी। थूक से गांड की छेद पूरी गीली हो गई थी और आसानी से मेरी जीभ को अपने अंदर खींच रही थी।
गांड चटवाते हुए दीदी एकदम गर्म हो गई थीं और सिसकते हुए बोलीं, “हाय राजा… अब गांड चाटना छोड़ो… हाय राजा… मैं बहुत गर्म हो चुकी हूँ… हाय मुझे तूने… मस्त कर दिया है… हाय अब अपनी रसवंती दीदी का रस चूसना छोड़ और… उसकी चूत में अपना मुसल लौड़ा डाल कर चोद और उसका रस निकाल दे… हाय सनम… मेरे राजा… चोद दे अपनी दीदी को अब मत तड़पा…”
दीदी की तड़प देख मैंने अपना मुँह उनकी गांड पर से हटाया और बोला, “हाय दीदी जब आपने मस्त राम की किताब पढ़ी थी तो… आपने पढ़ा तो होगा ही कि… कैसे गांड… में… हाय मेरा मतलब है कि एक बार दीदी… अपनी गांड…” दीदी इस पर एकदम से तड़प कर पलटीं और मेरे गालों पर चिकोटी काटती हुई बोलीं, “हाय हरामी… साला… तू जितना दीखता है उतना सीधा है नहीं… सीईईईइ… माधरचोद…
मैं सब समझती हूँ… तू साला गांड के पीछे पड़ गया है… कुत्ते मेरी गांड मारने के चक्कर में तू… साले… यहाँ मेरी चूत में आग लगी हुई है और तू… हाय… नहीं भाई मेरी गांड एकदम कुंवारी है और आज तक मैंने इसमें उँगली भी नहीं डाली है… हाय राजू तेरा लौड़ा बहुत मोटा है… गांड छोड़ कर चूत मार ले… मैंने तुझे गांड चाटने दिया… गांड का पूरा मज़ा ले लिया अब रहने दे…”
मैं दीदी की चिरौरी करने लगा। “हाय दीदी प्लीज़… बस एक बार… किताब में लिखा है कितना भी मोटा… हो चला जाता है… हाय प्लीज़ बस एक बार… बहुत मज़ा… आता है… मैंने सुना है… प्लीज़…” मैं दीदी के पैर को चूम रहा था, चुत्तर को चूम रहा था, कभी हाथ को चूम रहा था। दीदी से मैं भीख माँगने के अंदाज़ में चिरौरी करने लगा।
कुछ देर तक सोचने के बाद दीदी बोलीं, “ठीक है भाई तू कर ले… मगर मेरी एक शर्त है… पहले अपने थूक से मेरी गांड को पूरा चिकना कर दे… या फिर थोड़ा सा मक्खन काट कर ला आमेरी गांड में डाल कर एकदम चिकना कर दे फिर… अपना लौड़ा डालना… डालने के पहले…
लौड़े को भी चिकना कर लेना… हाँ एक और बात तेरा पानी मैं अपनी चूत में ही लूँगी खबरदार जो… तूने अपना पानी कहीं और गिराया… गांड मारने के बाद चूत के अंदर डाल कर गिराना… नहीं तो फिर कभी तुझे चूत नहीं दूँगी… और याद रख मैं इस काम में तेरी कोई मदद नहीं करने वाली मैं कुर्सी पकड़ कर खड़ी हो जाऊँगी… बस…”
मैं राज़ी हो गया और तुरंत भागता हुआ रसोई से फ्रीज़ खोल मक्खन के दो-तीन टुकड़े ले कर आ गया। दीदी तब तक सोफे वाली चेयर के ऊपर दो तकिए रख कर अपनी आधे धड़ को उस पर टिका कर गांड को हवा में लहरा रही थीं। मैं जल्दी से उनके पीछे पहुँच कर उनके चुत्तरों को फैला कर मक्खन के टुकड़ों को एक-एक कर उनकी गांड में ठेलने लगा। ये कहानी आप हमारी वासना डॉट नेट पर पढ़ रहे है.
गांड की गर्मी पा कर मक्खन पिघलता जा रहा था और उनकी गांड में घुस कर घुलता जा रहा था। मैंने धीरे-धीरे कर के सारे टुकड़े डाल दिए फिर नीचे झुक कर गांड को बाहर से चाटने लगा। पूरी गांड को थूक से लथपथ कर देने के बाद मैंने अपने लौड़े पर भी ढेर सारा थूक लगाया और फिर दोनों चुत्तरों को दोनों हाथ से फैला कर लौड़े को गांड की छेद पर लगा कर कमर से हल्का सा जोर लगाया।
गांड इतनी चिकनी हो चुकी थी और छेद इतनी टाइट थी कि लौड़ा फिसल कर चुत्तरों पर लग गया। मैंने दो-तीन बार और कोशिश की मगर हर बार ऐसा ही हुआ। दीदी इस पर बोलीं, “देखा भाई मैं कहती थी ना कि एकदम टाइट है… कुत्ते… मेरी बात नहीं मान रहा था… किताब में लिखी हर बात… सच नहीं… हाय तू तो… बेकार में… उफ़्फ़्फ़्फ़्फ़्फ़ कुछ होने वाला नहीं… दर्द भी होगा… हाय… चूत में पेल ले… ऐसे मत कर…”
मगर मैं कुछ नहीं बोला और कोशिश करता रहा। थोड़ी देर में दीदी ने खुद से दया करते हुए अपने दोनों हाथों से अपने चुत्तरों को पकड़ कर खींचते हुए गांड के छेद को अंगूठा लगा कर फैला दिया और बोलीं, “ले माधरचोद अपने मन की आरज़ू पूरी कर ले… साला हाथ धो के पीछे पड़ गया है… ले अब घुसा… लौड़े का सुपाड़ा ठीक से छेद पर लगा कर उसके बाद… धक्का मार… धीरे-धीरे मारना… हरामी… ज़ोर से मारा तो गांड टेढ़ा कर के लौड़ा तोड़ दूँगी…”
मैंने दीदी के फैले हुए गांड के छेद पर लौड़े के सुपाड़े को रखा और गांड तक का जोर लगा कर धक्का मारा। इस बार पक से मेरे लौड़े का सुपाड़ा जा कर दीदी की गांड में घुस गया। गांड की छेद फैल गई। सुपाड़ा जब घुस गया तो फिर बाकी काम आसान था क्योंकि सबसे मोटा तो सुपाड़ा ही था।
पर सुपाड़ा घुसते ही दीदी की गांड परपराने लगी। वो एकदम से चिल्ला उठीं और गांड खींचने लगीं। मैंने दीदी की कमर को जोर से पकड़ लिया और थोड़ा और जोर लगा कर एक और धक्का मार दिया। लौड़ा आधा के करीब घुस गया क्योंकि गांड तो एकदम चिकनी हो रखी थी।
पर दीदी को शायद दर्द बर्दाश्त नहीं हुआ, चिल्लाते हुए बोलीं, “हरामी… कुत्ते… कहती थी… मत कर… माधरचोद… पीछे पड़ गया था… साले… हरामी… छोड़… हाय… मेरी गांड फट गई… उफ़्फ़्फ़्फ़्फ़्फ़… सीईईईई… अब और मत डालना… हरामी… तेरी माँ को चोदू… मत डाल… हाय निकाल ले… निकाल ले भाई… गांड मत मार… हाय चूत मार ले… हाय दीदी की गांड फाड़ कर क्या मिलेगा… सीईईईईइ… आईईईईईइ… मररररर… गईइइइ…”
दीदी के ऐसे चिल्लाने पर मेरी गांड भी फट गई और मैं डर कर रुक गया और दीदी की पीठ और गर्दन को चूमने लगा और हाथ आगे बढ़ा कर उनकी दोनों लटकती हुई चूचियों को दबाने लगा। मेरी जानकारी मुझे बता रही थी कि अगर अभी निकाल लिया तो फिर शायद कभी नहीं डालने देंगी इसलिए चुप-चाप आधा लौड़ा डाले हुए कमर को हल्के-हल्के हिलाने लगा।
कुछ देर तक ऐसे करने और चूची दबाने से शायद दीदी को आराम मिल गया और आह-उह करते हुए अपनी कमर हिलाने लगीं। मेरे लिए ये अच्छा अवसर था और मैं भी धीरे-धीरे कर के एक-एक इंच लौड़ा अंदर घुसाता जा रहा था। हम दोनों पसीने-पसीने हो चुके थे। थोड़ी देर में ही मेरी मेहनत रंग लाई और मेरा लौड़ा लगभग पूरा दीदी की गांड में घुस गया।
दीदी को अभी भी दर्द हो रहा था और वो बड़बड़ा रही थीं। मैं दीदी को सांत्वना देते हुए बोला, “बस दीदी हो गया अब… पूरा घुस चुका है… थोड़ी देर में लौड़ा… सेट हो कर आपको मज़ा देने लगेगा… हाय… परेशान नहीं हो… मैं खुद से शर्मिंदा हूँ कि मेरे कारण आपको इतनी परेशानी झेलनी पड़ी… अभी सब ठीक हो जाएगा…”
दीदी मेरी बात सुन कर अपनी गर्दन पीछे कर मुस्कुराने की कोशिश करती बोलीं, “नहीं भाई… इसमें शर्मिंदा होने की कोई बात नहीं है… हम आपस में मज़ा ले रहे हैं… इसलिए इसमें मेरा भी हाथ है… भाई तू ऐसे मत सोच… मेरा भी दिल में था कि मैं गांड मरवाने का स्वाद लूँ… अब जब हम कर ही रहे हैं तो… घबराने की कोई ज़रूरत नहीं है… तुम पूरा कर लो पर याद रखना… अपना पानी मेरी चूत में ही छोड़ना… लो मारो मेरी गांड… मैं भी कोशिश करती हूँ कि गांड को कुछ ढीला कर दूँ…”
ऐसा बोल कर दीदी भी धीरे-धीरे अपनी कमर को हिलाने लगीं। मैं भी धीरे-धीरे कमर हिला रहा था। कुछ देर बाद ही सक-सक करते हुए मेरा लौड़ा उनकी गांड में आने-जाने लगा। अब जाकर शायद कुछ ढीला हो रहा था। दीदी के कमर हिलाने में भी थोड़ी तेज़ी आ गई, इसलिए मैंने अपनी गांड का जोर लगाना शुरू कर दिया और तेज़ी से धक्के मारने लगा।
एक हाथ को उनकी कमर के नीचे ले जा कर उनकी बूर के टीट को मसलने लगा और चूत को रगड़ने लगा। उनकी चूत पानी छोड़ने लगी। दीदी को अब मज़ा आ रहा था। मैं अब कचा-कच धक्का लगाने लगा और एक हाथ उनके चूचियों को थाम कर लौड़े को गांड के अंदर-बाहर करने लगा। चूत से चार गुना ज्यादा टाइट दीदी की गांड लग रही थी। ये कहानी आप हमारी वासना डॉट नेट पर पढ़ रहे है.
दीदी अपनी गांड को हिलाते हुए बोलीं, “हाय भाई मज़ा आ रहा है… सीईईईई… बहुत अच्छा लग रहा है… शुरू में तो दर्द कर रहा था… मगर अब अच्छा लग रहा है… सीईईईई… हाय राजा… मारो धक्का… ज़ोर-ज़ोर से चोदो अपनी दीदी की गांड को… हाय सैयाँ बताओ अपनी दीदी की गांड मारने में कैसा लग रहा है… मज़ा आ रहा है कि नहीं… मेरी टाइट गांड मारने में…
बहन की गांड मारने का बहुत शौक था ना तुझे… तो मन लगा कर मार… हाय मेरी चूत भी पानी छोड़ने लगी है… हाय ज़ोर से धक्का मार… अपनी बहन को बीबी बना लिया है… तो मन लगा कर बीबी की सेवा कर… हाय राजा सीईईईईइ… बहनचोद बहुत मज़ा आ रहा है… सीईईईइ… उफ़्फ़्फ़्फ़्फ़्फ़…”
मैं भी अब पूरा ज़ोर लगा कर धक्का मारते हुए चिल्लाया, “हाय दीदी सीईईई… बहुत टाइट है तुम्हारी गांड… मज़ा आ गया… हाय एकदम संकरी छेद है… ऊपर-नीचे जहाँ के छेद में लौड़ा डालो वही के छेद में मज़ा भरा हुआ है… हाय दीदी साली… मज़ा आ गया… सच में तुम बहुत मज़ेदार हो… बहुत मज़ा आ रहा है… सीईईई… मैं तो पागल हाय… मैं तो पूरा बहनचोद बन गया हूँ… मगर तुम भी तो भाईचोदी बहन हो मेरी डार्लिंग सिस्टर… हाय दीदी आज तो मैं तुम्हारी बूर और गांड दोनों फाड़ कर रख दूँगा…”
तभी मुझे लगा कि इतनी टाइट गांड मारने के कारण मेरा किसी भी समय निकल सकता है। इसलिए मैंने दीदी से कहा कि “दीदी… मेरा अब निकल सकता है… तुम्हारी गांड बहुत टाइट है… इतनी टाइट गांड मारने से मेरा तो छिल गया है मगर… बहुत मज़ा आया… अब मैं निकाल सकता हूँ… हाय बोलो दीदी क्या मैं तुम्हारी गांड से निकाल कर चूत में डालूँ या फिर… तुम्हारी गांड में निकाल दूँ… बोलो ना मेरी लौड़ाखोर बहन… साली मैं तुम्हारे चूत में झारूँ या फिर… गांड में झारूँ… हाय मेरी रंडी दीदी…”
दीदी अपनी गांड नचाते हुए बोलीं, “माधरचोद… मुझे रंडी बोलता है… साले अगर नहीं दिया होता तो मुठ मारता रह जाता… हाय अगर निकलने वाला है तो भोसड़ी के पूछ क्या रहा है… जल्दी से गांड से निकाल चूत में डाल…”
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मैंने सटक से लौड़ा खींचा और दीदी भी उठ कर खड़ी हो गईं और बिस्तर पर जा कर अपनी दोनों टाँगें हवा में उठा कर अपने जाँघों को फैला दिया। लगभग कूदता हुआ उनके जाँघों बीच घुस गया और अपना तमतमाया हुआ लौड़ा गच से उनकी चूत में डाल कर ज़ोरदार धक्के मारने लगा। दीदी भी नीचे से गांड उछल कर धक्का लेने लगीं और चिल्लाने लगीं, “हाय राजा मारो… ज़ोर से मारो… अपनी बहन बीबी की… हाय मेरे सैयाँ… बहुत मज़ा आ रहा है… इतना मज़ा कभी नहीं मिला…
मेरे भाई मेरे पति… अब तुम ही मेरे पति हो… हाय राजा मैं तुमसे शादी करूँगी… हाय अब तुम ही मेरे सैयाँ हो… मेरे बालम… माधरचोद… ले अपनी दीदी की की चूत का मज़ा… पूरा अंदर तक लौड़ा डाल कर… चूत में पानी छोड़ो… माधरचोद…” मैं भी चिल्लाते हुए बोला, “हा रंडी मैं तेरे से शादी करूँगा… मेरे लौड़े का पानी अपनी चूत में ले… हाय मेरा निकलने वाला है… हाय सीईईईईइ… ले ले…” और दीदी को कस कर अपनी बाँहों में चिपका झरने लगा। उसी समय वो भी झरने लगीं।
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