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भाभी ने हम दोनों पति पत्नी को ट्रेनिंग दी

अक्टूबर 23, 2026 by hamari Leave a Comment

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हम लोग गाँव के रहने वाले हैं। हमारा गाँव शहर से पैंतालीस किलोमीटर दूर है। पास के ही एक शहर में भैया की शादी हो गयी। स्नेहा भाभी बहुत ही अच्छी थी और खूबसूरत भी। भैया की उम्र चौबीस साल की थी। वो उम्र में भैया से एक साल छोटी थी। मैं स्नेहा भाभी से उम्र में पाँच साल छोटा था। स्नेहा भाभी शहर की पढ़ी-लिखी और फैशनेबल युवती थीं। Suhagrat Anal Sex

शादी के बाद भैया की नौकरी लग गयी। वो लखनऊ में ही रहने लगे। वो खुद ही घर का सारा काम करते थे और खाना भी बनाते थे। जब उन्हें खाना बनाने में और घर का काम करने में दिक्कत होने लगी तो उन्होंने स्नेहा भाभी को भी लखनऊ बुला लिया। मम्मी तो थी नहीं, केवल पापा ही थे।

कुछ दिनों के बाद पापा का भी स्वर्गवास हो गया तो भैया ने मुझे अपने पास ही रहने के लिये बुला लिया। मैं उनके पास लखनऊ आ गया और वहीं रह कर पढ़ायी करने लगा। भाभी लखनऊ में रह कर बिल्कुल शहरी – माडर्न हो गयी थीं। वो खुद को कई किट्टी- पार्टियों और दूसरे सामाजिक सम्मेलनों में खुद को व्यस्त रखती थीं।

मैंने बी.ए. तक की पढ़ायी पूरी की और फिर नौकरी की तलाश में लग गया। अभी मुझे नौकरी तलाश करते हुए एक साल ही गुजरा था की भैया का रोड एक्सीडेंट में स्वर्गवास हो गया। उस समय मेरी उम्र इक्कीस साल की हो चुकी थी। अब तक मैं एक दम हट्टा कट्टा नौजवान हो गया था।

मैं बहुत ही ताकतवर भी था क्योंकि गाँव में कुश्ती भी लड़ता था। मुझे भैया की जगह पर नौकरी मिल गयी। अब घर पर मेरे और स्नेहा भाभी के अलावा कोई नहीं था। वो मुझसे बहुत प्यार करती थी। मैं भी उनकी पूरी देखभाल करता था और वो भी मेरा बहुत ख्याल रखती थी।

स्नेहा भाभी को भी एक कंपनी में सेक्रेटरी की नौकरी मिल गयी थी और साथ ही उनको ही घर का सारा काम करना पड़ता था इसलिये मैं भी उनके काम में हाथ बंटा देता था। वो मुझसे बार-बार शादी करने के लिये कहती थी। एक दिन स्नेहा भाभी ने शादी के लिये मुझ पर ज्यादा दबाव डाला तो मैंने शादी के लिये हाँ कर दी।

स्नेहा भाभी की एक सहेली थीं जो की उनके मायके के शहर में ही रहती थी। उनकी एक चचेरी छोटी बहन थी जिसका नाम दिव्या था। स्नेहा भाभी ने दिव्या के साथ मेरी शादी की बात चलायी। बात पक्की करने से पहले स्नेहा भाभी ने मुझे दिव्या की फोटो दिखा कर मुझसे पूछा, “कैसी है?”

मैं दिव्या की फोटो देख कर दंग रह गया। मैं समझता था की गरीब लड़की है, ज्यादा खूबसूरत नहीं होगी लेकिन वो तो बहुत ही खूबसूरत थी। मैंने हाँ कर दी। दिव्या की उम्र अभी बीस साल की ही थी। खैर शादी पक्की हो गयी। दिव्या के मम्मी-पापा बहुत गरीब थे। एक महीने के बाद ही हमारी शादी एक मंदिर में हो गयी।

शादी हो जाने के बाद दोपहर को स्नेहा भाभी मुझे और दिव्या को लेकर लखनऊ आ गयी। स्नेहा भाभी ने दिव्या को अच्छे से नये कपड़े वगैरह में फिर तैयार किया और पास के एक ब्यूटी पार्लर में उसका श्रृंगार इत्यादि भी करवाया।

घर पर कुछ पड़ोस के लोग बहू देखने आये। जिसने भी दिव्या को देखा, उसकी बहुत तारीफ की। शाम तक सब लोग अपने-अपने घर चले गये। रात के आठ बज रहे थे। स्नेहा भाभी ने मुझसे कहा, “आज मैं बहुत थक गयी हूँ। तुम जा कर होटल से खाना ले आओ।”

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मैंने कहा, “ठीक है!”

मैं खाना लाने के लिये चल पड़ा। मेरा एक दोस्त था — नितेश। उसका एक होटल था। मैं सीधा नितेश के पास गया।

नितेश बोला, “आज इधर कैसे?”

मैंने उससे सारी बात बता दी। वो मेरी शादी की बात सुनकर बहुत खुश हो गया। हम दोनों कुछ देर तक गपशप करते रहे। हम दोनों ने एक-दो पैग भी पिये। मुझे चिंता नहीं थी क्योंकि स्नेहा भाभी इस मामले में काफी खुले विचारों की थीं और खुद भी कई बार ड्रिंक करती थीं।

नितेश ने मुझसे कहा, “तुझे मज़ा लेना हो तो मैं एक तरीका बताता हूँ!”

मैंने कहा, “बताओ!”

वो बोला, “तुम दिव्या की चूत को कुछ दिन तक हाथ भी मत लगाना। तुम केवल उसकी गाँड मारना और अपने आप को काबू में रखना। कुछ दिन तक उसकी गाँड मारने के बाद तुम उसकी चुदाई करना।”

मैंने सोचा की नितेश ठीक ही कह रहा है। मैंने उससे कहा, “ठीक है, मैं ऐसा ही करूँगा!” उसने मेरे लिये सबसे अच्छा खाना जो की उसके होटल में बनता था, पैक करवा दिया। मैं खाना लेकर घर वापस आ गया। हम तीनों ने खाना खाया। स्नेहा भाभी ने दिव्या को मेरे रूम में पहुँचा दिया। उसके बाद उन्होंने मुझे अपने रूम में बुलाया।

मैंने देखा कि उनके पलंग के पास स्टूल पर एक शराब की बोतल खुली रखी थी और पास ही ग्लास में शराब भरी थी। मैंने पहले कभी भाभी के पास पूरी बोतल नहीं देखी थी। कभी अगर उन्हें पीने का मूड होता तो मुझसे कह कर पौव्वा या अद्धा ही मंगवाती थीं और वो भी हम दोनों शेयर करते थे क्योंकि हम दोनों को ही ज्यादा पीने की आदत नहीं थी।

मैंने कहा, “भाभी! ये क्या पूरी बोतल…? आप अकेले मत पी जाना… आपको कंट्रोल नहीं रहता…!”

वो बोलीं, “तू मेरी फिक्र मत कर… आज खुशी का दिन है… पर मैं ज्यादा नहीं पियुँगी… खैर तू ज़रूरी बात सुन…” और कहने लगी, “दिव्या अभी छोटी है… उसके साथ बहुत आराम से करना!”

मैंने मज़ाक किया, “मुझे करना क्या है?”

वो बोली, “शैतान कहीं का! तू तो ऐसे कह रहा है की जैसे कुछ जानता ही नहीं!”

मैंने कहा, “मुझे कुछ नहीं मालूम है!”

स्नेहा भाभी ने मुस्कुराते हुए कहा, “पहले उससे प्यार की दो बातें करना। उसके बाद अपने औज़ार पर ढेर सारा तेल लगा लेना। फिर अपना औज़ार उसके छेद में बहुत ही धीरे-धीरे घुसा देना। जल्दी मत करना नहीं तो वो बहुत चिल्लायेगी। वो अभी बीस साल की ही है.. समझ गये ना!”

मैंने कहा, “हाँ… मैं समझ गया।”

स्नेहा भाभी ने कहा, “अब जा अपने कमरे में।”

मैं अपने कमरे में आ गया। दिव्या बेड पर बैठी थी, मैं भी उसके बगल में बैठ गया।

मैंने उससे पूछा, “मैं तुम्हें पसंद हूँ?”

उसने अपना सिर हाँ में हिला दिया।

मैंने कहा, “ऐसे नहीं, बोल कर बताओ।”

उसने शर्माते हुए कहा, “हाँ!”

मैंने पूछा, “कहाँ तक पढ़ी हो?”

वो बोली, “केवल इंटर तक।”

मैंने कहा, “मेरी स्नेहा भाभी ने मुझे कुछ सिखाया है। क्या तुम्हें भी किसी ने कुछ सिखाया है?”

वो कुछ नहीं बोली तो मैंने कहा, “अगर तुम कुछ नहीं बोलोगी तो मैं बाहर चला जाऊँगा।”

इतना कह कर मैं खड़ा हो गया तो उसने मेरा हाथ पकड़ लिया। मैं उसकी बगल में बैठ गया।

मैंने कहा, “अब बताओ।”

वो कहने लगी, “मेरे घर पर केवल मेरे मम्मी पापा ही हैं। उन्होंने तो मुझसे कुछ भी नहीं कहा लेकिन मेरी दीदी जो मेरे ताऊजी की बेटी हैं, उन्होंने मुझसे कहा था की तुम्हारे पति जब अपना औज़ार तुम्हारे छेद में अंदर घुसायेंगे, तब बहुत दर्द होगा।

उस दर्द को बर्दाश्त करने की कोशिश करना। ज्यादा चींखना और चिल्लाना मत नहीं तो बड़ी बदनामी होगी। अपने पति से कह देना की अपने औज़ार पर ढेर सारा तेल लगा लेंगे। मैंने आज तक औज़ार नहीं देखा है। ये औज़ार क्या होता है?”

मैंने कहा, “तुमने आदमियों को पेशाब करते समय उनका डंडा देखा है?”

उसने कहा, “हाँ, हमारे मोहल्ले में तो सारे मर्द कभी भी कहीं भी पेशाब करने लगते हैं। आते जाते समय मैंने कईं बार देखा है। लेकिन उसे तो लंड कहते हैं।”

मैंने कहा, “उसी को औज़ार भी कहते हैं।”

वो बोली, “मैंने तो देखा है की किसी-किसी का बहुत बड़ा होता है।”

मैंने कहा, “जैसे आदमी कईं तरह के होते हैं… ठीक उसी तरह उनका औज़ार भी कईं तरह का होता है। मेरा औज़ार देखोगी?”

वो बोली, “मुझे शरम आती है।”

मैंने कहा, “अब तो तुम्हें हमेशा ही मेरा औज़ार देखना पड़ेगा। उसे हाथ में भी पकड़ना पड़ेगा। देखोगी मेरा औज़ार?”

वो बोली, “ठीक है, दिखा दो।”

मैं पहले से ही जोश में था। मैंने अपनी शर्ट और बनियान उतार दी। उसके बाद मैंने अपनी पैंट और चड्डी भी उतार दी। मेरा नौ लंबा और खूब मोटा लंड फनफनाता हुआ बाहर आ गया। मैंने अपना लंड उसके चेहरे के सामने कर दिया और कहा, “देख लो मेरा औज़ार!”

उसने तिरछी निगाहों से मेरे लंड को देखा और शर्माते हुए बोली, “तुम्हारा तो बहुत बड़ा है!” इतना कह कर उसने अपने हाथों से अपने चेहरे को ढक लिया। मैंने उसका हाथ पकड़ कर उसके चेहरे पर से हटा दिया और कहा, “शरमाती क्यों हो। जी भर कर देख लो इसे। अब तो सारी ज़िंदगी तुम्हें मेरा औज़ार देखना भी है और उसे अपने छेद के अंदर भी लेना है। मैंने तो अपने कपड़े उतार दिये हैं अब तुम भी अपने कपड़े उतार दो।”

वो बोली, “मैं अपने कपड़े कैसे उतार सकती हूँ, मुझे शरम आती है।”

मैंने कहा, “अगर तुम अपने कपड़े नहीं उतारोगी तो मैं अपना औज़ार तुम्हारे छेद में कैसे घुसाऊँगा?”

वो कुछ नहीं बोली। मैंने दिव्या के कपड़े उतारने शुरू कर दिये तो वो शरमाने लगी। धीरे-धीरे मैंने उसे एक दम नंगा कर दिया। सिर्फ मैंने उसके पैरों में से उसके सैंडल नहीं उतारे। स्नेहा भाभी काफी फैशनेबल थीं और अपने काम पर और घर में भी ज्यादातर समय ऊँची ऐड़ी के सैंडल पहने रहती थी.

और मुझे औरतों के सुंदर पैरों में ऊँची ऐड़ी के सैंडल देख कर अजीब सी उत्तेजना मिलती थी। किस्मत से दिव्या को भी भाभी ने ऊँची ऐड़ी के सैंडल पहना दिये थे। मैं उसके संगमरमर जैसे खूबसूरत बदन को देख कर दंग रह गया। उसकी चूचियाँ अभी बहुत बड़ी नहीं थीं।

मैंने उसे बेड पर लिटा दिया और उसकी चूचियों को सहलाते हुए उसे होंठों को चूमने लगा। मैंने देखा की उसकी चूत पर अभी बहुत हल्के-हल्के बाल ही उगे थे और उसकी चूत एकदम गुलाबी सी दिख रही थी। मैंने उसकी चूचियों को मसलना शुरू कर दिया तो वो बोली, “मुझे गुदगुदी हो रही है।”

मैंने पूछा, “अच्छा नहीं लग रहा है?”

वो बोली, “बहुत अच्छा लग रहा है।”

मैंने उसके निप्पलों को मुँह में लेकर चूसना शुरू कर दिया तो वो सिसकारियाँ भरने लगी। उसके बाद मैंने उसकी चूत को सहलाना शुरू कर दिया। उसे गुदगुदी होने लगी। उसने मेरा हाथ हटा दिया तो मैंने पूछा, “क्या हुआ?”

वो बोली, “बहुत जोर की गुदगुदी हो रही है।”

मैंने कहा, “अच्छा नहीं लग रहा है क्या?”

वो बोली, “अच्छा तो लग रहा है।”

मैंने कहा, “तुमने मेरा हाथ क्यों हटाया। अगर तुम ऐसा ही करोगी तो मैं बाहर चला जाऊँगा।”

वो बोली, “ठीक है, मैं अब तुम्हें कुछ भी करने से मना नहीं करूँगी।”

मैंने कहा, “फिर ठीक है।”

मैंने उसकी चूत को सहलाना शुरू कर दिया। थोड़ी ही देर में उसकी चूत गीली होने लगी। वो जोर-जोर से सिसकारियाँ भरने लगी। मैंने एक अँगुली उसकी चूत के अंदर डाल दी तो उसने जोर की सिसकरी ली। मेरा लंड अब तक बहुत ज्यादा टाइट हो चुका था। थोड़ी देर तक मैं उसकी चूत में अपनी अँगुली अंदर-बाहर करता रहा तो वो झड़ने लगी।

झड़ते समय उसने मुझे जोर से पकड़ लिया और बोली, “तुम्हारे अँगुली करने से मुझे तो पेशाब हो रहा है।”

मैंने कहा, “ये पेशाब नहीं है। जोश में आने के बाद चूत से पानी निकलता है।”

वो कुछ नहीं बोली। मेरी अँगुली उसकी चूत के पानी से एक दम गीली हो चुकी थी। थोड़ी ही देर में वो पूरे जोश में आ गयी तो मैंने कहा, “अब मैं अपना औज़ार तुम्हारे छेद में घुसाऊँगा। तुम पेट के बल लेट जाओ।”

वो पेट के बल लेट गयी। मैंने देखा की उसकी गाँड भी एक दम गोरी थी। उसकी गाँड का छेद बहुत ही हल्के भूरे रंग का था। मैं अपनी अँगुली उसकी गाँड के छेद पर फिराने लगा। उसके बाद मैंने एक झटके से अपनी एक अँगुली उसकी गाँड में घुसा दी। वो जोर से चीखी। ये कहानी आप हमारी वासना डॉट नेट पर पढ़ रहे है.

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मैंने कहा, “अगर तुम ऐसे चींखोगी तो स्नेहा भाभी आ जायेगी।”

वो बोली, “दर्द हो रहा है।”

मैंने कहा, “दर्द तो होगा ही। अभी तो मैं अपना लंड तुमहारी गाँड में घुसाऊँगा।”

थोड़ी देर तक मैं अपनी अँगुली उसकी गाँड में अंदर-बाहर करता रहा। वो बोली, “मेरा छेद तो बहुत ही छोटा है और तुम्हारा औज़ार बहुत बड़ा। अंदर कैसे घुसेगा?”

मैंने कहा, “जैसे और औरतों के अंदर घुसता है।”

वो बोली, “तब तो मुझे बहुत दर्द होगा।”

मैंने कहा, “इसी लिये तो तुम्हारी दीदी ने तुमसे कहा था की दर्द को बर्दाश्त करना, ज्यादा चींखना चिल्लाना मत।”

वो बोली, “मैं समझ गयी।”

मैं उसके ऊपर आ गया तो वो बोली, “तेल नहीं लगाओगे?”

मैंने कहा, “लगाऊँगा।”

मैंने अपने लंड पर ढेर सारा तेल लगा लिया। उसके बाद मैंने उसकी गाँड के छेद पर अपने लंड का सुपाड़ा रखा और उससे कहा, “अब तुम अपना मुँह जोर से दबा लो जिस से तुम्हारे मुँह से चींख ना निकले।”

उसने कहा, “ठीक है, दबा लेती हूँ लेकिन बहुत धीरे-धीरे घुसाना।”

मैंने कहा, “हाँ, मैं बहुत धीरे ही घुसाऊँगा।”

उसने अपने हाथों से अपने मुँह को दबा लिया। मैंने थोड़ा सा ही जोर लगाया था कि वो जोर से चींखी। मेरे लंड का सुपाड़ा भी अभी उसकी गाँड में नहीं घुस पाया था। वो रोने लगी और बोली, “मुझे छोड़ दो, बहुत दर्द हो रहा है।”

मैंने कहा, “दर्द तो होगा ही। तुम अपना मुँह जोर से दबा लो।”

उसने अपना मुँह फिर से दबा लिया तो मैंने इस बार कुछ ज्यादा ही जोर लगा दिया। वो दर्द से तड़पते हुए जोर-जोर से चींखने लगी, “दीदी, बचा लो मुझे, नहीं तो मैं मर जाऊँगी।”

इस बार मेरे लंड का सुपाड़ा उसकी गाँड में घुस गया। उसकी गाँड से खून निकल आया था। वो इतने जोर-जोर से चींख रही थी की मैं थोड़ा सा डर गया। मैंने एक झटके से अपना लंड बाहर खींच लिया। पक की आवाज़ के साथ मेरे लंड का सुपाड़ा उसकी गाँड से बाहर आ गया। मैंने उसे चुप कराते हुए कहा, “अगर तुम ऐसे ही चिल्लाओगी तो काम कैसे बनेगा?”

वो बोली, “मैं क्या करूँ, बहुत दर्द हो रहा था।”

मैंने कहा, “थोड़ा सब्र से काम लो। फिर सब ठीक हो जायेगा। अब तुम अपना मुँह दबा लो, मैं फिर से कोशिश करता हूँ।”

उसने अपना मुँह दबा लिया तो मैंने फिर से अपने लंड का सुपाड़ा उसकी गाँड के छेद पर रख दिया। उसके बाद मैंने उसकी कमर के नीचे से हाथ डाल कर उसे जोर से पकड़ लिया। फिर मैंने पूरी ताकत के साथ जोर का धक्का मारा। वो बहुत जोर-जोर से चिल्लाने लगी।

वो मेरे नीचे से निकलना चाहती थी लेकिन मैंने उसे बुरी तरह से जकड़ रखा था। मेरा लंड इस धक्के के साथ उसकी गाँड में तीन इंच तक घुस गया। वो जोर-जोर से चिल्लते हुए स्नेहा भाभी को पुकार रही थी, “दीदी! बचा लो मुझे नहीं तो ये मुझे मार डालेंगे। बहुत दर्द हो रहा है।”

तभी कमरे के बाहर से स्नेहा भाभी की आवाज़ आयी, “संजीव, क्या हुआ? दिव्या इतना क्यों चिल्ला रही है?”

मैंने कहा, “मैं अपना औज़ार अंदर घुसा रहा था लेकिन ये मुझे घुसाने ही नहीं दे रही है। बहुत चिल्ला रही है।”

स्नेहा भाभी ने कहा, “तुम दोनों बाहर आ जाओ। मैं दिव्या को समझा देती हूँ।”

मैंने लूँगी पहन ली और दिव्या से कहा, “बाहर चलो… स्नेहा भाभी बुला रही है।”

वो उठना चाहती थी लेकिन उठ नहीं पा रही थी। मैंने उसे सहारा दे कर खड़ा किया। उसने केवल अपनी साड़ी बदन पर लपेट ली। मैं उसे सहारा दे कर बाहर ले आया क्योंकि वो दर्द के मारे ठीक से चल भी नहीं पा रही थी। साथ ही उसे ऊँची ऐड़ी के सैंडल पहनने की आदत भी नहीं थी।

स्नेहा भाभी ने दिव्या से पूछा, “इतना क्यों चिल्ला रही थी?”

वो रोते हुए स्नेहा भाभी से कहने लगी, “ये अपना औज़ार मेरे छेद में घुसा रहे थे इस लिये मुझे बहुत दर्द हो रहा था।”

स्नेहा भाभी ने कहा, “पहली-पहली बार दर्द तो होगा ही। सभी औरतों को होता है। ये कोई नयी बात थोड़े ही है।” स्नेहा भाभी ने मुझसे कहा, “मैंने तुझसे कहा था ना की तेल लगा कर धीरे-धीरे घुसाना।”

मैंने कहा, “मैं तेल लगा कर धीरे-धीरे ही घुसाने की कोशिश कर रहा था। जैसे ही मैंने थोड़ा सा जोर लगाया और मेरे औज़ार का टोपा ही इसके छेद में घुसा कि ये जोर-जोर से चिल्लाने लगी। इसके चिल्लाने से मैं डर गया और मैंने अपना औज़ार बाहर निकाल लिया।

उसके बाद मैंने इसे समझाया तो ये राज़ी हो गयी। मैंने फिर से कोशिश की तो ये फिर जोर-जोर से चिल्लाने लगी और मेरा औज़ार केवल जरा सा ही अंदर घुस पाया। तभी आप ने हम दोनों को बुलाया और हम बाहर आ गये।”

स्नेहा भाभी ने कहा, “इसका मतलब तुमने अभी तक कुछ भी नहीं किया?”

मैंने कहा, “बिल्कुल नहीं! तुम चाहो तो दिव्या से पूछ लो!”

स्नेहा भाभी ने दिव्या से पूछा, “क्या ये सही कह रहा है?”

उसने अपना सिर हाँ में हिला दिया।

स्नेहा भाभी ने दिव्या से कहा, “तुम कमरे में जाओ। मैं इसे समझा बुझा कर भेजती हूँ।”

दिव्या कमरे में चली गयी। मैंने देखा कि स्नेहा भाभी की आँखें नशे में लाल-सी थीं और उन्होंने अभी तक अपने कपड़े नहीं बदले थे। उन्होंने मुझे समझाते हुए कहा, “इस बार बहुत ही धीरे-धीरे घुसाना नहीं तो मैं बहुत मारूँगी।”

मैंने कहा, “मैं तो बहुत धीरे-धीरे ही घुसा रहा था लेकिन इसका छेद भी तो बहुत छोटा है।”

स्नेहा भाभी ने कहा, “फिर तो ऐसे काम नहीं बनेगा। तुम इसके साथ थोड़ी सी जबरदस्ती करना लेकिन ज्यादा जबरदस्ती मत करना। ये अभी बीस साल की है… इस लिये इसे ज्यादा दिक्कत हो रही है।”

मैंने कहा, “ठीक है।”

इतना कह कर स्नेहा भाभी मुस्कुराने लगी। मैं कमरे में आ गया और मैंने अपनी लूँगी उतार दी। मैंने दिव्या से अपनी साड़ी उतारने को कहा तो उसने इस बार खुद ही अपनी साड़ी उतार दी। साड़ी उतारने के बाद दिव्या खुद ही बेड पर सैंडल पहने हुए पेट के बल लेट गयी। मैंने अपने लंड पर ढेर सारा तेल लगाया और उसके ऊपर आ गया।

उसके बाद मैंने जैसे ही अपने लंड का सुपाड़ा उसकी गाँड के छेद पर रखा तो उसने अपना मुँह दबा लिया। उसके बाद मैंने थोड़ा सा जोर लगाया तो इस बार वो ज्यादा जोर से नहीं चींखी। मेरे लंड का सुपाड़ा उसकी गाँड में घुस गया। मैंने अपने लंड के सुपाड़े को उसकी गाँड में अंदर बाहर करना शुरू कर दिया तो वो आहें भरने लगी।

थोड़ी देर के बाद जैसे ही मैंने थोड़ा सा जोर लगाया तो उसने जोर की आह भरी और मेरा लंड उसकी गाँड में दो इंच तक घुस गया। मैंने थोड़ा जोर और लगाया तो वो जोर-जोर से चिल्लाने और रोने लगी। मेरा लंड बहुत मोटा था ही। अब तक उसकी गाँड में तीन इंच ही घुस पाया था। ये कहानी आप हमारी वासना डॉट नेट पर पढ़ रहे है.

मैं रुक गया लेकिन वो दर्द के मारे अभी भी बहुत जोर-जोर से चिल्ला रही थी। मुझे गुस्सा आ गया तो मैंने जोर का एक धक्का लगा दिया। इस धक्के के साथ ही मेरा लंड उसकी गाँड में चार इंच तक घुस गया। वो और ज्यादा जोर-जोर से चिल्लाने लगी, “दीदी, बचाओ मुझे। मैं मर जाऊँगी।”

उसके चिल्लाने की आवाज़ सुनकर स्नेहा भाभी ने बाहर से पूछा, “अब क्या हुआ?”

वो रोते हुए कहने लगी, “दीदी, मुझे बचा लो नहीं तो मैं मर जाऊँगी।”

स्नेहा भाभी ने कहा, “अच्छा तुम दोनों बाहर आ जाओ।”

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मैंने अपना लंड उसकी गाँड से बाहर निकाला और हट गया। मेरे लंड पर ढेर सारा खून लगा हुआ था। उसके बाद हम दोनों ने कपड़े पहने और बाहर आ गये। दिव्या ठीक से चल नहीं पा रही थी। मैं उसे सहारा देकर बाहर ले आया। बाहर आने के बाद स्नेहा भाभी दिव्या को समझाने लगी, “देखो दिव्या अगर तुम ऐसे ही चिल्लाओगी तो काम कैसे बनेगा। हर औरत को पहली-पहली बार दर्द होता है और उसे उस दर्द को बर्दाश्त करना पड़ता है।”

दिव्या रो-रो कर कहने लगी, “दीदी, मैंने अपने आप को संभालने की बहुत कोशिश की… लेकिन मैं दर्द को बर्दाश्त नहीं कर पायी, इसलिये मेरे मुँह से चींख निकल गयी। इनका औज़ार भी तो बहुत बड़ा है।”

स्नेहा भाभी ने कहा, “औज़ार तो सबका बड़ा होता है। लेकिन एक बार जब अंदर घुस जाता है फिर कभी भी बड़ा नहीं लगाता। उसके बाद हर औरत को मज़ा आता है और तुम्हें भी आयेगा।”

दिव्या बोली, “दीदी, मेरी बात पर विश्वास करो, इनका औज़ार बहुत बड़ा है। मैंने बहुत से आदमियों को पेशाब करते समय देखा है लेकिन इनके जैसा औज़ार मैंने आज तक कभी नहीं देखा। तुम चाहो तो खुद ही देख लो, तुम्हें मेरी बात पर विश्वास हो जायेगा।”

स्नेहा भाभी के हाथ में शराब का भरा ग्लास था। उन्होंने एक घूँट पीते हुए मुझसे कहा, “संजीव, दिखा तो सही अपना औज़ार। जरा मैं भी तो देखूँ कि ये बार-बार क्यों तेरे औज़ार को बहुत बड़ा कह रही है।”

मैंने कहा, “भाभी, मुझे शरम आती है।”

स्नेहा भाभी ने कहा, “मैं तो तेरी भाभी हूँ, मुझसे कैसी शरम। अपना औज़ार बाहर निकाल कर दिखा मुझे।”

मैंने शर्माते हुए अपनी लूँगी खोल दी। मेरा लंड पहले से ही खड़ा था। मेरा नौ इंच लंबा और खूब मोटा लंड फनफनाता हुआ बाहर आ गया। उस पर खून भी लगा हुआ था। स्नेहा भाभी ने जैसे ही मेरा लंड देखा तो उन्होंने अपना हाथ मुँह पर रख लिया और बोली, “बाप रे! तेरा औज़ार सचमुच बहुत ही बड़ा है। मैंने भी ऐसा औज़ार तो कभी देखा ही नहीं था। अब मेरी समझ में आया की दिव्या क्यों इतना चिल्लाती है।”

मैंने देखा की स्नेहा भाभी की आँखें जो पहले से नशे में लाल थीं, अब मेरे लंड को देख कर चमक उठी थीं। उन्हें भी जोश आने लगा था क्योंकी मेरा लंड देखने के बाद उन्होंने गटागट अपना ग्लास खाली किया और अपना एक हाथ अपनी चूत पर रख लिया था।

मैंने कहा, “भाभी, तुम ही बताओ मैं क्या करूँ। मैं अपना औज़ार छोटा तो नहीं कर सकता।”

स्नेहा भाभी ने दिव्या से कहा, “इसका औज़ार तो सच में बहुत बड़ा है। तुम्हें दर्द को बर्दाश्त करना ही पड़ेगा नहीं तो बड़ी बदनामी होगी।” स्नेहा भाभी ने दिव्या को बहुत समझाया तो वो मान गयी। स्नेहा भाभी ने दिव्या से कहा “अब तुम अपने कमरे में जाओ। मैं इसे समझा बुझा कर तुम्हारे पास भेज देती हूँ।”

दिव्या कमरे में चली गयी। रात के दो बज रहे थे। स्नेहा भाभी ने फिर अपने ग्लास में शराब ले ली और दो घूँट पी कर मुस्कुराते हुए मुझसे कहने लगी, “देवर जी, तुम्हारा औज़ार तो वाकई बहुत ही बड़ा है और शनदार भी। मैंने आज तक अपनी ज़िंदगी में ऐसा औज़ार कभी नहीं देखा था। मेरा मन इसे हाथ में पकड़ कर देखने को कह रहा है, देख लूँ?” उनकी आवाज़ नशे में काँप रही थी।

मैंने कहा, “भाभी, आप क्या कह रही हो…? आज आपने बहुत ज्यादा पी ली है और आप नशे में हो।”

वो बोली, “तुम्हारे भैया को गुजरे हुए एक साल हो गया। आखिर मैं भी तो औरत हूँ और जवान भी। मेरा मन भी कभी-कभी इधर-उधर होने लगाता है। तुम तो मेरे देवर हो। हर औरत अच्छे औज़ार को पसंद करती है। मुझे भी तुम्हारा औज़ार बहुत ही अच्छा लग रहा है। अगर मैं तुमसे लग जाती हूँ तो मेरी भी इच्छा पूरी हो जायेगी और किसी को कुछ पता भी नहीं चलेगा।”

इतना कह कर उन्होंने मेरा लंड पकड़ लिया और सहलाने लगी। मैं भी आखिर मर्द ही था। मुझे स्नेहा भाभी का लंड सहलाना बहुत अच्छा लगने लगा इसलिये मैं कुछ नहीं बोला। थोड़ी देर तक मेरा लंड सहलाने के बाद वो बोली, “तुमने अभी तक सुहागरात का मज़ा भी नहीं लिया है और मैं समझती हूँ की तुम भी एक दम भूखे होगे। मेरी इच्छा पूरी करोगे?”

मैंने कहा, “अगर तुम कहती हो भला मैं कैसे इनकार कर सकता हूँ। आखिर मैं भी तो मर्द हूँ और तुम्हारे सिवा मेरा इस दुनिया में और कौन है।”

वो बोली, “फिर तुम यहीं रुको, मैं अभी आती हूँ।”

इतना कह कर स्नेहा भाभी दिव्या के पास चली गयी। मैंने देखा की वो काफी नशे में थीं और उनके कदम लड़खड़ा रहे थे। ऊँची ऐड़ी के सैंडलों में उन्हें डगमगाते देख मेरे लंड में एक लहर सी दौड़ गयी। उन्होंने दिव्या से कहा, “अब तुम सो जाओ। रात बहुत हो चुकी है। मैं संजीव को सब कुछ समझा दूँगी। उसके बाद मैं उसे सुबह तुम्हारे पास भेज दूँगी। मैं बाहर से दरवाजा बंद कर देती हूँ।”

दिव्या बोली, “ठीक है, दीदी।”

स्नेहा भाभी दिव्या के कमरे से बाहर आ गयी और उन्होंने दिव्या के कमरे का दरवाजा बाहर से बंद कर लिया। उसके बाद वो मुझे अपने कमरे में ले गयी। मेरे बदन पर कुछ भी नहीं था। लूँगी तो मैंने पहले ही उतार दी थी। कमरे में पहुँचते ही स्नेहा भाभी ने कहा, “देवर जी, तुमने अपना औज़ार इतने दिनों तक कहाँ छिपा रखा था। बड़ा ही प्यारा औज़ार है तुम्हारा।”

मैंने कहा, “मैंने कहाँ छिपाया था, यहीं तो था तुम्हारे पास।”

वो स्टूल से शराब की बोतल उठा उसपे सीधे मुँह लगा कर पीते हुए बोली, “मेरे पास आओ।”

मैं उनके नज़दीक चला गया और बोला “भाभी… आपको मैंने इतनी ज्यादा शराब पीते हुए पहले नहीं देखा… मुझे भी एक पैग दो ना।”

उन्होंने मेरा लंड पकड़ लिया और सहलाते हुए बोली, “देवर जी… आज तो बहुत ही खास दिन है… मैं बस मदहोश हो जाना चाहती हूँ पर तुझे नहीं दूँगी… मुझे पता है तू पहले से पी कर आया था.. और तू मर्द है… थोड़ी सी भी ज्यादा हो गयी तो तेरा ये बेहतरीन औज़ार ठंडा पड़ जायेगा।”

फिर वो कहने लगी, “मैंने आज तक ऐसा औज़ार कभी नहीं देखा था। हर औरत अच्छा औज़ार पसंद करती है। मुझे तो तुम्हारा औज़ार बहुत पसंद आ गया है। आज मैं तुमसे लग जाती हूँ। तुमसे चुदवाने में मुझे बहुत मज़ा आयेगा। लेकिन जैसे तुमने दिव्या के साथ किया था उस तरह मेरे साथ मत करना नहीं तो मुझे भी बहुत तकलीफ़ होगी और मेरे मुँह से भी चींख निकल जायेगी। दिव्या पास के ही कमरे में है, इसका ख्याल रखना।”

मैंने कहा, “अच्छा।”

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थोड़ी देर तक स्नेहा भाभी मेरा लंड सहलाती रही और शराब पीती रही। उसके बाद उन्होंने भी अपने कपड़े उतार दिये और एक दम नंगी हो गयी। स्नेहा भाभी भी बहुत ही खूबसूरत थी। वो अपने सैंडल उतारने लगी तो मैंने उन्हें रोका। वो मुस्कुराते हुए बोली, “तो तू भी अपने भैया की तरह औरतों के ऊँची ऐड़ी के सैंडल देख कर उत्तेजित होता है…?”

मैं थोड़ा सा शरमाया तो वो बोली, “शर्माता क्यों है… ज्यादातर मर्दों को ऊँची ऐड़ी के सैंडल पहनी औरतें उत्तेजक लगती हैं… इसी लिये तो मैं हरदम ऊँची ऐड़ी के सैंडल पहने रहती हूँ।” उसके बाद वो सैंडल पहने हुए ही बेड पर लेट गयी और बोली, “अब थोड़ा सा तेल अपने लंड पर लगा लो और आ जाओ।”

मैंने कहा, “क्या भाभी, आपने तो भैया से बहुत बार चुदवाया है, आप मुझसे तेल लगाने को कह रही हैं? बिना तेल के ज्यादा मज़ा आयेगा!”

वो बोली, “फिर देर किस बात की… आ जाओ।”

मैं स्नेहा भाभी के पैरों के बीच आ गया।

स्नेहा भाभी ने कहा, “आराम से घुसाना, जल्दी मत करना। जब मैं रोकूँगी तो रुक जाना।”

मैंने कहा, “ठीक है।”

वो बोली, “चलो अब धीरे-धीरे अंदर घुसाओ।”

मैंने अपने लंड का सुपाड़ा स्नेहा भाभी की चूत के मुँह पर रख दिया और धीरे-धीरे अपना लंड स्नेहा भाभी की चूत में घुसाने लगा। जैसे ही मेरे लंड का सुपाड़ा स्नेहा भाभी की चूत में घुसा तो उनके मुँह से आह निकल गयी। उनकी चूत मुझे ज्यादा टाइट लग रही थी। ये कहानी आप हमारी वासना डॉट नेट पर पढ़ रहे है.

मेरा लंड आसानी से घुस नहीं पा रहा था। मैं जोर लगा कर धीरे-धीरे अपना लंड स्नेहा भाभी की चूत में घुसाने लगा। स्नेहा भाभी आहें भरती रही। जब मेरा लंड पाँच इंच तक घुस गया तो दर्द के मारे उनका बुरा हाल होने लगा लेकिन उन्होंने मुझे रोका नहीं।

उन्होंने अपने होंठों को जोर से जकड़ लिया था। मैं जोर लगाता रहा। जब मेरा लंड स्नेहा भाभी की चूत में छः इंच तक घुस गया तो वो बोली, “अब रुक जाओ!” मैं रुक गया तो वो बोली, “बहुत दर्द हो रहा है। अब बर्दाश्त करना मुश्किल है। कितना बाकी है अभी?”

मैंने कहा, “तीन इंच।”

वो बोली, “अब और ज्यादा अंदर मत घुसाना। धीरे-धीरे चुदाई करना शुरू कर दो।”

मैंने धीरे-धीरे स्नेहा भाभी की चुदाई शुरू कर दी। उनकी चूत ने मेरे लंड को बुरी तरह से जकड़ रखा था। वो आहें भरती रही। मुझे भी खूब मज़ा आ रहा था। आज मैं किसी औरत को पहली बार चोद रहा था। पाँच मिनट की चुदाई के बाद स्नेहा भाभी झड़ गयी। उन्होंने बहुत दिनों से चुदवाया नहीं था इसलिये उनकी चूत से ढेर सारा जूस निकला।

उनकी चूत और मेरा लंड एक दम गीले हो गये तो उन्होंने कहा, “अब धीरे-धीरे बाकी का भी घुसा दो।” मैंने इस बार थोड़ा ज्यादा ही जोर लगा दिया तो वो अपने आप को रोक नहीं पायी। उनके मुँह से चींख निकल ही गयी लेकिन उन्होंने तुरंत ही खुद को संभाल लिया। मैंने इस बार एक धक्का लगा दिया तो वो दर्द के मारे तड़पने लगी और बोली, “अब कितना बाकी है?”

मैंने कहा, “एक इंच।”

वो बोली, “अब चोदो मुझे, बाकी का चुदाई करते समय घुसा देना।”

मैंने स्नेहा भाभी की चुदाई शुरू कर दी। मुझे खूब मज़ा आ रहा था। स्नेहा भाभी दर्द के मारे आहें भर रही थी। जैसे-जैसे समय गुजरता गया वो शाँत होती गयी। अब उन्हें भी मज़ा आने लगा था। तभी मैंने एक धक्का लगा कर बाकी का लंड भी उनकी चूत में घुसा दिया। वो चींख उठी और बोली, “पूरा घुस गया?”

मैंने कहा, “हाँ।”

वो बोली, “अब जोर-जोर से चोदो। तुम तो गाँव में कुश्ती लड़ा करते थे ना?”

मैंने कहा, “हाँ।”

वो बोली, “अब तुम मेरी चूत के साथ कुश्ती लड़ो। मेरी चूत को अपने लंड का दुश्मन समझ लो और मेरी चूत पर अपने लंड से खूब जोर-जोर से वार करो। फाड़ देना आज इसको।”

मैंने कहा, “अगर फाड़ दूँगा तो बाद में मज़ा कैसे आयेगा?”

वो बोली, “तुम इसका मतलब नहीं समझे। मैं सचमुच फाड़ने को थोड़े ही कह रही हूँ।”

मैंने बहुत ही जोर-जोर के धक्के लगाते हुए स्नेहा भाभी को चोदना शुरू कर दिया। स्नेहा भाभी तो बहुत ही सैक्सी निकलीं। वो हर धक्के के साथ अपने चूतड़ उछाल-उछाल कर मुझसे चुदवा रही थी। पूरा बेड जोर-जोर से हिल रहा था। कमरे में धप-धप की आवाज़ हो रही थी।

उनकी चूत से भी चप-चप की आवाज़ निकल रही थी। मैं भी पूरे जोश में था और वो भी। पाँच मिनट की चुदाई के बाद वो फिर से झड़ गयी लेकिन मैं रुका नहीं। मैं खूब जोर-जोर के धक्के लगाते हुए उनकी चुदाई कर रहा था।

वो पूरी तरह से मस्त हो चुकी थी और अपनी चूचियों को अपने हाथों से मसल रही थी। थोड़ी देर की चुदाई के बाद मैं झड़ गया। स्नेहा भाभी भी मेरे साथ ही साथ फिर से झड़ गयी। मैंने अपना लंड उनकी चूत से बाहर निकाला तो मेरे लंड पर खून भी लगा हुआ था।

स्नेहा भाभी ने कहा, “देख लिया तुमने अपने लंड की करतूत। इसने मुझ जैसी चुदी चुदाई औरत की चूत से भी खून निकाल दिया।”

उन्होंने मेरे लंड को कपड़े से साफ़ कर दिया। उसके बाद मैं उनके बगल में लेट गया। वो मेरे होंठों को चूमने लगी और बोली, “देवर जी, आज तो तुमने मुझे ऐसा मज़ा दिया है की मैं क्या बताऊँ। ऐसा मज़ा तो मुझे आज तक कभी नहीं मिला।”

मैंने कहा, “भाभी… आप इतने नशे में हो… इसलिये इतनी तारीफ कर रही हो।”

भाभी बोलीं, “अरे मेरे बेवकूफ देवर जी, नशे में जरूर हूँ पर गलत नहीं कह रही… बल्कि नशे में तो मज़ा दोगुना हो गया।”

मैंने फिर कहा, “मैं दिव्या का क्या करूँ?”

वो बोली, “मैंने तुम्हारे भैया से इतने सालों तक चुदवाया था… फिर भी मुझे तुम्हारा लंड अपनी चूत के अंदर लेने में बहुत तकलीफ़ हुई। दिव्या अभी बहुत छोटी है। जरा सोचो की उसे कितनी तकलीफ होती होगी।”

मैंने कहा, “तब तुम ही बताओ मैं क्या करूँ। क्या मैं दिव्या को छोड़ कर केवल तुम्हारी चुदाई करूँ?”

वो बोली, “मैं ऐसा थोड़े ही कह रही हूँ। अब की बार जब तुम दिव्या की चुदाई करना तो उसके ऊपर जरा सा भी रहम मत करना। वो चाहे कितनी भी चींखे या चिल्लाये… अपना पूरा का पूरा लंड अंदर घुसा देना। उसकी चींख मुझे सुनायी पड़ेगी… तुम इसकी परवाह मत करना।”

मैंने कहा, “ठीक है, मैं ऐसा ही करूँगा।”

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वो बोली, “थोड़ी देर आराम कर लो। उसके बाद दिव्या के पास जाओ। अब की बार हार नहीं मानना। पूरा का पूरा घुसा देना भले ही वो कितना भी चींखे या चिल्लाये। हो सके तो उसे भी थोड़ी सी शराब पिला दो… उसे तकलीफ कुछ कम होगी और बाद में मज़ा भी ज्यादा आयेगा।”

मैंने कहा, “मैं ऐसा ही करूँगा।”

सुबह के पाँच बजने वाले थे। थोड़ी देर आराम करने के बाद मैं दिव्या के पास चला गया। दिव्या सो रही थी। मैंने उसे जगाया तो वो उठ गयी। मैंने उससे कहा, “जा कर तेल की शीशी उठा लाओ और मेरे लंड पर ढेर सारा तेल लगा दो।”

वो बोली, “मुझे शरम आती है।”

मैंने कहा, “अगर तुम मेरे लंड पर तेल नहीं लगाओगी तो मैं ऐसे ही अपना लंड तुम्हारे छेद में घुसा दूँगा।”

वो बोली, “ना बाबा ना, ऐसा मत करना। जब तेल लगाने के बाद भी इतना दर्द होता है तो बिना तेल लगाये जब तुम अपना औज़ार अंदर घुसाओगे तो मैं तो मर ही जाऊँगी। मैं तुम्हारे औज़ार पर तेल लगा देती हूँ।”

इतना कह कर वो उठी। उसने तेल की शीशी से तेल निकाल कर मेरे लंड पर लगा दिया। उसके तेल लगाने से मेरा लंड एक दम टाइट हो गया। उसके बाद मैंने एक ग्लास में थोड़ी सी शराब डाल कर उसके होंठों से ग्लास लगा दिया। उसने थोड़ी आनाकानी की पर फिर मेरे समझाने पर वो बुरा सा मुँह बना कर एक ही साँस में पुरा गटक गयी। ये कहानी आप हमारी वासना डॉट नेट पर पढ़ रहे है.

“ऊँ.. मेरा सिर घूम रहा है…” वो बोली और वो मेरे कुछ कहे बिना ही पेट के बल लेट गयी और बोली, “धीरे-धीरे घुसाना।”

मैं उसके ऊपर आ गया। मैंने अपने लंड का सुपाड़ा उसकी गाँड के छेद पर रख दिया और फिर उसकी कमर के नीचे से हाथ डाल कर उसकी कमर को जोर से पकड़ लिया। मैंने थोड़ा सा जोर लगाया तो उसके मुँह से आह निकल गयी। मैंने थोड़ा जोर और लगाया तो उसके मुँह हल्की सी चींख निकल गयी।

मेरा लंड उसकी गाँड में तीन इंच तक घुस चुका था। मैंने थोड़ा सा जोर और लगाया तो वो फिर से चिल्लाने लगी और मेरा लंड चार इंच तक घुस गया। मैंने उसकी चींख पर जरा सा भी ध्यान नहीं दिया। मैंने जोर का धक्का मारा तो वो तड़पने लगी और जोर जोर से चींखने लगी, “दीदी, बचा लो मुझे, मर जाऊँगी मैं।”

अगले धक्के के साथ मेरा लंड पाँच इंच तक घुस गया। मैंने फिर से बहुत ही जोर का एक धक्का और मारा तो वो अपने हाथों को जोर-जोर से बेड पर पटकने लगी। उसने अपने सिर के बाल नोचने शुरू कर दिये और बहुत ही जोर-जोर से चिल्लाने लगी।

अब तक मेरा लंड दिव्या की गाँड में छः इंच तक घुस चुका था। मैंने पूरी ताकत के साथ फिर से जोर का धक्का मारा तो वो बहुत जोर-जोर से रोने लगी। लग रहा था कि जैसे वो मर जायेगी। मैं रुक गया और फिर अगले धक्के के साथ मेरा लंड उसकी गाँड में सात इंच घुस चुका था।

मैंने अपना लंड एक झटके से बाहर खींच लिया। पक की आवाज़ के साथ मेरा लंड बाहर आ गया। मैंने देखा की उसकी गाँड का मुँह खुला हुआ था और ढेर सारा खून मेरे लंड पर और उसकी गाँड पर लगा हुआ था।

मैंने तेल की शीशी उठायी और उसकी गाँड के छेद में ढेर सारा तेल डाल दिया। उसके बाद मैंने फिर से अपना लंड धीरे धीरे उसकी गाँड में घुसा दिया। जब मेरा लंड उसकी गाँड में सात इंच तक घुस गया तो मैंने पूरी ताकत के साथ दो बहुत ही जोरदार धक्के लगा दिये।

वो जोर जोर से चिल्लाने लगी, “दीदी, तुमने मुझे कहाँ फँसा दिया। मैं मरी जा रही हूँ और तुम सुन ही नहीं रही हो, बचा लो मुझे, नहीं तो ये मुझे मार डालेंगे।”

मैंने कहा, “अब चुप हो जाओ। मेरा पूरा लंड अब घुस चुका है।”

वो कुछ नहीं बोली, केवल सिसक-सिसक कर रोती रही। मैं अपना लंड उसकी गाँड में ही डाले हुए थोड़ी देर तक रुका रहा। धीरे-धीरे वो कुछ हद तक शाँत हो गयी। तभी कमरे के बाहर से ही स्नेहा भाभी ने पूछा, “काम हो गया?”

मैंने कहा, “अभी तो मैंने केवल अपना औज़ार ही पूरा अंदर घुसाया है।”

वो बोली, “ठीक है, अब जल्दी से अपना पानी भी निकाल दो और बाहर आ जाओ।”

मैंने धीरे-धीरे धक्के लगाने शुरू कर दिये तो दिव्या फिर से चीखने लगी। वक्त गुजरता गया और वो धीरे-धीरे शांत होती गयी। दस मिनट में वो एक दम शांत हो गयी तो मैंने अपनी स्पीड बढ़ानी शुरू कर दी। अब उसके मुँह से केवल हल्की-हल्की सी आह ही निकल रही थी। मैंने अपनी स्पीड और तेज कर दी।

तेल लगा होने की वजह से मेरा लंड उसकी गाँड में सटासट अंदर बाहर हो रहा था। मुझे खूब मज़ा आ रहा था। दिव्या को भी अब कुछ-कुछ मज़ा आने लगा था। मैं भी पूरे जोश में आ चुका था और तेजी के साथ उसकी गाँड मार रहा था। दस मिनट तक मैंने उसकी गाँड मारी और फिर झड़ गया। लंड का सारा पानी उसकी गाँड में निकाल देने के बाद भी मैंने उसकी गाँड में ही अपना लंड डाले रखा और उसके ऊपर लेट गया।

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मैंने दिव्या से पूछा, “कुछ मज़ा आया?”

वो बोली, “बहुत दर्द हो रहा है और तुम पूछ रहे हो की मज़ा आया!”

मैंने कहा, “मेरी कसम है तुम्हें, सच-सच बताओ… क्या तुम्हें जरा सा भी मज़ा नहीं आया?”

उसने शरमाते हुए कहा, “पहले तो बहुत दर्द हो रहा था लेकिन बाद में मुझे थोड़ा-थोड़ा सा मज़ा आने लगा था कि तुम रुक गये।”

मैंने कहा, “अभी थोड़ी देर में मेरा लंड फिर से खड़ा हो जायेगा। उसके बाद मैं फिर से तुम्हारी गाँड मारूँगा।”

वो बोली, “नहीं, अभी रहने दो।”

तभी स्नेहा भाभी ने पूछा, “क्यों संजीव, काम हो गया?”

मैंने कहा, “हाँ, मैंने अपना पानी इसके छेद में निकाल दिया है। अभी थोड़ी ही देर में मैं फिर से अपना पानी निकालने वाला हूँ।”

स्नेहा भाभी ने कहा, “ठीक है, जब दोबारा पानी निकाल देना तो बाहर आ जाना।”

मैंने कहा, “ठीक है।”

मैंने अपना लंड दिव्या की गाँड में ही रखा और उसकी चूचियों को मसलता रहा। पंद्रह मिनट में ही मेरा लंड फिर से खड़ा हो गया तो मैंने उसकी गाँड मारनी शुरू कर दी। अब उसके मुँह से केवल हल्की-हल्की सी आह ही निकल रही थी। थोड़ी ही देर में उसे मज़ा आने लगा तो वो सिसकारियाँ लेने लगी।

मैंने पूछा, “अब कैसा लग रहा है?”

वो बोली, “अब अच्छा लग रहा है।”

मैंने अपनी स्पीड बढ़ा दी तो थोड़ी ही देर में वो जोर की सिसकारियाँ भरने लगी। मुझे भी उसकी गाँड मारने में खूब मज़ा आ रहा था। बीस मिनट तक मैंने उसकी गाँड मारी और फिर झड़ गया। मैंने अपना लंड उसकी गाँड से बाहर निकाला और उसके बगल में लेट गया। मैंने उसके होंठों को चूमते हुए पूछा, “कैसा लगा?”

वो बोली, “इस बार कुछ ज्यादा ही मज़ा आया… अच्छा हुआ तुमने मुझे शराब पिला दी… कड़वी तो थी पर अब काफी अच्छा लग रहा है।”

मैंने कहा, “धीरे-धीरे तुम्हें ज्यादा मज़ा आने लगेगा… चाहो तो जब भी मैं तुम्हारे छेद में अपना औज़ार डालूँ, तुम थोड़ी शराब पी लिया करना… तुम्हें ज्यादा मज़ा आयेगा।”

मैं दिव्या के पास से उठ कर बाहर चला आया। स्नेहा भाभी बाहर बैठी थी। नशे और पूरी रात ना सोने के कारण उनकी आँखें लाल और बुझी हुई सी थीं।

उन्होंने मुझसे पूछा, “काम हो गया?”

मैंने कहा, “हाँ!”

वो बोली, “मैं गरम पानी से उसकी चूत की सिंकाई कर देती हूँ। इससे उसका दर्द कम हो जायेगा।”

मैं चुप रह गया क्योंकि मैंने तो दिव्या की चूत को अभी तक छुआ ही नहीं था। मैंने तो उसकी गाँड मारी थी। मैं दिव्या के पास चला गया। स्नेहा भाभी पानी गरम कर के ले आयीं। वो बोली, “मैं पानी गरम कर के लायी हूँ, अंदर आ जाऊँ।”

मैंने कहा, “आ जाओ।”

दिव्या बोली, “मैं एक दम नंगी हूँ और तुम दीदी को यहाँ बुला रहे हो… क्या सोचेंगी वो… मैं नंगी और बिस्तर पे सैंडल पहने हुए…।”

मैंने कहा, “तो क्या हुआ?”

वो कुछ नहीं बोली। स्नेहा भाभी अंदर आ गयी। उन्होंने दिव्या से कहा, “लाओ मैं तुम्हारे छेद की सिंकाई कर दूँ। इससे तुम्हारा दर्द कम हो जायेगा।”

दिव्या ने करवट बदल ली तो स्नेहा भाभी ने कहा, “तुमने करवट क्यों बदल ली। अब मैं कैसे तुम्हारे छेद की सिंकाई करूँगी?”

उसने अपनी गाँड के छेद की तरफ़ इशारा करते हुए कहा, “इसी में तो इन्होंने अपना औज़ार घुसाया था।”

स्नेहा भाभी के मुँह से निकला, “क्या???”

स्नेहा भाभी की नज़र दिव्या की गाँड पर पड़ी। उसकी गाँड खून से लथपथ थी। मैंने अभी तक अपना लंड साफ़ नहीं किया था। मेरा लंड भी खून से भीगा हुआ था। स्नेहा भाभी आँखें फाड़े कभी मेरे लंड को और कभी दिव्या की गाँड को और कभी मेरे चेहरे को देखने लगी। स्नेहा भाभी ने गरम पानी से दिव्या के गाँड की सिंकाई की। ये कहानी आप हमारी वासना डॉट नेट पर पढ़ रहे है.

उसके बाद उन्होंने मुस्कुराते हुए दिव्या से कहा, “दिव्या तुमने एक मैदान तो मार लिया है। अब दूसरा मैदान मारना और बाकी है।”

वो बोली, “दीदी, मैं समझी नहीं।”

स्नेहा भाभी ने दिव्या की चूत पर हाथ लगाते हुए कहा, “अभी तो तुम्हें इस छेद में भी इसका औज़ार अंदर लेना है।”

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दिव्या को बहुत दर्द हो रहा था। स्नेहा भाभी की बात सुनकर वो गुस्से में आ गयी। उसने अपनी चूत की तरफ़ इशारा करते हुए कहा, “एक छेद के अंदर इनका औज़ार लेने में ही मेरा इतना बुरा हाल हो गया और आप कह रही हो की अभी इस छेद में भी अंदर लेना है। मैं अब किसी छेद में इनका औज़ार अंदर नहीं लूँगी। मुझे बहुत दर्द होता है। आप खुद ही इनका औज़ार अपने छेद में ले लो।”

स्नेहा भाभी ने मुस्कुराते हुए कहा, “मेरे अंदर लेने से क्या होगा। आखिर तुम्हें भी तो इसका औज़ार अपने इस छेद में अंदर लेना ही पड़ेगा। जैसे एक बार तुमने दर्द को बर्दाश्त कर लिया है उसी तरह से एक बार और दर्द को बर्दाश्त कर लेना।”

दिव्या ने स्नेहा भाभी की चूत की तरफ़ इशारा करते हुए कहा, “पहले तुम इनका औज़ार अपने इस छेद में अंदर ले कर दिखाओ। उसके बाद ही मैं इनका औज़ार अपने इस छेद में अंदर लूँगी।”

स्नेहा भाभी मुझे देखने लगी और मैं उनको।

दिव्या बोली, “क्यों अब क्या हुआ? आप मुझे फँसा रही थी लेकिन मैंने आप को ही फँसा दिया। दिखाओ इनका औज़ार अपने छेद के अंदर लेकर।”

स्नेहा भाभी ने कहा, “अच्छा बाबा, अभी दिखा देती हूँ लेकिन उसके बाद तो तुम मना नहीं करोगी?”

वो बोली, “पहले आप दिखाओ… उसके बाद मैं इनका औज़ार अंदर ले लूँगी भले ही मुझे कितनी भी तकलीफ क्यों ना हो।”

स्नेहा भाभी ने मुझसे कहा, “देवर जी! दिव्या ऐसे नहीं मानेगी। अब तुम अपना औज़ार मेरे अंदर डाल ही दो।”

मैंने कहा, “दिव्या के सामने?”

स्नेहा भाभी बोली, “तो क्या हुआ? जब ये मुझे तुम्हारा औज़ार अंदर लेते हुए देखेगी तब ही तो ये तुम्हारा औज़ार अंदर लेगी।”

स्नेहा भाभी ने सैंडल छोड़ कर अपने सारे कपड़े उतार दिये और दिव्या के बगल में लेट गयी। मैं स्नेहा भाभी के पैरों के बीच आ गया तो स्नेहा भाभी ने दिव्या से कहा, “अब तुम बैठ जाओ और देखो की कैसे मैं इसका औज़ार पूरा का पूरा अंदर लेती हूँ।”

दिव्या स्नेहा भाभी के बगल में बैठ गयी। मैंने स्नेहा भाभी की चूत में अपना लंड घुसाना शुरू कर दिया। धीरे-धीरे मेरा पूरा का पूरा लंड स्नेहा भाभी की चूत में समा गया। दिव्या आँखें फाड़े देखती रही। उसके बाद मैंने स्नेहा भाभी की चुदाई शुरू कर दी। दिव्या मेरे लंड को स्नेहा भाभी की चूत में सटासट अंदर-बाहर होते हुए देखती रही। पाँच मिनट की चुदाई एक बाद स्नेहा भाभी झड़ गयी तो दिव्या ने कहा, “दीदी, तुम्हारे छेद में से क्या निकल रहा है?”

स्नेहा भाभी ने कहा, “ये मेरी चूत का पानी है। अभी ये कईं बार निकलेगा। जब ये तुम्हारी चूत में भी अपना लंड घुसा कर तेजी से अंदर बाहर करेगा तब तुम्हारी चूत में से भी ऐसा ही पानी निकलेगा। चूत से पानी निकलने पर बहुत मज़ा आता है। तुम खुद ही देख लो की मुझे कितना मज़ा आ रहा है।”

मैंने स्नेहा भाभी को लगभग पच्चीस मिनट तक खूब जम कर चोदा। दिव्या आँखें फाड़े देखती रही। लंड का सारा पानी स्नेहा भाभी की चूत में निकाल देने के बाद मैंने अपना लंड बाहर निकाल लिया तो दिव्या बोली, “तुम्हारे लंड पर तो जरा सा भी खून नहीं लगा है?”

मैंने कहा, “खून तो केवल पहली-पहली बार घुसाने में ही निकलता है।”

वो कुछ नहीं बोली। स्नेहा भाभी ने दिव्या से कहा, “अब तो तैयार हो इसका लंड अपनी चूत में लेने के लिये?”

वो बोली, “हाँ, लेकिन दीदी, बहुत दर्द होगा।”

स्नेहा भाभी ने कहा, “पगली, केवल एक ही बार तो दर्द होगा। उसके बाद तो तू खुद ही इससे बार-बार कहेगी की अपना लंड मेरी चूत में डाल दो।”

वो बोली, “भला मैं ऐसा क्यों कहूँगी?”

स्नेहा भाभी ने कहा, “क्योंकि तुझे इसमें मज़ा जो आयेगा।”

मैं स्नेहा भाभी के बगल में लेट गया। दिव्या मेरे लंड को देखती रही। थोड़ी देर बाद वो बोली, “इनका लंड अब खड़ा क्यों नहीं हो रहा है।”

स्नेहा भाभी ने कहा, “अभी इसने मुझे चोद है ना… इसलिये। तू इसके लंड को सहलाना शुरू कर दे। थोड़ी ही देर में ये फिर से खड़ा हो जायेगा।”

स्नेहा भाभी की चुदाई देख कर दिव्या को भी थोड़ा जोश आ गया था। उसने अपना हाथ धीरे से मेरे लंड पर रख दिया। थोड़ी देर तक वो मेरे लंड को देखती रही। उसके बाद उसने मेरे लंड को सहलाना शुरू कर दिया। पंद्रह-बीस मिनट के बाद मेरा लंड फिर से खड़ा होने लगा। मैंने देखा की उसकी आँखें कुछ गुलाबी सी होने लगी थीं। लंड खड़ा होते देख दिव्या जोश में आ गयी और स्नेहा भाभी से बोली, “दीदी, अब तो इनका लंड खड़ा हो गया।”

स्नेहा भाभी बोली, “अब तू लेट जा।”

इतना कह कर स्नेहा भाभी उठ कर बैठ गयी और दिव्या लेट गयी। स्नेहा भाभी ने मुझसे कहा, “तू मेरे साथ जरा बाहर आ।” स्नेहा भाभी वैसे ही नंगी ऊँची ऐड़ी के सैंडल में चूतड़ मटकाती कमरे से बाहर जाने लगीं तो मैं स्नेहा भाभी के साथ बाहर आ गया।

स्नेहा भाभी ने कहा, “इस बार दिव्या के ऊपर जरा-सा भी रहम मत करना। पूरी ताकत के साथ धक्का लगाते हुए पूरा का पूरा लंड अंदर घुसा देना। ज्यादा देर भी मत करना। उसके बाद उसकी किसी दुश्मन की तरह खूब जम कर चुदाई करना। समझ गये?”

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मैंने कहा, “ठीक है, मैं ऐसा ही करूँगा।”

स्नेहा भाभी ने कहा, “मैं कभी तेरे भैया से गाँड नहीं मरवाती थी… मेरी गाँड कब मारेगा?”

मैंने कहा, “जब तुम कहो।”

वो बोली, “ठीक है, मैं तुझे बता दूँगी। अब चल मेरे साथ कमरे में।”

मैं स्नेहा भाभी के साथ कमरे में आ गया। दिव्या बेड पर लेटी हुई थी। स्नेहा भाभी ने मुझसे कहा, “अब तू अपने लंड पर तेल लगा ले और दिव्या की चुदाई शुरू कर। मैं इसके पास ही बैठ जाती हूँ।”

स्नेहा भाभी दिव्या के बगल में बैठ गयी। मैंने अपने लंड पर ढेर सारा तेल लगा लिया और दिव्या के पैरों के बीच आ गया। जैसे ही मैंने अपना लंड दिव्या की चूत पर रखा तो स्नेहा भाभी ने कहा, “ऐसे नहीं… मैं बताती हूँ।”

मैंने कहा, “बताओ।”

स्नेहा भाभी ने कहा, “तू अपना हाथ इसकी टाँगों के नीचे से डाल कर इसके कंधे को जोर से पकड़ ले। उसके बाद अंदर घुसा।” मैंने दिव्या की टाँगों के नीचे से हाथ डाल कर दिव्या के कंधों को जोर से पकड़ लिया। स्नेहा भाभी ने कहा, “अब जैसा मैंने तुझे समझाया था… ठीक उसी तरह अंदर घुसा दे।”

मैंने दिव्या के चूत के मुँह पर अपने लंड का सुपाड़ा रख दिया। जैसे ही मैंने धक्का लगाया तो स्नेहा भाभी ने दिव्या के मुँह को जोर से दबा कर पकड़ लिया। दिव्या के मुँह से गूँ-गूँ की आवाज़ ही निकल पायी। स्नेहा भाभी मुझसे बोली, “घुसा दे जल्दी से पूरा का पूरा।”

मैं तो ताकतवर था ही। मैंने अपनी सारी ताकत लगाते हुए फिर से एक धक्का मारा। दिव्या की चूत से खून की धार निकलने लगी। मेरा लंड खून से नहा गया। वो अपने हाथों को जोर-जोर से बेड पर पटकने लगी। उसकी सारी की सारी चूड़ियाँ टूट गयीं और उसका हाथ लहू लुहान हो गया।

मुँह दबा होने की वजह से उसके मुँह से केवल गूँ-गूँ की आवाज़ ही निकल पा रही थी। मैंने फिर से एक धक्का लगाया। इस धक्के के साथ ही मेरा लंड दिव्या की चूत में सात इंच तक घुस गया। दिव्या तड़प रही थी। उसकी आँखों से आँसू बह रहे थे। बेड की चादर पर भी ढेर सारा खून लग गया था। ये कहानी आप हमारी वासना डॉट नेट पर पढ़ रहे है.

भाभी बोली, “जल्दी कर।”

मैंने एक धक्का और मारा तो मेरा लंड आठ इंच घुस गया। मैंने गहरी साँस लेते हुए फिर से जोर का धक्का लगाया। इस धक्के के साथ ही मेरा पूरा का पूरा लंड दिव्या की चूत में समा गया। स्नेहा भाभी बोली, “अपना पूरा लंड बाहर निकाल कर एक ही झटके में फिर से अंदर कर दे।”

मैंने वैसा ही किया। स्नेहा भाभी ने कहा, “शाबाश… ठीक इसी तरह से चार-पाँच बार और कर।” मैंने चार-पाँच बार फिर से वैसा ही किया। दिव्या तड़प रही थी। उसका सारा बदन पसीने से नहा गया था। उसकी साँसें बहुत तेज चल रही थी और सारा बदन थर थर काँप रहा था।

मैंने दिव्या की चुदाई शुरू कर दी। स्नेहा भाभी अभी भी उसका मुँह दबाये हुए थी। उसके मुँह से गूँ-गूँ की आवाज़ निकल रही थी। उसकी चूत ने मेरे लंड को बुरी तरह से जकड़ रखा था। मेरा लंड आसानी से उसकी चूत में अंदर बाहर नहीं हो पा रहा था।

पूरी ताकत के साथ मैं लगभग दस मिनट तक उसकी चुदाई करता रहा। दिव्या अब कुछ हद तक शांत हो चुकी थी। स्नेहा भाभी ने अपना हाथ उसके मुँह पर से हटा लिया तो दिव्या सिसक-सिसक कर रोते हुए कहने लगी, “दीदी, आप दोनों ने मिलकर मुझे मार ही डाला। बहुत दर्द हो रहा है।”

स्नेहा भाभी ने कहा, “अब तो पहले जैसा दर्द नहीं है न?”

वो बोली, “नहीं, अब पहले से बहुत कम है।”

स्नेहा भाभी ने कहा, “थोड़ा सब्र कर, अभी बाकी का दर्द भी चला जायेगा।”

मैं तेजी के साथ उसकी चुदाई कर रहा था। अब वो चींख नहीं रही थी, केवल आहें भर रही थी। मैंने उसे पाँच मिनट तक और चोदा तो दिव्या झड़ गयी। उसकी चूत और मेरा लंड एक दम गीला हो गया। अब मेरा लंड थोड़ा आसानी से उसकी चूत में अंदर बाहर होने लगा था। मैंने अपनी स्पीड बढ़ा दी। दिव्या ने धीरे-धीरे सिसकारियाँ भरनी शुरू कर दी।

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स्नेहा भाभी ने पूछा, “अब कैसा लग रहा है?”

वो बोली, “अब कुछ-कुछ मज़ा आ रहा है लेकिन दर्द अभी भी है।”

स्नेहा भाभी ने कहा, “अब इस दर्द को जाने में समय लगेगा। उसके बाद बिल्कुल भी दर्द नहीं होगा।”

दिव्या बोली, “समय क्यों लगेगा?”

स्नेहा भाभी ने कहा, “जब ये तुम्हें तीन-चार बार चोद देगा, तब तुम्हारी चूत इसके लंड के साइज़ की हो जायेगी। उसके बाद ये दर्द अपने आप चला जायेगा।”

मैंने और ज्यादा जोर-जोर के धक्के लगाने शुरू कर दिये थे और उसे तेजी के साथ चोद रहा था। दिव्या ने भी अब धीरे-धीरे अपने चूतड़ उठाने शुरू कर दिये थे। वो भी अब मस्ती में आ रही थी। पाँच मिनट में ही वो फिर से झड़ गयी। उसने मेरे होंठों को चूम लिया और कहा, “अब मुझे बहुत अच्छा लग रहा है।”

मैंने उसकी चुदाई जारी रखी। दो मिनट भी नहीं गुजरे थे कि स्नेहा भाभी ने कहा, “दिव्या अब तुम इसका लंड अपने दूसरे छेद में ले लो।”

वो बोली, “फिर से दर्द होगा।”

स्नेहा भाभी ने कहा, “अब ज्यादा दर्द नहीं होगा क्योंकि तुम इसका लंड पहले ही अंदर ले चुकी हो।”

वो बोली, “फिर इनसे कह दो की धीरे-धीरे करेंगे।”

स्नेहा भाभी ने कहा, “ये धीरे-धीरे ही करेगा। मैं हूँ न यहाँ पर। अगर ये बदमाशी करेगा तो मैं इसे बहुत मारूँगी।”

वो बोली, “ठीक है।”

मैंने अपना लंड दिव्या की चूत से बाहर निकाला और उसकी गाँड में घुसाने लगा। मेरे लंड पर दिव्या की चूत का ढेर सारा पानी लगा हुआ था। धीरे-धीरे मेरा लंड सात इंच तक उसकी गाँड में घुस गया। उसके बाद जब मैंने और ज्यादा घुसाने की कोशिश की तो उसे फिर से दर्द होने लगा और वो चीखने लगी लेकिन इस बार उसने मुझे रोका नहीं। वो बोली, “अब रहने दो, दर्द हो रहा है।”

स्नेहा भाभी ने कहा, “बस थोड़ा सा ही तो बाकी है। उसे भी अंदर ले लो।” दिव्या कुछ नहीं बोली।

स्नेहा भाभी ने मुझे आँख मारी तो मैंने जोर का धक्का लगा दिया। मेरा बाकी का लंड भी उसकी गाँड में समा गया। वो जोर से चींखी तो स्नेहा भाभी ने कहा, “बस हो गया।” उसके बाद मैंने उसकी गाँड मारनी शुरू कर दी। थोड़ी देर चींखने के बाद वो शाँत हो गयी। अब उसे गाँड मरवाने में भी मज़ा आने लगा था। लगभग पाँच मिनट तक मैंने उसकी गाँड मारी तो स्नेहा भाभी ने कहा, “अब रहने दो।”

मैंने कहा, “अभी तो मेरे लंड का पानी ही नहीं निकला है।”

वो बोली, “मैं मना थोड़े ही कर रही हूँ। अब तुम इसकी चूत में अपना लंड डाल कर इसे चोदो।”

मैंने अपना लंड दिव्या की गाँड से निकाल कर उसकी चूत में डाल दिया। उसके बाद मैंने पूरी ताकत के साथ जोर-जोर से उसकी चुदाई शुरू कर दी। पाँच मिनट में ही दिव्या फिर से झड़ गयी। मैं इसके पहले दो बार दिव्या की गाँड मार चुका था और दो बार स्नेहा भाभी को चोद चुका था।

इसलिये मेरे लंड का पानी निकलने का नाम ही नहीं ले रहा था। मैं जोर-जोर के धक्के लगाते हुए दिव्या को चोद रहा था। वो भी अपने चूतड़ उठाने लगी थी। थोड़ी देर बाद वो बोली, “दीदी, अब मुझे बहुत अच्छा लग रहा है। इनसे कह दो की थोड़ा और जोर-जोर से धक्का लगायें।”

स्नेहा भाभी ने मुझसे कहा, “तुमने सुना ये क्या कह रही है?”

मैंने कहा, “हाँ!”

वो बोली, “तो फिर तुम इसका कहा मानो और अपनी ताकत दिखा दो इसे।”

मैंने पूरी ताकत लगाते हुए बहुत ही जोर-जोर के धक्के लगाने शुरू कर दिये।

स्नेहा भाभी ने दिव्या से पूछा, “अब ठीक है?”

वो बोली, “हाँ! अब मुझे ज्यादा मज़ा आ रहा है।”

दिव्या अब चूतड़ उठा-उठा कर मेरा साथ दे रही थी। मेरा लंड उसकी चूत में पूरा का पूरा सटासट अंदर बाहर हो रहा था। दस मिनट की चुदाई के बाद दिव्या फिर से झड़ गयी। मैंने अपना लंड उसकी चूत से बाहर निकाल लिया तो उसने मेरे लंड को तुरंत पकड़ लिया और कहने लगी, “बाहर क्यों निकाल रहे हो। अभी मुझे और मज़ा लेना है।”

मैंने कहा, “मैं तुम्हें अभी और मज़ा दूँगा। अब तुम घोड़ी की तरह हो जाओ।”

वो डॉगी स्टाइल में हो गयी तो मैं उसके पीछे आ गया। मैंने अपना लंड उसकी गाँड में घुसा दिया और उसकी गाँड मारने लगा। वो जोश के मारे सिसकारियाँ भरने लगी। पाँच मिनट तक उसकी गाँड मारने के बाद मैं अपना लंड उसकी गाँड से निकाल कर उसकी चूत में डाल दिया और उसकी चुदाई करने लगा।

मैं उसकी कमर को पकड़ कर उसे बहुत ही बुरी तरह से चोद रहा था। वो भी अपने चूतड़ आगे पीछे करते हुए मेरा साथ देने लगी थी। दस मिनट उसकी चुदाई करने के बाद मैं झड़ गया। मेरे साथ ही साथ दिव्या भी फिर से झड़ गयी। ये कहानी आप हमारी वासना डॉट नेट पर पढ़ रहे है.

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मैंने अपना लंड बाहर निकाला तो स्नेहा भाभी ने दिव्या से कहा, “अब तुम इसके लंड को चाट लो।”

वो बोली, “मैं इनके लंड को नहीं चाटूँगी। इनका लंड गंदा है।”

स्नेहा भाभी ने कहा, “गंदा कहाँ है? इसके लंड पर तुम्हारी चूत का और इसके लंड का पानी ही तो लगा है। इसे चाटने से प्यार बढ़ता है। चाट लो इसे।”

वो बोली, “मैं नहीं चाटूँगी। मुझे घिन्न आती है।”

स्नेहा भाभी ने कहा, “मैं ही चाट लेती हूँ। फिर आगे से तुझे ही चाटना पड़ेगा।”

वो बोली, “ठीक है! पहले तुम चाट कर दिखाओ, बाद में मैं चाट लूँगी।”

स्नेहा भाभी मेरे लंड को चाटने लगी। दिव्या देख रही थी। मेरे लंड पर लगा हुआ थोड़ा सा पानी स्नेहा भाभी ने चाट लिया फिर दिव्या से बोली, “अब बाकी का तुम चाट लो।”

दिव्या ने शर्माते हुए मेरे लंड को चाटना शुरू कर दिया। उसने मेरे लंड पर लगे हुए बाकी के पानी को चाट-चाट कर साफ़ कर दिया।

स्नेहा भाभी ने दिव्या से कहा, “अब तुम्हें जब ये फिर से चोदेगा तो चिल्लाओगी तो नहीं?”

वो बोली, “अब क्यों चिल्लाऊँगी? अब तो मुझे बहुत मज़ा आने लगा है।”

स्नेहा भाभी ने कहा, “फिर ठीक है, तुम आराम कर लो। जब तुम्हारा मन करेगा तो इसे बुला लेना। मैं इसके साथ अपने कमरे में जा रही हूँ। मुझे इस से कुछ बात करनी है।”

वो बोली, “ठीक है, बुला लूँगी।”

स्नेहा भाभी बोली, “मैं भी इसके साथ आऊँगी तुम्हारे पास और अपने सामने ही तुम्हारी चुदाई करा दूँगी।”

स्नेहा भाभी नंगी ही अपनी सैंडल फर्श पर खट-खट करती हुई बाहर चली गयी तो मैं भी उनके पीछे-पीछे नंगा ही बाहर चला आया। मैंने स्नेहा भाभी से कहा, “तुमने मुझसे दिव्या एक सामने ही चुदवा लिया। वो क्या सोचेगी।”

स्नेहा भाभी ने कहा, “उसे कुछ भी नहीं मालूम है। अगर उसे कुछ मालूम होता तो भला वो मुझे चुदवाने को क्यों कहती। चलो अच्छा ही हुआ की अब मुझे और दिव्या को एक दूसरे के सामने तुमसे चुदवाने में कोई दिक्कत नहीं होगी। हमारा रास्ता पूरी तरह से साफ़ हो गया। मैं दिव्या से भी इस बारे में बात कर लूँगी।”

मैंने भाभी से पूछा, “गाँड कब मरवाओगी?”

वो मुस्कुराते हुए बोली, “क्या मेरी गाँड भी फाड़नी है?”

मैंने कहा, “हाँ!”

वो बोली, “कल फाड़ लेना।”

मैंने कहा, “थोड़ा सा आज अंदर ले लो बाकी का कल अंदर ले लेना।”

वो बोली, “जो तेरा जी कहे कर ले। अब तो मैं तेरी बीवी बन गयी हूँ।”

मैं स्नेहा भाभी के बगल में लेटा हुआ उनसे बातें करता रहा और उनकी चूत को सहलाता रहा। वो मुझे तरह-तरह के स्टाइल में चोदना सिखा रही थी और मेरे लंड को सहला रही थी। लगभग एक घंटे के बाद मेरा लंड फिर से खड़ा होने लगा।

मैंने स्नेहा भाभी से कहा, “दिव्या ने अभी तक मुझे बुलाया ही नहीं। मैं अब तुम्हारी गाँड में ही लंड घुसाने की कोशिश करता हूँ।”

स्नेहा भाभी और हम दोनों अभी तक नंगे ही थे। मैंने स्नेहा भाभी से घोड़ी बन जाने को कहा तो वो घोड़ी बन गयी। मैंने अपने लंड का सुपाड़ा उनकी गाँड के छेद पर रखा तो वो बोली, “तेल तो लगा ले।”

मैंने कहा, “नहीं… ऐसे ही।”

वो बोली, “फिर तो बहुत दर्द होगा।”

मैंने कहा, “होने दो। तुम कोई सत्रह-अट्ठारह साल की थोड़े ही हो।”

वो बोली, “ठीक है, जैसी तेरी मरज़ी।”

मैंने अपना लंड उनकी चूत में डाल दिया और उनकी चुदाई शुरू कर दी। पाँच मिनट में ही स्नेहा भाभी झड़ गयी तो मेरा लंड गीला हो गया। अब तेल लगने की जरूरत नहीं थी। मैंने अपने लंड का सुपाड़ा उनकी गाँड के छेद पर रखा और थोड़ा सा जोर लगाया।

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स्नेहा भाभी के मुँह से जोर की आह निकली और मेरे लंड का सुपाड़ा उनकी गाँड में घुस गया। मैंने थोड़ा जोर और लगाया तो वो तड़प उठी और बोली, “जरा धीरे से।” मैंने फिर से जोर लगाया तो उनके मुँह से चींख निकल गयी। मेरा लंड स्नेहा भाभी की गाँड में अब तक चार इंच घुस चुका था। मैंने और ज्यादा अंदर घुसाने की कोशिश नहीं की। मैंने धीरे-धीरे धक्के लगाने शुरू कर दिये।

दो मिनट में ही स्नेहा भाभी का दर्द जाता रहा तो वो बोली, “थोड़ा और अंदर कर दे।”

मैंने फिर से थोड़ा जोर लगाया तो वो फिर से चींखी और मेरा लंड उनकी गाँड में पाँच इंच तक घुस गया। तभी दिव्या आ गयी। उसने कपड़े नहीं पहने थे। वो पहले जैसी ही सिर्फ अपनी हाई-हील की सैंडल पहने हुए एक दम नंगी थी। उसने हम दोनों को देखा तो बोली, “दीदी, तुम भी मज़ा ले रही हो?”

स्नेहा भाभी ने कहा, “ये तेरा बड़ी देर से इंतज़ार कर रहा था लेकिन तूने इसे बुलाया ही नहीं। इसे जोश आ गया और इसने मेरी गाँड में अपना लंड घुसाना शुरू कर दिया। मैं इसे मना नहीं कर पायी।”

वो बोली, “मुझे भी फिर से चुदवाना है।”

स्नेहा भाभी ने कहा, “तो आ जा।”

दिव्या ने कहा, “लेकिन ये तो आपको चोदने जा रहे हैं?”

स्नेहा भाभी ने कहा, “मेरा क्या है, मैं तो कभी भी चुदवा लूँगी। पहले तू चुदवा ले। तेरा चुदवाना ज्यादा जरूरी है। मैं तो बहुत मज़ा ले चुकी हूँ।”

दिव्या स्नेहा भाभी के बगल में ही घोड़ी की तरह बन गयी। मैंने अपना लंड स्नेहा भाभी की गाँड से बाहर निकाल कर दिव्या की गाँड में घुसाना शुरू कर दिया। वो दर्द के मारे आहें भरने लगी। धीरे-धीरे मेरा पूरा का पूरा लंड दिव्या की गाँड में घुस गया तो मैंने उसकी गाँड मारनी शुरू कर दी।

वो बोली, “आगे के छेद में घुसा कर चोदो। मुझे उसमें ज्यादा मज़ा आता है।”

मैंने कहा, “थोड़ी देर पीछे के छेद की चुदाई कर लूँ फिर आगे के छेद में भी चोदूँगा।”

वो बोली, “ठीक है, जैसी तुम्हारी मरज़ी।”

मैं दिव्या की गाँड मारता रहा।

स्नेहा भाभी दिव्या से कहने लगी, “तू तो जानती है की संजीव के भैया का स्वर्गवास हुए बहुत दिन हो चुके हैं। मैंने बहुत दिनों से चुदवाया नहीं था और मेरी इच्छा भी मर चुकी थी। लेकिन आज मैंने तेरी खुशी के लिये तेरे कहने पर इससे चुदवा लिया।

इससे चुदवाने के बाद मेरी चूत और गाँड की आग फिर से भड़क गयी है। मैं जानती हूँ की ये बहुत ही गलत बात है लेकिन मैं अब इससे चुदवाये बिना नहीं रह सकती। अगर किसी को ये पता चल गया तो मेरी बड़ी बदनामी होगी। अब तू ही बता की मैं क्या करूँ? मैं तो अब मर जाना चाहती हूँ।”

दिव्या बोली, “दीदी, तुम ऐसा क्यों कह रही हो? तुम इनसे जी भर कर चुदवाओ और खूब मज़ा लो। मुझे कोई ऐतराज़ नहीं है। अगर मैं तुम्हें कभी मना करूँ तो तुम मुझे ही मार डालना। ये बात किसी को नहीं पता चलेगी।”

स्नेहा भाभी ने कहा, “फिर तू मेरी कसम खा कर कह दे की तू कभी भी किसी से नहीं कहेगी।”

दिव्या ने अपना हाथ पीछे कर के मेरा लंड पकड़ लिया और बोली, “मैं तुम्हारी कसम क्यों खाऊँ? मैं अपने पति का लंड पकड़ कर कसम खाती हूँ की मैं कभी भी किसी से कुछ भी नहीं कहूँगी। अब तो आप को मेरी बात पर विश्वास हो गया।”

स्नेहा भाभी ने कहा, “मुझे तुझ पर पूरा विश्वास है।”

वो बोली, “अब इनसे कह दो कि मेरी चूत में अपना लंड डाल कर मेरी चुदाई करें। मुझे गाँड मरवाने में ज्यादा मज़ा नहीं आता है।”

स्नेहा भाभी ने मुझसे कहा, “सुन रहा है ना तू की दिव्या क्या कह रही है। अब इसकी इच्छा पूरी कर।”

मैंने अपना लंड दिव्या की चूत में घुसा दिया और उसकी चुदाई करने लगा। दो मिनट में ही वो एक दम मस्त हो गयी। उसने पूरी मस्ती के साथ मुझसे चुदवाना शुरू कर दिया। वो तेजी के साथ अपने चूतड़ आगे पीछे करते हुए मेरा साथ दे रही थी। मैं भी पूरे जोश और ताकत के साथ उसे चोदता रहा। दिव्या की चुदाई करते हुए मुझे लगभग तीस मिनट गुजर चुके थे। वो अब तक तीन बार झड़ चुकी थी लेकिन मैं झड़ने का नाम ही नहीं ले रहा था।

दिव्या बोली, “दीदी, मैं थक गयी हूँ।”

स्नेहा भाभी ने कहा, “क्यों, मज़ा नहीं आ रहा है क्या?”

वो बोली, “मज़ा तो बहुत आ रहा है लेकिन अभी मेरी चुदवाने की आदत नहीं है ना।”

स्नेहा भाभी बोली, “फिर मैं क्या करूँ। जब संजीव झड़ जायेगा तब ही तो तुम्हारी चुदाई बंद करेगा।”

वो बोली, “मुझे थोड़ा सा आराम कर लेने दो। मैं बाद में चुदवा लूँगी।”

स्नेहा भाभी ने कहा, “जब लंड खड़ा हो तो चुदाई नहीं बंद की जाती… इससे आदमी के सेहत पर बुरा असर पड़ता है।”

दिव्या बोली, “इनसे कह दो की अब रहने दें। बाद में चोद लेंगे। तब तक तुम ही इनसे चुदवा लो।”

स्नेहा भाभी ने कहा, “अच्छा बाबा! मैं ही चुदवा लेती हूँ।”

मैंने अपना लंड दिव्या की चूत से निकाल कर स्नेहा भाभी की गाँड में घुसाना शुरू कर दिया। मेरा लंड दिव्या की चूत के पानी से पहले से ही भीगा हुआ था। धीरे-धीरे मेरा लंड स्नेहा भाभी की गाँड में पाँच इंच तक घुस गया। मैंने धक्के लगाने शुरू कर दिये। ये कहानी आप हमारी वासना डॉट नेट पर पढ़ रहे है.

थोड़ी देर बाद जब मैंने देखा की स्नेहा भाभी मस्ती में आ गयी हैं तो मैंने जोर का धक्का लगा दिया। इस धक्के के साथ ही मेरा लंड भाभी की गाँड को चीरता हुआ सात इंच तक अंदर घुसा गया। स्नेहा भाभी के मुँह से जोर की चींख निकली तो दिव्या ने कहा, “दीदी, तुम क्यों चींख रही हो। तुम तो चुदवाने की आदी हो।”

स्नेहा भाभी ने कहा, “मैंने आज तक अपनी गाँड नहीं मरवायी थी। तुम तो जानती ही हो की इसका लंड बहुत लंबा और मोटा है… इसलिये मुझे भी दर्द हो रहा है और मैं चींख रही हूँ। बस अभी थोड़ी ही देर में मेरा दर्द कम हो जायेगा… फिर मुझे भी तेरी तरह खूब मज़ा आने लगेगा।”

धीरे-धीरे स्नेहा भाभी फिर से मस्ती में आ गयी। मैंने पूरी ताकत के साथ फिर से जोर का धक्का मारा। वो फिर से चींखी और मेरा लंड आठ इंच तक घुस गया। मैंने फिर एक धक्का मारा तो वो बुरी तरह से चींखने लगी और मेरा पूरा का पूरा लंड स्नेहा भाभी की गाँड में समा गया। मैंने तेजी के साथ धक्के लगाने शुरू कर दिये। थोड़ी ही देर में स्नेहा भाभी शाँत हो गयी और उन्हें मज़ा आने लगा।

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तभी दिव्या बोली, “दीदी, अब मैं तैयार हूँ। इनसे कह दो की अब मुझे चोद दें।”

स्नेहा भाभी ने कहा, “बार-बार मुझसे क्यों कहती है। तू खुद ही इससे कह दे। अब मैं इससे कुछ नहीं कहूँगी।”

दिव्या ने मेरा लंड पकड़ लिया और बोली, “अब तुम मुझे चोद दो।”

मैं खुश हो गया। मैंने अपना लंड स्नेहा भाभी की गाँड से निकाल कर दिव्या की चूत में डाल दिया और उसकी चुदाई शुरू कर दी। उसने भी मेरा साथ देना शुरू कर दिया। पंद्रह मिनट की चुदाई के बाद मैं झड़ गया। दिव्या भी मेरे साथ ही साथ झड़ गयी। जैसे ही मैंने अपना लंड उसकी चूत से बाहर निकाला तो उसने मेरा लंड चाटना शुरू कर दिया। मैं बहुत खुश हो गया।

स्नेहा भाभी ने दिव्या से कहा, “अब घिन्न नहीं आ रही है?”

वो बोली, “बिल्कुल नहीं, अब तो मुझे भी खूब मज़ा आने लगा है।”

हम सब नंगे ही सो गये। रात के ७ बजे दिव्या मेरा लंड सहलाने लगी। मैं जग गया तो वो बोली, “एक बार फिर से चोद दो।”

मैंने कहा, “क्यों श्रीमती जी, अब चुदवाने में मज़ा आने लगा है?”

वो बोली, “हाँ! अब तो मैं चाहती हूँ की तुम मुझे सारा दिन चोदते रहो।”

उसने और कुछ कहे बिना ही मेरा लंड मुँह में ले लिया और चूसने लगी। तभी स्नेहा भाभी भी उठ गयी। स्नेहा भाभी ने मुस्कुराते हुए कहा, “दिव्या! तू इसका लंड क्यों चूस रही है?”

वो बोली, “मुझे चुदवाना है।”

स्नेहा भाभी ने दिव्या से मज़ाक किया, “पहले तो बहुत चिल्ला रही थी अब क्या हुआ?”

वो बोली, “पहले मुझे मलूम नहीं था की इसमें इतना मज़ा आता है।”

थोड़ी ही देर में मेरा लंड खड़ा हो गया। मैंने दिव्या की चुदाई शुरू कर दी। उसने पूरी मस्ती के साथ चुदवाया। मैंने भी उसे पूरे जोश के साथ लगभग पैंतालिस मिनट तक चोदा। वो इस बार की चुदाई के दौरान चार बार झड़ चुकी थी।

उसके बाद स्नेहा भाभी और दिव्या खाना बनाने चले गयी। मैं टीवी देखने लगा। लगभग डेढ़ घंटे गुजर गये तो दिव्या किचन से बाहर आयी। उसने मुझसे कुछ कहे बिना ही मेरा लंड मुँह में ले लिया और चूसने लगी।

मैंने पूछा, “अब क्या हुआ?”

वो बोली, “चुदवाना है।”

मैंने कहा, “पहले मुझे खाना खा कर थोड़ा आराम कर लेने दो। बहुत थक गया हूँ।”

वो बोली, “बाद में खा लेना, पहले तुम मुझे एक बार और चोद दो। मुझसे बर्दाश्त नहीं हो रहा है।”

तभी स्नेहा भाभी आ गयी। उन्होंने दिव्या से कहा, “सुबह से ही ये हम दोनों को कईं बार चोद चुका है। इसे खाना खा कर थोड़ा आराम कर लेने दे, फिर सारी रात खूब जम कर चुदवाना।”

वो बोली, “दीदी! मुझसे रहा नहीं जा रहा है। मेरा मन अजीब सा हो रहा है।”

स्नेहा भाभी ने मज़ाक करते हुए कहा, “अगर तू इतना ही तड़प रही है तो चल मेरे साथ किचन में… मैं तेरी चूत में बेलन घुसेड़ देती हूँ।”

दिव्या बोली, “फिर घुसेड़ दो ना। मैं आप को कुछ भी नहीं कहूँगी। शादी के पहले मैं अच्छी भली थी। शादी के बाद इन्होंने मेरी चुदाई करके मेरी चूत और गाँड में आग सी भर दी है। अब आप ही बताओ की मैं क्या करूँ?”

स्नेहा भाभी ने कहा, “थोड़ा सब्र करना सीख… आखिर ये भी तो आदमी है… थक गया है बेचारा।”

वो बोली, “एक बार ये मुझे और चोद दें। फिर मैं कभी भी इनसे चुदवाने की ज़िद्द नहीं करूँगी। जब भी मुझे जोश आयेगा मैं इनका लंड मुँह में लेकर चूसूँगी। उसके बाद ये मुझे चोदना चाहेंगे तो चोदेंगे।”

मैंने कहा, “ठीक है… आ जाओ मेरे पास।”

मैं सोफ़े पर बैठा था। दिव्या के चूसने से मेरा लंड खड़ा हो ही चुका था।

मैंने उससे कहा, “अब तुम खुद ही मेरे लंड को अपनी चूत में घुसेड़ लो और धक्के लगाओ।”

वो तुरंत ही मेरी जाँघों पर बैठ गयी और मेरे लंड को अपनी चूत के अंदर घुसेड़ लिया। उसके बाद उसने धक्के लगाने शुरू कर दिये। पाँच मिनट में ही वो हाँफने लगी और बोली, “मुझे इस तरह मज़ा नहीं आ रहा है। जब तुम खूब जोर-जोर के धक्के लगाते हुए मुझे चोदते हो… तब ही मुझे मज़ा आता है। चोद दो ना मुझे।”

मैंने कहा, “अच्छा बाबा, अब तुम मेरे सामने घोड़ी बन जाओ।”

वो तुरंत ही मेरे सामने घोड़ी बन गयी। उसकी चूत मेरी तरफ़ थी। मैं थोड़ा गुस्से में था। मैंने अपना लंड उसकी चूत में घुसा दिया और उसकी कमर को जोर से पकड़ लिया। उसके बाद मैंने बड़ी बेरहमी के साथ उसकी चुदाई शुरू कर दी।

स्नेहा भाभी कभी मुझे और कभी दिव्या को देख रही थी। उन्हें विश्वास ही नहीं हो रहा था की मैं दिव्या को इतनी बुरी तरह से भी चोद सकता हूँ। दिव्या भी बहुत सैक्सी निकली। मैं उसे बहुत ही बुरी तरह से चोद रहा था लेकिन उसे तो इस चुदाई में और ज्यादा मज़ा आ रहा था।

वो अपने चूतड़ आगे पीछे करते हुए पूरी मस्ती के साथ चुदवा रही थी। मैंने उसे लगभग पैंतालीस मिनट तक खूब जम कर चोदा। इस बार की चुदाई के दौरान दिव्या पाँच बार झड़ गयी थी। स्नेहा भाभी और मैं उसे देख कर दंग रह गये। दिव्या ने मेरे लंड को चाट कर साफ़ किया और फिर बाथरूम चली गयी। ये कहानी आप हमारी वासना डॉट नेट पर पढ़ रहे है.

स्नेहा भाभी ने मुझसे कहा, “तुमने उसे उसे इतनी बुरी तरह से चोदा… फिर भी उसे मज़ा आ रहा था। वो तो मुझसे भी ज्यादा सेक्सी है।”

मैंने कहा, “अभी वो नयी है इसलिये और उसे ज्यादा जोश आ रहा है। अभी तो उसने ज्यादा बार चुदवाया ही कहाँ है। केवल कुछ दिन आप मुझसे मत चुदवाओ। मुझे केवल दिव्या की चुदाई करने दो। मैं उसे इतनी ज्यादा बार और इतनी बुरी तरह से चोदूँगा की उसकी चूत और गाँड की आग ठंडी हो जायेगी। वो मुझसे रो-रो कर कहेगी की मुझे अब मत चोदो।”

स्नेहा भाभी ने कहा, “ठीक है।”

तभी दिव्या बथरूम से वापस आ गयी और बोली, “देवर-भाभी क्या बातें कर रहे हो?”

स्नेहा भाभी ने दिव्या से कहा, “मैं इसे समझा रही थी कि ये कुछ दिनों तक मेरी चुदाई ना करे। केवल खूब जम कर तुम्हारी चुदाई ही करे।”

दिव्या बोली, “आप ने तो मेरे मुँह की बात छीन ली। मैं भी यही चाहती थी।”

स्नेहा भाभी ने कहा, “मैं समझ सकती हूँ क्योंकि अभी तुम नयी-नयी हो और तुम्हारे अंदर जोश का ज्वालामुखी फूट रहा है। ये तुम्हारे चूत के ज्वालामुखी को अपने लंड के पानी से बुझा देगा… उसके बाद मैं भी चुदवाना शुरू कर दूँगी।”

दिव्या बोली, “दीदी, तुम एक दम ठीक कह रही हो।”

अगले चार दिनों तक भाभी तड़पती रही। उनका चेहरा एक दम उदास हो गया था। मैं केवल दिव्या की ही चुदाई करता रहा। दिव्या को चुदवाने में ही ज्यादा मज़ा आता था। मैंने दिव्या की खूब जम कर चुदाई की। उसने भी पूरी मस्ती के साथ मेरा साथ दिया और खूब जम कर चुदवाया। मैंने इन चार दिनों में उसे लगभग तीस बार बहुत ही बुरी तरह से चोदा था।

उसकी चूत का मुँह एक दम चौड़ा हो चुका था। अब उसका जोश कुछ ठंडा पड़ चुका था। अब तो वो कभी-कभी चुदवाने से इनकार भी करने लगी थी। दिव्या की विदाई भी होने वाली थी। उसे एक महीने के लिये मायके जाना था। पाँच दिन गुजर जाने के बाद वो मायके चली गयी। मायके जाते वक्त वो मुझसे लिपट कर बहुत रोयी।

मैंने पूछा, “क्या हुआ?”

उसने कहा, “एक महीने तक मैं बिना चुदवाये कैसे रहूँगी?”

मैंने कहा, “तुम्हें इतना सब्र तो करना ही पड़ेगा। सभी औरतों को शादी के बाद मायके तो जाना ही पड़ता है।”

वो मायके चली गयी। उसके जाने के बाद स्नेहा भाभी मुझसे लिपट गयी और फूट-फूट कर रोने लगी।

मैंने पूछा, “क्या हुआ?”

तो वो बोली, “तुम्हारे भैया का स्वर्गवास हो जाने के बाद मेरा जोश एक दम ठंडा हो गया था। मैं तुम्हारे साथ अकेली ही रहने लगी थी लेकिन मैंने कभी भी तुम्हें बुरी नज़र से नहीं देखा। मैं आराम से रहने लगी थी। तुम्हारा लंड देखने के बाद मुझे जोश आ गया और मैंने तुमसे चुदवा लिया। दिव्या को गाँड मरवाते हुये देख कर मैंने तुमसे गाँड भी मरवा ली।

उसमें भी मुझे बहुत मज़ा आया। तुमने मेरी चुदाई करके और मेरी गाँड मार कर मेरे सारे बदन में आग लगा दी है। पाँच दिनों से तुमने मुझे चोदा नहीं और ना ही मेरी गाँड मारी। मैंने ये पाँच दिन कैसे गुजारे हैं… मैं ही जानती हूँ। दिव्या तो अब एक महीने के लिये मायके चली गयी है। अब तुम मेरी चुत और गाँड की आग को पूरी तरह से बुझा दो।”

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मैंने कहा, “भाभी, मैंने तो इनकार नहीं किया है।”

वो बोली, “तुमने ऑफिस से शादी के लिये सात दिनों की छुट्टी ली थी… तुम सात दिनों की छुट्टी और ले लो… मैं भी अपने ऑफिस से छुट्टी ले लेती हूँ… फिर मुझे सात दिनों तक खूब जम कर चोदो… मुझे उसी तरह से चोदना जैसे कि उस दिन तुमने गुस्से में दिव्या को चोदा था।”

मैंने कहा, “तुम जैसा कहोगी… मैं तुम्हें वैसे ही चोदूँगा। मैं तुम्हें पूरी तरह से संतुष्ट कर दूँगा।”

स्नेहा भाभी ने सारे कपड़े उतार दिये और एक दम नंगी हो गयी। उन्होंने मेरा लंड चूसना शुरू कर दिया। दो मिनट में ही मेर लंड खड़ा हो गया तो मैंने ठीक उसी तरह से स्नेहा भाभी को चोदना शुरू किया जैसे मैंने दिव्या को गुस्से में चोदा था।

उस तरह की चुदाई से स्नेहा भाभी एक दम मस्त हो गयी। सात दिनों तक हम दोनों ऑफिस नहीं गये। मैंने इन सात दिनों में सारा दिन और सारी रात स्नेहा भाभी की खूब जम कर चुदाई की। उसके बाद दिव्या के आने तक मैंने उन्हें खूब चोदा। स्नेहा भाभी की चूत की आग भी कुछ हद तक बुझ चुकी थी। दिव्या के वापस आ जाने के बाद मैं उन दोनों की चुदाई करने लगा। अब वो दोनो ही मुझसे चुदवा कर पूरी तरह से खुश हैं और मैं भी।

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