College Couple Fuck Story
सबको पता है कि जवानी बड़ी जालिम होती है। यह जाने लड़कों और लड़कियों से क्या-क्या करवा बैठती है। मुझे भी अपने कॉलेज के समय में एक लड़के से दोस्ती हो गई थी। उसका नाम हार्दिक था। हम लोग मिलने के लिए अक्सर एक झील के किनारे आते-जाते थे। यूँ तो वहाँ कितने ही जोड़े आते थे, पर वे सभी अपने आप में व्यस्त रहते थे। College Couple Fuck Story
हम लोग वहाँ बस कुछ खाते पीते थे और बस यूँ ही बतियाकर चले आते थे। पर हाँ, मेरे दिल में अब कुछ-कुछ होने लगा था। मैं आज से चार साल पहले चुदाई का लुत्फ उठा चुकी थी, पर फिर मैं डर गई थी कि यदि मुझे गर्भ रह जाता तो क्या होता? पर नहीं हुआ। फिर कुछ दिन और चुदवाया, पर सावधानी रखी।
आज फिर दिल में कुछ ऐसा ही हो रहा था। पर आजकल मैं भी औरों की तरह पिल्स के बारे में जानती थी, और साथ में रखती थी। एक दिन एक अच्छी हॉलीवुड मूवी देखने का हार्दिक ने प्रोग्राम बनाया। कहता था कि मस्त मूवी है… मजा आ जाएगा। कॉमेडी मूवी थी। मैं उसका मतलब खूब समझ रही थी।
वह हॉल में मुझसे खेलना चाहता था। जैसे ही मुझे यह लगा, मेरी चूत में पानी उतर आया। मैं मजे लेने के लिए तैयार थी। मेरी चूचियाँ मसलवाने के लिए तड़प उठीं। मेरी चूत में कोई उँगली करे… हाय, यह सोचकर मेरा शरीर वासना से भर उठा। हम दोनों हॉल में गए और एक कोने में बैठ गए… कम ही लोग थे।
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हार्दिक बहुत ही उत्तेजित लग रहा था। बार-बार मूवी की तारीफ कर रहा था। मुझे भी लगा कि जरूर मूवी अच्छी ही होगी। मूवी चालू हो चुकी थी। मुझे अंग्रेजी कम ही आती थी, सो चुपचाप बैठी रही। सो सब कुछ सर के ऊपर से निकल रहा था। जब सब हँसते तो मैं भी हँस देती थी। जोश में हार्दिक मुझे हँसते हुए कभी पीठ पर मार देता था, कभी कंधे पर।
पर अब तो उसने मेरा हाथ भी पकड़ लिया था। मुझे झुरझुरी आने लग गई थी। मैं अपने आप को हर प्रकार से तैयार कर चुकी थी। मुझे लगा कि वह जल्दी से मेरी चूचियाँ दबा दे… हाय राम… मेरी चूत में उँगली घुसाकर मस्त कर दे… पर मैंने कुछ कहा नहीं।
उसका हाथ और मेरा हाथ आपस में मिले हुए थे। वह कभी-कभी मेरा हाथ दबा देता था। अब धीरे से उसने अपना हाथ मेरे कंधे पर रख लिया। मुझे दिल में गुदगुदी सी हुई। मुझे लगा कि कुछ ही देर में वह मेरी चूचियों पर आ ही जाएगा। पर्दे पर चूमने का दृश्य चल रहा था।
उसने भी मुझे गले से खींचकर अपने पास कर लिया और चुम्मा ले लिया। मैं जानबूझकर उससे चिपक सी गई। हमारे सामने वाला जोड़ा, जो साइड में सामने बैठा था, बिना किसी हिचकिचाहट के लड़की के बोबे मसल रहा था और उसे चूम रहा था। मैं तो उन्हीं को देख-देखकर उत्तेजित हो रही थी। अचानक मुझे अब अपनी चूचियों पर दबाव महसूस हुआ। हार्दिक का हाथ मेरे स्तन को सहलाने लगा। हाय रे, मजा आ गया… मैं झुककर दोहरी हो गई।
“ना करो, हार्दिक… हाय हाथ हटा लो…” मैंने भी शरीफ लड़की की तरह नखरे दिखाए।
“अनुराधा, कितने कठोर हैं तुम्हारे बोबे… मस्त हैं यार…” हार्दिक वासना भरे स्वर में बोला।
“आह… बस करो…” मेरी सिसकी निकल पड़ी। पर हार्दिक कहाँ मानने वाला था। उसका वह हाथ ऊपर से मेरी ब्रा में घुस गया और मेरी नरम-नरम सी चूचियाँ मसलने लगा। उसने दूसरे हाथ से मेरा चेहरा ऊपर कर लिया और अपने होंठ मेरे होंठों से चिपका दिए।
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अब मेरा हाथ भी उसकी जाँघों पर रेंगने लगा था। मेरे निपल कड़े हो गए थे और वे उसकी उँगलियों के बीच में घुमा-घुमाकर मसले जा रहे थे। मेरा शरीर भी वासना से भर उठा। मैंने अपना सीना थोड़ा सा और उभार लिया ताकि वह मेरी चूचियाँ भली-भाँति दबा सके।
उसका कड़क लंड मेरे हाथों में आ चुका था। मैंने कोशिश करके उसकी जिप खोल दी। पर अंदर चड्डी के रूप में एक बाधा और थी। जल्दी ही यह बाधा भी मैंने पार कर ली और उसका मूसल जैसा लंड पकड़ ही लिया। गरम-गरम कड़ा डंडा। थोड़ा जोर लगाया तो वह पैंट से बाहर आ गया।
“हाय रे… यह तो बहुत मोटा है… देखो तो कैसा हो रहा है…” मैंने सिसकते हुए कहा।
उसके सुपाड़े के सिरे पर चिकनापन लग रहा था, शायद उत्तेजना में उसमें से चिकनाई बाहर आ गई थी। उसने भी अपना हाथ मेरी छातियों पर से हटाकर मेरी चूत पर रख दिया था। मेरी सलवार के अंदर हाथ घुसाकर मेरी गीली चूत को रगड़ दिया। ये कहानी आप हमारी वासना डॉट नेट पर पढ़ रहे है.
“मैं मर जाऊँगी रे… धीरे से करना…!” उसका हाथ जैसे ही मैंने अपनी चूत पर महसूस किया, उसे धीरे से समझा दिया। मेरी गीली चूत में उसकी उँगली उतरी जा रही थी। मैंने भी अपनी चूत को थोड़ा सा ऊपर उठाकर उसे उँगली घुसाने में सहायता की। मेरा जिस्म अब मीठी-मीठी गुदगुदी से भर चुका था।
“अनुराधा, चुदोगी क्या… मेरे लंड की हालत खराब हो रही है…” उसकी साँस फूली सी लगी। उसने मेरे मन की बात कह दी। चूत फड़क उठी।
“हाँ हार्दिक… चुदने को चूत बेताब हो रही है… पर कैसे…” सिसकती हुई सी बोली।
“मेरे घर चलें क्या? वहाँ कोई नहीं है… मस्ती से चुदना…”
“हाँ हाँ… जल्दी चलो…” और हम दोनों ने खड़े होकर अपने आप को ठीक किया और हॉल के बाहर आ गए। हार्दिक वहाँ से सीधे अपने घर ले गया… मैंने चेहरे पर कपड़ा बाँध लिया था कि कोई पहचाने न…। हार्दिक ने ताला खोला और हम जल्दी से अंदर आ गए।
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मुझे भी अब लग रहा था कि बस एक बार तबीयत से चुद जाऊँ तो मेरा जी हल्का हो जाएगा।
उसने मुझे चाय के लिए पूछा, पर यहाँ चाय की नहीं, चुदाने की लगी हुई थी।
“चाय छोड़ो ना हार्दिक, चलो बिस्तर पर चलते हैं…”
“अनुराधा… लगता है तुम्हारा बुरा हाल है… मेरे लंड को तो देखो, साला पैंट ही फाड़कर बाहर आ जाएगा।”
मुझे एकदम से हँसी आ गई। उसने पैंट की जिप खोलकर अपना लंड बाहर निकाल लिया। पहली बार इतने बड़े लंड के दर्शन हुए। मैं जैसे ही आगे बढ़ी, उसने मुझे रोक दिया।
“पहले अनुराधा तुम अपने कपड़े उतारो… तुम्हारी फुद्दी देखनी है…” हार्दिक ने फरमाइश कर दी। मैं शरमा गई।
“धत्त… शरम नहीं आएगी…?” मैंने नारी का धर्म अदा किया।
“शरम नहीं रे… नशा आएगा तुम्हें नंगी देखकर… लंड फड़फड़ाएगा… कड़का कड़क हो जाएगा…”
“हाय रे… ऐसा मत बोलो… तुम्हारा लंड देखकर ही मेरी फुद्दी तो वैसे ही लप-लप कर रही है…”
“तो प्लीज उतारो ना…” उसने अपना लंड मुझे दिखाते हुए मसला।
मुझे हालाँकि बड़ी शरम आ रही थी, पर इस दिल का क्या करूँ, सो झिझकते हुए मैंने कपड़े उतार ही दिए। पंखे की हवा मेरे नंगे बदन को सहलाने लगी। मैं शरम के मारे नीचे बैठ गई। पर नीचे बैठते ही मेरे चूतड़ उभरकर खिल उठे। दोनों तरबूज सी फाँकें अलग-अलग हो गईं। हार्दिक भी नंगा हो चुका था। उसका लंड मेरी गाँड देखकर फूल उठा। उसका तनतनाता हुआ बलिष्ठ लंड जैसे मेरी चूत को न्योता दे रहा था।
“अनुराधा तुम्हारा बदन तराशा हुआ है… जरा दोनों टाँगें चौड़ी करो… अपनी फूल जैसी चूत तो दिखा दो… यूँ सिकुड़कर मत बैठो।”
“हाय… नहीं जी… ऐसे तो सब दिख जाएगा ना…” फिर भी मैंने हिम्मत करके टाँगें चौड़ी करके अपनी गीली चूत खोल दी। हार्दिक मचल सा पड़ा।
“अनुराधा, लड़कियाँ मुठ कैसे मारती हैं… मारकर बताओ ना… चूत में उँगली करती हो ना…?”
“चलो हटो जी… मुझे क्या बेशर्म समझ रखा है… अच्छा तुम मुठ मारकर बताओ…”
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हार्दिक ने अपने मोटे से लंड की सुपाड़े पर से चमड़ी ऊपर हटाई और लंड को अपनी मुट्ठी में भर लिया और उसे पकड़कर हाथ ऊपर-नीचे चलाने लगा। उसका सुपाड़ा लाल होने लगा और फूलने लगा। मेरे दिल पर छुरियाँ चलने लगीं… हाय चूत की जगह मुठ में उसका लंड मसला जा रहा था।
उसके सुपाड़े पर चिकनाई की दो बूँदें तक उभर आई थीं। मेरा हाथ अपने आप ही चूत की तरफ बढ़ गया और दाने पर आ गया। उसे मैं हल्के-हल्के सहलाने लगी। मेरे मुँह से सिसकियाँ निकलने लगीं। मेरी उँगली भी चूत में घुसने लगी।
“हाँ… हाँ… अनुराधा, और करो… आपकी चूत कैसी लपलपा रही है…” उसकी आवाज में वासना भरी हुई थी।
मेरे बाल बिखर गए थे, लटें माथे पर लहराने लगी थीं। मेरी दोनों टाँगें काँपने लगी थीं। चूत में उँगली सटासट अंदर-बाहर जा रही थी। उधर मेरी नजरें हार्दिक पर पड़ीं, वह जोर-जोर से लंड पर हाथ चला रहा था। उसका सुपाड़ा लाल हो गया था, फूलकर मोटा हो चुका था। उसकी आँखें नशे में बंद सी हो गई थीं। हम दोनों एक-दूसरे को देखकर मुठ मारे जा रहे थे।
“हाय, हार्दिक और जोर से मुठ चलाओ, क्या लंड है राम… चला हाथ जोर से… आह्ह्ह्ह्ह.”
मैं ज्यों ही उठकर उसके पास पहुँची,
“अनुराधा, ऐसे ही मजा आ रहा है… तुम वहीं जाओ… तुम उधर मुठ मारो! मैं इधर मारता हूँ… चल घुसा दे फिर से अपनी उँगली…” उसकी साँस फूल उठी थी।
वह मना करता रहा, पर मैंने जाकर उसके लंड को अपने दोनों हाथों से पकड़ लिया और उसके लाल-लाल फूले हुए सुपाड़े पर उँगलियाँ फिराने लगी। उसके सुपाड़े को मलने से उसमें से चिकनाई की दो बूँदें और निकल आईं। आनंद में वह डूब रहा था। मुझे ऐसा करते देख उसने मेरी चूचियों को पकड़ लिया और उसे दबाने लगा और निपल को उँगलियों से हल्के-हल्के दबाने और घुमाने लगा।
मेरी मस्ती और वासना, मर्द के हाथों से मसले जाने से और बढ़ती गई। अब वह मेरे निपल जोर-जोर से मलने लगा था। मैं नशे में उसके लंड को जोर-जोर से मुठ मारने लगी थी। मेरे हाथ बहुत ही तेजी से उसके लंड पर ऊपर-नीचे हो रहे थे। उसकी सिसकियाँ बढ़ती जा रही थीं। ये कहानी आप हमारी वासना डॉट नेट पर पढ़ रहे है.
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अचानक उसने मेरी फुद्दी में अपनी दो उँगलियाँ डाल दीं और अंदर-बाहर करने लगा। इससे मेरी उत्तेजना तेजी से बढ़ने लगी, लगा कि चुद रही हूँ। मुख से आह की आवाजें निकलने लगीं। शायद हार्दिक को अहसास हुआ कि यदि ऐसे ही उसका लंड मेरे हाथों में फिसलता रहा तो उसका वीर्य निकल जाएगा।
उसने मुझे नीचे दबा लिया और मुझसे लिपट पड़ा। हमारे नंगे शरीर बिस्तर में आपस में रगड़ खाने लगे। उसका लंड मेरी चूत को ठोकर मारने लगा। मेरा मन सिहर उठा, लौड़ा लेने को आतुर हो उठा। मेरी चूत उसके लंड को लपकने की कोशिश कर रही थी, और अंत में सफल हो ही गई।
उसका लंड चूत में समाता चला गया। मेरे मुख से खुशी की सीत्कार निकल पड़ी। हार्दिक भी तड़प उठा। ऊपर से उसने अपने शरीर का बोझ मेरे पर डालना आरंभ कर दिया। मैं दबती गई। आनंद मेरे जिस्म में भरता गया। हार्दिक ने अब अपने चूतड़ ऊपर खींचकर फिर से मेरी चूत पर पटक दिए… उसका लंड मेरी चूत में जड़ तक चीरता हुआ घुस गया। मुझे थोड़ा सा दर्द हुआ, पर कसक भरी मिठास का अहसास अधिक हुआ।
“और जोर से चोद दे मेरे राजा… हाय… लंड पूरा घुसेड़ दे रे… मेरी माँ आआआअ…” मैं आनंद से सिसकने लगी।
“ले… मेरी अनुराधा… मेरा पूरा लंड ले ले… तू तो मजे की खान है रे…” वह मुझे भींच-भींचकर चोदने लगा।
मेरी चूचियों की हालत खींच-खींचकर खराब कर दी थी। मैं नीचे से जोर से अपने चूतड़ उछालकर लंड ले रही थी। साला क्या चूत में गुदगुदी मचा रहा था। उसका मोटा लंड मेरी चूत की दीवारों से रगड़ता हुआ चोद रहा था। अचानक मेरे शरीर में ऐंठन सी हुई और मुझे लगा कि मैं तो गई…।
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तेज मीठी सी आग भड़की और फिर जैसे पानी के ठंडे छींटे पड़े… मेरा रज छूट पड़ा। मेरी चूत पानी से भरने लगी। मेरी चूत लहरा-लहराकर जोर लगाकर पानी छोड़ रही थी। पर उसका लंड था कि मेरी चूत को रौंदे जा रहा था। मेरे मुख से अब मस्ती की सिसकियों की जगह दर्द की कराह निकल रही थी।
इतनी कसकर चुदाई मेरी आज तक नहीं हुई थी। पर आह्ह्ह रे… मेरी चूत में उसके लंड ने ठंडक कर दी। मुझसे लिपटते हुए उसने अपना वीर्य मेरी चूत में निकाल दिया। मैंने अपने दोनों हाथ फैला दिए और बिस्तर पर पसर गई। उसका लंड मेरी चिकनी चूत में से फिसलकर बाहर आने लगा।
उसके सिकुड़कर निकलने से मेरी चूत में गुदगुदी सी हुई और लंड बाहर आ गया। चुदने के कारण मैं मस्ती में बस आँखें बंद करके यूँ ही पड़ी थी। हार्दिक मेरे ऊपर से हट गया और मेरी चूत पर लगे वीर्य और चिकनाहट को चाटने लगा। उसके चाटने से मुझे चूत में फिर से गुदगुदी उठने लगी…
कुछ ही देर में मुझे फिर से तरावट आने लगी। मैंने हार्दिक को हटा दिया और उसके लंड पर लगे वीर्य का थोड़ा सा रस चाटने के लिए उसका लंड मुख में घुसा लिया और उसे चूसने लगी। कुछ ही देर में उसका लंड फिर से तनतना उठा। मैंने मुठ मारते हुए उसे और उत्तेजित किया। फिर सीधे खड़ी हो गई।
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“बस हार्दिक अब चलें… देखो शाम होने को है…”
“अच्छा… बस एक किस… फिर तुम्हें छोड़ आता हूँ।”
पर हार्दिक के मन की इच्छा कुछ और ही थी। मैं जैसे ही पलटी, वह मेरी पीठ से चिपक गया। उसका लंड मेरी गाँड में घुसने के लिए जोर लगाने लगा।
“अरे नहीं करो हार्दिक… मुझे लग जाएगी…”
“नहीं अनुराधा, तुम्हारी गाँड गजब की है… बिना मारे मुझे तो चैन नहीं आएगा!”
मेरी गाँड के छेद में लंड का घर्षण होने लग गया था। मैंने नाटक करते हुए अपनी दोनों टाँगें चौड़ी कर दीं। मुझे वास्तव में आनंद आने लगा था। अभी मेरा गाँड का छेद तो प्यासा था ही…
“अरे यार फट जाएगी ना तुम्हारे मोटे लंड से… हाय रे धीरे से करो…
आआईईईई… मर गई रे…”
उसका सुपाड़ा छेद में दाखिल हो चुका था। मुझे बड़ा सुहाना सा लगा। मैंने मुस्कुराकर पीछे हार्दिक को देखा, वह भी खुश था कि उसे एक कॉलेज गर्ल की ताजी गाँड मारने को मिल रही थी… हम दोनों ही मस्त हो रहे थे… पीछे से मेरी गाँड चुदी जा रही थी… हम दोनों खुशी में किलकारियाँ मार रहे थे… अपने चूतड़ों को हिला-हिलाकर चुदाई का मजा ले रहे थे… मस्ती में डूबे जा रहे थे।
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