Relation Wali Porn Kahani
मेरा नाम उमेश है मैं 55 का हूँ। इधर बॉडी फिट रहे, उधर लड़की खुश रहे- ये तमन्ना शुरू से ही रही है। आँखें बंद हों या खुली, करीब 18 साल की उम्र से और आज भी मैं मम्मों के साइज और वजन नापने में मशरूफ हूँ। “संभोग से पूर्व रति-क्रिया अनिवार्य है। रति-क्रिया न हो तो मनुष्य और पशु के संभोग में अंतर ही क्या है।” Relation Wali Porn Kahani
रिश्ते में मेरी बड़ी साली की बड़ी बेटी दिल्ली में ही रहती है। उसका नाम मनीषा, उम्र अब 27 साल, मैरिड, मदर ऑफ टू किड्स, हसबैंड ए बिजनेसमैन। मैं अक्सर उसके घर आता-जाता हूँ। ये 2 साल पहले गर्मियों के दिनों की घटना है। तब मनीषा 25 की थी। शरीर भरा-भरा, गदराया हुआ, लंबाई 5’5”।
मम्मे बड़े, गोल-गोल, फैले हुए, नितंब कामुक। कुल बात ये कि वो शरीर से पंजाबी जटनी की तरह लगती है। मेरे सामने ही वो बच्ची से जवान हुई। वो कामुक नहीं है, लेकिन मिलनसार और खुशमिजाज है। हम दोनों आपस में पहले से ही काफी फ्रैंक हैं। वो 3-रूम के फ्लैट में रहते हैं। मैंने बेल बजाई तो 11 एएम था। मनीषा ने दरवाजा खोला।
“अहा, रमेश अंकल आप?”
वो बहुत खुश हुई मुझे अपने यहाँ देखकर।
“खुशामदीद।”
मुझे हाथ से पकड़कर सोफे पर बिठा दिया और पानी लेकर आई।
“रमेश अंकल कैसे चल रहा है, आज इधर का रुख कैसे किया, लगता है हम 6-7 महीनों के बाद एक-दूसरे को देख रहे हैं?”
“हाँ, मनीषा। तुम्हें देखे एक अरसा हो गया था, आज अचानक याद आई तुमसे मिलने की और अब सामने हो तुम्हारे।”
वो मेरे सामने बैठी हुई थी, सलवार-कमीज में। मेरी नजर पहले उसके चेहरे पर, फिर मम्मों पर, उसके नीचे फिसलती हुई उसके पाँव तक गई। उसकी आँखें मेरी नजर पर टिकी थीं।
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“क्या देख रहे हो बहुत गहरी नजर से?”
“तुम बहुत ही सुंदर लग रही हो। शादी से पहले तो तुम सुंदर थी ही, लेकिन आज जब तुम एक बेटे की माँ हो अब तो अति-सुंदर हो गई हो।”
“अंकल मैं आपकी रग-रग से वाकिफ हूँ। मैं जानती हूँ आप लड़कियों को बहलाने-फुसलाने में माहिर हैं, आपकी निगाहें हमेशा लड़कियों की गोल…गोल… पर रहती हैं और जीभ होंठों पर फेरते हो। कोई लड़की आपके साथ आधा घंटा भी नहीं बैठ सकती इत्मिनान से।”
“I am serious, मनीषा।”
वो हँसी और किचन में चली गई। बेटा जो 1+ साल का था उस समय वो सो रहा था अंदर बेडरूम में। कुछ देर बाद वो चाय वगैरह लेकर आई, टेबल पर रखा, एक कप मेरे हाथ में देकर सामने बैठ गई।
“अंकल, अगर सच है जो आपने कहा, तो थैंक यू फॉर द कॉम्प्लिमेंट्स।”
“मनीषा, हम अपने अल्फाज नहीं बदलते, जो सच है वो कह दिया।”
अब वो अपने पूरे शरीर को ऊपर-से-नीचे कद-आमद शीशे में देख रही थी जो हमारे सामने ही था। चेहरे पर लाली और आँखों में चमक आ गई उसके।
चाय पीने के दौरान-
“रमेश अंकल, जबसे मैंने होश संभाला है आपको योगाभ्यास में ही लगे हुए देखा व सुना है। सुबह-सवेरे उठकर इसी में लग जाते हो। ये आपकी ही हिम्मत है। मुझे मालूम है आपके भीतर आंतरिक-शक्ति बहुत है। आप सोचते नहीं कुछ करने से पहले, बस कर देते हो।”
“मस्का मत लगाओ। हाँ! अगर तुम भी योगासन करना शुरू कर दो तो तुम्हारी काया ही बदल जाएगी। तुम पहचान भी नहीं पाओगी अपने-आप को।”
“अंकल मैं इस झंझट में नहीं पड़ती।” (वो मुझसे 3” लंबी व 10 किलो भारी है.)
“मनीषा छोड़ो इस बात को, तुम बताओ कि रात को सुख से सोती हो ना? हसबैंड तुम्हें वक्त देता ही होगा?”
“अंकल, उनके पास वक्त ही कहाँ, रात देर बाद आते हैं, खाना खाया और सो गए, वो कहते हैं कि मनीषा तुम्हें बेटा दे दिया उसके साथ तुम्हारी बोरियत कम हो जाएगी।” उसने उदासी से वर्णन किया।
और देगर बातों में समय व्यतीत हो गया, 1 पीएम था.
“अंकल, आप नहा लो। बाथरूम की चिटकनी काम नहीं कर रही, डोर बंद हो जाता है, मैं तब तक रसोई में काम करती हूँ।”
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मैंने दरवाजा बंद किया, कपड़े उतारे और शावर खोला। सारे बदन में साबुन लगाया एक दफा, रोजमर्रा की तरह आज भी लंड को मैंने 3-4 मर्तबा साबुन लगाकर मला, धोया, फिर मला, धोया। ऐसे मलते-मलते तीव्र गति से खून लंड की नसों में बहने लगा जिस कारण लंड का अगर-भाग लाल सुरख हो गया और लंड मोटा और लंबा होता जा रहा था।
मेरा ध्यान लंड की ओर ही रहा (मेरे लंड का अगर भाग गोरा व पीछे का भाग काला है आज भी)। मैंने फिर शावर खोला और सारे बदन को पानी से साफ किया… अचानक देखा बाथरूम का दरवाजा बिलकुल थोड़ा-सा खुला है और वो खड़ी ये सब देख रही थी।
“ओ बेवकूफ।” मैं चिल्लाया।
वो खिलखिलाकर हँसी और किवाड़ बंद कर दिया। मैं ड्राय करके लुंगी बांधकर बाहर आ गया और सोफे पर बैठ गया। हम दोनों आमने-सामने बैठे खाना खा रहे थे, लास्टली आफ्टर फिनिशिंग, मनीषा ने कहा-
“अंकल वेरी सॉरी फॉर माय स्टुपिडिटी” (फिर मेरे कान में कबूल किया) “बट आई गॉट ए गुड एंजॉयमेंट व्हाइल फ्रॉम द मोमेंट यू स्टार्टेड अप्लाइंग सोप टू योर बॉडी।” (जैसा मैंने बताया, वो मेरे साथ बहुत फ्रैंक है)।
“मनीषा, इट्स बैड। तुम मेरी बेटी हो।”
“अच्छा मेरे बाप, आई एम सॉरी।” उसने मेरी जाँघ पर चुटकी मार दी।
शायद उसके बेटे की नींद खुल गई थी, रोने की आवाज सुनाई दी, वो बेडरूम की ओर गई, बेटे को उठाकर पेशाब कराकर, मुँह साफ किया और बेटे को गोद में उठाकर बेडरूम में चली गई। कुछ देर बाद-
“अंकल आप भी इधर आ जाइये हमारे पास, अकेले बैठे बोर हो जाओगे।”
मैं उसके पास जाकर पलंग की एक ओर उकड़ू होकर बैठ गया, फिर बेटे को उठाया, प्यार किया, और चूमा, बच्चा हँसने लगा। फिर मेरे नंगे पेट पर पेशाब कर दिया और लुंगी गीली कर दी।
“ओह, नटखट, तुमने नाना को नहला दिया, नाना तो पहले से ही नहा लिए हैं।”
“कोई बात नहीं ये तो बच्चा है, यहाँ तो बड़ी-बड़ी लड़कियों ने मेरी लुंगी गीली कर रखी है।”
“अंकल आपका इशारा मेरी ओर है। जब मैं छोटी थी और आप हमारे हाँ आते थे, तो मैं आपके साथ सोती थी। मम्मी ने भी कई बार मुझे बोला था कि तुम रमेश अंकल की लुंगी में पेशाब कर देती थी सोते-सोते, होश नहीं रहता था तुम्हें।” ये कहानी आप हमारी वासना डॉट नेट पर पढ़ रहे है.
ये उसने बोल तो दिया (तब मेरी नजर उसकी सलवार के बीचों-बीच पेशाब वाली जगह (V) पर थी), जब उसने देखा मेरी नजर कहाँ है, और उसी स्थान पर उसकी नजर भी गई तो शर्म से झुक गई अपने इल्फाज याद करके। कुछ क्षण बाद-
“इसके दूध पीने का समय हो गया है।”
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उसने मेरी गोद से बेटे को उठाकर अपनी गोद में लिटा दिया। मैं बाथरूम से बदन साफ करके दूसरी लुंगी बांधकर वापस आकर बेड पर बैठ गया। (सीन) वो अपनी दो उंगली से मम्मे को दबाए हुए अपने बेटे के मुँह में डाले हुई थी और बेटा दूध चूसी जा रहा था, ट्टूज… ट्टूज… ट्टूज आवाज करते हुए, और एक हाथ मम्मे के मम्मे पर फेर रहा था। कमीज़ ऊपर होने से दूसरा मम्मा आधा और पेट पूरा नंगा था, मेरी नजर वहीं टिक गई।
“अंकल, क्या कुछ दिख रहा है जो आप टिकटिकी लगाए देख रहे हो?”
“मनीषा अति-सुंदर दृश्य मेरी नजर के सामने है। मैं सोच रहा हूँ कि दूध पिलाते हुए माँ कितनी प्रसन्न व तृप्त होती है।”
“क्यों नहीं। दूध जब भर जाता है तो पीड़ा होती है, जब बच्चे को दूध पिलाती हूँ तो दिल में गुदगुदी होती है, आनंद मिलता है और पीड़ा भी कम होते-होते खत्म हो जाती है।”
(मजाक से उसके मम्मों की ओर इशारा करके) “लाओ… मैं भी तुम्हारी पीड़ा कम कर दूँ?”
ये सुनना था कि उसके गालों पर लाली और बदन में सिहरन सी दौड़ने लगी। शायद लंड पर साबुन लगाने का दृश्य सामने आ गया था। उसकी आँखें बंद हो गईं और मुँह को दुपट्टे से ढक लिया उसी क्षण। ये स्वीकृति (acceptance) थी उसकी ओर से।
अब मेरी आँखें उसके बदन को कामुकता की नजर से देख रही थीं। मेरा लंड हरकत में आकर खड़ा हो रहा था, तन कर तंबू बन गया उस स्थान पर। उसने दुपट्टा उठाकर उठे हुए तंबू को देखा, फिर मेरी आँखों की तरफ, नजरें मिलीं, झट से अपने चेहरे को बाहों से छुपा लिया। अब उसका बदन फड़कने लग रहा था। कुछ क्षण वो ऐसे ही बैठी रही।
बेटा अब दूध पीते-पीते सो गया था। उसने मेरे सामने ही अपनी चूची बेटे के मुँह से बाहर निकालकर कमीज़ को नीचे किया, और बेटे को पलंग पर लिटा दिया। अब मेरा शरीर सरकते-सरकते उसके करीब जा रहा था। अब हम एक-दूसरे के बिलकुल नजदीक थे।
मैं उसकी आँखों में देख रहा था। मेरे हाथ उसके गालों पर आ चुके थे, और उसके लब फड़क रहे थे। काम-वासना हम दोनों के शरीर में अंगड़ाइयाँ ले रही थी। काम-वासना की लहरें पूरे जवां से हमारे शरीर के भीतर उछाले मार रही थीं। वो उठी और उठकर पलंग की दूसरी तरफ हो गई और मुझे बाजू से पकड़कर अपनी ओर खींच लिया।
(मुस्कुराते हुए, मेरे कान में बोली) “उमेशजी… आइये… अब आपकी बारी है दूध पीने की।”
“अच्छाजी।”
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वो सीधी लेटी हुई थी, मैं उसकी राइट साइड लेट गया, फिर मैंने उसके बदन को अपनी तरफ कर लिया। बिना सोचे उसके गालों पर चूमन स्टांप कर दिए बिना गिनती किए। उसके बाद होंठों पर होंठ रखकर जीभ उसके मुँह के भीतर सरकाई तो उसने मेरी जीभ को चूसना शुरू कर दिया।
इधर मैं उसके होंठों का रस पी रहा था, उधर वो मेरी जीभ से शर्बत ग्रहण कर रही थी। उसका स्मूचा शरीर मेरे शरीर में प्रवेश करने का यत्न कर रहा था। उसकी लेफ्ट जाँघ अब मेरी राइट जाँघ पर आ चुकी थी। उसका बदन मस्ती से फड़कने लग रहा था। कुछ देर बाद…
(धीरे से मेरे कान में) “उमेशजी, मैं आज अपना शरीर आपको समर्पित करती हूँ, अपनी इच्छा से। मेरे बदन को नहला दो अपने प्यार से।”
“My love, अब दो शरीर एक होंगे। इसकी अनुभूति तुम्हें पूरे समय रहेगी।”
उसने फिर अपना सारा बदन ढीला कर दिया। खुशी में न समा पाई। शरारत से दोनों हाथों से मेरी छाती को दबोच दिया (मेरी छाती गुदगुदी व भारी-भारी है) मुझे जोश आ गया। अब हम दोनों के बीच शर्म व हया न थी। वो मेरी छाती को और जोर से मसलने और दाँतों से काटने लगी, मुझे दर्द होने लगा।
मनीषा ने फिर मेरा हाथ अपने मम्मों पर रख दिया। मेरा ध्यान दर्द से हटकर उसके मम्मों की ओर आ गया। अब मेरे लिए सब्र रखना मुश्किल हो गया था। मैंने उसकी कमीज़ ऊपर की और सरका कर अलग करके उसके बदन को आजाद कर दिया, और उसे सीधा पीठ के बल कर दिया, और अब मैं उसके ऊपर था।
मनीषा का ऊपर का आधा बदन नंगा और मेरा भी आधा बदन नंगा: माथे पे माथा, होंठों पे होंठ, छाती से वक्षस्थल, पेट से पेट, नाभि पर नाभि, योनि के ऊपर लंड, जाँघों पे जाँघें, घुटनों पर घुटने, टाँगों से टाँगें और पैरों से पैर भिड़ा दिए… यानी कि हमारे एक-एक अंग एक-दूसरे के अंगों से मिल गए, जैसे कि हमारा दोनों का शरीर एक-दूसरे में प्रवेश कर गया हो। ये कहानी आप हमारी वासना डॉट नेट पर पढ़ रहे है.
इस शारीरिक स्थिति में होने से उसका पूरा बदन फड़कने लगा। भीतरी शरीर जाग रहा था, जिस कारण उसे एक तड़पन की अनुभूति हो रही थी। मैंने पहले उसके होंठों को अपनी जीभ से गीला किया, गालों पर हल्की आवाज के, फिर भारी आवाज के चुम्बन मार दिए तड़-तड़, फिर उसके रसीले होंठों का रस ग्रहण करने के लिए उसके लबों को भींचकर चूसना शुरू हो गया।
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उसके अधर फड़कने लगे, मुँह खुल गया, उसकी जीभ मेरे मुँह में जाने के लिए बेताब थी, ये इन्विटेशन था, मैं उसकी जीभ को चूसते-चूसते अपने मुँह के भीतर ले गया। फिर उसकी जीभ को अपनी जीभ से घर्षण करते हुए घुमाना शुरू कर दिया। उसकी जीभ को मैं अपने अंदर-अंदर घसीट रहा था “उन्ह…उन्ह…उन्ह..” मदहोशी की आवाज कहीं दूर से आई।
वो छटपटा रही थी। मेरी छाती को जोर-जोर से पीट जा रही थी। मैंने उसकी जीभ को आजाद कर दिया। वो लंबी-लंबी साँसें ले रही थी और दिल जोर-जोर से धड़क रहा था। मैं कुछ क्षण रुका फिर अपने होंठ उसके गाल पर रख दिए और मेरा एक हाथ उसके मम्मों पर था। उसके मम्मे धुक-धुक..धुक-धुक कर रहे थे। जब साँसें नॉर्मल हुईं तो मैंने उसके बालों के अंदर दोनों हाथ डालते हुए उसकी गर्दन को चूमा, ठोड़ी को, कान के पीछे चूमा। एक मस्ती सी छा गई उसपर।
“उमेशजी मैं पागल हो जाऊँगी, आपकी एक-एक हरकत में नशा है, शरीर में तूफान बर्पा रहा है, ऐसी शारीरिक अनुभूति आज से पहले कभी नहीं हुई मुझे… यू आर डिफरेंट।”
मैंने उसके उरोजों को अपने हाथों में ले लिया। अब मेरी नजर उसके मम्मों की गोलाइयाँ नाप रही थी। हाथ चारों ओर घूम रहे थे। मेरा मुँह मम्मों के ऊपर झुका, होंठ खुल गए, मेरी जीभ उसके चुचुक पर फिरने लगी, फिर दूसरे चुचुक पर, बारी-बारी।
उसके बाद मम्मे को दोनों हाथों से कप करते हुए अपने मुँह के भीतर चूसा, और प्राणिक क्रिया से और भीतर ले गया और रुककर अपनी जीभ और तालु से चुचुक को चूस रहा था। चूसते-चूसते मम्मे से दूध निकलना शुरू हो गया और मैं पी रहा था। दूध धीरे-धीरे मेरे गले के नीचे जाता हुआ प्रतीत होने लगा।
वो मचल उठी ऐसे अनुभव से जो उसका बदन महसूस कर रहा था। उसका शरीर ऊपर-नीचे हो रहा था, सरूर में आ रहा था: ओह्ह्ह… आह्ह्ह… हाए… “छोड़िये इसे, अब इसको लगाइये अपने मुंह में।” अब पहला मम्मा मुँह के बाहर था तो उसने अपने हाथों से पकड़कर दूसरा मम्मा मेरे खुले मुँह के भीतर सरका दिया।
जब मम्मे का अधिकतर हिस्सा मुँह के भीतर मानसिक शक्ति से खींच लिया, मेरा मुँह पूरा गोल-गोल हो गया, चुचुक जीभ के काफी भीतर तक पहुँच चुका था। जीभ अब कसकर चुचुक चूस रही थी। पहले की तरह अब दूध की धारा मम्मे से बहनी शुरू हो गई, जिसे पीते हुए मेरे शरीर में मस्ती छा रही थी।
“आआह्ह्ह…. दूध…. निकल…. रहाा…. हेइइइइ… प्लीज्ज…. आराम…. से…. चूस्स्सो… आह्ह्ह… ह्ह्हा आआआ… अब्ब्ह्ह बहुत मज्ज्जा आआ रहहा हेइइइ… उह्ह्ह… हाईइइ… आआईइइइ…. स्वार्ग्ग मिल्ल ग्ग्या… आन… उउइइह्ह… आआन।”
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वो फड़फड़ा रही थी, अपने नितंब जोर-जोर से ऊपर-नीचे पटक रही थी, उसकी योनि मेरे लंड को पीड़ित कर रही थी (अभी भी वो सलवार में और मैं लुंगी में था)। “आह्ह्हा… छोड़िये भीइइ?” जैसे ही मेरा ध्यान उसकी उछल-कूद की ओर गया मेरा मुँह ढीला हो गया। फौरन उसने मम्मे को बाहर खींच लिया।
“बेशर्म, बेहया, बदतमीज कहीं के… मेरे मम्मों को निचोड़ दोगे क्या?… (ठंडी साँस भरते हुए)… आगे चलो… मैं बेसब्र हो रही हूँ।”
“अच्छा जी।”
अब मेरा सिर उसकी नाभि के पास था। अपनी जीभ को उसकी नाभि के अंदर घुमाने लगा, फिर पेट पर चुम्बन की वर्षा कर दी। वो थर-थराई, फड़-फड़ाई… उत्तेजित होने लगी। काम-वासना अब उसके पूरे शरीर में वर्तुल (encircling) बना रही थी।
उसने हाथ नीचे करके मेरी लुंगी की गांठ खोल दी और परे कर दी। मेरा शरीर पूरे जोश से भर रहा था। नाभि के भीतर घर्षण करते-करते इधर मेरी जीभ मजा ले रही थी उधर वो काम के आवेश से उत्तेजित हो रही थी। मेरे दोनों हाथ अभी भी उसके चुचुकों को मसल रहे थे।
(मेरे कान की ओर मुँह करके) “उमेशजी, सलवार का नाड़ा खोलिये ना प्लीज। मेरा शरीर बेसब्र, बेकाबू हो रहा है। आग फैल रही है पूरे बदन में। आगे चलिये ना प्लीज?”
“नहीं, my love”… “नाड़ा खोलने की देर है कि हम दोनों अपने को रोक नहीं सकेंगे।”… “तुम्हें मालूम है इसका क्या परिणाम होगा?”
“क्या?”
“खतरा है… फिर बाप-बेटी का रिश्ता खत्म हो जाएगा?”
“तो अभी कौन सा बाप-बेटी का रिश्ता चल रहा है। होने दो ना रिश्ता खत्म। बहुत दिन से इच्छा थी कि कब आपसे संभोग करके मेरा बदन तृप्त होगा और आज मौका मिल ही गया। अब पीछे मत हटिये। संभोग करिये मेरे साथ। मेरे बदन में काम जगृत करके अग्नि जला दी है तो अब मेरी योनि के अंदर गर्भाशय के भीतर अपने वीर्य की वर्षा करके नहला दो मुझे।”
“My love. पक्का हो गया कि तेरी योनि पर मेरे लंड का नाम लिखा हुआ है। अब मुझे भी ज्यादा सोचने की जरूरत नहीं।” (मेरे लबों पर चुम्बन रसीद करते हुए)।
“Proceed… मेरे राजा.. लेट योर लंड रन डीप इनसाइड माय थर्स्टी चूत।”
ये सुनते ही मेरे शरीर में मर्दानगी का तूफान उठ चुका था। मैं घुटने के बल बैठ गया। उसकी सलवार का नाड़ा खोलकर उसकी योनि को आजाद कर दिया। उसने गहरी साँस ली। कुछ देर तक मेरी नजर उसकी साफ (शेव्ड) सफाचट योनि की बनावट, शकल, बीचों-बीच एक लंबी लकीर जैसे दो पंखुड़ियाँ आपस में जुड़ी हुई हों। मुझ पर नशा चढ़ गया ऐसी शुद्ध योनि… माउंट ऑफ वीनस को देखकर।
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“क्यों रानी इसे खुद साफ करती हो या जमाई राजा करते हैं?” इस पर वो हँसकर बोली, “कभी वो शेव करते हैं और कभी मैं खुद ही साफ करती हूँ। पर आप ये क्यों पूछ रहे हो मेरे राजा। ये तो मैंने आज सुबह ही शेव की थी। मुझे क्या पता था कि आज तुम्हारा शानदार लंड मुझे नसीब होगा।” ये कहानी आप हमारी वासना डॉट नेट पर पढ़ रहे है.
हाथों से योनि को स्पर्श किया, सहलाया, दबाया। चारों ओर फैली हुई, सख्त, ऊपर से नीचे तक लंबाई लिए हुए। मेरा मुँह मचलने लगा उसको स्पर्श करने के लिए। मैं नीचे झुका, होंठ रख दिए उस नायाब शै पर। लग गया जीभ से चाटने, फिर चूसने। बाहर-ही-बाहर हाथ भी फिर रहे थे, कभी उसकी नाभि पर, फिर उसके घुंघराले बालों पर।
ऐसा होते-होते जीभ ने दो पंखुड़ियों को अलग कर दिया, सटककर कुछ अंदर योनि के भीतर चली गई, लगी चाटने ऊपर-नीचे, भीतर ही भीतर… “उह्ह्ह… हम्म्म… हाईइइ… औरररर तेज्जीईईई से… रम्मेश्ह जीइइ।” मनीषा एक्साइटेड लाउडली। कामुकता का भूत मुझ पर सवार हो गया मनीषा के कहे हुए इल्फाज को सुनते ही।
अब जीभ वर्तुल में घूमने लगी। मेरे दोनों हाथ उसके मम्मों पर आ गए, उसने उनके ऊपर अपने हाथों का दबाव डाल दिया। योनि से तरल पदार्थ रिसने लगा। मनीषा के हाथ मेरे हाथों पर कसने लगे। मेरी उंगलियों से अपनी चुचुकों को दबा रही थी। योनि से तरल पदार्थ मेरी जीभ के नजदीक आ चुका था जो मेरी जीभ से होकर मेरे गले के अंदर जा रहा था। स्वाद क्या था!.. मेरा शरीर मस्ती में घूम गया!
“मेरे राजा-प्लीज्ज्ज… खुश्ह्ह…. कर्र्र…. दो मेरीईईई… चूततत्त्त…… को”
अब मैं पहली स्थिति में आ गया था… मुँह पर मुँह, छाती मम्मों के भीतर, नाभि पर नाभि, योनि के ऊपर लंड का स्पर्श, जाँघों पर जाँघें, टाँगें और पैर लिपटे हुए। मेरा लंड अभी योनि को छू ही रहा था कि उसके नितंब ऊपर को उछलने लगे।
“प्रिये, my love, मेरी जान… मेरा शरीर अब आने को है पूरी तैयारी से तुम्हारे भीतर।”
“अच्छाजी… अब और देर मत करो।”
मैंने पहले अपने लंड को हाथ से पकड़कर उसकी योनि के बाहरी लिप्स पर फेरा दो फड़ियों के बीच, मेरा लंड उत्तेजित होकर और सख्त, लोहे के खंबे की माफिक तन गया… मैंने उसके कंधों को पकड़कर थोड़ा ऊपर को उठाया।
“देखो प्रिये… देखो… छूकर देखो.. अपना हाथ आगे लाओ।”
मनीषा ने मेरे लंड को दोनों हाथों में लेकर सहलाया, आगे से जड़ तक हाथ फेरा, कुछ दबाया। लंड के वजन और घेराव को महसूस करते हुए वो सिहर उठी, और मस्ती में आ गई।
“हाई! आगे से गोरा? इतना लंबा, मोटा, सख्त और भारी लंड?… मुझे आगे का गोरा हिस्सा चूसना है प्लीज?”
मैं चुप। मनीषा ने लंड का अगर-भाग मुँह के भीतर करके चूसना शुरू कर दिया। मैं और उत्तेजित हो रहा था। कुछ क्षण बाद मैंने प्यार से लंड को उसके मुँह से अलग कर लिया। वो और भी प्रेम-विह्वल हो चुकी थी। मछली की मानिंद तड़प रही थी काम-उत्तेजना के कारण।
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उसी समय उसके सिर के नीचे से तकिया खिसकाकर मैंने उसके नितंबों को उठाकर उनके नीचे लगा दिया। उसके नितंब अब तकिये के कारण उठे-उठे थे। उसकी जाँघें फैल गई थीं। योनि कुछ और ऊपर को उठी हुई प्रतीत हो रही थी। उसने अपनी जाँघें और चौड़ी कर लीं।
मैं उसकी जाँघों के भीतर था, उसकी जाँघों को हाथों से व मुँह से सहला रहा था, चूम रहा था। उसने जाँघें और ज्यादा फैला दीं। फिर मैंने उसकी टाँगों को घुटनों से मोड़कर अपने घुटनों को मोड़ लिया, उसकी टाँगें अब मेरी जाँघों के बाहर और मेरी जाँघें उसके नितंबों के आर-पार थीं।
अब योनि का दरवाजा मेरे लंड के बिलकुल सामने था। मेरे लंड ने योनि के दरवाजे पर दस्तक दी, हल्का सा हुल्किया, फिर हुल्किया थोड़ा जोर से, दरवाजा काँपकर थोड़ा खुल गया (पंखुड़ियाँ थोड़ी सी खुलीं)। तुरंत अपनी २ उंगलियाँ उसकी योनि के भीतर सरका दीं और भीतर की दो पंखुड़ियों को टटोला।
उंगलियों के स्पर्श होते ही वो खुलकर खिल गईं। जब उंगलियाँ बाहर निकाल लीं तब बाहर की दोनों पंखुड़ियाँ गुलाब के फूल की तरह खिली हुई थीं तुरंत ही एक धक्का मारा योनि के दरवाजे पर मेरे लंड ने, किवाड़ फौरन खुल गए और लंड का अगर भाग भीतर पहुँच गया।
मनीषा का ध्यान आगे जो दर्द होगा उस ओर न जाए, उसे बातों में लगाने के लिए…
“प्रिये, कैसा लग रहा है?” (मेरे कान में)
“लग रहा है कि कोई दरवाजा खट-खटा रहा है।” (मजाक से)
“कौन सा दरवाजा, फ्लैट का?” (मचलते हुए)
“नहीं जी… आपका लंड मेरी चूत का दरवाजा ठक-ठक रहा है।”
इसी दौरान मूसल लंड धीरे-धीरे योनि में प्रवेश करने लगा, पहले धीरे-धीरे फिर अधिक जोर से लंड को फँसा ही दिया योनि के भीतर। मनीषा चीखी जोर से। “आआह्ह्ह्ह….आआह्ह्ह… धीरेरेरे … धीरेरेरे… करोओओह… हाँ जीईईई… माजाआआआ आआआ रहहा हाई… उउउह्ह्ह्ह… आह्ह्हा…. प्लीज धीरे… धीीरे…… करते जाओओओओ.. और भीतर और भीतर।”
मुझे कस लिया जोर से अपने आलंडन में। मैंने लंड को एक क्षण के लिए बाहर निकाल लिया। उसकी योनि से तरल पदार्थ बह रहा था, गर्म और चिपचिपा। मैंने फिर धीरे से लंड की टोपी योनि के द्वार पर रखी और एक जोरदार झटका दिया। पूरा लंड उसकी टाइट योनि में समा गया। वो फिर चीखी, लेकिन इस बार दर्द और मजा दोनों मिले हुए। ये कहानी आप हमारी वासना डॉट नेट पर पढ़ रहे है.
“ओह्ह्ह उमेशजी… कितना मोटा है आपका… आह्ह्ह… पूरी तरह भर दिया… हाँ… अब धीरे-धीरे हिलाओ…”
मैंने कमर हिलानी शुरू की। धीरे-धीरे, फिर तेज। उसकी योनि की दीवारें मेरे लंड को कसकर जकड़ रही थीं। हर धक्के के साथ वो सिसकारी ले रही थी- आह्ह… उफ्फ्फ… हाँ… और जोर से… उसके नितंब ऊपर उठ-उठकर मेरे धक्कों का जवाब दे रहे थे। हमारा तालमेल परफेक्ट हो गया। पसीना दोनों के बदन पर छा गया। मैं उसके मम्मों को मसलता रहा, चुचुकों को चूसता रहा। वो मेरी पीठ पर नाखून गड़ा रही थी।
“उमेशजी… मैं… मैं आने वाली हूँ… आह्ह्ह… हाँ… और तेज… फक मी हार्ड…”
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उसकी योनि ने मेरे लंड को और कस लिया। वो झड़ने लगी, उसका पूरा बदन काँप उठा, योनि से गर्म तरल बह निकला। मैं रुका नहीं, और जोर-जोर से धक्के मारता रहा। अब मेरी बारी थी। मेरे लंड में झनझनाहट हुई और मैंने आखिरी जोरदार झटके दिए। “मनीषा… मेरी जान… ले मेरा वीर्य…” मेरा लंड फड़का और गर्म वीर्य की धाराएँ उसके गर्भाशय में उड़ेल दीं। हम दोनों थककर एक-दूसरे से लिपट गए। साँसें तेज चल रही थीं। कुछ देर बाद वो मेरे सीने पर सिर रखकर बोली-
“अंकल… नहीं, उमेशजी… आज आपने मुझे स्वर्ग दिखा दिया। इतना मजा… इतनी तृप्ति… पहले कभी नहीं महसूस की।” मैंने उसके माथे को चूमा। “माय लव, ये तो सिर्फ शुरुआत है। जब तक मैं हूँ, तुम्हारी हर इच्छा पूरी करूँगा।” हम नंगे ही लिपटकर सो गए। बेटा पास में सोया हुआ था, लेकिन हमारी दुनिया अलग थी। उस दिन के बाद हमारा रिश्ता बदल गया, बाप-बेटी का नहीं, प्रेमी-प्रेमिका का। और वो गुप्त संबंध आज भी जारी है, जब भी मौका मिलता है।
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