Mummy Papa Ki Chudai
नमस्ते दोस्तों, मेरा नाम राजा है। यह मेरी पहली कहानी है, जो मेरे परिवार के इतिहास के उन पन्नों से निकली है जो पूरी तरह सत्य हैं। यह उस दौर की बात है जब हमारे खानदान की नींव तो सदियों पुरानी थी, लेकिन वक्त के साथ उसकी रवायतें दरकने लगी थीं। हम बिहार के एक रसूखदार जमींदार परिवार से ताल्लुक रखते हैं, जिसकी आन-बान का अंदाजा हमारी हजारों बीघा फैली जमीन से लगाया जा सकता था। Mummy Papa Ki Chudai
मेरे दादाजी अपनी रियासत और दबदबे के लिए दूर-दराज तक मशहूर थे। लेकिन अफसोस, जिस रसूख को उन्होंने सींचा था, उसे शराब की एक ऐसी लत लग गई कि वह हमें और अपनी उस विरासत को असमय ही मझधार में छोड़कर इस दुनिया से कूच कर गए।
दादाजी के जाने के बाद घर पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा। उस वक्त मेरे पिता महज एक अबोध बालक थे और बुआ अभी दादी की गोद में ही खेल रही थीं। महज तीस साल की उम्र में दादी के सिर से सुहाग का साया उठ गया था। आस-पास के लोगों और विरोधियों को लगा कि अब यह जमींदारी ताश के पत्तों की तरह बिखर जाएगी।
लेकिन उन्हें अंदाजा नहीं था कि मेरी दादी किसी साधारण मिट्टी की नहीं बनी थीं। वे खुद एक संपन्न जमींदार घराने की बेटी थीं; उनके रसूख और दिलेरी उनके खून में रची-बसी थी। उन्होंने वक्त के आगे घुटने टेकने या कोने में बैठकर आंसू बहाने के बजाय अपनी साड़ी का पल्लू कमर में खोंसा और एक ‘मर्दानी’ की तरह पूरी रियासत की कमान अपने हाथों में ले ली।
धूप से तपते खेत-खलिहानों से लेकर कचहरी की पेचीदा बहसों तक, दादी ने अकेले दम पर हर चुनौती से लोहा लिया। उन्होंने कभी यह महसूस नहीं होने दिया कि घर में किसी मर्द का साया नहीं है। उनकी काबिलियत का लोहा पूरा इलाका मानने लगा था। उन्होंने न केवल ढहती हुई जमींदारी को संभाला, बल्कि पिता और बुआ की परवरिश में भी कोई कसर नहीं छोड़ी।
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पिता इकलौते बेटे थे, इसलिए दादी ने अपनी सारी ममता और भविष्य की उम्मीदें उन्हीं पर केंद्रित कर दीं। उनकी शिक्षा का इंतजाम सबसे बेहतरीन तरीके से किया गया, ताकि वे अपने पिता की परछाईं बनकर बर्बाद न हों, बल्कि खानदान के नाम को एक नई चमक दे सकें।
वक्त का पहिया अपनी रफ्तार से घूमता रहा और मेरे पिता अब वह अबोध बालक नहीं रहे थे जो दादी के आंचल में पनाह लेते थे। शहर के विश्वविद्यालय से अपनी शिक्षा पुरी कर जब वे राँची विश्वविद्यालय में वनस्पति विज्ञान (बॉटनी) के प्रोफेसर बनकर लौटे, तो उनकी उम्र महज 25 वर्ष थी।
पापा का व्यक्तित्व किसी को भी प्रभावित करने के लिए काफी था। करीब 5 फीट 10 इंच का कद, गोरा रंग, और गठीला बदन—उन्हें देखकर अभिनेता धर्मेंद्र की याद ताजा हो जाती थी। उनकी आँखों में वही पुराना जमींदारी रौब था, जो उन्हें अपने पिता की परछाईं साबित करता था।
उनकी चौड़ी छाती और उभरी हुई मांसपेशियां उनके अनुशासन और सेहत के प्रति लगाव को दर्शाती थीं। प्रोफेसर की इस गरिमा और जमींदारी विरासत के साथ उनके जीवन का नया अध्याय शुरू हुआ। करीब तीन वर्षों के भीतर ही, धूमधाम के साथ उनका विवाह मेरी माँ से संपन्न हुआ, शादी के बाद हमारा परिवार और विस्तार पा गया।
हम तीन भाई-बहन इस दुनिया में आए—दो प्यारी बहनें, जिनका पुकारू नाम दादी ने बड़े चाव से ‘रानी’ और ‘राजकुमारी’ रखा था। दादी को हम तीनों से अगाध प्रेम था और हमारे नामकरण में भी उनकी उसी ममता की झलक मिलती थी। मेरी माँ का व्यक्तित्व भी पिता की तरह ही प्रभावशाली था। ये कहानी आप हमारी वासना डॉट नेट पर पढ़ रहे है.
करीब 5 फीट 6 इंच का कद, सुंदर नैन-नक्श और सुडौल काया—उन्हें देखकर कोई अंदाजा भी नहीं लगा सकता था कि वे तीन बच्चों की माँ हैं। वे न केवल रूपवती थीं, बल्कि काफी पढ़ी-लिखी और काबिल भी थीं। उन्होंने सरकारी बाबू की परीक्षा भी ससम्मान उत्तीर्ण कर ली थी। लेकिन यहाँ उनके सपनों का सामना दादी की उन रूढ़िवादी जड़ों से हुआ, जो खानदान की ‘मर्यादा’ और पुरानी रवायतों में जकड़ी थीं।
दादी के भारी दबाव और उनकी सख्त सोच के आगे माँ को घुटने टेकने पड़े। एक होनहार करियर की बलि चढ़ गई और उन्होंने कभी नौकरी नहीं की। इस तरह, एक काबिल सरकारी अफसर बनने का सपना घर की चारदीवारी और ममता के आंचल में कहीं सिमट कर रह गया।
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यह किस्सा 90 के दशक के उन सुनहरे दिनों का है, जब मेरी उम्र करीब ** साल रही होगी। मेरी छोटी बहन रानी ** साल की थी और नन्हीं राजकुमारी अभी महज ** बरस की। उस दौर में पापा अपनी काबिलियत के दम पर वनस्पति विज्ञान (बॉटनी) विभाग के ‘विभागाध्यक्ष’ (HOD) बन चुके थे।
तब उनकी उम्र 36 के आसपास रही होगी और माँ अपने जीवन के 29वें वसंत में थीं। उन दिनों राँची आज की तरह शोर-शराबे से भरा शहर नहीं था। विकास की रफ्तार धीमी थी और बिजली का कोई भरोसा नहीं होता था—वह अपनी मर्जी से आती और जाती रहती थी।
हम विश्वविद्यालय के एक सरकारी बंगले में रहते थे, जो पुराना होने के बावजूद अपनी एक अलग गरिमा रखता था। बिजली की इसी कमी ने हमें अपनों के और करीब ला दिया था। बिजली कम रहने के कारण अक्सर हम शाम ढलते ही जल्दी खाना खा लेते और अंधेरा गहराने से पहले ही नींद की आगोश में समा जाते थे।
वह एक ऐसा दौर था जहाँ रातें ठंडी एवम् शांत थीं और रिश्तों में गर्माहट। अकसर गर्मियों की रातों में हमारा बसेरा आंगन के खुले आसमान के नीचे होता था, जबकि आम दिनों में हम बंगले के भीतर कमरों में सिमट जाते थे। हम तीनों भाई-बहन अभी छोटे थे, इसलिए पापा-मम्मी के कमरे में ही हमारा भी बिस्तर लगता था।
वे दोनों एक दीवान पर सोते और हम तीनों के लिए पास ही दूसरा पलंग बिछा होता था। जिंदगी अपनी इसी सहज लय में गुजर रही थी कि एक रात कुदरत ने करवट ली। हम आंगन में गहरी नींद में थे कि अचानक धूल भरी आंधी और बारिश की बौछारों ने हमें झकझोर दिया।
उस कच्ची नींद और अफरा-तफरी में हम अपना-अपना बिस्तर समेटकर कमरों की ओर भागे। बाहर मौसम का मिजाज बिगड़ा तो बिजली ने भी साथ छोड़ दिया और पूरा बंगला स्याह अंधेरे में डूब गया। माँ ने आनन-फानन में मच्छरदानी गिराई और हमें भीतर सुला दिया।
नन्ही राजकुमारी तो थकी-हारी बेसुध होकर सो गई, लेकिन अचानक टूटी नींद के कारण मेरी और रानी की आँखों से नींद कोसों दूर थी। बाहर बारिश का शोर था और कमरे के भीतर भारी खामोशी। हम दोनों बस आँखें मूँदे निस्तब्ध पड़े थे, जैसे सोने का ढोंग कर रहे हों, पर हमारा ध्यान कमरे की हर छोटी आहट पर था।
कमरे में पसरे उस सन्नाटे और अंधेरे के बीच माँ भी पापा के पास दीवान पर सुस्ताने चली गईं। तभी पापा की थकी हुई आवाज गूँजी, उन्होंने माँ से अपने पैरों में मालिश करने को कहा। माँ ने अंधेरे की ओर इशारा करते हुए धीमे से कहा, ‘इतने घने अंधेरे में तेल की शीशी कहाँ ढूँढूँगी?’
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पापा ने सिरहाने रखी टॉर्च जलाई, उसकी पीली रोशनी ने कमरे के एक कोने को रोशन किया। तेल की कटोरी माँ के हाथ में थमाकर उन्होंने टॉर्च बुझा दी। कमरा एक बार फिर स्याह अंधेरे की चादर में लिपट गया। माँ ने अंधेरे में ही सधे हुए हाथों से मालिश शुरू की। ये कहानी आप हमारी वासना डॉट नेट पर पढ़ रहे है.
पापा उस वक्त पजामे में थे, लेकिन मालिश में बाधा आते देख माँ ने सहजता से उसे हटाने को कहा। पापा अब सिर्फ अपने अंतःवस्त्रों में थे और माँ पूरी तल्लीनता से उनके पैरों की थकान मिटा रही थीं। कुछ देर बाद, पापा ने करवट बदलते हुए बड़े लाड़ से कहा, ‘अब दूसरी टांग पर भी लगा दो, मेरी जान!’
मच्छरदानी के उस पार, लेटे-लेटे मेरे कान खड़े हो गए। वह ‘जान’ शब्द मेरे कानों में किसी जादुई गूँज की तरह टकराया। वह पहली बार था जब मैंने पापा को माँ के लिए ऐसे किसी शब्द का इस्तेमाल करते सुना था। शायद एकांत में उनकी बातचीत का लहजा यही रहा हो, लेकिन उस अंधेरी रात में एक आठ साल के बच्चे के लिए वह संबोधन जितना अनजाना था, उतना ही मन में एक अजीब सी हलचल पैदा करने वाला भी।
मम्मी की दबी-दबी सी शरारती हंसी उस सन्नाटे में तैर गई। उन्होंने फुसफुसाते हुए पूछा, ‘क्या तीनों सो गए होंगे?’ पापा को शायद यकीन नहीं था। उन्होंने फिर से टॉर्च जलाई और उसकी चुभती हुई तेज रोशनी बारी-बारी से हम तीनों के चेहरों पर डाली। मेरी पलकें थरथरा रही थीं, लेकिन मैंने सांसें रोककर गहरी नींद का नाटक जारी रखा।
रानी भी पत्थर की मूरत बनी पड़ी थी। तसल्ली होने पर टॉर्च बुझ गई। अंधेरा होते ही मम्मी ने एक आखिरी बार हमें आवाज देकर परखा, और जब कोई जवाब नहीं मिला, तो कमरे की हवा का मिजाज ही बदल गया। मालिश करते-करते मम्मी की आवाज में अब एक अलग तरह की भारीपन और ललक थी।
वे दबी जुबान में बोलीं, ‘जान, अब ये अंडरवियर भी हटा दो… मैं तुम्हारी इस ‘मुसल लण्ड’’ की भी सेवा कर देती हूँ।’ उन्होंने पापा के उस कठोर और मुसल जैसे अंग को सहलाते हुए कहा, ‘तीन बच्चे हो गए, फिर भी जब ये मेरी बुर उतरता है तो आज भी मेरी जान निकल जाती है। इसमें अच्छे से तेल लगा लेने दो, ताकि ये मेरी बुर की गहराई में आसानी से समा सके।’
मच्छरदानी के पीछे दुबके हम दोनों भाई-बहन उन शब्दों से पूरी तरह अनजान थे, लेकिन उस रात के उस ‘प्राइवेट’ खेल ने हमारे भीतर एक अजीब सा कौतूहल और सिहरन भर दी थी। पापा की भारी होती सांसें और मम्मी की वो बेबाक बातें… उस अंधेरे कमरे में कुछ ऐसा घट रहा था जिसने हमारे बचपन की मासूमियत को एक झटके में हिला कर रख दिया था।
बाहर आंधी का शोर थमा तो बारिश की बूंदों की टिप-टिप संगीत की तरह गूँजने लगी। हवाएं अब भी बंगले के झरोखों से टकरा रही थीं। तभी पल भर के लिए बिजली आई और फिर अचानक से चली गई, लेकिन उस एक पल के उजाले ने मेरे सामने की पूरी दुनिया बदल दी।
मेरे दोस्तों ने अक्सर कहानियाँ सुनाई थीं कि रात के सन्नाटे में मम्मी-पापा के बीच ‘अजीब सी लड़ाई’ होती है। वे कहते थे कि अंधेरे में पापा मम्मी को मारते-पीटते हैं और उनके ऊपर चढ़ जाते हैं। मैं उसी खौफ और जिज्ञासा के साथ अपनी पलकें अधखुली रखकर उस दीवान की ओर ताक रहा था। लेकिन जो दृश्य मेरे सामने था, वह किसी भी ‘लड़ाई’ की परिभाषा से परे था।
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मुझे अपनी आँखों पर यकीन नहीं हो रहा था। वहाँ कोई मारपीट नहीं हो रही थी, बल्कि एक अलग ही समर्पण का खेल चल रहा था। मम्मी, जिन्हें मैं हमेशा एक शांत और मर्यादा में रहने वाली महिला के रूप में देखता था, वे पापा के पैरों के बीच घुटनों के बल बैठी थीं।
वे पापा के उस विशाल और कठोर अंग को, जिसे वे ‘मुसल लण्ड’ कह रही थीं, अपनी जुबान से बड़ी शिद्दत से सहला रही थीं। वह कोई नफरत या हिंसा नहीं थी, बल्कि एक ऐसी उत्तेजना भरी तैयारी थी जिसकी गहराई मेरा आठ साल का दिमाग समझ नहीं पा रहा था।
वह दृश्य मेरे मन में घर कर गया—वह लड़ाई नहीं, बल्कि दो जिस्मों के बीच की एक ऐसी रवायत थी जिसे समाज की नजरों से छिपाकर अंधेरे में खेला जा रहा था। बाहर कड़कती बिजली की गड़गड़ाहट ने रानी को भीतर तक झकझोर दिया। वह बुरी तरह डर गई और रेंगती हुई बिस्तर पर मुझसे चिपक गई।
मैंने अपनी छोटी बहन को अपनी बाहों के घेरे में ले लिया और अपनी पतली चादर उसके चेहरे पर डाल दी। पर वह चादर नाममात्र की थी; उसकी झीनी बुनावट के आर-पार कमरे का हर मंजर धुंधला ही सही, पर साफ नजर आ रहा था। सन्नाटे में डूबे उस कमरे में मम्मी के चूसने और चाटने के साथ उनकी चुड़ियों की झनकार की आवाजें किसी गहरी गुंजन की तरह गूँज रही थीं।
तभी अचानक आसमान की बिजली चमकी और एक क्षण के लिए कमरा दूधिया रोशनी से नहा उठा। उस रोशनी ने दीवान पर चल रहे उस कामुक आसन को पूरी तरह उजागर कर दिया—मम्मी, पापा के उस विशाल लण्ड को पूरी शिद्दत से अपने मुँह के भीतर समाए हुए थीं। ये कहानी आप हमारी वासना डॉट नेट पर पढ़ रहे है.
पापा के गले से एक लंबी आह निकली, जिसमें एक अजीब सा भारीपन और जुनून था। उन्होंने जोशीले अंदाज में फुसफुसाते हुए कहा, ‘मेरी कुतिया… आज मुझे तेरी बुर का अमृत पीना है।’ उन्होंने मम्मी को झटके से बिस्तर पर लिटाया और उनकी नाइटी और चड्डी खोल कर दोनों टांगों को किसी चौड़े दरवाजे की तरह खोल दिया।
अगले ही पल, पापा का सिर मम्मी की जांघों के बीच था और उनके चाटने की लपलपाती आवाजें कमरे की खामोशी को चीरने लगीं। इसी बीच, बिजली अपनी मद्धिम पीली रोशनी के साथ वापस आ गई। हम दोनों भाई-बहन, अधखुली आँखों से उस मंजर को देख रहे थे, जहाँ हमारे सभ्य और अनुशासित माता-पिता अपनी मर्यादा की खाल उतारकर एक-दूसरे के जिस्म में डूबे हुए थे।
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बिजली की मद्धिम पीली रोशनी ने उस कमरे के सन्नाटे को एक अजीब सी चमक से भर दिया। हमारे सभ्य और अनुशासित माता-पिता अब पूरी तरह निर्वस्त्र थे। उस नग्नता में वे किसी यूनानी मूर्तियों की तरह सुंदर और आकर्षक लग रहे थे। एक पल के लिए वे रुके और बड़ी बारीकी से हम तीनों का मुआयना किया।
पापा की नजर मुझ पर और रानी पर पड़ी। उन्होंने धीमे से मुस्कुराते हुए माँ से कहा, ‘देखो, राजा अपनी बहन को कैसे बाहों में समेटे सोया है… बिल्कुल वैसे ही जैसे दोनों एक-दूसरे की ढाल बने हों।’ पापा के उन शब्दों ने मेरे भीतर एक सिहरन पैदा कर दी, लेकिन मैंने अपनी आँखें पत्थर की तरह बंद रखीं।
जैसे ही उन्हें यकीन हुआ कि हम गहरी नींद में हैं, वे फिर से उसी आदिम खेल में डूब गए। माँ ने अपनी गोरी और सुडौल टांगें किसी आमंत्रण की तरह फैला दीं और बड़ी बेबाकी से बोलीं, ‘जान, अब और इंतज़ार नहीं होता… इसे अपनी जुबान से सराबोर कर दो।’
मैंने मां के बुर के होंठों(clitoris hood) में एक सोने से मढ़ा हुआ हीरे का एक नथ देखा तो बड़ा ताज्जुब हुआ खैर ये खानदानी रवायतें थी, और पापा बिना देर किए माँ की जांघों के बीच झुक गए। चाटने की आवाजें अब पहले से ज्यादा तेज और गीली थीं। पापा ने मदहोशी में डूबकर कहा, ‘जान, तुम्हारे इस झरने का पानी पीने में जो मजा शादी के पहले दिन था, वो आज भी वैसा ही है… बिल्कुल शुद्ध और नशीला।’
माँ ने पापा के बालों को अपनी उंगलियों में जकड़ लिया और उनकी सिसकारियां कमरे की दीवारों से टकराने लगीं। कुछ ही पलों में माँ की सांसें उखड़ने लगीं, उनके शरीर में एक अजीब सी ऐंठन होने लगी। उन्होंने हड़बड़ाते हुए कहा, ‘मेरे कुत्ते… अपनी जीभ और अंदर तक डालो, मैं… मैं अब छूटने वाली हूँ!’
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पापा भी किसी जुनूनी शिकारी की तरह उस अमृत को सोखने में लगे रहे, जबकि हम दोनों भाई-बहन उस मच्छरदानी के पीछे अपनी सांसें रोके इस विस्मयकारी मंजर के गवाह बने रहे। माँ का पूरा शरीर अचानक बिजली के झटके की तरह कांपने लगा। उनके भीतर से फूटते उस अहसास को पापा ने अपनी हथेलियों और मुँह में भर लिया।
कुछ पल के लिए माँ बिल्कुल शांत और निहाल होकर दीवान पर पसर गईं। लेकिन यह तो बस आगाज़ था। अब पापा के भीतर का वह जमींदारी जुनून उफान पर था। उन्होंने माँ की टांगों को अपने मजबूत हाथों में फंसाया और उनके चेहरे को चूमते हुए फुसफुसाए, ‘मेरी प्यारी कुतिया… अब तैयार हो जाओ।’
माँ की आँखों में एक अजीब सी चमक और विद्रोह था। उन्होंने पापा की उत्तेजना को चरम पर पहुँचाने के लिए उस शब्द का इस्तेमाल किया जिसने कमरे के सन्नाटे को चीर दिया—’तैयार हूँ बहन चोद डाल दो अपना मुसल मेरे बुर में!’ वह गाली महज एक शब्द नहीं थी, बल्कि उस छिपे हुए राज की गूँज थी जिसे पूरा खानदान दबाए बैठा था। ये कहानी आप हमारी वासना डॉट नेट पर पढ़ रहे है.
जैसे ही पापा का वह मुसल जैसा अंग माँ के बुर में भीतर उतरा, उनकी आँखें उलट गईं और एक दर्दभरी मिठास उनके चेहरे पर छा गई। पापा के भीतर के जानवर को जगाने के लिए माँ अब बुआ का जिक्र करने लगी थीं। वे ऐसी बातें कह रही थीं जो किसी भी सभ्य समाज के लिए वर्जित थीं, लेकिन उस बंद कमरे में वे आग में घी का काम कर रही थीं।
माँ ने ललकारते हुए कहा, ‘मेरे साथ वो करो कि तुम्हें अपनी बहन याद आ जाए!’ यह सुनते ही पापा की रफ्तार दुगनी हो गई। कमरे में माँ की पायल की रुनझुन, उनकी सिसकारियां और पुराने दीवान के चरमराने की आवाजें एक अजीब सा शोर पैदा कर रही थीं।
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हम दोनों भाई-बहन उस मच्छरदानी के पीछे दुबके हुए उस कौतूहल और डर के बीच झूल रहे थे, जहाँ हमारे परिवार की मर्यादा की हर दीवार ढह चुकी थी। कमरे की उमस और जिस्मों की गर्मी अब अपने चरम पर थी। माँ की योनि से बहते तरल और तेल की चिकनाई ने पापा के उस मुसल जैसे अंग की राह आसान कर दी थी; वह बिना किसी रुकावट के सरपट अंदर-बाहर हो रहा था।
दोनों के शरीर पसीने से तरबतर थे और सांसों की गति किसी दौड़ते हुए घोड़े की तरह तेज हो चुकी थी। जोश और जुनून के उस आलम में वे एक-दूसरे को पागलों की तरह चूम रहे थे; कभी पापा माँ के निप्पलों को अपने दाँतों से काटते, तो कभी उन्हें पूरी शिद्दत से चूसने लगते।
कुछ देर बाद, पापा की आवाज़ में एक भारीपन और जल्दबाज़ी सुनाई दी। उन्होंने हाँफते हुए पूछा, ‘मुँह में लोगी या… मेरा पानी आने वाला है?’ माँ ने एक बार फिर उस वर्जित राज को हवा दी और उत्तेजना से भरकर बोलीं, ‘मुँह में डाल… बिल्कुल वैसे ही जैसे अपनी बहन को पिलाते हो!’
पापा ने बिना एक पल गँवाए अपना वह विशाल अंग माँ के मुँह के भीतर कंठ तक उतार दिया। चंद लम्हों के संघर्ष के बाद, पापा के शरीर में एक थरथराहट हुई और उन्होंने अपना सारा सफेद, गाढ़ा और चिपचिपा गुबार माँ के मुँह में खाली कर दिया। उस वीर्य को किसी अमृत की तरह पीकर माँ शांत हुईं और पापा भी निहाल होकर उनके ऊपर ही ढह गए।
वो दोनों नग्न अवस्था में ही एक-दूसरे से चिपक कर सो गए। बाहर बारिश थम चुकी थी, लेकिन हमारे भीतर सवालों का एक सैलाब उमड़ रहा था। मैं और रानी, मच्छरदानी की ओट में दुबके, उस विस्मयकारी और डरावने मंजर के बारे में सोचते-सोचते न जाने कब नींद की आगोश में चले गए।
वक्त की परतों ने धीरे-धीरे उन शब्दों से धूल हटानी शुरू की, जो उस रात मैंने मच्छरदानी के पीछे सुने थे। जिसे हमने एक ‘बीमारी’ समझा था, वह दरअसल उस खानदान का सबसे गहरा और अंधेरा राज था। बुआ को हिस्टीरिया के दौरे पड़ते थे और दादी—वही ‘मर्दानी’ दादी जिन्होंने जमींदारी बचाई थी—उन्होंने ही यह तय किया था कि बुआ का इलाज किसी डॉक्टर के पास नहीं, बल्कि पापा के बिस्तर पर होगा।
बचपन की वे धुंधली यादें अब साफ होने लगी थीं, जब मैंने दादी को खुद अपने हाथों से पापा, मम्मी और बुआ को एक ही कमरे में भेजते देखा था। माँ ने उस ‘वर्जित’ रिश्ते का विरोध करने के बजाय, बुआ को अपनी सगी बहन की तरह स्वीकारा और उन्हें रतिक्रीड़ा के उन गुप्त पाठों को उनसे सीखा जो वो नहीं जानती थी।
आज बुआ बिहार सरकार में एक बेहद ऊँचे और सम्मानजनक पद पर आसीन हैं। जब भी उनका काफिला हमारे दरवाजे पर रुकता है, तो पूरा मोहल्ला उनके रसूख और खूबसूरती को देखकर दंग रह जाता है। वे जब आती हैं, तो घर खुशियों से भर जाता है—हम बच्चों के लिए ढेर सारे चाकलेट, महंगे कपड़े और खिलौने। ये कहानी आप हमारी वासना डॉट नेट पर पढ़ रहे है.
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उनका व्यक्तित्व इतना भव्य है कि कोई कल्पना भी नहीं कर सकता कि उनके भीतर एक ऐसा खालीपन है जिसे उनके पति का साथ कभी नहीं भर पाया। हैरानी की बात यह है कि आज भी, जब वे घर आती हैं, तो समाज की नजरों में वे एक ‘सम्मानित अतिथि’ होती हैं, लेकिन रात ढलते ही उस पुराने बंगले के उसी कमरे में वे तीनों आज भी एक साथ सिमट जाते हैं। बुआ के कोई बच्चे नहीं हैं, शायद इसीलिए उनका सारा वात्सल्य हम भाई-बहनों पर बरसता है।
बाहर से वह घर आज भी एक संस्कारी जमींदार परिवार का प्रतीक है, जहाँ मर्यादा की बातें होती हैं। लेकिन उस भव्य स्वागत और हंसी-मजाक के पीछे एक ऐसा चेहरा भी है जिसे सिर्फ उस घर की दीवारें और हम जैसे वे बच्चे जानते हैं, जिनकी मासूमियत उस रात आंधी और बारिश के शोर में कहीं खो गई थी। यह उस रसूखदार खानदान की वह सत्य कथा है, जहाँ रवायतें तो बदलीं, लेकिन रिश्तों की परिभाषाएं हमेशा के लिए धुंधला गईं। कहानी शेष है, अगले भाग में.
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