XXX Hot Aurat Sex
मेरे मकान मालिक छोटा-मोटा बिजनेस करते थे, पर ज्यादा कमाई न होने की वजह से वे खूब मेहनत करते थे। कई-कई बार तो दूसरे शहर में जाकर भी माल लाना-ले जाना पड़ता था, जिस कारण वे चार-पाँच दिनों के लिए घर से बाहर रहते थे। मकान मालिक का छोटा-सा परिवार था—एक उनकी पत्नी, जिनका नाम कविता था और उन्हें मैं भाभी कहकर संबोधित करता था। XXX Hot Aurat Sex
वे एक हाउस लेडी थीं जो ज्यादा मॉडर्न तो नहीं थीं, लेकिन घर में ही रहना ज्यादा पसंद करती थीं। कविता भाभी का फिगर बहुत अच्छा था। कोई यह नहीं कह सकता था कि यह लेडी इतने बड़े बच्चे की माँ है। उनकी उम्र लगभग 42 होगी, लेकिन अभी वे मुश्किल से 34-35 की लगती थीं।
उनका चेहरा काफी सेक्सी था, नाक-नैन भी काफी आकर्षक करने वाले थे। उनकी एक बेटी थी जिसकी उम्र करीब 20 साल की थी। मैं उसे दिव्या बहन कहकर बुलाता था और वो मुझे राज भैया कहकर बुलाती थी। दोनों माँ-बेटी का शरीर गठीला और खूबसूरत था। वैसे मैं शुरू से ही थोड़ा रिजर्व नेचर का था, जिस कारण मैं आमतौर पर दफ्तर से आने के बाद घर में ही रहना ज्यादा पसंद करता था।
कुछ दिनों में मैं भी उनके घर का एक सदस्य बन गया था। कविता भाभी को थोड़ा ब्लड प्रेशर की समस्या थी, जिस कारण वे ज्यादा काम नहीं करती थीं। कविता भाभी अक्सर घर में नाइटी या साड़ी-ब्लाउज में रहती थीं और लो-कट नेक वाला ब्लाउज ही पहनती थीं, जिसमें से उनके मोटे-मोटे चुचियाँ झलकते थे।
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उन्हें देखकर तो बूढ़ा भी पागल हो जाने पर मजबूर हो जाता था। दिव्या बहन भी टाइट कपड़े ही पहनती थी। मैं भी कभी-कभी उसके टाइट टी-शर्ट में से उसके उरोज को ताकता रहता था। दिव्या प्रायः स्कर्ट और टी-शर्ट में ही घर में रहती थी और बड़ी ही लापरवाही से उठती-बैठती थी, जिस कारण वो भी अपनी जवानी का प्रदर्शन मुझे करती रहती थी।
मैं इसी जुगाड़ में लगा रहता था कि कब मौका मिले, कब इन दोनों को चोद डालूँ। एक दिन उनके एक रिश्तेदार की शादी उसी शहर में थी। मकान मालिक दूसरे शहर गए हुए थे, इसलिए कविता भाभी और दिव्या बहन के साथ मैं भी उस शादी में चला गया।
शादी में कविता भाभी की बड़ी ननद रागिनी जी भी आई हुई थीं, जो दूसरे शहर में रहती थीं और कभी-कभार अपने भाई (मेरे मकान मालिक) से मिलने आया जाया करती थीं। जिस कारण हम दोनों एक-दूसरे से अनजान नहीं थे। उनके बारे में मैं काफी सुन रखा था कि शादी से पहले और बाद में भी उनके कई लड़कों से शारीरिक संबंध थे।
वो थीं ही इतनी सेक्सी कि कोई भी उन्हें चोदने के लिए उतावला हो जाता था। वैसे वो थीं भी रंगीन मिजाज की औरत। वो शादी में अपने एक साल के लड़के को भी लाई थीं। वहाँ काफी गर्मी और भीड़ को देखकर उनका लड़का बार-बार रो रहा था, इसलिए कविता भाभी ने कहा, “राज, तुम जाकर रागिनी दीदी के बच्चे को संभालो। वो गर्मी के कारण काफी रो रहा है। अगर चुप नहीं हुआ तो घर पर रागिनी को ले जाओ, वहाँ शायद मुन्ना चुप हो जाए।”
तब मैं रागिनी दीदी के करीब जाकर बैठ गया। वो काफी बिंदास औरत थीं, जरा भी लाज-शर्म नहीं थी। गर्मी लगने के कारण वो अपने पेटीकोट को घुटने तक ऊँचा उठाकर पंखे के सामने बैठी हुई थीं और पंखे की वजह से उनकी साड़ी के साथ-साथ पेटीकोट भी हवा में इधर-उधर हो रहा था, जिस कारण मुझे उनकी पैंटी और साइड के झाँटें दिखाई दे रहे थे।
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यह नजारा देखकर तो मेरा लंड पैंट के अंदर जूमने लगा। मुन्ना लगातार रोए जा रहा था, तब मैं रागिनी दीदी को अपने साथ लेकर मैं घर ले आया। रास्ते में वो कहती जा रही थीं कि “राज, तुम्हारे जीजाजी एक महीने के लिए दिल्ली में ट्रेनिंग पर गए हुए हैं और यहाँ तो गर्मी के मारे मेरा सारा शरीर गरम हो उठा है” और वो मुझे जल्दी चलने को कहती रहीं क्योंकि उन्हें जोर की पेशाब लगी थी।
खैर, घर आते ही रागिनी दीदी ने सबसे पहले तो पंखा चलाकर अपने बच्चे को सुलाया और फिर जब तक मैं ठंडा पानी लाया, उन्होंने अपनी साड़ी खोलकर एक तरफ फेंकी और बाथरूम में घुस गईं। शायद उन्हें लगा होगा कि मैं अपने कमरे में हूँ, इस कारण वे खुले दरवाजे में ही पेशाब करने लगीं।
मैं पीछे से चुपचाप उनके मोटे-मोटे चूतड़ों के दर्शन करता रहा। जब वो मूत रही थीं तब तेज छींटों की आवाज उनके मूत के धार से निकल रही थी। आवाज इतनी तेज और ज्यादा थी कि मानो हफ्ते भर का आज ही मूत रही हों। जब रागिनी पेशाब करके उठीं तो पीछे से उनकी चूत का नजारा भी दिखने को मिल गया था। ये कहानी आप हमारी वासना डॉट नेट पर पढ़ रहे है.
उफ्फ्फ! क्या काली-काली झाँटों के बीच चूत की लाल-लाल सुरखियाँ और चूत के जमुनी कलर की फाँकें (चूत का मुँह यानी होंठ) नजर आ रही थीं। फिर वो अपनी सफेद पैंटी को हिप्स पर चढ़ाती हुई बाहर आईं तो मुझे देखकर बड़ी बेशर्मी से बोलीं कि “यदि एक पल और रुक जाती तो मूत के मारे मेरी मूतने की नली ही फट जाती।”
यह सुनकर मैं चौंक पड़ा, लेकिन रागिनी दीदी अपनी चूत को पेटीकोट के ऊपर से सहलाते हुए हँस रही थीं। फिर मुझे बोलीं, “रात भर सफर में नींद ही नहीं आई, चल यहीं कमरे में पंखे के नीचे सो जाते हैं।” और फिर वो जमीन पर केवल तकिया लेकर पसर गईं और मुझसे बातें करने लगीं।
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लेकिन मेरा सारा ध्यान रागिनी दीदी के ब्लाउज पर ही था, जिसके ऊपर के दो बटन खुले थे और उनके दूध से भरे दोनों चुचियाँ ब्लाउज से बाहर निकलने के लिए बेताब लग रही थीं। उनकी निप्पल्स में से दूध अपने आप बाहर आ रहा था, जिस कारण उनकी ब्रा भी गीली हो गई थी।
मुझे उनकी चुचियों को घूरते हुए वो ताड़ गईं और अपने ब्लाउज में हाथ डालकर दोनों स्तनों को खुजलाते हुए बोलीं कि “मुझे दूध ज्यादा आता है और मुन्ना इसे पी नहीं पाता, इस कारण मेरे स्तनों में से दूध बहता रहता है और छातियाँ दुखने लगती हैं।” ऐसा कहते हुए उन्होंने अपने बच्चे को अपने पास खींच लिया और मेरे सामने ही अपना ब्लाउज एक तरफ से ऊँचा उठाकर अपना दूध से भरा एक चूची बच्चे के मुँह में दे दिया।
उनके स्तनों का आकार देखकर मैं चकित रह गया। रागिनी दीदी पंखे के नीचे पसरे हुए थीं और पंखे की हवा के रुख से उनका पेटीकोट घुटनों के ऊपर तक चढ़ा हुआ था और वो बार-बार अपनी चूत को खुजाए जा रही थीं। बच्चे के मुँह में अपना दूसरा स्तन देते हुए वो अपनी चूत खुजाते हुए बोलीं, “शायद रात भर बस में बैठे रहने के कारण वो भी इतनी गर्मी की वजह से मुझे नीचे की तरफ काफी खुजली होने लगी है। साली बड़ी मीठी-मीठी खुजली आ रही है।”
यह सुनते हुए मेरी नजर बार-बार उनकी चुचियों पर पड़ रही थी। उनकी चूची के निप्पल्स दूध पिलाने से बड़ी लंबी हो गई थीं, जिन्हें वो अंदर भी नहीं कर रही थीं। बच्चा बड़े जोर-जोर से दूध चूसते हुए आवाज कर रहा था। तब वो मेरी ओर देखकर आँख मारते हुए बोलीं, “यह साला भी अपने बाप पर गया है। या तो पूरा रस निचोड़ लेगा या फिर मुझे रस से भरी ही छोड़ देगा। दोनों तरफ से बड़ी मुश्किल होती है।”
और वो जोर-जोर से हँसने लगीं। फिर हम लोग इधर-उधर की बातें करते रहे, पर उनका बार-बार चूत खुजलाना बंद नहीं हुआ। मैं समझ गया कि आज वो मेरा लंड का पानी लेकर अपनी चूत की गर्मी ठंडी करना चाहती है, पर जानबूझकर सीधा बन रहा था। उनसे दूरी बनाकर एक तकिया लेकर कोने में पसर गया।
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फिर हम इधर-उधर की बातें करते हुए कब सो गए, पता ही नहीं चला। लगभग रात के करीब 2 बजे जब मेरी नींद पेशाब के लिए खुली तो मैं रागिनी दीदी के दोनों स्तनों को देखता ही रह गया। वे पूरी तरह से वापस दूध से भर गए थे और चुचियों में से दूध की बूंदें टपक रही थीं।
तनाव के कारण उनमें लाल खून की नसें दिखाई पड़ने लगी थीं। दूसरी तरफ रागिनी दीदी का पेटीकोट भी जाँघों तक चढ़ गया था, जिसमें से उनकी चूत की फाँकें साफ-साफ झलक रही थीं। मुझे पता ही नहीं चला कि कब उन्होंने अपनी सफेद पैंटी निकालकर अपने सिरहाने रख दी थी।
यह सब देखकर मेरा लंड जोरों से फुंकार मारने लगा, पर पेशाब की वजह से रहा नहीं गया और मैं बाथरूम में घुस गया। जब मैं पेशाब करके वापस आया, तब तक शायद आहट से रागिनी दीदी जाग गई थीं और झुककर अपने बैग में से कुछ ढूँढ रही थीं।
तब उनके लटकते हुए बड़े-बड़े चुचियाँ बड़े सेक्सी लग रहे थे। मैंने अपना लंड सहलाते हुए पूछा, “रागिनी दीदी, क्या बात है? कोई परेशानी है क्या?” तो बोलीं, “मेरी छातियाँ काफी दुख रही हैं क्योंकि इसमें काफी दूध भर गया है। मुन्ना भी दूध नहीं पी रहा है, इसलिए मेरी चुचियों से दूध निकालना पड़ेगा।
मेरी दोनों चुचियाँ बहुत दुख रही हैं। इनका दूध नहीं निकला तो इनमें से खून आने लगेगा।” यह सुनकर मैं घबरा सा गया। तब मैंने पूछा कि “अब क्या होगा?” तो वो बोलीं, “अब एक ही तरीका है—मुझे अपने हाथों से चुचियों को दबा-दबाकर दूध निकालना पड़ेगा।” और वो अपने हाथों से चुचियों को दबाते हुए दूध निकालने की कोशिश करने लगीं, पर दूध थोड़ा-थोड़ा जमीन पर गिरने लगा।
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तो वो पास पड़े गिलास को उठाकर अपनी बायीं चूची पर गिलास सटाकर दाहिने हाथ से बायीं चूची को दबा-दबाकर निचोड़-निचोड़कर दूध निकालने लगीं। तब उनकी चूची में से थोड़ी-सी दूध की फुहार-सी निकली। लेकिन जब उन्हें आराम नहीं मिला तो बोलीं, “काश अभी यहाँ तेरे जीजाजी होते तो मुझे इतनी इतनी परेशानी ही नहीं होती।”
तो मैंने रागिनी दीदी से कहा, “यदि मैं कुछ कर सकता हूँ तो मुझे जरूर बताना ताकि तुम्हारा दर्द कम हो जाए।” तो वो बोलीं, “राजजी, तुम चाहो तो मुझे अभी इस दर्द से आराम दिलवा सकते हो। क्या तुम थोड़ा मेरे करीब आओगे और मेरा थोड़ा-सा दूध पी लोगे?” ये कहानी आप हमारी वासना डॉट नेट पर पढ़ रहे है.
तब मैं उनके करीब खिसकते हुए शरमाकर बोला, “रागिनी दीदी, मुझे शर्म आती है।” तब वो बोलीं, “इसके सिवाय कोई रास्ता नहीं है। अगर तुम ऐसा नहीं करोगे तो रात भर मैं दर्द के मारे परेशान रहूँगी और ठीक से सो भी नहीं सकूँगी।” यह कहकर वो मुझे जबरदस्ती अपनी ओर खींच लिया और अपनी एक चूची को हाथों से पकड़कर मेरे मुँह में ठूँस दिया।
मैं तो बस इसी मौके की तलाश में था। उनकी एक चूची को मुँह में लेकर चूसने लगा तो दूसरी चूची को अपने हाथ से दबा रहा था। यह हरकत करीब मैंने 10 मिनट तक की और मेरी इस हरकत से इधर रागिनी दीदी के मुँह से उफ्फ-ईईच की आवाजें निकलने लगीं, उधर मेरा लंड तनकर लुंगी से बाहर आने के लिए उछल-कूद मचाने लगा।
मैं बारी-बारी से दोनों चुचियों को मुँह में लेकर चूस रहा था। तब रागिनी दीदी बड़ी सफाई से मेरे कड़क हो चुके लंड को टटोलते हुए अपने हाथों में लेकर सहलाते हुए लंड के सुपाड़े की ऊपर की चमड़ी को ऊपर-नीचे करने लगीं। मैं भी ताव में आकर उनके पेटीकोट में हाथ डालकर उनके चूतड़ों को सहलाने लगा।
तब रागिनी दीदी ने आँखें बंद कर लीं और गहरी-गहरी साँसें लेने लगीं। धीरे-धीरे मैंने अपनी उंगलियों से उनकी चूत को टटोलते हुए उनकी चूत को सहलाने लगा तो रागिनी दीदी ने अपने होंठों को दाँतों से भींचते हुए बोला, “अब देर मत कर, डाल दे। मेरी चूत का भोसड़ा बना दे।”
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यह कहती हुई वो अपना पेटीकोट ऊँचा कर दोनों टाँगें चौड़ी कर चूत को फैलाकर लंड घुसाने के लिए कहने लगीं। यह देख मैंने भी तुरंत अपना मोटा और लंबा लंड रागिनी दीदी की चूत में पेल दिया और लगातार अंदर-बाहर करने लगा। कुछ देर मैं उनकी ऊपर आकर चोदता रहा तो थोड़ी देर बाद वो मेरे ऊपर आकर अपनी चूत में मेरा लंड डालकर उछल-कूद मचा-मचा कर चुदवा रही थीं। जब वो थक गईं तो मैंने उन्हें घोड़ी बनाकर पीछे से उनकी चूत में लंड डाल दिया। वाकई वो खूब चुदक्कड़ औरत थीं।
इस तरह हम दोनों ने एक लंबी अवधि तक खूब चुदाई के मजे लिए। इतने में कविता भाभी और दिव्या बहन ने दरवाजे पर दस्तक दे कर आवाज लगाई। हम दोनों ने अपने कपड़े व्यस्त किए और मैं कविता और दिव्या के लिए दरवाजा खोल दिया। रागिनी दीदी अपने भाई के घर 2 दिन रहीं, लेकिन हम दोनों को चुदाई का मौका नहीं मिला, पर मैं समयानुसार उनके बूब्स या चूतड़ों पर हाथ फेर लेता था। लेकिन इन दो दिनों में मैंने देखा कि कविता भाभी में काफी परिवर्तन आ चुका था।
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