Village Jungle Sex
तो दोस्तों, ये काफी पहले की बात है। तब मैं कॉलेज में पहली साल में था। जनवरी के महीने में मैं अपने कजिन के यहाँ गया था। वे लोग गाँव में रहते थे, तो मुझे गाँव की लाइफस्टाइल के बारे में जानने का मौका मिला। शायद उन दिनों कॉलेज में चुनाव का समय था और मैं कॉलेज पॉलिटिक्स से दूर रहता था। Village Jungle Sex
मेरे कजिन के यहाँ 4-5 भाई थे और वे सब जॉइंट फैमिली में रहते थे। उस समय मेरे 3 कजिन की शादी हो चुकी थी और 2 कुँवारे थे। इस तरह करीब 12-14 सदस्यों की काफी बड़ी फैमिली थी। उन लोगों की करीब 20-25 एकड़ जमीन थी, जिसमें से करीब 10-12 एकड़ में गन्ना लगा हुआ था और बाकी में मौसमी फसलें जैसे गेहूँ, दालें आदि।
सर्दियों के समय गाँव में सभी लोग लकड़ी लेने के लिए जंगल में जाते थे। मेरे कजिन की फैमिली से भी लोग उन दिनों सुबह करीब 7 बजे जंगल सूखी लकड़ी लेने के लिए बैलगाड़ी लेकर जाते थे। मेरे कजिन के यहाँ भी एक बैलगाड़ी थी जिस पर जीप के पहिए और नायलॉन टायर लगे हुए थे।
उसे लोग बैलगाड़ी न कहकर लोकल भाषा में “डनलप” या ऐसा ही कुछ कहते थे क्योंकि उसमें डनलप के टायर लगे हुए थे। तो दोस्तों, मुझे भी जंगल घूमने का शौक था और गाँव में घूमने को खेतों और जंगल के अलावा कुछ था भी नहीं, तो मैं भी रोज उन लोगों के साथ जंगल जाने लगा।
जंगल में पड़ोस के लोग भी हमारे साथ जाते थे और सारी बैलगाड़ियाँ आगे-पीछे चलती थीं। जंगल शुरू होते ही सब अलग-अलग दिशाओं में निकल जाते थे। जब मैं पहला दिन जंगल गया तो हमारी गाड़ी (बैलगाड़ी) में मेरे दो कजिन और एक भाभी थे। धीरे-धीरे हम सब लोग गाँव से जंगल की तरफ बढ़ने लगे।
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हमारी गाड़ी के साथ ही हमारे पड़ोस में रहने वाले पड़ोसियों की गाड़ी भी थी, जिसमें पड़ोसी और उसकी पत्नी थे। जब हम जंगल के पास पहुँचे तो दोनों ने अपनी गाड़ियाँ एक साथ कर लीं। क्योंकि हम लोग ज्यादा थे और वे केवल दो ही थे, तो हममें से फैसला हुआ कि एक-दो लोग उन्हें भी लकड़ी इकट्ठा करने में मदद करेंगे।
मैं तो उन लोगों के साथ विजिटर था, मेरे बस की बड़े-बड़े पेड़ों से सूखी लकड़ी काटना या पेड़ पर चढ़ना तो पॉसिबल नहीं था। पर मैं भी एक मेंबर तो था ही और मुझे भी कुछ करना तो था ही। जब जंगल में पहुँचे तो गाड़ी एक जगह खड़ी करके सभी दो-दो के ग्रुप में इधर-उधर हो गए।
मैं भी एक ग्रुप में आ गया और मेरी पार्टनर थी वही मेरे कजिन की पड़ोसन। क्योंकि वह पेड़ पर चढ़ सकती थी और लकड़ी काट सकती थी और मैं सिर्फ इकट्ठा करके गाड़ी पर रख सकता था। तो मैं एक कमजोर मेंबर था, इसलिए मैं पड़ोस वाली भौजी के साथ हो गया।
भौजी का नाम वैसे रमा था, पर मेरे लिए भौजी बोलना भी मुश्किल था क्योंकि टाउन में तो भाभी कहते हैं ना, पर वहाँ भाभी कहना भी बड़ा अटपटा था क्योंकि वहाँ की भाषा एकदम अलग थी। पर मैं जैसे-तैसे “हुन” “हन” से ही काम चला लेता था और कभी-कभी भौजी भी कह देता था।
भौजी वाले भाई साहब भी एक ग्रुप में लकड़ियाँ ढूँढने निकल पड़े। जंगल में बड़े-बड़े पेड़ों के बीच बहुत ऊँची घास थी, तो कहीं जबरदस्त झाड़ियाँ और कहीं बड़े-बड़े गड्ढे और कहीं बड़े-बड़े बोल्डर (बड़े पत्थर) थे। मैं और भौजी भी लकड़ी ढूँढते हुए गाड़ी वाली जगह से करीब 400-500 मीटर दूर निकल आए।
तो मैंने भौजी से कहा कि हम बहुत दूर आ गए हैं, कहीं रास्ता भूल गए तो? भौजी बोली उसकी चिंता मत करो, उसे सारे रास्ते पता हैं और ये कोई ज्यादा दूर नहीं है। कभी-कभी तो 1-2 किलोमीटर तक निकलना पड़ता है। इस बीच हम लोगों ने थोड़ी बहुत लकड़ी जमीन से इकट्ठा करके एक जगह पर रखनी शुरू कर दी थी।
भौजी मेरे से मेरे बारे में पूछने लगी कि मैं क्या करता हूँ। तो मैंने बताया कि कॉलेज में पढ़ता हूँ। तो वह कॉलेज के बारे में पूछने लगी। उन्होंने मुझसे ये भी पूछा कि क्या कॉलेज में तुम्हारे साथ लड़कियाँ भी पढ़ती हैं? तो मैंने कहा हाँ। बस हम ऐसे ही बातें करते हुए लकड़ियाँ इकट्ठा करके एक जगह पर रखने लगे।
अचानक हमें एक पेड़ नजर आया जो आधा सूखा हुआ था और जिससे सूखी लकड़ी काटी जा सकती थी। भौजी ने मुझसे पूछा कि क्या मैं पेड़ पर चढ़ सकता हूँ? तो मैंने मना कर दिया। उस पेड़ की हाइट करीब 15-20 मीटर के करीब थी और वह काफी मोटा भी था, पर उसमें ऊपर काफी सूखी हुई ब्रांचेस थीं।
अब भौजी ने पेड़ पर चढ़ने का फैसला किया। पहले उन्होंने अपनी साड़ी ऊपर से उतारकर अच्छी तरह से अपने पेटीकोट पर लपेट ली और उसके बाद पेटीकोट को थोड़ा ढीला करके उसे ऊपर से एक-दो फोल्ड करके थोड़ा ऊँचा कर लिया, जिससे वह अब उनके घुटने और पैर के जस्ट हाफ हाइट तक हो गया था।
उसके बाद वह पेड़ पर चढ़ने लगी तो उनका पेटीकोट और साड़ी और ऊपर हो रही थी, जिससे मुझे उनकी नंगी गोरी टांगें एकदम चिकनी दिखाई दे रही थीं और उनका पेटीकोट करीब घुटने तक पहुँच रहा था। थोड़ी देर में ही वह पेड़ पर जाकर सूखी ब्रांचेस को काटकर नीचे गिराने लगी और मैं नीचे से उन्हें इकट्ठा करने लगा। ये कहानी आप हमारी वासना डॉट नेट पर पढ़ रहे है.
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एक बार जब वह एक ब्रांच को काट रही थी तो भौजी ने एक पैर एक ब्रांच पर और दूसरा पैर ऊपर घुटने से मोड़कर दूसरी ब्रांच पर रख रखा था और वह ब्रांच को काट रही थी। मैं नीचे जमीन पर था और ऊपर कटी लकड़ी को पकड़ने के लिए देख रहा था, पर अचानक मेरा ध्यान लकड़ी की बजाय कहीं और पहुँच गया।
मेरे ठीक ऊपर भौजी की नंगी टांगें, जाँघें, रान और यहाँ तक कि चूत का एरिया भी दिखाई दे रहा था। उनकी टांगें एकदम गोरी थीं और जैसे-जैसे मैंने दोबारा ऊपर को देखा तो टांगों के ऊपर थाइज एकदम गुलाबी थीं और उससे ऊपर का एरिया लाल था। पर चूत के आसपास घनी झाड़ियाँ थीं और बालों की वजह से कुछ साफ दिखाई नहीं दे रहा था।
पर मुझे तो उस समय सब जन्नत का नजारा लग रहा था। मन कर रहा था कि जाकर पैर से लेकर ऊपर तक सारे एरिया को चूम लूँ। पर मैं ऐसा नहीं कर सकता था, क्योंकि मैं करीब 4-6 मीटर नीचे था। किसी औरत को नीचे से नंगा देखने का शायद मेरा पहला मौका था। मेरा बॉडी मस्त हो रही थी पर एक्साइटमेंट में मुझे डर भी लग रहा था कि कहीं भौजी को पता चल गया तो मेरी कितनी बेइज्जती होगी।
मैं कभी ऊपर देखता और कभी शर्म सी आने पर रुक जाता, पर एक्साइटमेंट की वजह से फिर ऊपर देखने लगता। आधे-एक घंटे में भौजी ने उस पेड़ से करीब सारी सूखी ब्रांचेस काटकर नीचे गिरा दी और मैं उन्हें एक जगह पर इकट्ठा कर लिया। फिर भौजी पेड़ से नीचे उतरने लगी।
पर एक समस्या थी — वह ऊपर तो चढ़ गई पर नीचे उतरना मुश्किल लग रहा था क्योंकि पेड़ की ब्रांच और ग्राउंड में दूरी ज्यादा थी और वह उतनी हाइट से जंप नहीं कर सकती थी। भौजी ने मुझसे कहा कि मैं नीचे जंप करूँगी तो तुम मुझको थोड़ा सपोर्ट देना, जिससे मैं सीधा नीचे ग्राउंड पर न गिर पड़ूँ।
वैसे ग्राउंड पर घास थी पर उतनी हाइट से डायरेक्ट गिरने पर डिस्बैलेंस होने का खतरा था, जिससे चोट लग सकती थी। मैं भी भौजी को बीच में पकड़ने को तैयार हो गया। आइडिया ये था कि वह बीच में मेरे सपोर्ट से डबल जंप करके नीचे उतर जाएंगी।
पर हुआ कुछ उल्टा ही। जैसे ही भौजी ने नीचे को जंप लगाई तो मैं उनके वजन और फोर्स को कंट्रोल नहीं कर पाया और जैसे ही मैंने उनको थामना चाहा तो हम दोनों धड़ाम से ग्राउंड पर गिर पड़े। असल में जब भौजी ने नीचे को जंप लगाया तो भौजी का पेटीकोट और साड़ी हवा के फोर्स से उनकी थाई तक आ गई, जिसकी वजह से मेरा ध्यान चेंज हो गया और घबराहट की वजह से मैं उन्हें थाम नहीं पाया।
वह डिस्बैलेंस होकर मेरे ऊपर आ गई। मैंने उनको कमर से पकड़ना था पर मेरे हाथ पीछे उनकी थाइज और हिप्स पर फिसल गए क्योंकि उनका पेटीकोट पीछे से ऊपर हो गया था। जब हम नीचे गिरे तो मैं पेट के बल नीचे गिरा और भौजी मेरे ऊपर चित पड़ी थी। उनकी रान मेरे लंड को टच कर रही थी और मेरे दोनों हाथ उनके मुलायम और चिकने चूतड़ों को टच कर रहे थे।
औरत के चूतड़ कितने चिकने होते हैं, मुझे पहली बार पता चला। भौजी के चिकने चूचे मेरी छाती को रगड़ रहे थे क्योंकि भौजी ने अंदर से ब्रा नहीं पहन रखी थी, इसलिए उनके पूरे बूब्स की गोलियाँ मैं महसूस कर सकता था। मुझे मज़ा भी आ रहा था और अपनी बेवकूफी की वजह से शर्म भी आ रही थी, पर ये अच्छा हुआ कि किसी को भी चोट नहीं आई थी और दोनों ठीक-ठाक थे।
फिर भौजी पहले उठी तो उन्होंने अपने पेटीकोट को ठीक किया। फिर अपनी पूरी साड़ी उतार दी। मुझे शर्म आने लगी तो मैंने मुँह दूसरी तरफ कर लिया। पर भौजी बोली, “क्यों लाला शर्माते हो? अरे जब मुझे शर्म नहीं आ रही तो तुम क्यों शर्माते हो? फिर आसपास कोई नहीं है, अरे पूरा नजारा किया करो जब मौका मिले। शादी होगी तो क्या लुगाई से भी ऐसे ही शरमाओगे क्या, बेवकूफ कहीं के।”
इस दौरान भौजी ने अपने पेटीकोट की गांठ खोलकर पहले उसे ठीक किया और फिर पेटीकोट को टाई बाँधकर अपनी साड़ी पहननी शुरू कर दी। फिर उन्होंने बिना शर्माए अपने ब्लाउज के सारे बटन खोलकर अपना ब्लाउज भी दोबारा से एडजस्ट किया। जब भौजी के ब्लाउज के सारे बटन खुले तो मुझे भौजी के गोल-मटोल चूचों का कुछ सेकंड्स के लिए नजारा करने का मौका मिल गया।
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पर दोस्तों ये छोटा सा मौका ही सही, पर मुझे सचमुच उस दिन जंगल में “मंगल” वाली कहावत सच लग रही थी। भौजी गाँव की लेडी थी और वह मेकअप भी किए हुए नहीं थी और बाहर से दिखने में एवरेज ही लगती थी, पर यार उसके कपड़ों के नीचे की आइटम्स तो ऐसे मस्त थे कि साली मल्लिका शेरावत जैसी आइटम गर्ल भी अपनी ऐसी-तैसी करवा ले।
भौजी के नंगे बदन का नजारा करके आज मेरी आँखों की प्यास तो बढ़ ही गई थी। साला लंड भी नीचे से ज़ोर मार रहा था, पर मैं बड़ा शर्मा रहा था और मुझे हमेशा डर लगा रहता था कि कहीं कोई आ गया तो बड़ी बेइज्जती होगी। पर भौजी बड़ी बिंदास थी।
वह मुझसे बोली, “देखो लल्ला, तुम शहर से आए हो, एक-दो दिन हम भी तुम्हारे साथ मज़ा-मस्ती कर लें और तुम भी गाँव-देहात में हँसी-खुशी कुछ समय काट लो। ये शर्माने का नाटक हमसे न करना। अरे कैसे मर्द हो जो एक जवान औरत को नंगा देख के जवानियों की माफिक शर्माते हो। ये कहानी आप हमारी वासना डॉट नेट पर पढ़ रहे है.
कल से अगर हमारे साथ आना हो तो जरा मज़ा-मस्ती किया करो। अरे हमारे मर्द तो साला दिन भर मेहनत-मजदूरी करें और रात में रजाई तान के सो जाएँ। और अगर कुछ करेंगे भी तो हमारे मज़ा की परवाह किए बगैर चढ़ जाएँ हमारी टांगों के बीच। साली जैसी हमको बेजान मूर्ति हैं। हमार मन है ना है, हमका क्या पसंद है क्या नहीं है, ऐसा ही धक्का-पेली करके 3 साल में 3 पैदा हो गए।”
फिर पता नहीं भौजी को क्या लगा और बोली, “अरे मैं भी क्या कहने लगी, अपना रोना ले के बैठ गई। लल्ला हमका माफ करी, तुम तो गैर हो, जैसा तुमको ठीक लगे वैसा करना। तुम जैसे सुंदर जवान को देखकर हमरा मन भी साला फिसल गया। अगर तुमको बुरा लगे तो माफ करना, हम तो गँवारू लोग हैं, बोलने की तमीज नहीं है।”
मैंने कहा, “नहीं भौजी, ऐसी बात नहीं है। आप बहुत सुंदर और समझदार हो, और कल मैं आपके साथ ही आऊँगा। बाकी आप ज्यादा बड़ी हैं, आप जैसा कहेंगी वैसा करने की कोशिश करूँगा।”
इस बार भौजी मुस्कुरा दी और बोली, “सच?”
मैंने कहा, “बिल्कुल। मैं आपको परेशान नहीं देख सकता।”
बातचीत के साथ हम लकड़ियों का ढेर भी लगा रहे थे जिससे गाड़ी में जल्दी से डाली जा सकें। फिर हमें बैलगाड़ी आती हुई दिखी और थोड़ी देर में वह हमारे पास आकर रुकी। सबने लकड़ियाँ गाड़ी में लोड कर दीं और गाड़ी एकदम ऊपर तक भर गई। हम लोग गाँव को रिटर्न हो गए।
जब हम गाँव में लकड़ियाँ लेकर पहुँचे तो दिन के करीब 2 बजे थे। हम भौजी को बाय (नमस्ते) कहकर वापस घर आ गए। उस दिन मैं सारा समय भौजी की बातों और उनके नंगे बदन के बारे में ही सोचता रहा और मेरे दिमाग में हमेशा भौजी का नंगा बदन घूम रहा था। मैं रात को नींद में सोने के समय भी भौजी की चुदाई करने के बारे में सोच रहा था।
और दोस्तों, रात को मुझे ऐसा लगा कि अंधेरे में कोई मेरे बिस्तर के पास खड़ी है। फिर वह मेरे बगल में आकर सो गई। फिर मैंने देखा कि वह तो भौजी थी। मैं जैसे ही कुछ बोलता, उन्होंने मेरा मुँह बंद कर दिया और बोली, “जल्दी से अपना पायजामा खोलो।”
मैं कुछ करता, इससे पहले ही भौजी ने मेरा पायजामा खोल दिया और मेरे लंड को हिलाने लगी। अब मुझे भी मज़ा आने लगा तो मैंने भी भौजी के ब्लाउज के बटन खोलने शुरू कर दिए। ये क्या, भौजी ने ब्रा नहीं पहनी थी और ब्लाउज खुलते ही भौजी के गुलाबी गोल चूचे नजर आने लगे।
तो मैंने उनको दबाना शुरू कर दिया। तो भौजी को मज़ा आने लगा और उसने मेरा लंड छोड़ दिया, जो अब तनने लगा था। इधर अब मैं अपने मुँह से भौजी की चूचियों को चूमना शुरू कर दिया। तो भौजी खट पर पैर मारने लगी। तो मैंने हाथ नीचे किया तो भौजी ने केवल पेटीकोट पहन रखा था।
मैंने भौजी की कमर में हाथ डालकर साइड से भौजी के पेटीकोट का नाड़ा खोल दिया। जिसके बाद मैंने उनका पेटीकोट भी नीचे को खींच दिया। और जब मैंने भौजी की दोनों टांगों के बीच हाथ डाला तो भौजी का वह एरिया एकदम चिकना था और वहाँ दिन की तरह बाल नहीं थे।
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वहाँ मेरा हाथ एकदम फिसल रहा था और रानों के बीच एक गड्ढा सा था, जो शायद भौजी की चूत का एरिया था। पर अंधेरे में कुछ दिख नहीं रहा था, बस महसूस हो रहा था। भौजी मेरी जाँघों और पीठ पर अपने हाथों से रगड़ रही थी और हल्के से आहें भर रही थी। फिर भौजी ने मेरे लंड पर हाथ लगाया और धीरे से बोली, “लल्ला आ जाओ मेरे ऊपर और पहले अपना लंड मेरी टांगों के बीच।”
मैंने भी भौजी का पेटीकोट और नीचे सरकाया और उनकी दोनों जाँघें फैलाकर अपने लंड से भौजी की चूत के आसपास रगड़ने लगा। तो भौजी बोली, “लल्ला मैं तेरी मदद करती हूँ।” और भौजी ने मेरा लंड पकड़कर अपनी चूत के ऊपर लगाया और बोली, “लल्ला पहले दे पूरी ताकत से फाड़ दे साली को।” और मेरे चूतड़ों पर ज़ोर से थपकी मारी।
अबकी बार मैंने भी अपनी आँखें बंद करके एक ज़ोर का धक्का लगाया। तो मेरा लंड आधे से ज्यादा भौजी की चूत में चला गया, पर पूरा अंदर नहीं गया। इस बार भौजी ने नीचे से एक धक्का लगाया और मुझसे दोबारा धकेलने को कहा। अबकी बार मेरा पूरा लंड भौजी की चूत के अंदर तक चला गया और भौजी मज़े में उछलने लगी और बोली, “लल्ला मार धक्का, आह्ह पूरी ताकत से साली को फाड़ दे, पर मुझे मज़ा दे दे।”
मैंने अब धक्का लगाना शुरू कर दिया और मेरा लंड भौजी की चूत में अंदर-बाहर होने लगा। मैं भी पूरी ताकत से भौजी की चुदाई करने लगा और भौजी नीचे से धक्का लगाकर मुझे और एन्करेज कर रही थी।
फिर अचानक भौजी बोली, “अरे संजू तू नादान बच्चा है, मैं तुझे ट्रेनिंग देती हूँ कि चुदाई कैसे की जाती है। चल अब तू नीचे हो, मैं ऊपर आती हूँ।”
और इसके बाद हम दोनों ने पोजीशन बदल ली और अब भौजी ऊपर से मेरे लंड पर सवार हो गई और उछलकर मेरे लंड को अपनी चूत में लेने लगी। और मैं उनके चूतड़ों पर हाथ फेरने लगा। भौजी के चूतड़ सुबह की तरह ही सॉफ्ट और चिकने थे। उन पर हाथ फेरने में बड़ा मज़ा आ रहा था।
भौजी दबा-दबाकर अपनी चूत पिलवाए जा रही थी और एक तरह से मेरे लंड में अपनी चूत पिलवा रही थी। अचानक जाने क्या हुआ कि मुझे लगा कि भौजी कहीं गायब हो गई और मैं बेड पर पीठ के बल लेटा हुआ हूँ। मैंने हाथ से अंधेरे में टटोला तो वहाँ कोई नहीं था, बस अंधेरा ही अंधेरा था।
मैंने अपने पायजामे में हाथ लगाया तो वह बढ़ा हुआ था। फिर जैसे ही मैंने अपने लंड के आसपास हाथ लगाया तो वहाँ पर मेरा अंडर वियर और पायजामा दोनों गीले हो गए थे और मेरा लंड एकदम सिकुड़ा हुआ था। अब मैं समझ गया कि भौजी ने मेरी कैसी चुदाई की है। भौजी रात में मेरे सपने में आकर मेरा अंडर वियर गीला कर गई थी।
पर दोस्तों, उस सपने में जो मज़ा आ रहा था वह साला असल चुदाई में भी नहीं आया कभी। इसके बाद काफी देर तक नींद नहीं आई और फिर पता नहीं कब नींद आ गई। और जब सुबह मेरी नींद खुली तो पौने सात (6:45) हो गए थे और सब लोग उठ चुके थे। ये कहानी आप हमारी वासना डॉट नेट पर पढ़ रहे है.
मैंने जल्दी से उठकर सबसे पहले फ्रेश होकर नहा लिया क्योंकि सारा गीला होने की वजह से बड़ा लेज़ी फील कर रहा था। पर जब भी मुझे सपने का ख्याल आता तो मैं सोचता — काश ऐसा एक बार हो जाए। करीब 7:30 पर उस दिन भी सभी लोग जंगल की तरफ निकलने लगे तो मैं भी चल पड़ा।
आज पड़ोस वाली गाड़ी में भौजी अकेली थीं, तो सबने मुझे उनकी गाड़ी में भेज दिया। उनके पति शायद उस दिन नहीं आए थे या क्या बात थी, मुझे नहीं पता था। भौजी की गाड़ी पीछे थी। भौजी ने साड़ी कमर पर लपेट रखी थी और ब्लाउज के ऊपर स्वेटर पहन रखा था क्योंकि सुबह ठंड होती है।
गाड़ी में भौजी ने मुझे अपने बगल में बिठा लिया और बोली, “क्या हाल है? आज शरमाओगे तो नहीं?” तो मैंने सर हिला दिया। भौजी बोली, “अबे अभी से लुगाइयों की तरह शर्माता है। मुझे तो समझ में नहीं आता कि तू अपनी बीबी के पास रात को कैसे जाएगा।”
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भौजी पता नहीं क्यों मुझे परेशान करने के लिए ऐसी बातें करती थी या उसे इसमें मज़ा आता था, पता नहीं। भौजी ने अपने हाथ मेरी थाइज पर रख रखे थे और बीच में बहाने से मेरी थाइज पर हाथ फेरती रहती थी। मुझे भी इसमें मज़ा आता था पर मैं शर्म की वजह से और करने को नहीं कह पाता।
एक बार जब मैंने शर्म के मारे उनका हाथ हटाया तो वो बोली, “अरे क्या हुआ? तुझे परेशानी है तो तू भी मेरी जाँघ पर हाथ फेर ले। सच मुझे बड़ा मज़ा आएगा। तेरा भैया तो फेरता नहीं कभी, बस जब मन किया तो बस पेल देता है अपना हथियार दो टांगों के बीच में।”
भौजी बड़ी बिंदास बात करती थी।
भौजी मेरे से बोली, “संजू तो ऐसा मत करना अपनी लुगाई के साथ। मैं चाहती हूँ कि तू अपनी लुगाई को पूरा मज़ा दे और उसकी हालत मेरी जैसी न हो।”
पर दोस्तों, मुझे तो भौजी की बातों को सुनकर उस समय शर्म आ रही थी पर मैं मैदान छोड़कर जा नहीं सकता था। भौजी करीब डेढ़-दो घंटे के जंगल के रास्ते में ऐसी ही बिंदास बात करती रही और मैं मज़े लेता रहा पर कुछ ज्यादा जवाब नहीं दे पाता था।
जंगल पहुँचने तक भौजी ने मुझे एक्साइट करना चालू रखा। फिर जंगल में पहुँचकर भौजी और मैं गाड़ी लेकर एक ऐसी जगह पर पहुँच गए जहाँ पर 2-3 सूखे पेड़ गिरे हुए थे और वहाँ पर बहुत बड़ी घास भी थी और कुछ दूर करीब आधा किमी पर रिवर थी। घास के साथ ही वहाँ पर बड़े-बड़े गड्ढे और बोल्डर स्टोन्स थे।
कुल मिलाकर जगह बड़ी भयानक और डेंजरस थी। भौजी बताने लगी कि शेर और बाघ ऐसी जगह पर ही देखे जाते हैं। मैंने जब उनसे पूछा कि आपने कभी देखा तो वह बोली, “हाँ, एक साल पहले इसी के आसपास उन्होंने टाइगर देखा था।” भौजी की बात सुनकर तो मेरी गांड फटने लगी और साला वहाँ पर दिन में भी अंधेरा था। मुझे ऐसा लगा कि अभी किसी झाड़ी से टाइगर आ जाएगा।
पर दोस्तों, एक औरत के सामने मैं अपना डर बयान भी नहीं कर सकता था। वहाँ पर लकड़ियाँ काफी थीं और हम लकड़ियाँ इकट्ठा करने लगे। भौजी लकड़ियाँ काटकर मुझे देती और मैं उन्हें एक जगह पर इकट्ठा करता। हमारी गाड़ी पास में ही खड़ी थी और बैल घास खा रहे थे। पर गाड़ी को लास्ट में लोड करना था जिससे लकड़ियाँ एडजस्ट की जा सकें।
करीब वन एंड हाफ ऑवर में हमने लकड़ियाँ काटकर इकट्ठा करके ढेर लगा दिया। मैं बीच में एक-दो बार भौजी के बूब्स, टांगों और थाई का नजारा कर लिया था पर आज चूत का नजारा नहीं कर पाया था, क्योंकि आज भौजी पेड़ पर नहीं चढ़ी थी और गिरे हुए पेड़ों की हाइट कम थी। पर साइड व्यू में मैंने उनकी थाइज और टांगों और पास से उनके बूब्स का नजारा जरूर कर लिया था।
भौजी जैसे ही फ्री हुई वह सुस्ताने लगी और अपने कपड़े एडजस्ट करने लगी। फिर भौजी बोली, “संजू आज तो काम जल्दी पूरा हो गया है और अभी टाइम बहुत है। चलो कुछ मस्ती करें। आज तुझे समझाती हूँ कि तू अपनी लुगाई के पास कैसे जाएगा।”
मैं तो बड़ा एक्साइटेड हुआ पर बोलने में अटक रहा था।
मैंने फिर कहा, “उसमें तो टाइम है अभी भौजी।”
भौजी बोली, “तभी तो अभी से सिखा दूँ तुझे और फिर मुझे टाइम नहीं मिलेगा ना।”
फिर भौजी ने अपना ब्लाउज खुद ही खोल दिया और अपने चूचे दिखाते हुए बोली, “देख ये क्या हैं?”
मैं शर्माते हुए बोला, “ये आपके।”
तो भौजी बोली, “अबे चूतिये बोल ना, मेरे चूचे हैं। अच्छा ये बता, ये क्या काम आते हैं, जल्दी बता।”
मैंने कहा, “बच्चों को दूध पिलाने के।”
“साला चूतिया अबे तो क्या दूध पीता बच्चा है क्या? अबे ये औरत को गरम करने के लिए दबाने को होते हैं साला बच्चा। अब तो मैं तुझे अपना दूध पिला कर ही रहूँगी। चल जल्दी से पास आ और पकड़ मेरे चूचे।”
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मेरी तो दोस्तों हालत थोड़ी खराब थी क्योंकि ऐसी बिंदास औरत मैंने नहीं देखी थी। मैं भाग भी नहीं सकता था। मेरे देर करने पर भौजी बोली, “संजू लल्ला सोच लो, अगर मेरा कहना नहीं मान तो मैं ये भी कह सकती हूँ कि तुमने मेरे साथ जबरदस्ती की।” ये कहानी आप हमारी वासना डॉट नेट पर पढ़ रहे है.
और तब तक भौजी ने अपनी साड़ी पूरी उतार दी और अब वह पेटीकोट और खुले ब्लाउज के साथ मेरे सामने आ गई। फिर भौजी ने मुझे कमर से पकड़कर बोली, “साले क्या हिजड़ा है जो कुछ कर नहीं रहा है। मर्द है तो दबा ना, मैं दबवाने को तैयार हूँ।”
अबकी बार किसी तरह से हिम्मत करके मैंने एक हाथ भौजी के चूचों पर रख दिया। तो वह बोली, “अबे दबा ना, क्या करंट लग रहा है?” मैंने जैसे ही कोशिश की, मेरे हाथ काँपने लगे। तब तक भौजी मेरी पीठ पर हाथ फेरने लगी। तो उनके हाथ कोमल न होकर अच्छे हार्ड थे, पर थे तो एक औरत के हाथ ही, इसलिए बड़े चिकने लग रहे थे।
भौजी अब बोली, “अबे दबा नहीं सकता तो चूस ले, क्या पता दूध ही निकल आए।” और अबकी बार भौजी ने मेरा सर अपने ब्लाउज की तरफ खींच लिया। तो मेरे होंठ सीधे भौजी की चूचियों से टच हो गए। तो मैंने उनकी एक चूची को होंठों से नोच लिया। भौजी को बड़ा मज़ा आया।
वह बोली, “शाबाश, आगे बढ़, मरोड़ दे सालों को, चूस ले पूरी ताकत से।”
अब मुझे मज़ा आने लगा और मैंने दोनों चूचियों को चूसना शुरू कर दिया। फिर मैंने भौजी के दोनों चूचों पर चाटना शुरू कर दिया। अब भौजी थोड़ा खुश हुई। मैंने अपने दोनों हाथों से भौजी की पीठ पर उसके ब्लाउज के नीचे से मसाज करना शुरू कर दिया।
तो भौजी खुश हो गई और बोली, “अब लगता है तू कुछ मर्दों वाले काम कर रहा है।”
अब मुझे मज़ा आने लगा तो मैंने भौजी की पीठ पर मसाज और रब करना शुरू कर दिया। इधर भौजी के निप्पल्स, बूब्स और नाभि पर चाटना और चूसना और निप्पल को काट भी कर देता था। अब भौजी मुझसे खुश थी। अब भौजी बोली, “लल्ला तू मर्द तो है पर पूरा मर्द तो तब मानूँ जब तेरी मर्दानगी का टेस्ट हो जाए।” और इतना कहकर भौजी ने मेरी पैंट खोलनी शुरू कर दी और मेरे अंडरवियर के अंदर अपना हाथ डाल दिया।
मेरा लंड तब तक खड़ा नहीं था, पर भौजी के हाथ लगते ही मुझे बड़ा अटपटा लगा और मैंने भौजी के रगड़ना और चूसना बंद करके अपने से अलग करने लगा। तो भौजी बोली, “तेरा पहलवान तो सोया है, इसे उठाना पड़ेगा नहीं तो मैं तो सूखी ही रह जाऊँगी।”
इतना कहकर भौजी ने मेरा अंडरवियर नीचे करके मेरे लंड को अपने होंठों से दबा लिया। मुझे दर्द सा हो रहा था पर मज़ा भी आ रहा था। फिर भौजी ने मेरे लंड को पूरा अपने मुँह में ले लिया। और वह मेरे लंड को टॉफी की तरह चूसने लगी।
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पर जैसे ही मुझे दर्द सा लगता, वह रुक जाती और फिर शुरू हो जाती। और थोड़ी देर में ही मेरा लंड एकदम खंभे की तरह खड़ा हो गया। और भौजी ने अपना मुँह अलग कर लिया और बोली, “लल्ला अब ये तैयार हो गया है, अब टाइम खराब मत कर और पेल दे इसे मेरी चूत में।”
मैं घबरा रहा था। तब तक भौजी ने अपनी साड़ी फोल्ड करके बैलगाड़ी में बिछा दी और उस पर लेट गई। अब भौजी ने अपना पेटीकोट भी खोल दिया और मुझे अपने ऊपर खींच लिया और बोली, “लल्ला डर मत, तू बस पहले की तरह मेरे चूचे चूसने शुरू कर दे।” मैंने वैसा ही किया।
पर लंड कैसे अंदर करूँ, इसका मुझे ना तो आइडिया लग रहा था और ना ही मेरी हिम्मत हो पा रही थी कि कैसे लंड भौजी की चूत में डालूँ। अब मुझे शर्म तो नहीं आ रही थी पर मैं अनाड़ी साबित हो रहा था। फिर भी मैं भौजी की थाइज के बीच उसकी चूत पर उंगली करने की कोशिश करी और ऊपर उसकी चूचियों, चूचों, आर्मपिट्स, पीठ, गले, होंठ, कमर और नाभि पर एक-एक कर चूमना, चाटना, काटना जारी रखा।
मेरे इस तरह के एक्शन से भौजी बड़ी मस्त थी और मुझे भी मज़ा आ रहा था। पर जब भी मुझे ये ख्याल आता कि कहीं कोई आ न जाए तो मेरी हालत खराब हो जाती और भौजी परेशान हो जाती क्योंकि उसकी मस्ती में पंगा होता था और वह बर्दाश्त नहीं कर पा रही थी।
भौजी की चूत के आसपास जब मैं उंगली करी तो भौजी तो मज़े में आ गई और वह खुश हो गई और बोली, “अगर ऐसे अपनी लुगाई को खुश करेगा तो तेरी लुगाई क्या पड़ोस की लुगाई भी तुझसे चुदवाने को तरसेगी संजू। लल्ला मज़ा आ गया। अब बस एक बार अपने कुँवारे लंड का स्वाद करवा दे, मैं तुझसे फिर कुछ नहीं माँगूँगी और जब कहेगा और जहाँ कहेगा तुझसे चुदवाने चली आऊँगी।”
फिर भौजी ने मेरे लंड को पकड़कर शायद अपनी चूत के ऊपर ले लिया और उसको वहाँ पर दबने लगी। और फिर भौजी ने एक ज़ोर का धक्का ऊपर को दिया और मुझे ऐसा लगा कि मैं किसी छेद में फंस गया और मेरा लंड किसी गड्ढे में धंस गया। मैंने भी एक और धक्का लगा दिया तो मेरा लंड असल में भौजी की चूत के अंदर चला गया था। अब तो मुझे उसे पेलने के अलावा कुछ करना नहीं था।
मैंने अपना लंड भौजी की चूत पर धकेलना शुरू कर दिया। तो भौजी तो पागल हो गई और बोली, “वाह मेरे लल्ला, मज़ा आ गया। तेरे कुँवारे लंड ने मुझे मालामाल कर दिया। कभी नहीं सोचा था कि ऐसी चुदाई का मज़ा भी ले पाऊँगी। पर संजू तुझसे चुदवाने को मुझे बहुत मेहनत करनी पड़ी पर मुझे मेरी मेहनत का फल मिल गया।”
अब वह बोलने की बजाय मेरी तरह ही मुझे चूमने और चाटने लगी और मैंने भी और ताकत से भौजी की चुदाई शुरू कर दी। पर एक-दो मिनट के धक्कों के बाद ही मेरे लंड के अंदर गीला सा होने लगा और जैसे ही मैंने इस बार धक्का लगाया, मेरे लंड के अंदर से जैसे यूरिन पास होता ऐसे ही कुछ पास होने लगा।
और पूरी कोशिश के बाद भी मैं अपने आप को नहीं रोक पाया और मेरे लंड का सारा माल भौजी की चूत में चला गया। और मेरा लंड जैसे मुनक्का बनकर सिकुड़ गया। भौजी को बड़ी तकलीफ हुई। उनकी मस्ती में बाधा आ गई थी। ये कहानी आप हमारी वासना डॉट नेट पर पढ़ रहे है.
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वह बोली, “अबे साले तू भी बीच में ही झड़ गया। साली मेरी किस्मत ही ऐसी है। रात में साला मेरा खसम मज़ा खराब कर देता है और दिन में आज तुझसे चुदवाई तो तू भी बीच में ही लुढ़क गया। तुम मर्दों के बस की भी चुदाई करना नहीं रहा। कोई जान ही नहीं, अबे 5 मिनट भी सब्र नहीं कर सकते। एक औरत के आगे ढीले पड़ जाते हो।”
फिर भौजी खुद ही बोली, “मैं तुझसे क्यों ये कह रही हूँ, तू तो नया है। फिर मैंने ही तुझे तैयार किया। चल कोई बात नहीं। पर संजू, कल तुझे मेरी इच्छा पूरी करनी होगी, नहीं तो सोच ले मैं तेरे से कभी बात नहीं करूँगी। और अगर तूने कल मैदान मार लिया तो फिर तो मैं तुझसे जब, जहाँ और जैसे कहेगा चुदवाऊँगी।”
मुझे तो आज चुदाई का चस्का लग गया था और आज नाकामयाब होने की खुन्नस भी थी, इसलिए मैंने कहा, “भौजी अब तुम कल जैसे कहोगी वैसे ही करूँगा और कल ऐसा नहीं होगा।”
इस दौरान भौजी अपनी मस्ती मिटाने के लिए मुझे चूमती-चाटती रही और मैं भी चुदाई के अलावा जैसे भी उनको खुश कर सकता था, उस तरह से उनके एक-एक अंग पर चुम्मा और मसाज करता रहा। फिर थोड़ी देर के बाद जब भौजी ने अलग होने को कहा तो हम दोनों अलग हो गए और हमने अपने-अपने कपड़े ठीक करके पहन लिए और आगे के काम के लिए तैयार हो गए।
इसके बाद हम दोनों ने लकड़ियाँ गाड़ी में लोड कर लीं और गाड़ी तैयार करके वापस गाँव की तरफ निकल लिए। थोड़ा आगे आकर हमें और लोग मिल गए, जिसमें मेरे कजिन वगैरह भी थे। तो उन लोगों को सरप्राइज हुआ कि हमने इतनी जल्दी कैसे पूरी गाड़ी लोड कर ली।
इस पर भौजी ने मेरी खूब तारीफ करी कि मैं काफी मदद करी और दूर-दूर से लकड़ियाँ इकट्ठा करके लाया। पर दोस्तों, वह तो मैं जानता था कि मैं कैसे भौजी की मदद की थी। पर मुझे चुदाई में उतना मज़ा नहीं आया जितना अब भौजी को खुश देखकर आ रहा था।
दोस्तों, मेरा तो गाँव में आना कामयाब हो गया था। कई फायदे हुए थे। एक चुदाई का फ्री एक्सपीरियंस हो गया था। दो, कोई खर्चा नहीं। नहीं तो किसी लड़की को सेट करने और चुदवाने के लिए तैयार करने में साला काफी खर्चा हो जाता और फिर साली उन रंडियों के नखरे भी सहने पड़ते।
और अगर जैसे भौजी के सामने फेल हो गया था वैसा हो जाए तो साली मेरी सबके सामने बेइज्जती भी कर देती। यहाँ तो साला हर तरफ से मज़ा ही मज़ा था और फिर एक एक्सपीरियंस्ड, मैच्योर्ड और मस्त चूत मिली थी चोदने को। शहर में तो साली गंदगी के अलावा कुछ नहीं और साला बिना किसी प्रोटेक्शन के किया तो लेने के देने भी पड़ जाते।
फिर रास्ते में अब हमारी उतनी बिंदास बातें नहीं हुईं क्योंकि पहले तो भौजी मुझे एक्साइट करने के लिए ऐसा कर रही थी, अब तो उनका काम हो गया था। फिर भी भौजी मुझे रास्ते में समझाती रही कि कैसे कल को भौजी की चुदाई करूँ जिससे जल्दी से आज की तरह झड़ न जाऊँ। वह मुझे ये एहसास करती रही कि उनको बड़ा मज़ा आया और वह खुश हैं।
भौजी अब मुझसे एक बार फुल चुदाई का मज़ा लेना चाहती थी और मैं भी जिंदगी की पहली फुल चुदाई के लिए तैयार हो रहा था। जब मैंने भौजी को उनके घर पर छोड़ा तो उन्होंने मुझे पानी पीने के बहाने कमरे में बुलाया और मुझे पकड़कर मेरा एक चुम्मा लिया। तो मैंने भी बदले में भौजी का चुम्मा लिया।
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पर जैसे ही मैं मुड़ा, उन्होंने मेरी पैंट के बाहर से मेरे लंड पर हाथ लगाते हुए कहा, “कल के लिए इसे अभी से तैयार कर लो।” मैं जब घर पर आ गया तो आज मैं काफी रिलैक्स था और अब मुझे चुदाई के बारे में कोई घबराहट नहीं हो रही थी। बस आज मैं नेक्स्ट डे का इंतजार करने लगा और रात को टाइम से सो गया और सोते ही मुझे नींद आ गई। मॉर्निंग में डेली रूटीन के बाद फिर हम जंगल की तरफ चल दिए और आज भी भौजी और मैं साथ-साथ गए। क्योंकि वह आज भी अकेली थी।
आज भौजी ने बताया कि उसका पति कहीं दूसरे गाँव गया है और शाम को आएगा। फिर आज रास्ते में जब मौका लगा हम मस्ती करते हुए चलते रहे। पर आज मैं भी भौजी को छेड़ रहा था और आज तो मैं एक-दो बार अकेले में मौका देखकर भौजी के चूचे गाड़ी में ही खूब तसल्ली से दबाए और एक-दो बार पपी भी लिए। इससे भौजी को भी मज़ा आ रहा था। क्योंकि जब भी मैं शांत होता तो भौजी भी मौका देखकर मेरी थाइज और पैंट के बाहर से मेरे लंड के ऊपर हाथ मार लेती थी।
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