Devar Bhabhi Bur Chudai XXX
उत्तर प्रदेश का सहारनपुर शहर अपनी बेहतरीन नक्काशी और लकड़ी के बारीक काम के लिए जितना मशहूर है, उतनी ही गहरी और रूढ़िवादी यहाँ के पारंपरिक परिवारों की जड़ें हैं। यहाँ के पुराने मकानों की खिड़कियों और दरवाज़ों पर नक्काशी तो बड़ी खूबसूरत होती है, लेकिन उनके पीछे रहने वाले दिलों का दर्द अक्सर अंदर ही दबा रह जाता है। Devar Bhabhi Bur Chudai XXX
इसी शहर के एक शांत, पुराने मोहल्ले के बड़े से पुश्तैनी मकान में रीमा का ब्याह बड़े अरमानों के साथ शरद से हुआ था। शादी के शुरुआती दिन किसी हसीन और मखमली सपने जैसे थे। शरद का प्यार और रीमा की नई नवेली चूड़ियों की खनक ने उस घर को जीवंत कर दिया था।
लेकिन वक्त का पहिया हमेशा एक सा नहीं घूमता; खुशियों की उम्र जैसे बहुत छोटी थी। शादी के कुछ साल बाद ही शरद की तबीयत अचानक बिगड़ने लगी। लगातार उठने वाली सूखी खांसी, रात को आने वाला बुखार और धीरे-धीरे बदन का टूटता मास—जब शहर के बड़े डॉक्टर से जांच करवाई गई, तो पता चला कि शरद को टीबी (तपेदिक) जैसी गंभीर बीमारी ने जकड़ लिया है।
उस दौर में यह बीमारी न सिर्फ मरीज़ के शरीर को जर्जर कर देती थी, बल्कि छुआछूत के डर से इंसान को अपनों से भी दूर कर देती थी। शरद को घर के सबसे आखिरी कमरे में एकांतवास में भेज दिया गया। उम्र के जिस हसीन पड़ाव पर, यानी अपनी जवानी की दहलीज पर जब एक स्त्री को अपने पति के शारीरिक, मानसिक और भावनात्मक साहचर्य की सबसे ज़्यादा ज़रूरत होती है, रीमा उस सुख से पूरी तरह महरूम हो रही थी।
उसका पूरा दिन अब सिर्फ दवाई की तीखी गंध, उबले हुए पानी के बर्तनों और बीमार पति की चौबीस घंटे सेवा करने के बीच एक बेजान मशीन जैसा बन कर रह गया था। गर्मियों की उन लंबी, सुनसान दोपहरों में जब पूरा मोहल्ला सो जाता, तो रीमा अपने कमरे की नक्काशीदार खिड़की से बाहर देखती।
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उसकी सुलगती जवानी, उसकी अधूरी इच्छाएँ और उसके भीतर का सूनापन हर बीतते दिन के साथ और गहराता जा रहा था। उसे अहसास होने लगा था कि वह इस भरे-पूरे घर में भी कितनी अकेली है… उसी पुश्तैनी घर के एक हिस्से में शरद का छोटा भाई मंदीप भी रहता था।
मंदीप एक प्राइवेट फाइनेंस कंपनी में रिकवरी एजेंट के तौर पर काम करता था। उसका काम आसान नहीं था; दिनभर सहारनपुर की तपती धूप में मोटरसाइकिल पर चक्कर लगाना, पैसों की वसूली के लिए भागदौड़ करना और कर्जदारों की कड़वी व रूखी बातें सुनना उसकी रोज़मर्रा की ज़िंदगी थी।
शाम को जब वह घर लौटता, तो उसका पूरा बदन और ज़हन बुरी तरह थका-हारा होता था। लेकिन पैर जैसे ही घर की चौखट के अंदर पड़ते, शरद की बीमारी के कारण पसरा भारी और उदास माहौल उसे और थका देता। ऐसे में उस भारीपन को अपनी मुस्कान से हल्का करने का जिम्मा अक्सर रीमा खुद उठा लेती थी।
मंदीप स्वभाव से बेहद गंभीर, सीधा और अपनी मर्यादा की लक्ष्मण रेखा को अच्छी तरह समझने वाला लड़का था। उसकी २२ साल की जवान नज़रों में अपनी भाभी रीमा के लिए सम्मान आसमान जितना ऊँचा था। वह रीमा को सिर्फ अपने बड़े भाई की पत्नी नहीं, बल्कि घर की लक्ष्मी समझता था।
लेकिन रीमा, जो अंदर ही अंदर अपनी जवान होती इच्छाओं और जीवन के सूनेपन से जूझ रही थी, अपने उस दर्द को हँसी के पीछे छुपाना बखूबी जानती थी। वह मंदीप के आते ही रसोई से अदरक वाली कड़क चाय और बिस्कुट लेकर हाज़िर हो जाती। शाम की उस मद्धम रोशनी में, जब मंदीप सोफे पर बैठकर अपनी आँखें मूँद लेता, तो रीमा अक्सर उससे हँसी-मज़ाक करने का कोई मौका नहीं छोड़ती थी।
“क्यों मंदीप बाबू, आज फिर किसी कर्ज़दार ने पसीना छुड़ा दिया क्या? लाओ, चाय पियो और अपने इस गंभीर चेहरे पर थोड़ी तो रौनक लाओ,” रीमा अपनी साड़ी का पल्लू कमर में खोंसते हुए हल्के से खिलखिलाकर कहती।
उसकी उस खनकती हँसी और साड़ी के सरकने से दिखने वाली गोरी कलाई को देखकर मंदीप का मर्यादित दिल भी एक पल के लिए अपनी धड़कन भूल जाता। वह झेंपकर अपनी नज़रें झुका लेता और चाय का कुल्हड़ थामते हुए बस मुस्कुरा कर रह जाता। ये कहानी आप हमारी वासना डॉट नेट पर पढ़ रहे है.
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मंदीप को नहीं पता था कि रीमा का यह मज़ाक सिर्फ माहौल हल्का करने के लिए नहीं था, बल्कि यह उसके भीतर सुलग रही उस छुपी हुई तड़प का एक अनकहा इशारा भी था, जिसे वह खुद भी समझने से डर रही थी… वक्त अपनी बेरहम रफ़्तार से गुजरता रहा, लेकिन शरद की सेहत में कोई सुधार नहीं आया।
आखिरकार, करीब तीन महीने तक उस जानलेवा बीमारी से जूझते-जूझते एक स्याह रात को शरद की सांसें हमेशा के लिए टूट गईं। पुश्तैनी मकान के उस नक्काशीदार दरवाज़े के पीछे दुखों का पहाड़ टूट पड़ा। रीमा की चूड़ियाँ टूट चुकी थीं और उसकी मांग का सिंदूर धुल गया था।
उसके सामने गहरा अंधेरा था और जीने के लिए एक लंबी, अधूरी ज़िंदगी बाकी थी। शरद के जाने के बाद घर का वो पुराना माहौल, जो पहले से उदास था, अब एक अंतहीन मातम और सन्नाटे में डूब गया। शरद की तेहरवीं का दिन आया। आँगन में सफ़ेद चादरें बिछी थीं, धूप-अगरबत्ती की गंध हवा में तैर रही थी और दोनों परिवारों के बड़े-बुजुर्गों की एक बेहद आवश्यक और गंभीर पंचायत बैठी थी।
रीमा कोने में सफ़ेद सूती साड़ी पहने, घूंघट गिराए बेजान मूर्ति की तरह बैठी थी। उसकी जवान बेटी के इस उजाड़ भविष्य को देखकर उसके पिता, लेखराज जी का दिल फटा जा रहा था। वे अपनी बेटी के आने वाले कल को लेकर बेहद चिंतित थे, इसलिए उन्होंने समाज के सामने गहरी सांस लेकर अपनी बात रखी।
लेखराज जी ने पंचायत के बीच खड़े होकर, दोनों हाथ जोड़कर रूंधे हुए गले से कहा, “समधी जी… मेरी बेटी रीमा जिस घर की दहलीज को पवित्र मानकर ब्याह कर आई थी, मैं जीते-जी यह नहीं देखना चाहता कि वह यहाँ से बेघर होकर कहीं और जाए। लेकिन रीमा की उम्र अभी बहुत छोटी है, पूरी जवानी और पूरी ज़िंदगी उसके आगे पड़ी है।
इस सूनेपन में वह घुट-घुट कर मर जाएगी। इसलिए मेरा एक प्रस्ताव है… क्यों न समाज की गवाही में रीमा का हाथ मंदीप के हाथ में सौंप दिया जाए? दोनों एक ही छत के नीचे रहे हैं, एक-दूसरे के स्वभाव और आदर को अच्छी तरह जानते हैं। मंदीप के रूप में रीमा को फिर से एक पति का प्यार और सहारा मिल जाएगा, और हमारा परिवार भी बिखरने से बच जाएगा।”
लेखराज जी के इस प्रस्ताव के आते ही पूरे आँगन में एक गहरा सन्नाटा छा गया। मंदीप, जो सिर झुकाए बैठा था, उसकी छाती ज़ोर से धड़कने लगी। उसने कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि जिस भाभी का उसने हमेशा एक देवी की तरह सम्मान किया है, समाज उसे ही उसकी पत्नी बनाने की बात कहेगा।
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उधर घूंघट के पीछे से रीमा की आँखें भी भीग गईं, और उसके दिल के किसी कोने में दबी हसरतों ने डरते-डरते एक बार फिर करवट ली… कमरे में फैली चंदन (सैंडलवुड) के इत्र की भीनी-भीनी खुशबू हवा में तैर रही थी, जो मंदीप के भीतर के संकोच को और बढ़ा रही थी।
मंदीप बेड पर रीमा के बिल्कुल करीब बैठा था, लेकिन उसकी रीढ़ की हड्डी में एक अजीब सी सिहरन दौड़ रही थी। उसने कभी कल्पना भी नहीं की थी कि जिस कालीन और जिस बेड पर वह कभी बड़े भाई के सामने अदब से बैठता था, आज वहीं वह अपनी ब्याहता बीवी के साथ बैठा है। रीमा ने मंदीप के उस कांपते हुए हाथ को अपनी दोनों हथेलियों के बीच और कस लिया। उसकी हथेलियों की गर्माहट मंदीप की रगों में सीधे उतर रही थी।
रीमा ने बेहद धीमी और मादक आवाज़ में कहा, “मंदीप… मैं जानती हूँ कि तुम्हारे मन में क्या चल रहा है। तुम आज भी इस कमरे में शरद की परछाई ढूंढ रहे हो। लेकिन सच को स्वीकार करो… वो चले गए। अब इस जिंदगी के सफर में मुझे संभालने वाले सिर्फ तुम हो। क्या तुम्हें मुझ पर ज़रा भी तरस नहीं आता?”
रीमा की आँखों में आँसुओं की एक पतली लकीर चमक उठी, जिसने मंदीप के सीधे और पवित्र दिल को पूरी तरह पिघला दिया। वह नज़रें चुराते हुए धीमे से बोला, “रीमा जी… ऐसा नहीं है। मैं… मैं आपकी तकलीफ समझता हूँ। लेकिन मेरे संस्कार मुझे एकदम से आगे बढ़ने की इजाज़त नहीं दे रहे। मुझे बस थोड़ा सा वक्त चाहिए खुद को इस नए रिश्ते में ढालने के लिए।”
रीमा के होंठों पर एक गहरी, समझदार मुस्कान उभर आई। वह मंदीप के इस सीधेपन और मर्यादा का सम्मान करती थी, लेकिन वह यह भी जानती थी कि अगर आज उसने पहल नहीं की, तो मंदीप अपनी झिझक की दीवार कभी नहीं तोड़ पाएगा। उसने बिना कुछ कहे अपना दूसरा हाथ आगे बढ़ाया और मंदीप के कुर्ते के कॉलर के पास जमी शिकन को धीरे से ठीक करने लगी। ये कहानी आप हमारी वासना डॉट नेट पर पढ़ रहे है.
इस बेहद नजदीकी छुअन से मंदीप की सांसें भारी होने लगीं। रीमा ने अपनी कत्थई आँखें मंदीप की आँखों में गाड़ते हुए कहा, “वक्त तो गुज़रता ही रहेगा मंदीप बाबू… लेकिन आज की यह रात सिर्फ हमारी है। समाज ने जो हाथ मुझे सौंपा है, क्या तुम उसे अपनी ज़िंदगी का हिस्सा नहीं बनाओगे?”
मंदीप ने धड़कते दिल से रीमा के उस खूबसूरत, सजे-धजे चेहरे को देखा। मद्धम रोशनी में रीमा के चेहरे का नूर और उसकी आँखों की बेताबी चीख-चीखकर कह रही थी कि अब मर्यादा के इस पुल को पार करने का वक्त आ चुका है… मंदीप से अब और दूर नहीं रहा गया। उसके भीतर का संयम तिनके की तरह बह गया।
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वह झटके से उठा और रीमा के ठीक सामने खड़ा हो गया। मद्धम रोशनी में उसकी आँखों में छिपी प्यास को देखते-देखते जब उससे और सब्र नहीं हुआ, तो उसने आगे बढ़कर रीमा को अपनी मजबूत बाहों के घेरे में भींच लिया। रीमा तो जैसे सदियों से इसी पल का इंतज़ार कर रही थी; वह बिना किसी विरोध के चुपचाप उसकी चौड़ी छाती में समा गई।
दोनों काफी देर तक उसी बंद कमरे में एक-दूसरे के जिस्म से चिपके खड़े रहे। भाई की परछाई का जो संकोच था, वह आज हमेशा के लिए ख़त्म हो चुका था। दोनों पहली बार एक-दूसरे के बदन की धड़कन को इतने करीब से महसूस कर रहे थे। वे ना जाने कब तक उसी अवस्था में खड़े रहते, अगर रीमा ने मंदीप के सीने पर उंगली फेरते हुए हल्के से टोका न होता, “मंदीप बाबू… अब ये भारी कुर्ता-पायजामा तो बदल लो।”
उसकी यह रेशमी आवाज़ सुनकर मंदीप जैसे होश में आया। उसने चौंककर रीमा को अपने आलिंगन से थोड़ा मुक्त किया। लेकिन रीमा दूर नहीं हटी, वह उसकी बाहों के पास ही सटकर खड़ी रही। मंदीप ने मुस्कुराते हुए उसे बेड पर बिठाया और खुद अलमारी से कपड़े बदलने चला गया।
जब वह अपना भारी कुर्ता उतारकर एक हल्का नाइटसूट पहनकर वापस आया, तो रीमा ने उसकी तरफ देखा और शरारती आवाज़ में पूछा, “बहुत थक गए हो ना… रात को सोने से पहले कुछ पीना तो नहीं है?” रीमा का यह सवाल सुनते ही मंदीप के भीतर दबी वासना ने एक ज़ोरदार हिलोरा मारा।
उसने आगे बढ़कर रीमा को सीधे बेड से ऊपर उठाया, उसे अपनी बाहों में भरा और बिना एक पल गंवाए अपने होंठ सीधे उसके रसीले गुलाबी होंठों पर टिका दिए। उसने रीमा की आँखों में देखते हुए मदभरी आवाज़ में कहा, “हाँ रीमा… मुझे पीना तो है, लेकिन कोई दूध या पानी नहीं… मुझे तो तुम्हारी जवानी का वो काम-रस पीना है!”
यह उस नए शादीशुदा जोड़े का पहला, आधिकारिक और पवित्र चुंबन था। मंदीप के होंठों की छुअन पाते ही रीमा के होंठ भी उसके मुँह से चिपक से गए। मर्यादा के सारे बांध टूट चुके थे; दोनों एक-दूसरे को बेतहाशा और पागलों की तरह चूमने लगे। मंदीप उसकी जीभ का रस चूस रहा था और रीमा उसके मुँह की गर्माहट को अपने भीतर सोख रही थी।
काफी देर तक कमरे में सिर्फ उनके सांसों की आवाज़ गूँजती रही, उनका मन ही नहीं भर रहा था। जब दोनों की साँसें पूरी तरह फूल गईं और फेफड़े जवाब देने लगे, तब जाकर उनके होंठ अलग हुए। होंठ भले अलग हो गए थे, लेकिन आलिंगन अभी भी अटूट था। रीमा की गोरी बाँहें मंदीप की पीठ पर कस चुकी थीं। उसने मंदीप के कान के पास अपनी गर्म साँसें छोड़ते हुए हौले से फुसफुसाया, “अब बातें ही करते रहोगे या सोने चले?”
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मंदीप ने एक कुटिल मुस्कान बिखेरी, उसे अपनी दोनों बाहों में उठाकर गोद में लिया और मखमली बेड पर लिटा दिया। मंदीप भी तुरंत अपनी नाइटसूट की पैंट को संभालते हुए उसके ठीक बगल में लेट गया। दोनों पति-पत्नी पहली बार समाज और भगवान की गवाही में एक-दूसरे के इतने समीप लेटे थे।
अब रुकने का कोई कारण नहीं था, ना ही कोई सामाजिक बाधा थी। मंदीप ने रीमा को पूरी तरह अपने आगोश में समेट लिया और वह भी उसकी छाती के बालों में अपना चेहरा छुपाकर सिमट गई। दोनों एक-दूसरे के शरीर से आ रही सुगंध और सैंडलवुड के इत्र का आनंद उठा रहे थे।
त्वचा से त्वचा टकरा रही थी और दोनों एक-दूसरे के बदन की उस सुलगती हुई गर्मी को अनुभव कर रहे थे। फिर अचानक काम के तीव्र आवेग के वश में होकर दोनों ने एक-दूसरे को फिर से चूमना शुरू कर दिया। इस बार वासना का वेग और तेज़ था; दोनों ने एक-दूसरे के चेहरे, गालों और सुराहीदार गर्दन पर चुंबनों की एक ज़ोरदार बरसात सी कर दी…
अब मंदीप और रीमा बिस्तर पर एक-दूसरे के सामने पूरी तरह नग्न थे। रीमा की नज़रें मंदीप के उस ९ इंच के विशाल लंड पर टिकी थीं, तो मंदीप भी उसकी सुडौल देह और उसकी साफ़, मखमली फुद्दी को एकटक घूर रहा था। रीमा ने मंदीप का हाथ पकड़कर अपनी छाती पर रखा और कामुक आवाज़ में कहा, “मंदीप… अब ज़रा मेरे इन बूब्स की भी मालिश करो ना।”
मंदीप ने आगे बढ़कर उसके भरे हुए, गोरे स्तनों को अपनी हथेलियों में भींचना शुरू कर दिया। रीमा के मुँह से एक ठंडी आह निकली और उसने तुरंत मंदीप का कड़ा लंड अपने नाजुक हाथ में थाम लिया। उसे ऊपर-नीचे सहलाते हुए उसने अपना मुँह खोला और उस ९ इंच के भारी सुपाड़े को सीधे अपने हलक में उतारकर चूसने लगी। ये कहानी आप हमारी वासना डॉट नेट पर पढ़ रहे है.
मंदीप मजे के मारे अपनी आँखें मूँदने लगा। जब उसने आँखें खोलकर रीमा को नीचे इस हाल में देखा, तो रीमा ने मुँह से लंड बाहर निकालकर शरारत से पूछा, “ऐसे क्या देख रहे हो मंदीप बाबू?” मंदीप ने हाँफते हुए कहा, “रीमा… मैं तुम्हारे इन मदमस्त बूब्स और इस भारी गांड को देख रहा हूँ। कसम से, तुम्हारी यह गांड और बदन बेहद मस्त हैं।”
उसने अपनी दोनों हथेलियों को रीमा के नितंबों पर टिकाया और उन्हें ज़ोर-ज़ोर से मसलने लगा; रीमा की गांड रुई की तरह सॉफ्ट और रेशमी थी। तभी मंदीप की नज़र नीचे गई—उसकी फुद्दी पर एक भी बाल नहीं था, वह पूरी तरह साफ़ और चिकनी थी। मंदीप से अब और नहीं रुका गया।
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उसने नीचे झुककर रीमा के एक भारी स्तन को पूरा अपने मुँह में भर लिया और चूसने लगा, जबकि उसका दूसरा हाथ नीचे जाकर रीमा की उस नग्न फुद्दी के काम-दाने को बेरहमी से रगड़ने लगा। इस दोहरे वार से रीमा जोश में आ गई और अपनी आँखें भींचकर सिसकने लगी—”आआऊऊश… ह्श्श्श्श्… मंदीप!”
मंदीप ऊपर से उसके निप्पलों को दांतों से काट रहा था और नीचे अपनी एक उंगली उसकी फुद्दी के गीले छेद के अंदर डाल-निकाल रहा था। रीमा कामुकता के सातवें आसमान पर पहुँच चुकी थी। उसने मंदीप के बाल पकड़े और भीख माँगने वाले लहजे में चिल्लाई, “मंदीप… प्लीज अपनी जीभ लगाओ, मेरी चूत को चाटो!”
मंदीप ने बिना देर किए उसकी दोनों टांगों को और फैलाया और अपनी गर्म जीभ सीधे उसकी फुद्दी के रसदार मुहाने पर टिका दी। जैसे ही उसकी जीभ ने अंदर-बाहर करना शुरू किया, रीमा बेड की चादर को हाथों में भींचकर ज़ोर-ज़ोर से कराहने लगी—”आआऊऊ… श्श्श्श्श्स… ईई… ऊऊ… मंदीप राजा… और चाटो… अंदर तक चाटो!”
लगभग १० मिनट तक पागलों की तरह चाटने के बाद रीमा का पूरा बदन कांपने लगा। उसने हाँफते हुए कहा, “मंदीप… रुकना मत, मैं झड़ने वाली हूँ!” मंदीप ने उसकी जाँघों को कसते हुए कहा, “रीमा… आज मैं तुम्हारी जवानी का यह सारा काम-रस पीना चाहता हूँ।”
इतना सुनते ही रीमा का पूरा जिस्म झटके खाने लगा और उसकी फुद्दी ने भारी मात्रा में गाढ़ा, मीठा रस छोड़ दिया। मंदीप ने अपनी जीभ से उसकी चूत का सारा पानी चूसकर पी लिया। इसके तुरंत बाद, मंदीप ने रीमा को बेड पर थोड़ा ऊपर उठाया और अपना कड़ा, ९ इंच का लंड सीधे उसके मुँह के आगे अड़ा दिया।
रीमा ने बिना झिझक के उसे दोनों हाथों से पकड़ा और किसी तजुर्बेकार औरत की तरह गहराई से चूसना शुरू कर दिया। करीब १० मिनट के उस तीखे ओरल सेक्स के बाद जब मंदीप की सांसें फूलने लगीं और उसने कहा, “रीमा… अब मेरा माल निकलने वाला है।”
तो रीमा ने उसकी आँखों में देखते हुए कहा, “मैं भी तुम्हारे इस गाढ़े वीर्य का एक-एक कतरा पीना चाहती हूँ, इसे बाहर मत फेंकना।” मंदीप ने एक गहरा धक्का उसके मुँह में मारा और अपना सारा गर्म वीर्य रीमा के हलक के अंदर झाड़ दिया। रीमा ने बिना एक बूंद गिराए उसका सारा गाढ़ा माल गटागट पी लिया और फिर दोनों एक-दूसरे के पसीने से लथपथ जिस्म से लिपटकर पाँच मिनट के लिए शांत सोए रहे।
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लेकिन ९ इंच के उस मूसल की भूख इतनी जल्दी शांत होने वाली नहीं थी। महज़ ५ मिनट के आराम के बाद मंदीप का लंड दोबारा लोहे की रॉड की तरह खड़ा होकर रीमा के पेट से टकराने लगा। मंदीप ने उसकी कलाई पकड़ी और कहा, “चलो रीमा… अब मैं तुम्हारी इस फुद्दी की गहराई नापता हूँ।”
उसने रीमा को बेड पर चित लेटाया, उसकी दोनों गोरी जाँघों को पूरा फैलाकर अपने कंधों पर टिकाया और अपने उस भारी लंड के कड़े सुपाड़े को उसकी फुद्दी के द्वार पर टिकाकर कमर का एक ज़ोरदार, सधा हुआ धक्का मारा। मंदीप का आधा लंड एक ही झटके में उसकी कसी हुई गहराई को चीरता हुआ अंदर धँस गया। ये कहानी आप हमारी वासना डॉट नेट पर पढ़ रहे है.
उस विशाल अंग की चौड़ाई झेलते ही रीमा के मुँह से दर्द की एक तीखी चीख निकल गई—”आआआआह्ह्ह्ह… मंदीप मर गई!” मंदीप ने अपनी गति रोकी और फिक्रमंदी से पूछा, “रीमा… क्या तुम्हें बहुत दर्द हो रहा है?” रीमा ने अपनी आँखें खोलते हुए हाँफकर कहा, “मंदीप बाबू… मेरी इस फुद्दी ने कई महीनों से कोई लंड नहीं खाया है, ऊपर से तुम्हारा यह मूसल इतना बड़ा है… इसीलिए जान निकल रही है, पर तुम रुकना मत… अपना काम जारी रखो।”
रीमा से यह मंज़ूरी मिलते ही मंदीप का हौसला बढ़ गया। उसने अपनी कमर पीछे खींची और पूरी ताकत से एक और आख़िरी मूसलधार धक्का मारा। इस बार उसका पूरा ९ इंच का लंड रीमा की चूत की आख़िरी दीवार को तोड़ता हुआ गर्भाशय से जा टकराया। लेकिन जैसे ही मंदीप ने नीचे देखा, बिस्तर की सफ़ेद चादर पर लाल खून की बूंदें बिखर चुकी थीं।
मंदीप ने चौंककर कहा, “रीमा… देखो, तुम्हारी फुद्दी में से खून निकल रहा है!” रीमा ने मजे और दर्द के उस मिले-जुले अहसास में अपनी गांड ऊपर उठाते हुए मंदीप के गले में हाथ डाले और मदहोश होकर बोली, “निकलने दो मेरे राजा… तुम्हारा यह लंड इतना बड़ा और मोटा है कि मेरी चूत के सारे पर्दे फट गए हैं… अब बिना रुके मुझे बुरी तरह पेलना शुरू करो!”
खून की उन लाल बूंदों को देखने के बाद मंदीप ने अपनी कमर को पीछे खींचा और पूरी ताकत से दोबारा धक्के लगाना चालू किया। शुरुआत के कुछ मिनटों के उस तीखे दर्द के बाद, रीमा के भीतर की जवानी मंदीप के उस ९ इंच के मोटे मूसल की आदी होने लगी।
अब उसे दर्द की जगह एक ऐसा बेइंतहा और अलौकिक मज़ा आने लगा था जो उसने अपनी पूरी ज़िंदगी में कभी महसूस नहीं किया था। वह बेड पर अपनी चौड़ी गांड को ऊपर उठा-उठाकर मंदीप के हर झटके का स्वागत करने लगी। कमरे में दोनों के नंगे बदन के टकराने की ‘थप-थप… थप-थप’ की भारी आवाज़ें गूँजने लगीं।
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रीमा अपनी आँखें आधी बंद किए, मुँह से लार टपकाते हुए मदहोश आवाज़ में चिल्ला रही थी—”ओह्ह्ह… ऊऊ… श्श्श्शसह… म्म्म्म्म्म… और डालो… और गहरे झटके मारो मंदीप! आज अपनी इस बीवी की फुद्दी को फाड़ दो… पूरी तरह तबाह कर दो मुझे!”
मर्यादा के सारे बंधन उस रात सहारनपुर की उस हवेली के बंद कमरे में पिघल चुके थे। दोनों के बीच यह भीषण और तूफ़ानी चुदाई बिना रुके पूरे ४० मिनट तक चलती रही। मंदीप पागलों की तरह उसे पेल रहा था और रीमा नीचे से अपनी चूत का पूरा पानी उसके लंड पर छोड़ रही थी।
४० मिनट बाद रीमा ने निढाल होते हुए मंदीप की पीठ पर हाथ रखा और कहा, “मंदीप राजा… अब बस करो, मेरा बदन टूट गया है।” पर मंदीप कहाँ मानने वाला था! ९ इंच का वह कड़ा हथियार अपनी पहली चुदाई के चरम पर था। उसने रीमा की दोनों टांगों को अपने कंधों पर और कस लिया और आख़िरी १० मिनट तक बिना रुके ऐसी ताबड़तोड़ ज़ोरदार मूसलधार बौछार की कि रीमा की फुद्दी पानी-पानी हो गई।
जब मंदीप की सांसें पूरी तरह फूल गईं और उसने हांफते हुए कहा, “रीमा… मैं झड़ने वाला हूँ!” तो रीमा ने अपनी जांघों से उसकी कमर को भींच लिया और चिल्लाई, “बाहर मत निकालना मेरे राजा… मेरी इस प्यासी फुद्दी के अंदर ही झाड़ दो अपना सारा माल!”
मंदीप ने एक आख़िरी, सबसे गहरा और ज़ोरदार धक्का मारा और अपना सारा गर्म, गाढ़ा वीर्य रीमा की चूत की गहराई में खाली कर दिया। झड़ते ही वह पूरी तरह निढाल होकर रीमा के उस गोरे, सुडौल जिस्म के ऊपर ही लेट गया। दोनों के पसीने आपस में मिल चुके थे।
वे काफी देर तक वैसे ही एक-दूसरे के आगोश में लेटे रहे। लेकिन वह रात इतनी जल्दी ख़त्म होने वाली नहीं थी; उस पूरी रात में दोनों ने कम से कम ८ बार अलग-अलग आसनों में एक-दूसरे को जी भरकर चोदा। उस ऐतिहासिक रात, देवर और भाभी का वह पुराना, संकोची रिश्ता हमेशा-हमेशा के लिए पीछे छूट गया, और उसकी जगह दो जवान रूहों और जिस्मों के मुकम्मल मिलन ने ले ली।
धड़कनों की रफ्तार तेज़ थी, और शब्दों की जगह सिर्फ दोनों की गर्म सांसों की सरगोशियों ने ले ली थी। समय का चक्र अपनी रफ़्तार से आगे बढ़ा और साल गुज़रते गए। रीमा, जो कभी अकेलेपन के अंधेरे में घुट रही थी, आज तीन खूबसूरत और चहकते बच्चों की माँ है।
उसके ये तीनों बच्चे किसी और का नहीं, बल्कि मंदीप के उसी ९ इंच के ताकतवर मूसल का अंश हैं, जिन्होंने उस उजाड़ घर में फिर से खुशियों की किलकारियां गूंजा दीं। आज जब सहारनपुर की उसी ऐतिहासिक हवेली के खुले आँगन में तीनों बच्चे एक साथ हंसते-खेलते दौड़ते हैं. ये कहानी आप हमारी वासना डॉट नेट पर पढ़ रहे है.
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तो रीमा रसोई से अदरक वाली कड़क चाय का कुल्हड़ लेकर आँगन में आती है। मंदीप अब भी दिनभर की भागदौड़ के बाद जब शाम को घर लौटकर आँगन के सोफे पर बैठता है, तो रीमा आज भी कभी-कभी पुरानी यादों को ताज़ा करते हुए उसे चिढ़ाती है और आँख मारते हुए धीरे से कहती है, “क्यों देवर जी… बहुत थक गए हो, थोड़ा बाम लगा दूँ?” मंदीप के होंठों पर एक गहरी और समझदार मुस्कान उभर आती है। वह आगे बढ़कर अपने सबसे छोटे बच्चे को अपनी मजबूत गोद में उठाता है.
रीमा की आँखों में छिपी उस रात की शरारत को देखता है और धीरे से फुसफुसाता है, “बाम की ज़रूरत तो उस पहली रात को चादर के नीचे ही हमेशा के लिए खत्म हो गई थी, मेरी बेगम!” दोनों एक-दूसरे की आँखों में देखते हुए खिलखिलाकर हंस पड़ते हैं, और उनका यह हंसता-खेलता, संतुष्ट परिवार इस बात का जीता-जागता गवाह बनता है कि अगर नियत साफ हो और रिश्तों में मर्यादा के साथ मुकम्मल समर्पण हो, तो उजाड़ और सूनी जिंदगी भी दोबारा खुशियों के इत्र से महक सकती है…
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