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मेरे जिस्म की जरुरत दीदी ने पूरी की

दिसम्बर 20, 2025 by hamari

Hawasi Bhai XXX Kahani

मैं निर्मल हूँ। उस वक्त मेरी उम्र 20 साल थी और मैं अपनी बड़ी बहन आरती के साथ रहता हूँ। मेरे पिताजी सरकारी दफ्तर में नौकरी करते थे। उनकी मृत्यु के बाद मेरी बहन आरती, जो उस समय ग्रेजुएशन कर रही थीं, को उसी दफ्तर में नौकरी मिल गई। वो शहर में अकेली रहती थीं और मैं पिछले दस साल से उनके साथ रह रहा था। Hawasi Bhai XXX Kahani

माँ अभी भी गाँव में रहती हैं क्योंकि गाँव में हमारी बहुत ज़मीन-जायदाद है और उसकी देखभाल के लिए माँ वहीं रहती हैं। उस समय मेरी उम्र 20 साल थी। मैं एक रीढ़ की हड्डी वाला मर्द था। कद-काठी भी अच्छी थी—लगभग 5 फुट 8 इंच, 70 किलो वज़न और गोरा-चिट्टा रंग। देखने में खूबसूरत था।

मेरी बहन करीब 5 फुट 2 इंच की हैं, गोरी-चिट्टी, भरा-पूरा बदन, लंबे काले बाल और खूबसूरत काली आँखें। मैं क्लास 5 में था जब बहन के साथ रहने आया। देखते-देखते समय बीत गया और मैं 12वीं में पहुँच गया। शरीर खूब भरा-पूरा हो गया और जवान लड़कों वाली हरकतें भी आने लगीं।

अक्सर दोस्तों के साथ बैठकर ब्लू-फिल्म देखता, नंगी किताबें देखता और कभी-कभी रात में पोर्न किताबें घर भी ले आता। जिनमें चुदाई के सीन मुझे बहुत पसंद आते। घंटों देखता रहता और सोचता कि चोदने वालों की ज़िंदगी क्या मस्त होती होगी। बेवजह ही लंड खड़ा हो जाता जो बैठने का नाम न लेता। और जब बैठता तो अंडरवियर भीग जाता।

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इन हरकतों को छुपाने के लिए अपना अंडरवियर खुद धोता और सुखाने डाल देता। बहन को कानो-कान खबर न होती। बहन जब ऑफिस में होतीं तो उनकी ब्रा पहनकर उसमें कपड़ा भरकर खुद चूची समझकर दबाता और सेक्स का मज़ा लेने की कोशिश करता। बहन की कच्छी-ब्रा को सूँघने का मज़ा लेता।

ये सब करने के बाद भी कॉलेज में अच्छे नंबर लेकर पास होता तो बहन को कोई शिकायत न रहती। बस एक दिन गज़ब हो गया। मैंने किसी दोस्त से किताब माँगकर लाया था और वापस देने कॉलेज बैग में ले गया, पर दोस्त छुट्टी पर था तो किताब वापस घर आ गई। बैग में पड़ी थी।

मैं रविवार को क्रिकेट खेलने पार्क चला गया और घर पर बड़ी बहन ने मेरा बैग चेक कर लिया। बीच से वो किताब निकली। मुझे पता नहीं था कि दीदी ने देखी या नहीं, पर जब मैं घर आया तो दीदी का मूड उखड़ा हुआ था और वो मुझे घूर-घूरकर देख रही थीं। मैं डर गया और बैग देखने दौड़ा तो किताब गायब थी। मेरे चेहरे का रंग उड़ गया।

दीदी ने पूछा, “क्या हुआ?”

मैंने कहा, “कुछ नहीं।”

तो वो किताब मेरी तरफ फेंकते हुए बोलीं, “यही तलाश रहे हो ना?”

मैंने कुछ नहीं कहा और सिर झुकाकर खड़ा हो गया। मुझे पता था सज़ा मिलेगी और मिली भी। उन्होंने मेरा बैग उठाकर फेंक दिया और बोलीं, “निकल जा घर से, मुझसे तेरी शक्ल नहीं देखी जाती।”

मैं चुपचाप खड़ा रहा और दीदी को देख भी नहीं पा रहा था। दीदी ने मेरी बाजू पकड़ी और घर से बाहर का दरवाज़ा दिखाकर दरवाज़ा बंद कर लिया। मैंने धीरे से कहा, “दीदी, अच्छा कल मैं माँ के पास चला जाऊँगा, आज मैं घर से बाहर ही रहूँगा।”

ये करीब दो बजे की घटना थी। मैं घर के सामने पार्क में जाकर बैठ गया और वहीं भूखा-प्यासा बैठा रहा। दिन बीता, शाम हुई और शाम को बारिश शुरू हो गई। पर मैंने भी ठान ली थी कि अब घर नहीं जाऊँगा। बारिश में बैठा रहा, भीगता रहा, पर घर नहीं गया।

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इतने में घर का दरवाज़ा खुला। मैंने देखा दीदी मेरी तरफ ही आ रही थीं। उन्होंने मुझे कसकर पकड़ लिया और बोलीं, “इतनी बारिश हो रही है, तू बरामदे में ही आकर बैठ जाता।”

मैंने कहा, “नहीं दीदी, अब मेरा ठिकाना मेरा गाँव है जहाँ मेरी माँ है, जो मुझे गलती करने पर समझा देती, यूँ घर से नहीं निकालती और भूखा तो कतई रहने न देती।”

ये सुनकर दीदी मुझसे लिपट गईं और रोने लगीं। बोलीं, “अरे पगले, मैं कोई तेरी दुश्मन थोड़े हूँ? मुझे बुरा लगा तो मैंने बोल दिया। चल घर चल, वहीं बात करेंगे। पहले गीले कपड़े बदल ले।”

मैं दीदी के समझाने पर घर आ गया। दीदी ने मेरे कपड़े निकाले, मुझे बदलने को कहा, गर्म कॉफी पिलाई और बोलीं, “अब बता, तू ये सब क्यों करता है? तेरी कोई उम्र थोड़े है ये सब करने की?”

मैं बोला, “दीदी, मेरे मन में सौ सवाल उठते हैं। क्यों मेरा लंड सुबह खड़ा हो जाता है? लाख बैठाने पर भी नहीं बैठता। उसमें से क्या सफेद रंग का गाढ़ा सा कुछ निकलता है और मैं क्यों ठंडा पड़ जाता हूँ? ये सवाल तो मैं अब आपसे पूछ नहीं सकता तो दोस्तों से पूछता हूँ और दोस्त जो जवाब देते हैं वो आपके सामने हैं। दोस्त यही बताते हैं कि ये सब शरीर की भूख है जिसे एक औरत ही इस तरह ठंडा कर सकती है। और वो सब मैं देखता हूँ, सोचता हूँ, वो सब आप देखकर गर्म हो गईं। है कोई जवाब इन बातों का आपके पास?”

दीदी चुप हो गईं और बोलीं, “मैं क्या जानूँ इन बातों को? मैंने तो मन को मार लिया है और ये सब नहीं सोचती।”

मैंने कहा, “आपको सोचना पड़ेगा दीदी, इस तरह तो आप कूद-कूदकर मर जाएंगी। आप देखो और सोचो दीदी, मैं छोटा ज़रूर हूँ पर जिस्म की भूख को समझने लगा हूँ।”

दीदी की आँखों में आँसू थे और वो मुझसे बुरी तरह लिपट गईं। बोलीं, “तू छोटा ज़रूर है पर बातें बड़ी-बड़ी करता है। आ, खाना खा ले, फिर बेड पर लेटकर बातें करेंगे। ठीक?”

मैंने कहा, “ठीक दीदी।”

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मैंने मुँह-हाथ धोकर खाना खाया और थोड़ी देर टीवी देखने के बाद हम लोग बिस्तर पर चले गए। सोते तो हम रोज़ ही साथ थे, पर आज कुछ नया था। दीदी कुछ सोच रही थीं और मेरे हाथ में वही पोर्न बुक थी। ये कहानी आप हमारी वासना डॉट नेट पर पढ़ रहे है.

मैंने दीदी को बताया, “कुछ ज़रूरतें ऐसी होती हैं जो सिर्फ शरीर ही पूरी कर सकता है। मन को मारने जैसी कोई बात नहीं।”

तो दीदी बोलीं, “अब ये सब मैं अगर छोटे भाई से करूँ तो समाज क्या कहेगा?”

मैं बोला, “समाज क्या हमें रोटी देने आ रहा है? आप जो बात है खुलकर कहो।”

दीदी कुछ नहीं बोलीं और मुझसे लिपटकर बोलीं, “जो तेरा मन छोटू… मैं अब तेरे हवाले हूँ।”

मैं जीत गया। मैंने दीदी से ज़ोर से लिपटकर उन्हें किस करना शुरू कर दिया। मेरा किस पैशनेट था और मैं दीदी के शरीर से जितना हो सके उतना मज़ा लेना चाहता था। मैंने धीरे से उनका ब्लाउज़ खोल दिया तो उनके नाशपति जैसे मम्मे बाहर निकल आए। दीदी ने शायद ब्रा नहीं पहनी थी। मैंने एक मम्मा मुँह में डाला और चूसने लगा। दीदी के शरीर में हरकत हुई और वो सिसकियाँ लेने लगीं।

दूसरा मम्मा मैंने हाथ से पकड़कर दबाना शुरू कर दिया तो दीदी की हालत खराब होने लगी। वो ज़ोर से मेरे साथ लिपट गईं और ऐसा लगा जैसे वो मेरे शरीर में घुस जाना चाहती हों। मैंने धीरे से उनका पेटीकोट खोल दिया और उसे पैरों के नीचे खिसका दिया। अब ब्लाउज़ भी निकाल दिया तो वो बिल्कुल नंगी हो गईं। बोलीं, “मेरे तो सारे कपड़े निकाल दिए, खुद सारे के सारे पहने हुए हैं।”

मैं बोला, “तो आप निकालो।”

वो बोलीं, “मुझे शर्म आती है।”

मैंने कहा, “अब किस बात की शर्म?”

वो धीरे से मेरी पैंट की ज़िप खोलने लगीं। मैंने उनकी मदद की और टी-शर्ट उतार दी। मुझे नंगा करके उन्होंने मेरे लंड पर नज़र डाली और अपनी उंगली की तरफ इशारा करके बोलीं, “इतना छोटा-सा हुआ करता था ये, अब देखो कितना बड़ा हो गया है।”

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मैंने उनकी चूची पर हाथ रखकर कहा, “दीदी, ये भी तो कैरम बोर्ड की तरह सपाट होते थे, अब देखो कितने बड़े मम्मे हो गए हैं।”

वो शर्मा गईं। बोलीं, “तुमसे कोई जीत नहीं सकता। बता अब क्या करना है मेरे भाई?”

मैंने दीदी को बिस्तर पर लिटाया और उनके दोनों मम्मों को बारी-बारी चूसने लगा। दीदी की सिसकियाँ तेज़ हो गईं। मैंने अपना लंड उनके हाथ में पकड़ा दिया। दीदी ने उसे प्यार से सहलाया और बोलीं, “इतना मोटा और लंबा… आज तक किसी ने मुझे छुआ तक नहीं। तू ही पहला मर्द है मेरे जीवन का।”

मैंने दीदी की टाँगें चौड़ी कीं और उनकी चूत पर उंगली फेरते हुए देखा कि वो पूरी तरह गीली हो चुकी थीं। मैंने अपना लंड उनकी चूत पर रगड़ा। दीदी ने खुद अपनी टाँगें और चौड़ी कर लीं और बोलीं, “धीरे से डाल छोटू… तेरी दीदी की सील आज तू ही तोड़ेगा।” ये कहानी आप हमारी वासना डॉट नेट पर पढ़ रहे है.

मैंने धीरे-धीरे अपना लंड दीदी की चूत में घुसाया। पहले सिर्फ सुपारा अंदर गया तो दीदी ने ज़ोर से सिसकारी ली, “आह्ह… कितना मोटा है रे… फट जाएगी मेरी चूत…”

मैं रुका नहीं। एक और झटका दिया और आधा लंड अंदर चला गया। दीदी की आँखों से आँसू निकल आए, पर वो बोलीं, “पूरा डाल दे… आज तेरी दीदी तेरी रंडी बनकर चुदना चाहती है।”

मैंने एक ज़ोरदार झटका मारा और पूरा लंड दीदी की चूत में समा गया। दीदी चीख पड़ीं, “माँ… मर गई… आह्ह्ह… बहुत मज़ा आ रहा है छोटू… अब धीरे-धीरे चलाओ…”

मैंने लय पकड़ी और दीदी की चूत मारने लगा। दीदी ने अपनी कमर ऊपर उठाकर मेरे हर धक्के का जवाब देना शुरू कर दिया। कमरे में सिर्फ चप-चप और दीदी की सिसकियाँ गूँज रही थीं। दस-पंद्रह मिनट तक मैंने दीदी को ज़ोर-ज़ोर से चोदा। दीदी ने तीन बार झड़ चुकी थीं और उनकी चूत से रस की बाढ़ आ रही थी।

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अंत में दीदी बोलीं, “अब मेरे मुँह में डाल दे… मैं तेरा सारा माल पीना चाहती हूँ।”

मैंने लंड बाहर निकाला और दीदी के मुँह में डाल दिया। दीदी ने ज़ोर-ज़ोर से चूसना शुरू किया। दो मिनट में ही मैंने दीदी के मुँह में अपना सारा वीर्य उड़ेल दिया। दीदी ने एक बूंद भी बाहर नहीं गिरने दी। सब पी गईं और लंड को चाट-चाटकर साफ कर दिया। उसके बाद हम दोनों नंगे ही एक-दूसरे से लिपटकर सो गए। दीदी ने मेरे कान में फुसफुसाया, “आज से मैं तेरी पत्नी हूँ छोटू… जब मन करे, दिन हो या रात, मुझे चोद लेना। तेरी दीदी की चूत हमेशा तेरे लिए खुली रहेगी।”

उस रात के बाद हम भाई-बहन नहीं, पति-पत्नी की तरह रहने लगे। दिन में ऑफिस से आते ही दीदी मुझे बाँहों में भर लेतीं और रात भर हम एक-दूसरे की बाँहों में खोए रहते। आज भी हम उसी सुखी ज़िंदगी में हैं, जहाँ न समाज की परवाह है, न किसी की नज़र। बस एक-दूसरे का प्यार और एक-दूसरे का शरीर।

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