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परिवार में चुदाई की अनोखी कहानी 5

दिसम्बर 26, 2023 by hamari

Mom Pussy Hole XXX

दोस्तों आप सभी का फिर से स्वागत है हमारी वासना पर. कैसे है आप सभी लोग. आपने कहानी के पिछले भाग परिवार में चुदाई की अनोखी कहानी 4 में पढ़ा था की अमर ने अपनी माँ को जयपुर ले जाकर चूत चुदाई करने वाला था अब आगे – Mom Pussy Hole XXX

अब और ज्यादा बर्दाश्त करना मेरे लिये असम्भव होता जा रहा था। मैंने अपना एक हाथ नीचे ले जाकर अमर के लण्ड को पकड़कर उसके सुपाड़े को मेरी चूत के मुखाने का रास्ता दिखाने लगी। जैसे ही उसके लण्ड ने पहली बार किसी चूत के छेद को छुआ तो अमर गुर्राने लगा। उसने मेरी टाँगों को थोड़ा और फ़ैला कर चौड़ा किया, जिससे उसको मेरी पनिया रही चूत में लण्ड घुसाने में आसानी हो सके।

“आह मम्मी…” वो हाँफ़ते हुए बोला, और फ़िर अपने होंठों को मेरे होंठों से दूर करते हुए, मेरी आँखों में आँखें डालकर देखने लगा। ”मम्मी…” उसके लण्ड का सुपाड़ा मेरी चूत के छेद की मुलायम, गीली गोलाई को अपने साइज के अनुसार खुलने पर मजबूर कर रहा था, अमर बुदबुदाते हुए बोला, ”आप बहुत अच्छी मम्मी हो, आई लव यू, मम्मा!”

”मैं भी तुझे बहुत प्यार करती हूँ बेटा,” मैं उसके होंठों पर अपने होंठ रखकर प्यार से बारम्बार चूमते हुए बोली। जब मैंने अपनी टाँगें अमर की मजबूत पींठ के गिर्द लपेटीं, और उसको अपनी तरफ़ खींचा, जिससे उसका लण्ड पूरा मेरी चुदने को बेकरार चूत में घुस सके, तो एक बार को तो मानो मेरी साँस ही रुक गयी।

जैसे ही मेरी चूत के अंदरूनी होंठों ने खुलते हुए उसके लण्ड के अंदर घुसने के लिये रास्ता बनाया, और फ़िर ईन्च दर ईन्च अंदर घुसने लगा, तो हम दोनों कराह उठे। जब हम दोनों एक दूसरे की जीभ के साथ चूमा चाटी कर रहे थे, तब अमर का मोटा लण्ड आराम से मेरी पनिया रही चूत में धीमे धीमे अंदर घुस रहा था।

मेरे होंठों को चूसते हुए प्यार से धीमे धीमे, पूरे मजे लेते हुए, अमर अपना लण्ड अपनी माँ की चूत में घुसा रहा था। जैसे ही उसने अपने फ़नफ़नाते लण्ड का जोर का झटका मेरी चूत में मारा, उसकी आँखें बंद हो गयी। उसकी उम्र में दुनिया में सबसे ज्यादा एहमियत चूत की थी.

और मेरी गीली चूत में अपना लण्ड अंदर और फ़िर और ज्यादा अंदर घुसाकर मुझे चोदने में जो मजा उसको आ रहा था, वो उसके लिये अकल्पनीय था। हाँलांकि पिछले हफ़्तों में अमर कई बार मेरी गाँड़ में अपना लण्ड घुसा चुका था, और मेरे मुँह में तो अनगिनत बार अपने लण्ड का पानी निकाल चुका था, लेकिन चूत का मजा अलग ही था।

मेरी चूत ने मेरे बेटे के लण्ड का स्वागत कम से कम अवरोध के साथ किया था, और जैसे ही उसने अपना लोहे जैसा कड़क लण्ड मेरी चूत में घुसाया था, मेरी गीली चूत ने उसको जकड़कर अपने अंदर समाहित कर लिया था। मेरी चूत किसी कुँवारी लड़की की तरह टाईट तो नहीं थी, लेकिन ज्यादा ढीली भी नहीं थी, गीली, भीगी हुई और उसके लण्ड को जकड़े हुए थी।

मेरी चूत अमर के लण्ड को गर्माहट दे रही थी, और उसका स्वागत कर रही थी, और चूत की मखमली चिकनाहट उसके लण्ड का पूरा ख्याल रख रही थी, और उसके लण्ड की मोटाई के अनुसार अपने आप को ऐडजस्ट कर रही थी।

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अमर के लिये ये सब किसी सपने से कम नहीं था, वो अपने लण्ड से उस औरत की चूत को चोद रहा था, जिसको वो सबसे ज्यादा प्यार करता था। और वो औरत कोई और नहीं उसकी सगी माँ थी, जिसने उसे जीवन दिया था और अब उसको वो शारीरिक सुख देकर उसके जिस्म की पूरी कर रही थी, जो उसको कहीं और मिल पाना असम्भव था।

जब उसने पुरा लण्ड मेरी चूत में घुसा दिया, तो मैं अपने होंठ चुसवाते हुए ही कराह उठी, क्योंकि मेरी चूत ने इतना बड़ा लण्ड कभी अंदर नहीं लिया था, अमर का लण्ड उसक पापा के लण्ड से कहीं ज्यादा बड़ा था। अमर अपना पूरा लण्ड मेरी मखमली मुलायम चूत में घुसाकर, अंदर बाहर करते हुए मुझे तबियत से चोद रहा था।

हम दोनों मस्त होकर चुदाई का मजा ले रहे थे, तभी हाँफ़ते हुए अमर ने अपनी आँखें खोल कर देखा। जैसे ही हम दोनों की नजरें मिलीं, तब मुझे यकायक वास्तविकता का एहसास हुआ कि मेरे सगे बेटे का लण्ड मेरी चूत के अंदर गर्भाशय पर टक्कर मार रहा था। समाज की मर्यादा, वर्जना को लांघकर हम दोनों के शारीरिक सम्बंध, एक पल को सब कुछ मेरे दिमाग में कौंध गया।

”अमर बेटा, आहह्ह्ह्… बेटा अमर!”

यकायक मानो किसी वज्रपात की तरह मेरा स्खलन हो गया, स्खलित होते हुए मेरा पूरा बदन काँप गया, मेरी साँसें उखड़ने लगी, और मैं अपने बेटे की मजबूत बाँहों में ही मचलने लगी, मेरी चूत में घुसे उसके मोटे लण्ड से मुझे पूर्णता का एहसास हो रहा था, और झड़ते हुए मेरी चूत उसके लण्ड को निचोड़ रही थी।

चरम पर पहुँच कर मैं मस्त होकर अमर को कस कर जकड़े हुए थी, उसके कन्धों को अपने नाखून से खरोंच रही थी, और अपनी टाँगों को उसकी कमर के गिर्द लपेट कर, कुछ कुछ आनंद से भरी आवाजें निकाल रही थी। जब मेरी चूत अमर के पूरी तरह खड़े लण्ड को ऐंठने लगी, तो अमर भी घुटी घुटी आवाजें निकालने लगा।

मेरी चूत धड़कते हुए मानो उसके लण्ड की मालिश कर रही थी, और उसकी सनसनाहट उसके सारे बदन में हो रही थी। अपनी मम्मी की चूत में लण्ड घुसाकर अमर को इतना ज्यादा मजा आ रहा था कि यदि उसने कुछ देर पहले मेरे मुँह में पानी ना निकाला होता, तो वो कब का मेरी चूत में स्खलित हो चुका होता।

झड़ने के बाद जब मैं थोड़ा होश में आई तो हम दोनों माँ बेटे वासना में डूबकर चूत में लण्ड घुसाकर लेटे हुए थे। अमर का चेहरे पर चमक थी, और उसकी आँखों में वासना, मैंने उसकी तरफ़ देखते हुए कहा, ”म्म्म्ह्ह बेटा, तुम बहुत अच्छी चुदाई करते हो, मैं तो बहुत अच्छी वाली झड़ी हूँ।”

”मैं भी बस होने ही वाला था,” अमर अपनी मम्मी की भीगी गीली चूत में अपना लण्ड थोड़ा और अंदर घुसाते हुए बोला। ”जैसा मैंने सोचा था, आप उससे भी बहुत ज्यादा अच्छी हो मम्मी…” वो बुदबुदाते हुए बोला, और उसने मेरे मम्मों को मसल दिया, मेरी गर्म मुलायम चूत में अपना मूसल पेलते हुए बोला, ”आपकी चूत तो बहुत मस्त है!”

”ये अब तुम्हारी है बेटा, तुम्हारी मम्मी की चूत पर अब बस तुम्हारा अधिकार है बेटा,” कसमसाती हुई किसी तरह जो आग मेरी चूत और संवेदनशील निप्पल में लगी हुई थी, उस पर काबू करते हुए मैं बोली।

अमर ने अपना पूरा लण्ड मेरी चूत में घुसा रखा था और मेरे चूत के दाने को भरपूर घिस रहा था, और धीरे धीरे झटके लगा रहा था, मानो वो हमेशा मेरी मुलायम प्यासी चूत में अपना लण्ड घुसा कर रखना चाहता था। उसकी ये कामुक हरकतें मुझे भी बहुत आनंदित कर रही थी।

मेरी आवाज भारी और घुटी हुई निकल रही थी, फ़िर भी मैं अमर से भीख माँगते हुए बोली, ”चोद दे बेटा, चोद दे अपनी मम्मी की चूत को, मार ले अपनी माँ की चूत अमर बेटा।” मेरी बार सुनकर अमर के लण्ड में हरकत हुई, तो मुझे उत्साहवर्धन मिला, ”निकाल दे सारी गर्मी मेरी प्यासी चूत की, चोद दे इसे, निकाल दे अपने लण्ड का पानी अपनी मम्मी की चूत में, आह्ह्ह्… कब से लण्ड की भूखी है तेरी मम्मी की चूत, हाँ बेटा ऐसे ही चोद दे!”

अमर का दिमाग घूम रहा था, और उसके कानों में मेरी दर्खाव्सत गूँज रही थी, फ़िर उसने अपने लण्ड को मेरी चूत में अंदर बाहर करना शुरू कर दिया। मेरी पनिया रही चिकनी चूत जिसने उसके लण्ड को जकड़ रखा था, उसमें उसने अपने मूसल लण्ड के धीरे धीरे झटके मारने शुरू किये।

लेकिन कुछ ही सैकण्ड में उसकी बलवती होती चुदास और मेरी कामुक बातों का उस पर असर होने लगा, और वो मेरी चूत में अपने लण्ड के जोर जोर से झटके मारने लगा। और फ़िर वो अपनी मम्मी को पागलों की तरह चोदने लगा।

जब उसका लण्ड मेरी चूत में घुसता तो हर झटके के साथ हर बार उसकी स्पीड और गहराई तेज होती जा रही थी। अमर मस्ती में डूबकर आहें भर रहा था। मेरी मखमली चिकनी चूत के एहसास के साथ मेरी चूत जो उसके लण्ड को निचोड़ रही थी वो उसका हर झटके के साथ मजा दोगुना कर रही थी।

हम दोनों माँ बेटे ताल से ताल मिलाते हुए, स्वतः ही झड़ने के करीब पहुँच चुके थे। मेरी घुटी दबी आनंद से भरी आवाजें, उसके हर झटके की थाप के साथ चुदाई का मधुर संगीत बना रही थी। मैं अपने बेटे का लण्ड अपनी चूत में घुसवाकर मस्त हो रही थी.

और अमर अपनी मम्मी की मुलायम मखमली चूत जिसने उसके लण्ड को अपनी चिकनाहट में जकड़ रखा था में अपने लण्ड को घुसाकर, अपनी मम्मी को मसलते हुए ताबड़तोड़ चोदे जा रहा था। सारी दुनिया से बेखबर हम दोनों माँ बेटे आलिंगनबद्ध, दो जिस्मों को एक बनाकर, हर वर्जना को तोड़ते हुए चुदाई का अपार आनंद ले रहे थे।

उस वक्त चूत और लण्ड का मिलन ही सर्वोपरी था। अमर के हर झटके के साथ ताल में ताल मिलाते हुए, मैं अपनी गाँड़ ऊपर उछाल रही थी, जिससे मेरी चूत का चिकना छेद उसके लण्ड को हर झटके को आराम से ऊपर होकर लपक लेता था, अमर मेरी गर्दन को तो कभी मेरी उभरे हुए निप्पल को चूस रहा था।

अमर मेरे प्यार में वशीभूत, वासना में डूबकर अपनी खूबसूरत माँ को चोदे जा रहा था। चुदाई के चरमोत्कर्ष पर पहुँच कर मैं एक अलग ही दुनिया में मानो जन्नत की सैर कर रही थी, तभी अमर बोला, ”मेरा पानी निकलने ही वाला है, मम्मी,” और फ़िर उसने अपने लण्ड अंधाधुंध मेरी रस टपका रही चूत में पेलना शुरू कर दिया।

”ओह मम्मी मैं बस आपकी चूत में झड़ने ही वाला हूँ, ओह्ह्ह मम्मी…”

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अपने बेटे के लोहे के समान सख्त लण्ड के अंतिम झटकों को झेलते हुए मैं कुछ भी बोलने की स्थिति में नहीं थी। जैसे ही अमर के लण्ड ने अंतिम झटका मारा, मेरी चूत में से भी मानो ज्वालामुखी की तरह विस्फ़ोट हो गया। अमर अपने लण्ड को मेरी चूत में घुसाये गर्म गर्म वीर्य की धार पर धार से मेरी प्यासी चूत में बौछार कर रहा था।

उसने इतना ज्यादा पानी छोड़ा कि मेरी चूत की सुरंग में मानो बाढ ही आ गई। वीर्य निकालते हुए अमर के मुँह से जो संतुष्टी भरी आवाज निकल रही थी, मेरी चीख उसका बराबर मुकाबला कर रही थी। मेरे गर्भाशय से टकराती उसके वीर्य के गर्म पानी की पिचकारी को मेहसूस करते हुए, मैं मन ही मन सोचने लगी कि अमर की जवानी में निकले इतने सारे वीर्य के पानी से कोई भी लड़की एक बार में ही गर्भवती हो जाये।

जैसे ही मैं अपने चर्मोमत्कर्ष पर पहुँची तो मेरी चूत ने अमर के लण्ड को कसकर जकड़ लिया, और उसको निचोड़ने लगी, और उसके तने हुए लण्ड को चूत के रस से नहलाने लगी। मैं अपने बेटे अमर के लण्ड से निकले वीर्य के पानी को अपनी चूत में मेहसूस करते हुए इस वर्जित सुख का आनंद ले रही थी।

मैं अमर के कन्धों को अपने नाखून से नोंचने लगी, और अपनी टाँगें उसकी कमर पर कसकर लपेट लीं, और अपने बेटे के नीचे लेट हुए मैं काँप रही थी, मैं और अमर दोनों कामोन्माद में डूब रहे थे। अमर इतना अच्छा वाला झड़ा था, कि जैसे ही उसके लण्ड से स्खलन बंद हुआ, वो मेरे गुदाज बदन पर निढाल होकर लेट गया।

उसने अपना सिर मेरे मम्मों पर टिका लिया, और मेरे बदन की जानी पहचानी गंध को सूँघने लगा, मेरी सामान्य होती साँसें मानो उसको थपकी दे रही हों। अमर मेरी दिल की धड़कन को धीरे धीरे सामान्य होता सुन रहा था, मेरे पैरों की जकड़ उसकी कमर पर ढीली हो गयी थी, और मेरी बाँहों की जकड़ में भी अब हताशा की जगह प्यार था।

अभी भी हम दोनों के यौनांग आपस में जुड़े हुए थे, और हम माँ बेटे दो संतुष्ट प्रेमियों की तरह कामोन्माद के अंतिम प्रहर का मजा ले रहे थे। जब अमर ने आँखें खोलकर मेरी तरफ़ देखा, तब भी उसका सिंकुड़ा हुआ लण्ड मेरी रस से डूबी हुई चूत के अंदर था। मुझे उसकी तरफ़ मुस्कुराता हुआ देखता हुआ पाकर उसको थोड़ा अचरज हुआ, मेरा चेहरा दमक रहा था, मेरी आँखों में अजीब चमक थी। लेकिन मेरी आँखों से आँसू निकल कर मेरे गालों पर लुढक रहे थे।

”मम्मी…” उसने गहरी साँस लेते हुए घबराकर मुझसे पूछा, ”क्या हुआ मम्मी?”

मेरी बगल में साईड से लेटते हुए, उसको लगा कि शायद मुझे कहीं दर्द हो रहा है, और उसने तुरंत अपने लण्ड को मेरी चूत से बाहर निकाल लिया। चूत में से लण्ड के बाहर निकलते ही मुझे कुछ रिक्तता का एह्सास हुआ, और मैं फ़िर से होश में आ गयी।

मैंने पलक झपकाई और सिर को हिलाया, मानो मेरे खुद समझ नहीं आ रहा था कि मेरे गाल आँखों से निकले आँसू से क्यों भीग रहे थे। जैसे ही अमर पींठ के बल सीधा लेटा, मैं उसके पीछे पीछे उसके ऊपर सवार हो गयी, और अपनी चूत जिससे वीर्य चूँ कर बाहर टपक रहा था, उसको अमर के सिंकुड़े हुए मुलायम लण्ड पर रख कर दबा दिया।

अमर की गोद में बैठकर, मैं उसके उदास चेहरे को सहलाने लगी, और मुस्कुराते हुए उसको खुश करने का प्रयास करने लगी। और फ़िर भावुक भरभराई आवाज में बोली, ”कुछ नहीं हुआ बेटा, परेशान होने की कोई बात नहीं है, सब ठीक है।”

”तो फ़िर आप रो क्यों रहीं थीं?” अमर हकलाते हुए बोला, वो मेरे होंठों पर लगातार बनी मुस्कान देखकर वो थोड़ा उलझन में पड़ गया। ”अगर मेरी वजह से आपको दर्द हुआ है, तो मुझे माफ़ कर दो मम्मी, लेकिन…”

“सच में बेटा, सब ठीक है,” अमर के होंठों को चूमने के लिये जैसे ही मैं आगे झुकी, मेरे मम्मे अमर की बलिष्ठ छाती को दबाने लगे। ”कुछ नहीं हुआ, तुम्हारी वजह से कुछ दर्द नहीं हुआ है, असल में तो तुमने तो मुझे बहुत अच्छा प्यार किया, मजा आ गया, मैं तो…”

मैं आह भरकर गुस्से में दूसरी तरफ़ देखने लगी। मुझे अपने आप पर बहुत गुस्सा आ रहा था, कि मैंने बेकार में इतने अच्छे खासे अपने बेटे से चुदाई के सुंदर मौके को बेकार कर दिया था। अपनी असुरक्षा के बारे में इस वक्त सोचना बेमानी था।

”सच सच बताओ, मम्मी,” अमर जिद करते हुए बोला, वो समझ गया था कि मैं कुछ छुपा रही थी। ”मैं आपको रोता हुआ नहीं देख सकता, कभी नहीं।”

जैसे ही मैंने उसकी तरफ़ चेहरा घुमाया, उसने मेरे गालों को अपने हाथों में भर लिया, और अपनी ऊँगलियों से मेरे आँसू पोंछने लगा। हम दोनों माँ बेटे एक दूसरे की आँखों में देख रहे थे, मैंने एक आह भरकर सिर हिलाते हुए बात को टालने की कोशिश की।

”अरे बेटा, कुछ नहीं, मैं तो बस वैसे ही…हम दोनों के बार में सोच रही थी। मैं भी कभी कभी कैसी बच्चों जैसी स्वार्थी हरकत कर बैठती हूँ।” मैं झेंप कर हँसते हुए बोली, जिस से बात आई गयी हो जाये।

“आप स्वार्थी नहीं हो मम्मी,” अमर ने मेरी पींठ और गदराये बदन को सहलाते हुए कहा। ”एक बार आप बताओ तो सही कि आप किस बात से परेशान हो, हम मिल कर कोई समाधान निकालेंगे। मैं आपसे बहुत प्यार करता हूँ, बस आप बताओ मुझे।”

”ओह बेटा, तू नहीं मानेगा,” उसकी बात सुनकर मैं पिघल गयी। मैं अपने आप पर काबू नहीं रख पायी, और मैंने झुककर अमर के होंठों को चूम लिया, और फ़िर अपने मम्मे उसकी छाती पर दबाते हुए उसके कन्धे पर अपना सिर रख दिया। अमर मेरे गालों को अपने हाथों से सहला रहा था, और उसका लण्ड मेरी वीर्य से भीगी चूत की फ़ाँकों के बीच दबा हुआ था।

मैंने सिर घुमाकर अमर की निश्चल सतेज आँखों में देखा। उसके प्यार से अभीभूत होकर, उसकी बलिष्ठ बाहों में आ रहा सुरक्षा का एहसास, मुझे सब कुछ सच सच बोलने को मजबूर कर रहा था। मैं ऐसे सच्चे भरोसेमंद प्यार करने वाले से कुछ भी नहीं छुपाना चाहती थी, और अपनी असुरक्षा वाली बात उसको बताने को मजबूर हो गयी थी।

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”मैं तो बस भविष्य के बारे में सोच रही थी, बेटा,” मैं धीमे से बोली, आर फ़िर अपने आप शब्द मेरे मुँह से निकलते चले गये। ”कुछ साल बाद जब तुम्हारी शादी हो जायेगी बेटा, मुझे डर है कहीं हमारा ये सब खत्म ना हो जाये,” मैं गहरी साँस लेते हुए बोली।

फ़िर इससे पहले कि मैं हताश होती, मैंने अपने आप को हिम्मती बहादुए दिखाते हुए कहा, ”और शायद वो ही ठीक भी होगा, और ऐसा ही होना चाहिये। मुझे पता है लेकिन मैं बर्दाश्त करने को तैयार हूँ, लेकिन मैं अपने आप को उस वक्त के लिये मानसिक रूप से तैयार कर रही हूँ।

और वो सब सोच के ही मैं उदास हो जाती हूँ, मुझे माफ़ कर दो, मैंने तुम्हारा मूड खराब कर दिया।” मैंने अमर के गालों को सहलाकर उसको चूमते हुए कहा, ”बस इसीलिये मैं थोड़ा परेशान थी, तुम्हारी मम्मी तुम्हारी कमी को बहुत ज्यादा मेहसूस करेगी बेटा…।”

अमर की आवाज भर्रा कर काँपने लगी, वो किसी तरह बोला, ”आप कहना क्या चाहती हो, खत्म हो जायेगा, क्यों खत्म हो जायेगा, और मेरी शादी तो होने में अभी काफ़ी साल बाकी हैं, पहले तो हम सन्नो की शादी करेंगे, और फ़िर…”

और फ़िर मैं कुछ देर तक अमर को लगातार चूमती रही, और उसको खामोश रहने पर मजबूर कर दिया। जैसे ही मैंने अपने होंठ उसके होंठों पर से हटाये, मैं तुरंत बोली, “बेटा, मैं तुमसे बहुत प्यार करती हूँ, मैं चाहती हूँ कि तुमको दुनिया की सारी खुशियाँ मिलें, तुम हमेशा खुश रहो।

मुझे पता है तुम उस बारे में अभी सोचना भी नहीं चाहते हो, लेकिन मुझे पक्का विश्वास है कि एक बार जब तुम्हारी शादी हो जायेगी तो तुम अपनी जवान बीवी से प्यार करने लगोगे। मुझे गलत मत समझो लेकिन ऐसा होना निश्चित है… मुझे तुमको खुश देखकर खुशी होगी.

मैं अपनी बहू यानि तुम्हारी बीवी का बाँहें खोलकर स्वागत करूँगी, और तुम दोनों को एक साथ खुश देखकर, मैं दुनिया की सबसे खुश माँ होऊँग़ी। अमर मैं चाहती हूँ कि तुमको दुनिया की सब कामयाबी मिले और तुम हँसी खुशी अच्छा जीवन बिता सको। मैं तुमको अभी और हमेशा इतना ही प्यार करती रहूँगी। बस ये ही बात थी।”

एक बार फ़िर, मेरे चेहरे पर आँखों मे आँसू और होंठों पर मुस्कान एक साथ आ गये। मैंने अमर को कसकर अपनी बाँहों में जकड़ लिया, अमर मेरे उसके प्रति प्यार की गहराई देखकर अचम्भित हो रहा था। मेरी निष्ठा और दुलार ने उसको अभिभूत कर दिया था।

मेरा प्यार हमारे भावनात्मक लगाव और शारीरिक सम्बंधों से आगे निकल चुका था। ये उस ऊँचाई को छू गया था कि मैं उसका त्याग करने को तैयार थी, जिससे वो मुझे पीछे छोड़कर, अपनी जिंदगी के रास्ते अपने आप तय कर सके। हाँलांकि अमर जानता था कि वो ऐसा कुछ नहीं करेगा, लेकिन फ़िर भी वो अपनी मम्मी की त्याग भावना को देखकर अवाक था।

मैं तो उससे विरह का दर्द झेलने के लिये तैयार थी, क्योंकि ये उसके भले के लिये अच्छा था। जब अमर भावनाओं में डूबा हुआ था, तभी अमर के लण्ड में हरकत होने लगी, मेरी पनियाती गर्म चूत के दोनों बाहरी फ़ाँकों के बीच दबा हुआ, वो फ़िर से खड़ा होने लगा।

अमर अच्छी तरह समझ रहा था कि उसको कभी कोई मेरी तरह ऐसा निस्वार्थ प्यार नहीं करेगा। मेरा सच्चा प्यार और मेरे गुदाज गदराये बदन का सामीप्य उसको फ़िर से उत्तेजित कर रहा था, और उसके लण्ड में हलचल बढने लगी थी।

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वो बड़बड़ाते हुए अपनी जीवनदायनी माँ जिसने उसको देखभाल कर पाल पोस के बड़ा किया था को सम्बोधित करते हुए बोला, ”आई लव यू, मम्मी, विश्वास करे मैं आपको हमेशा ऐसे ही प्यार करता रहूँगा।” अमर ने मुझे अपनी बाँहों मे जकड़ लिया, और मेरी आँखों में आँखें डालकर देखने लगा, वो शायद कुछ कहना चाहता था, लेकिन उसको शब्द नहीं मिल रहे थे। ”कुछ नहीं बदलेगा, सब ऐसे ही चलता रहेगा, मैं कैसे कहूँ…”

उसकी बात सुनकर मैं हँसने लगी, मैं उसके दिल से निकल रही भावनाओं को समझ रही थी। अमर की बाँहों में पिघलते हुए, मैंने उसके माथे पर अपना माथा छुला कर दबाते हुए कहा, ”मैं समझ रही हूँ बेटा, तुम ज्यादा मत सोचो।”

हम दोनों माँ बेटे, एक नवविवाहित युगल की तरह एक दूसरे को बारम्बार लगातार चूमने लगे, और जो कुछ हम दोनों ने एक दूसरे से कहा था, उसको जिस्मानी तौर से साबित करने लगे। कुछ देर प्यार से धीरे चीरे चूमने के बाद हम दोनों बेताब होकर चूमाचाटी करने लगे।

अमर मेरी नंगी चिकनी पींठ को सहलाते हुए, बीच बीच में मेरी गाँड़ की मोटी उभरी हुई गोलाइयों को दबा कर मसल रहा था, और मैंने अपने बेटे के चेहरे को अपने हाथों में पकड़ रखा था। इस दौरान मैं अमर की गोद में बैठकर अपनी गाँड़ उछाल रही थी, और अपनी भीगी गीली चूत की फ़ाँकों और चूत के उभरे हुए दाने को उसके खड़े लण्ड पर घिस रही थी।

अपने मम्मों को अमर की छाती पर दबाते हुए, अमर की जीभ को चूसते हुए, होंठों पर होंठ घिसते हुए, मैं अमर के ऊपर छाई हुई थी। जैसे ही मैंने अमर को चूमना बंद करते हुए, अपने आप को उसके पेट के निचले हिस्से से अपने आप को थोड़ा सा ऊपर उठाया, अमर सिहर गया।

अमर के लोहे जैसे कड़क लण्ड को अपने हाथ से पकड़कर मैं उसको अपनी चिकनी चूत के छेद का रास्ता दिखाने लगी। और फ़िर उसके लण्ड को अपनी चूत में घुसाकर, उसके ऊपर लेटते हुए मैंने अपने मम्मे अमर के चेहरे पर रख दिये।

जैसे ही अमर का शूल जैसा लण्ड मेरी चूत को चीरता हुआ मेरी प्यासी चूत की गुफ़ा में अंदर घुसा, मेरी चूत की पंखुड़ियाँ स्वतः ही खुल कर उसको निगलने लगी। अमर के लाजवाब मूसल जैसे लण्ड को अपनी चूत में फ़िसलकर अंदर घुसते हुए मुझे जो पूर्णता का एहसास हो रहा था.

उस की वजह से मेरे मुँह से अपने आप आहें निकल रही थी। जब उसका लण्ड पूरा मेरी चूत में घुस गया तो उसका अण्डकोश मेरी गाँड़ के छेद को छूने लगा, और लण्ड मेरी गर्म चूत के छेद में जितना अंदर जा सकता था उतना अंदर घुसा हुआ था।

अमर के लण्ड को अपनी चूत में घुसाकर, उसके ऊपर सवारी करते हुए, अपनी नशीली आँखें खोलकर मैं अपने बेटे को देखकर मुस्कुराई। मेरे बदन में चुदाई का खुमार चढने लगा था, और मेरी आँखें सवतः ही बंद होने लगी थी।

”तू मेरा बहुत प्यार बेटा है अमर, मैं तुझे बहुत प्यार करती हूँ… बहुत ज्यादा बेटा… ओह्ह्ह्…”

”आह मम्मी, मैं भी आपको बहुत प्यार करता हूँ…”

इससे पहले कि अमर कुछ और बोलता मैं उसके ऊपर सवार होकर चुदाई शुरू कर दी। मानो मेरे ऊपर किसी आत्मा का साया हो, मैं पागलों की तरह उसके लण्ड को अपनी चूत में घुसाकर उसके ऊपर कूद रही थी। हम दोनों अपने यौनांगों को आपस में चिपका कर चुदाई का मजा ले रहे थे.

हम समझ चुके थे कि दोनों को ही सबसे ज्यादा मजा सहवास में आता था, और इससे बेहतर कुछ और नहीं लगता था, मैं बेसुध होकर अमर के लण्ड को अंदर घुसाये ऊपर नीचे हो रही थी। अपनी चूत को अपने बेटे के लण्ड पर बार बार पेलते हुए एक ख्याल मेरे जेहन में आ रहा था कि अमर के लण्ड को मेरी वीर्य से भरी चिकनी चूत में ज्यादा से ज्यादा अंदर ले सकूँ।

इस पल को अपने जेहन में संजोते हुए, चुदाई के इस बेहतरीन पल जिसमें अमर का लण्ड मेरी चूत के अंदर बाहर हो रहा था, मैं उसके लण्ड पर उछलते हुए आनंदित होकर धीमे धीमे चीख रही थी। मैं बता नहीं सकती कि अपने बेटे के प्यारे लण्ड को अपनी चुत में घुसाकर मुझे जिस पूर्णता का एहसास हो रहा था वो अवर्णनीय है।

ताल में ताल मिलाते हुए अमर भी अपने लण्ड के नीचे से ऊपर झटके मार रहा था। मेरी चूत की फ़ाँको ने उसके लण्ड को जकड़ रखा था और उनके बीच वो अपने लण्ड को पिस्टन की तरह अंदर बाहर कर रहा था। मेरे चूतड़ों को अपनी उसने अपनी हथेली में भर कर वो उनको मसल कर मींड़ते हुए अपने डण्डे जैसे लण्ड के ऊपर उछाल रहा था।

मेरे उछलते हुए मम्मे देखकर वो उनके निप्पल को मुँह में भरकर चूसने से अपने आप को रोक नहीं पाया, और बारी बार से उनको कभी चूमकर, तो कभी चूसकर और मींजकर अपनी भड़ास निकालने लगा, मैं पागलों की तरह कसमसाते हुए चीखने लगी।

अपने बेटे के लण्ड पर सवारी करते हुए, रतिक्रीड़ा में डूबकर मैं कामोन्माद के चरम के करीब पहुँच रही थी। अमर के कंधो को अपने हाथों में पकड़कर मैंने स्पीड तेज कर दी, अमर के लण्ड पर अपनी रस से भीगी चूत की छेद के थाप मारते हुए, मेरा बदन काँप रहा था और मैं रिरिया रही थी।

”अंदर ही पानी निकाल देना बेटा, आह्ह्ह्… अमर मैं बस होने ही वाली हूँ! आह चोद दे अपनी मम्मी को, निकाल दे अपना पानी मम्मी की चूत में!”

अमर भी झड़ने ही वाला था, लेकिन वो अब भी मेरे मम्मों का मोह नहीं छोड़ पा रहा था, एक निप्पल को मुँह में भरकर वो तेजी से अपनी गाँड़ को उछालकर अपनी माँ की मोहक गर्म चूत में अपने लण्ड को पेलने लगा। बेकरार होकर उसके लण्ड पर उछलते हुए, मैं कसमसाते हुए काँपने लगी, कामोन्माद में डूबकर बड़बड़ाने लगी, ” चोदो, बेटा, हाँ ऐसे ही, तुम भी मेरे साथ ही हो जाओ बेटा, अपनी मम्मी के साथ साथ झड़ जा……!”

झड़ते हुए बीच बीच में सिंकुड़ कर जैसे जैसे मेरी चूत की मखमली पकड़ उसके लण्ड पर मजबूत होने लगी। तभी अमर ने एक अंतिम झटका मारा, और उसका ज्वालामुखी मेरी चूत के अंदर ही फ़ूट गया। अमर के लण्ड को चूत में अंदर तक घुसाते हुए मैं उसके लक्कड़ जैसे लण्ड पर ऊपर से नीचे होते हुए बैठ गयी.

अमर का लण्ड अपनी मम्मी की चूत की सुरंग में अंदर तक घुसकर वीर्य की धार पर धार निकाल रहा था। झड़ते हुए पगलाकर मैं मस्ती में चीखने लगी, मेरी चूत का निकलता हुआ पानी मेरे बेटे के लण्ड से निकल रही वीर्य की बौछार से मिश्रित हो रहा था।

झड़ते हुए अमर की मस्ती भरी आवाज घुटी घुटी सी बाहर आ रही थी, क्योंकि उसने अभी भी मेरे एक निप्पल को किसी भूखे बच्चे की तरह मुँह में भर रखा था, मेरे संवेदनशील निप्पल को उसका इस तरह चूसना, झड़ते हुए मुझे और ज्यादा मजा दे रहा था।

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अमर का मोटा मूसल लण्ड एक बार फ़िर से अपने वीर्य की पिचकारी मार मारकर मेरी चूत को वीर्य के गाढे पानी से भर रहा था, मेरी चूत में मानो बाढ आ गयी थी। उस जबरदस्त चरमोत्कर्ष के बाद मेरी तो मानो आवाज ही गायब हो गयी, मेरे पूरे बदन में गजब का हल्कापन मेहसूस हो रहा था। मैंने करवट लेकर अपना सिर अमर की छाती के ऊपर रख दिया, और सोचने लगी कि किस तरह मैंने अपने बदन को अपने बेटे को सौंप, उसकी बाँहों में समर्पण कर चुदाई का मजा लिया था, किस तरह उसने मेरी चूत को वीर्य के गाढे पानी से भर दिया था.

मैं उन पलों का आँख बंद कर संवरण करने लगी। अमर ने पहली बार किसी चूत में अपना लण्ड घुसाकर चुदाई का मजा लिया था, उसके लिये यह इसलिये और ज्यादा अविस्मरणीय था क्योंकि वो चूत उसकी प्यारी मम्मी की थी। लेकिन शायद अमर और मेरा दोनों का ही मन अभी भरा नहीं था। कुछ देर वैसे ही लेट कर आराम करते हुए, हम दोनों एक दुसरे को सहलाते हुए, चूमते हुए, साथ चिपक कर अठखेलियाँ करते रहे। और फ़िर नींद के आगोश में चले गए। दोस्तों अभी कहानी बाकि है आगे की कहानी अगले भाग में…

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  1. Hot says

    दिसम्बर 26, 2023 at 4:42 अपराह्न

    Hey grils bhabhi jisko bhi mere sath enjoy karna hai to mujhe Snapchat me msg kre meri id hotbaat97 pe aao

  2. Raman deep says

    दिसम्बर 27, 2023 at 11:34 पूर्वाह्न

    कोई लड़की भाभी आंटी तलाकशुदा महिला जिसकी चूत प्यासी हो ओर मोटे लड से चुदवाना चाहती हो तो मुझे कॉल और व्हाट्सएप करे 7707981551 सिर्फ महिलाएं….लड़के कॉल ना करे
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