Antarvasna Village Hindi Sex Kahani
गाँव का माहौल बड़ा ही अजीब किस्म का होता है। वहाँ एक ओर तो सब कुछ ढका-छुपा होता है, तो दूसरी ओर अंदर ही अंदर ऐसे-ऐसे करनामे होते हैं कि जान जाओ तो दाँतों तले उँगली दबा लो। थोड़ा सा भी झगड़ा होने पर लोग ऐसे तो मोटी-मोटी गालियाँ देंगे मगर, अपनी बहू-बेटियों को दो गज का घूँघट निकालने के लिए बोलेंगे। Antarvasna Village Hindi Sex Kahani
फिर यही लोग दूसरों की बहू-बेटियों पर बुरी नजर रखेंगे और जरा सा भी मौका अगर मिल जाए तो अपने अंदर की सारी कुंठा और गंदी वासना निकाल देंगे। कहने का मतलब ये कि गाँव में जो ये दबी-छुपी कामुक भावनाएँ हैं वो विभिन्न अवसरों पर भिन्न-भिन्न तरीकों से बाहर निकलती हैं।
खेत, खलिहान, आमों का बगीचा आदि कई ऐसी जगहें हैं जहाँ पर छुप-छुप के तरह-तरह के कुकर्म होते हैं, कभी उनका पता चल जाता है, कभी नहीं चल पाता। गाँव के बड़े-बड़े घरों के मर्द तो बकायदा एक-आध रखैल भी रखते हैं, जिनकी रखैल न हो उनकी इज्जत कम होती थी।
ये अलग बात है कि इन बड़े घरों की औरतें प्यासी ही रह जाती थीं क्योंकि मर्द तो किसी और ही कुएँ का पानी पी रहा होता था। दूसरों के कुएँ का पानी पीने के बाद अपने घर के पानी को पीने की उनकी इच्छा ही नहीं होती थी। और अगर किसी दिन पी भी लिया तो उन्हें मजा नहीं आता था।
इन औरतों ने भी अपनी प्यास बुझाने के लिए तरह-तरह के उपाय कर रखे थे। कुछ ने अपने नौकरों को फँसा रखा था और उनकी बाँहों में अपनी संतुष्टि खोजती थी, कुछ ने चोरी-छुपे अपने यार बना रखे थे और कुछ यूँ ही दिन-रात वासना की आग में जलकर हिस्टीरिया की मरीज बन चुकी थी।
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खैर ये तो हुआ गाँव के माहौल का थोड़ा सा परिचय। अब आपको गाँव की ही एक बड़े घर की कहानी सुनाता हूँ। ऐसे तो सब समझ गए होंगे कि ये गाँव की कोई वासना-प्रधान कहानी है, फिर इसको बताने की क्या जरूरत है जब इसमें कुछ भी नया नहीं है, तो दोस्तों इसमें बताने के लिए एक अनोखी बात है जो उस गाँव में पहले कभी नहीं हुई थी इसलिए बताई जा रही है। तो फिर सुनो कहानी।
गाँव के एक सुखी-संपन्न परिवार की कहानी है। घर की मालकिन का नाम सुशीला देवी था। मालिक का नाम तो पता नहीं पर सब उसे चौधरी कहते थे। सुशीला देवी, जब शादी होकर आई थी तो देखने में कुछ खास नहीं थी, रंग भी थोड़ा साँवला सा था और शरीर दुबला-पतला, चारहरा था।
मगर बच्चा पैदा होने के बाद उनका शरीर भरना शुरू हो गया और कुछ ही समय में एक दुबली-पतली औरत से एक अच्छी खासी स्वस्थ भरे-पूरे शरीर की मालकिन बन गई। पहले जिसकी तरफ इक्का-दुक्का लोगों की नजरें इनायत होती थीं वो अब सबकी नजरों की चाहत बन चुकी थी।
उसके बदन में सही जगहों पर भराव आ जाने के कारण हर जगह से कामुकता फूटने लगी थी। छोटी-छोटी छातियाँ अब उन्नत वक्षस्थल में तब्दील हो चुकी थीं। बाँहें जो पहले तो लकड़ी के डंडे सी लगती थीं अब काफी मांसल हो चुकी थीं। पतली कमर थोड़ी मोटी हो गई थी और पेट पर मांस चढ़ जाने के कारण गुदाजपन आ गया था। और झुकने या बैठने पर दो मोटे-मोटे फोल्ड से बनने लगे थे।
चूतड़ों में भी मांसलता आ चुकी थी और अब तो यही चूतड़ लोगों के दिलों धड़का देते थे। जाँघें मोटी-मोटी केले के खंभों में बदल चुकी थीं। चेहरे पर एक कशिश सी आ गई थी और आँखें तो ऐसी नशीली लगती थीं जैसे दो बोतल शराब पी रखी हो। सुंदरता बढ़ने के साथ-साथ उसको संभालकर रखने का ढंग भी उसे आ गया और वो अपने आप को खूब सजा-सँवार के रखती थी।
बोल-चाल में बहुत तेज-तर्रार थी और सारे घर के काम वो खुद ही नौकरों की सहायता से करवाती थी। उसकी सुंदरता ने उसके पति को भी बाँधकर रखा हुआ था। चौधरी अपनी बीवी से डरता भी था इसलिए कहीं और मुँह मारने की हिम्मत उसकी नहीं होती थी। बीवी जब आई थी तो बहुत सारा दहेज लेकर आई थी इसलिए उसके सामने मुँह खोलने में भी डरता था, बीवी भी उसके ऊपर पूरा हुक्म चलाती थी।
उसने सारे घर को एक तरह से अपने कब्जे में कर के रखा हुआ था। बेचारा चौधरी अगर एक दिन भी घर देर से पहुँचता था तो ऐसी-ऐसी बातें सुनाती कि उसकी सिट्टी-पिट्टी गुम हो जाती थी। काम-वासना के मामले में भी वो बीवी से थोड़ा उन्नीस ही पड़ता था। सुशीला देवी कुछ ज्यादा ही गरम थी। ये कहानी आप हमारी वासना डॉट नेट पर पढ़ रहे है.
उसका नाम ऐसी औरतों में शुमार होता था जो खुद मर्द के ऊपर चढ़ जाए। गाँव की लगभग सारी औरतें उसका लोहा मानती थीं और कभी भी कोई मुसीबत में फँसने पर उसे ही याद करती थी। चौधरी बेचारा तो बस नाम का चौधरी था, असली चौधरी तो चौधराइन थी।
उन दोनों का एक ही बेटा था, नाम उसका शैलेश था, प्यार से सब उसे सोनू कहा करते थे। देखने में बचपन से सुंदर था, थोड़ी बहुत चंचलता भी थी मगर वैसे सीधा-सादा लड़का था। थोड़ा जैसे ही बड़ा हुआ तो सुशीला देवी को लगा कि इसको गाँव के माहौल से दूर भेज दिया जाए ताकि इसकी पढ़ाई-लिखाई अच्छे से हो और गाँव के लौंडों के साथ रहकर बिगड़ न जाए।
चौधरी ने थोड़ा बहुत विरोध करने की भी कोशिश की “हमारा तो एक ही लड़का है उसको भी क्यों बाहर भेज रही हो” मगर उसकी कौन सुनता, लड़के को उसके मामा के पास भेज दिया गया जो कि शहर में रहकर व्यापार करता था। मामा को भी बस एक लड़की ही थी।
सुशीला देवी का ये भाई उससे उम्र में बड़ा था और वो खुशी-खुशी अपने भांजे को अपने घर रखने के लिए तैयार हो गया था। दिन इसी तरह बीत रहे थे, चौधराइन के रूप में और ज्यादा निखार आता जा रहा था और चौधरी सुखता जा रहा था। अब अगर किसी को बहुत ज्यादा दबाया जाए तो वो चीज इतना दब जाती है कि उठना ही भूल जाती है।
यही हाल चौधरी का भी था। उसने भी सब कुछ लगभग छोड़ ही दिया था और घर के सबसे बाहर वाले कमरे में चुपचाप बैठा दो-चार निठल्ले मर्दों के साथ या तो दिन भर हुक्का पीता या फिर ताश खेलता। शाम होने पर चुपचाप सटक लेता और एक बोतल देसी चढ़ा के घर जल्दी से वापस आकर बाहर के कमरे में पड़ जाता।
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नौकरानी खाना दे जाती तो खा लेता, नहीं तो अगर पता चल जाता कि चौधराइन जली-भुनी बैठी है तो खाना भी नहीं माँगता और सो जाता। लड़का छुट्टियों में घर आता तो फिर सबकी चाँदी रहती थी क्योंकि चौधराइन बहुत खुश रहती थी। घर में तरह-तरह के पकवान बनते और किसी को भी सुशीला देवी के गुस्से का सामना नहीं करना पड़ता था।
ऐसे ही दिन-महीने-साल बीतते गए, लड़का अब सत्रह बरस का हो चुका था। थोड़ा बहुत चंचल तो हो ही चुका था और बारहवीं की परीक्षा उसने दे दी थी। परीक्षा जब खत्म हुई तो शहर में रहकर क्या करता, सुशीला देवी ने बुलवा लिया। अप्रैल में परीक्षा के खत्म होते ही वो गाँव वापस आ गया।
लौंडे पर नई-नई जवानी चढ़ी थी। शहर की हवा लग चुकी थी, जिम जाता था सो बदन खूब गठीला हो गया था। गाँव जब वो आया तो उसकी खूब आव-भगत हुई। माँ ने खूब जमके खिलाया-पिलाया। लड़के का मन भी लग गया। पर दो-चार दिन बाद ही उसका इन सब चीजों से मन ऊब सा गया। ये कहानी आप हमारी वासना डॉट नेट पर पढ़ रहे है.
अब शहर में रहने पर स्कूल जाना, ट्यूशन जाना और फिर दोस्तों-यारों के साथ समय कट जाता था पर यहाँ गाँव में तो करने-धरने के लिए कुछ था नहीं, दिन भर बैठे रहो। इसलिए उसने अपनी समस्या अपनी सुशीला देवी को बता दी। सुशीला देवी ने कहा कि-
“देख बेटा मैंने तो तुझे गाँव के इसी गंदे माहौल से दूर रखने के लिए शहर भेजा था, मगर अब तू जिद कर रहा है तो ठीक है, गाँव के कुछ अच्छे लड़कों के साथ दोस्ती कर ले और उन्हीं के साथ क्रिकेट या फुटबॉल खेल ले या फिर घूम आया कर मगर एक बात और शाम में ज्यादा देर घर से बाहर नहीं रह सकता तू”।
सोनू इस पर खुश हो गया और बोला “ठीक है मम्मी तुझे शिकायत का मौका नहीं दूँगा”।
सोनू लड़का था, गाँव के कुछ बचपन के दोस्त भी थे उसके, उनके साथ घूमना-फिरना शुरू कर दिया। सुबह-शाम उनकी क्रिकेट भी शुरू हो गई। सोनू का मन अब थोड़ा बहुत गाँव में लगना शुरू हो गया था। घर में चारों तरफ खुशी का वातावरण था क्योंकि आज सोनू का जन्मदिन था।
सुबह उठकर सुशीला देवी ने घर की साफ-सफाई करवाई, हलवाई लगवा दिया और खुद भी शाम की तैयारियों में जुट गई। सोनू सुबह से बाहर ही घूम रहा था। पर आज उसको पूरी छूट मिली हुई थी। तकरीबन 12 बजे के आसपास जब सुशीला देवी अपने पति को कुछ काम समझाकर बाजार भेज रही थी तो उसकी मालिश करने वाली आया आ गई।
सुशीला देवी उसको देखकर खुश होती हुई बोली “चल अच्छा किया आज आ गई, मैं तुझे खबर भिजवाने ही वाली थी, पता नहीं दो-तीन दिन से पीठ में बड़ी अकड़न सी हो रखी है”।
आया बोली “मैं तो जब सुनी कि आज मुन्ना बाबू का जन्मदिन है तो चली आई कि कहीं कोई काम न निकल आए”।
काम क्या होना था, ये जो आया थी वो बहुत मुँह लगी थी चौधराइन की। आया चौधराइन की कामुकता को मानसिक संतुष्टि प्रदान करती थी। अपने दिमाग के साथ पूरे गाँव की तरह-तरह की बातें जैसे कि कौन किसके साथ लगी है, कौन किससे फँसी है और कौन किस पर नजर रखे हुए है आदि करने में उसे बड़ा मजा आता था।
आया भी थोड़ी कुत्सित प्रवृत्ति की थी, उसके दिमाग में जाने क्या-क्या चलता रहता था। गाँव, मुहल्ले की बातें खूब नमक-मिर्च लगाकर और रंगीन बनाकर बताने में उसे बड़ा मजा आता था। इसलिए दोनों की जमती भी खूब थी। तो फिर चौधराइन सब कामों से फुरसत पाकर अपनी मालिश करवाने के लिए अपने कमरे में जा घुसी।
दरवाजा बंद करने के बाद चौधराइन बिस्तर पर लेट गई और आया उसके बगल में तेल की कटोरी लेकर बैठ गई। दोनों हाथों में तेल लगाकर चौधराइन की साड़ी को घुटनों से ऊपर तक उठाते हुए उसने तेल लगाना शुरू कर दिया। चौधराइन की गोरी चिकनी टाँगों पर तेल लगाते हुए आया की बातों का सिलसिला शुरू हो गया था।
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आया ने चौधराइन की तारीफों के पुल बाँधने शुरू कर दिए थे। चौधराइन ने थोड़ा सा मुस्कुराते हुए पूछा “और गाँव का हाल-चाल तो बता, तू तो पता नहीं कहाँ मुँह मारती रहती है, मेरी तारीफ तू बाद में कर लेना”। आया के चेहरे पर एक अनोखी चमक आ गई.
“क्या हाल-चाल बताएँ मालकिन, गाँव में तो अब बस जिधर देखो उधर जोर-जबरदस्ती हो रही है, परसों मुखिया ने श्यामू कुम्हार को पिटवा दिया पर आप तो जानती ही हो आजकल के लड़कों को..का बेटा.. ऊँच-नीच का उन्हें कुछ खयाल तो है नहीं, श्यामू का बेटा शहर से पढ़ाई करके आया है पता नहीं क्या-क्या के आया है, उसने भी कल मुखिया को अकेले में धर दबोचा और लगा दी चार-पाँच पटखनी, मुखिया पड़ा हुआ है अपने घर पर अपनी टूटी टाँग लेकर और श्यामू का बेटा गया थाने”।
“हाँ रे, इधर काम के चक्कर में तो पता ही नहीं चला, मैं भी सोच रही थी कि कल पुलिस क्यों आई थी, पर एक बात तो बता मैंने तो ये भी सुना है कि मुखिया की बेटी का कुछ चक्कर था श्यामू के बेटे से”।
“सही सुना है मालकिन, दोनों में बड़ा जबरदस्त नैन-मटका चल रहा है, इसी से मुखिया खर-खराए बैठा था”।
“बड़ा खराब जमाना आ गया है, लोगों में एक तो ऊँच-नीच का भेद मिट गया है, कौन किसके साथ घूम-फिर रहा है ये भी पता नहीं चलता है, खैर और सुना, मैंने सुना है तेरा भी बड़ा नैन-मटका चल रहा है आजकल उस सरपंच के छोरे के साथ, साली बुढ़िया होके कहाँ से फँसा लेती है जवान-जवान लौंडों को”। ये कहानी आप हमारी वासना डॉट नेट पर पढ़ रहे है.
आया का चेहरा कान तक लाल हो गया था, छिनाल तो वो थी मगर चोरी पकड़े जाने पर चेहरे पर शर्म की लाली दौड़ गई। शर्माते और मुस्कुराते हुए बोली “अरे मालकिन आप तो आजकल के लौंडों का हाल जानती ही हो, सब साले छेड़ के चक्कर में पगलाए घूमते रहते हैं”।
“पगलाए घूमते हैं या तू पगल कर देती है, अपनी जवानी दिखा के”।
आया के चेहरे पर एक शर्मीली मुस्कुराहट दौड़ गई, “क्या मालकिन मैं क्या दिखाऊँगी, फिर थोड़ा बहुत तो सब करते हैं”।
“थोड़ा सा… साली क्यों झूठ बोलती है तू तो पूरी की पूरी छिनाल है, सारे गाँव के लड़कों को बिगाड़के रख देगी”।
“अरे मालकिन बिगड़े हुए को मैं क्या बिगाड़ूँगी, गाँव के सारे छोरे तो दिन-रात इसी चक्कर में लगे रहते”।
“चल साली, तू जैसे दूध की धुली है”।
“अब जो समझ लो मालकिन, पर एक बात बता दूँ आपको कि ये लौंडे भी कम नहीं हैं, गाँव के तालाब पर जो पेड़ लगे हुए हैं ना उस पर बैठकर खूब ताक-झाँक करते हैं”।
“अच्छा, पर तुम लोग क्या भगाती नहीं उन लौंडों को”।
“घने-घने पेड़ हैं चारों तरफ, अब कोई उनके पीछे छुपा बैठा रहेगा तो कैसे पता चलेगा, कभी दिख जाते हैं कभी नहीं दिखते”।
“बड़े हरामी लौंडे हैं, औरतों को चैन से नहाने भी नहीं देते”।
“लौंडे तो लौंडे, छोरियाँ भी कोई कम हरामी नहीं हैं”।
“क्यों वो क्या करती हैं”।
“अरे मालकिन दिखा-दिखाकर नहाती हैं”।
“अच्छा, बड़ा गंदा माहौल हो गया है गाँव का”।
“जो भी है मालकिन अब जीना तो इसी गाँव में है ना”।
“हाँ रे वो तो है, मगर मुझे तो मेरे लड़के के कारण डर लगता है, कहीं वो भी न बिगड़ जाए”।
इस पर आया के होंठों के कोमल थोड़े से खिंच गए। उसके चेहरे की कुटिल मुस्कान जैसे कह रही थी कि बिगड़े हुए को और क्या बिगाड़ना। मगर आया ने कुछ बोला नहीं।
सुशीला देवी हँसते हुए बोली “अब तो लड़का भी जवान हो गया है, तेरे जैसी रंडियों की नजरों से तो बचाना ही पड़ेगा नहीं तो तुम लोग कब उसको हजम कर जाओगी ये भी पता नहीं लगेगा”।
“अब मालकिन झूठ नहीं बोलूँगी पर अगर आप सच सुन सको तो एक बात बोलूँ”।
“हाँ बोल क्या बात”।
“चलो रहने दो मालकिन” कहकर आया ने पूरा जोर लगाकर चौधराइन की कमर को थोड़ा कसके दबाया, गोरी चमड़ी लाल हो गई, चौधराइन के मुँह से हल्की सी आह निकल गई, आया का हाथ अब तेजी से कमर पर चल रहा था। आया के तेज चलते हाथों ने चौधराइन को थोड़ी देर के लिए भुला दिया कि वो क्या पूछ रही थी।
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आया ने अपने हाथों को अब कमर से थोड़ा नीचे चलाना शुरू कर दिया था। उसने चौधराइन की पेटीकोट के अंदर खूँसी हुई साड़ी को अपने हाथों से निकाल दिया और कमर की साइड में हाथ लगाकर पेटीकोट के नाड़े को खोल दिया। पेटीकोट को ढीला करके उसने अपने हाथों को कमर के और नीचे उतार दिया।
हाथों में तेल लगाकर चौधराइन के मोटे-मोटे चूतड़ों के मांसों को अपने हथेलियों में दबोच-दबोचकर दबा रही थी। सुशीला देवी के मुँह से हर बार एक हल्की सी आनंद भरी आह निकल जाती थी। अपने तेल लगे हाथों से आया ने चौधराइन की पीठ से लेकर उसके मांसल चूतड़ों तक के एक-एक कस बल को ढीला कर दिया था। ये कहानी आप हमारी वासना डॉट नेट पर पढ़ रहे है.
आया का हाथ चूतड़ों को मसलते-मसलते उनके बीच की दरार में भी चला जाता था। चूतड़ों की दरार को सहलाने पर हुई गुद-गुदी और सीहरन के कारण चौधराइन के मुँह से हल्की सी हँसी के साथ कराह निकल जाती थी। आया के मालिश करने के इसी मस्ताने अंदाज की सुशीला देवी दीवानी थी।
आया ने अपना हाथ चूतड़ों पर से खींचकर उसकी साड़ी को जाँघों तक उठाकर उसके गोरे-गोरे बिना बालों के गुदाज मांसल जाँघों को अपने हाथों में दबा-दबाकर मालिश करना शुरू कर दिया। चौधराइन की आँखें आनंद से मुँदी जा रही थीं। आया का हाथ घुटनों से लेकर पूरे जाँघों तक घूम रहे थे।
जाँघों और चूतड़ों के निचले भाग पर मालिश करते हुए आया का हाथ अब धीरे-धीरे चौधराइन की चूत और उसकी झांटों को भी टच कर रहा था। आया ने अपने हाथों से हल्के-हल्के चूत को छूना करना शुरू कर दिया था। चूत को छूते ही सुशीला देवी के पूरे बदन में सीहरन सी दौड़ गई थी। उसके मुँह से मस्ती भरी आह निकल गई। उससे रहा नहीं गया और पीठ के बल होते हुए बोली “साली तू मानेगी नहीं”।
“मालकिन मेरे से मालिश करवाने का यही तो मजा है”।
“चल साली, आज जल्दी छोड़ दे मुझे बहुत सारा काम है”।
“अरे काम-धाम तो सारे नौकर-चाकर कर ही रहे हैं मालकिन, जरा अच्छे से मालिश करवा लो इतने दिनों के बाद आई हूँ, बदन हल्का हो जाएगा”।
चौधराइन ने अपनी जाँघों को और चौड़ा कर दिया और अपने एक पैर को घुटनों के पास से मोड़ दिया, और अपनी छातियों पर से साड़ी को हटा दिया। मतलब आया को ये सीधा संकेत दे दिया था कि कर ले अपनी मर्जी जो भी करना है मगर बोली “हट साली तेरे से बदन हल्का करवाने के चक्कर में नहीं पड़ना मुझे आज, आग लगा देती है साली…”।
चौधराइन की ने अपनी बात अभी पूरी भी नहीं की थी और आया का हाथ सीधा साड़ी और पेटीकोट के नीचे से सुशीला देवी के बूर पर पहुँच गया था। बूर के फाँकों पर उँगलियाँ चलाते हुए अपने अँगूठे हल्के से सुशीला देवी के चूत के क्लिट को आया सहलाने लगी। चूत एकदम से पानीया गई।
आया ने बूर को एक थपकी लगाई और मालकिन की ओर देखते हुए मुस्कुराते हुए बोली “पानी तो छोड़ रही हो मालकिन”। इस पर सुशीला देवी सिसकते हुए बोली “साली ऐसे थपकी लगाएगी तो पानी तो निकलेगा ही” फिर अपने ब्लाउज के बटनों को खोलने लगी। आया ने पूछा “पूरा करवाओगी क्या मालकिन”।
“पूरा तो करवाना ही पड़ेगा साली अब जब तूने आग लगा दी है…”।
आया ने मुस्कुराते हुए अपने हाथों को सुशीला देवी की चूचियों की ओर बढ़ा दिया और उनको हल्के हाथों से पकड़कर सहलाने लगी जैसे कि पूछकर रही हो। फिर अपने हाथों में तेल लगाकर दोनों चूचियों को दोनों हाथों से पकड़के हल्के से खींचते हुए निप्पलों को अपने अँगूठे और उँगलियों के बीच में दबाकर खींचने लगी।
चूचियों में धीरे-धीरे तनाव आना शुरू हो गया। निप्पल खड़े हो गए और दोनों चूचियों में उम्र के साथ जो थोड़ा बहुत थुल-थुलापन आया हुआ था वो अब मांसल कठोरता में बदल गया। उत्तेजना बढ़ने के कारण चूचियों में तनाव आना स्वाभाविक था। आया की समझ में आ गया था कि अब मालकिन को गर्मी पूरी चढ़ गई है। ये कहानी आप हमारी वासना डॉट नेट पर पढ़ रहे है.
आया को औरतों के साथ खेलने में उतना ही मजा आता था जितना मजा उसको लड़कों के साथ खेलने में आता था। चूचियों को तेल लगाने के साथ-साथ मसलते हुए आया ने अपने हाथों को धीरे-धीरे पेट पर चलाना शुरू कर दिया था। चौधराइन की गोल-गोल नाभि में अपनी उँगलियों को चलाते हुए आया ने फिर से बातें छोड़नी शुरू कर दी।
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“मालकिन अब क्या बोलूँ, मगर मुन्ना बाबू (चौधराइन का बेटा) भी कम उस्ताद नहीं है”।
मस्ती में डूबी हुई अधखुली आँखों से आया को देखते हुए सुशीला देवी ने पूछा “क्यों, क्या किया मुन्ना ने तेरे साथ”।
“मेरे साथ क्या करेंगे मुन्ना बाबू, आप गुस्सा न हो एक बताऊँ आपको”।
चौधराइन ने अब अपनी आँखें खोल दीं और चौकन्नी हो गई “हाँ-हाँ बोल ना क्या बोलना है”।
“मालकिन अपने मुन्ना बाबू भी कम नहीं हैं, उनकी भी संगत बिगड़ गई है”।
“ऐसा कैसे बोल रही है तू”।
“ऐसा इसलिए बोल रही हूँ क्योंकि, अपने मुन्ना बाबू भी तालाब के चक्कर खूब लगाते हैं”।
“इसका क्या मतलब हुआ, हो सकता है दोस्तों के साथ खेलने या फिर तैरने चला जाता होगा”।
“खाली तैरने जाएँ तब तो ठीक है मालकिन मगर, मुन्ना बाबू को तो मैंने कई तालाब किनारे वाले पेड़ पर चढ़कर छुपकर बैठे हुए भी देखा है”।
“सच बोल रही है तू”।
“और क्या मालकिन, आपसे झूठ बोलूँगी”। कहकर आया ने अपना हाथ फिर से पेटीकोट के अंदर सरका दिया और चूत से खेलने लगी। अपनी मोटी-मोटी दो उँगलियों को उसने गचक से सुशीला देवी के बूर में पेल दिया। चूत में उँगली के जाते ही सुशीला देवी के मुँह से आह निकल गई मगर उसने कुछ बोला नहीं।
अपने बेटे के बारे में जानकर उसके ध्यान सेक्स से हट गया था और वो उसके बारे और ज्यादा जानना चाहती थी। इसलिए फिर आया को कुरेदते हुए कहा “अब मुन्ना भी तो जवान हो गया है थोड़ी बहुत तो उत्सुकता सबके मन में होती, वो भी देखने चला गया होगा इन मुए गाँव के छोरों के साथ”।
“पर मालकिन मैंने तो उनको शाम में अमिया (आमों का बगीचा) में गुलाबो के चूचे दबाते हुए भी देखा है”।
चौधराइन का गुस्सा सातवें आसमान पर जा पहुँचा, उसने आया को एक लात कसके मारी, आया गिरी तो नहीं मगर थोड़ा हिल जरूर गई। आया ने अपनी उँगलियों को अभी भी चूत से नहीं निकालने दिया। लात खाकर भी हँसती हुई बोली “मालकिन जितना गुस्सा निकालना हो निकाल लो मगर मैं एकदम सच-सच बोल रही हूँ। झूठ बोलूँ तो मेरी जुबान कटके गिर जाए मगर मुन्ना बाबू को तो कई बार मैंने गाँव की औरतें जिधर दिशा-मैदान करने जाती हैं उधर भी घूमते हुए देखा है”।
“हाय दैया उधर क्या करने जाता है ये सुअर”।
“बसंती के पीछे भी पड़े हुए हैं छोटे मालिक, वो भी साली खूब दिखा-दिखाकर नहाती है, साली को जैसे ही छोटे मालिक को देखती और ज्यादा चूतड़ मटका-मटका के चलने लगती है, छोटे मालिक भी पूरा लट्टू हुए बैठे हैं”।
“क्या जमाना आ गया है, इतना पढ़ाने-लिखाने का कुछ फायदा नहीं हुआ, सब मिट्टी में मिला दिया, इन्हीं भंगियों और धोबनों के पीछे घूमने के लिए इसे शहर भेजा था”।
दो मोटी-मोटी उँगलियों को चूत में कच-कच पेलते, निकालते हुए आया ने कहा, “आप भी मालकिन बेकार में नाराज हो रही हो, नया खून है थोड़ा बहुत तो उबाल मारेगा ही, फिर यहाँ गाँव में कौन सा उनका मन लगता होगा, मन लगाने के लिए थोड़ा बहुत इधर-उधर कर लेते हैं”। ये कहानी आप हमारी वासना डॉट नेट पर पढ़ रहे है.
“नहीं रे, मैं सोचती थी कम से कम मेरा बेटा तो ऐसा न करे”।
“वाह मालकिन आप भी कमाल की हो, अपने बेटे को भी अपने ही जैसा बना दो”।
“क्या मतलब है रे तेरा”।
“मतलब क्या है आप भी समझती हो, खुद तो आग में जलती रहती हो और चाहती हो कि बेटा भी जले”।
नजरें छुपाते हुए चौधराइन ने कहा “मैं कौन सी आग में जलती हूँ रे कुतिया”।
“क्यों जलती नहीं हो क्या, मुझे क्या नहीं पता कि मर्द के हाथों की गर्मी पाए आपको न जाने कितने साल बीत चुके हैं, जैसे आपने अपनी इच्छाओं को दबाकर रखा हुआ है वैसा ही आप चाहती हो छोटे मालिक भी करे”।
“ऐसा नहीं है रे, ये सब काम करने की भी एक उम्र होती है वो अभी बच्चा है”।
“बच्चा है, अरे मालकिन वो न जाने कितनों को अपने बच्चे की माँ बना दे और आप कहती हो बच्चा है”।
“चल साली क्या बकवास करती है”।
आया ने बूर के क्लिट को सहलाते हुए और उँगलियों को पेलते हुए कहा “मेरी बातें तो बकवास ही लगेंगी मगर क्या आपने कभी छोटे मालिक का औजार देखा है”।
“दूर हट कुतिया, क्या बोल रही है बेशर्म तेरे बेटे की उम्र का है”।
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आया ने मुस्कुराते हुए कहा- “बेशर्म बोलो या फिर जो मन में आए बोलो मगर मालकिन सच बोलूँ तो मुन्ना बाबू का औजार देखके तो मेरी भी पानीया गई थी” कहकर चुप हो गई और चौधराइन के दोनों टाँगों को फैलाकर उसके बीच में बैठ गई। फिर धीरे से अपनी जीभ को बूर की क्लिट पर लगाकर चलाने लगी।
चौधराइन ने अपनी जाँघों को और ज्यादा फैला दिया, चूत पर आया की जीभ गजब का जादू कर रही थी। आया की जीभ अब तेजी से चूत की दरार में घूम रही थी। सुशीला देवी की सिसकारियाँ बढ़ गई थीं। “आह्ह… साली… क्या कर रही है… उफ्फ… बस कर…” मगर उसकी आवाज में विरोध कम और माँग ज्यादा थी।
आया ने जीभ को और गहराई से अंदर डाला और क्लिट को चूसने लगी। सुशीला देवी की कमर ऊपर उठने लगी, उसने आया के सिर को दोनों हाथों से दबाया और अपनी चूत पर और जोर से दबाया। “आह्ह… साली… और जोर से… चाट… फाड़ दे इस चूत को…”।
आया ने अपनी दो उँगलियाँ फिर से चूत में डाल दीं और तेज-तेज अंदर-बाहर करने लगी। साथ ही जीभ से क्लिट को चाटती रही। सुशीला देवी का बदन काँपने लगा। उसकी साँसें तेज हो गईं। “आआह्ह… मैं… मैं झड़ने वाली हूँ… साली… मत रुक…”। आया ने स्पीड बढ़ा दी। उँगलियाँ तेजी से चल रही थीं, जीभ क्लिट पर घूम रही थी।
अचानक सुशीला देवी का बदन सख्त हो गया, उसने आया के सिर को जोर से दबाया और एक लंबी सिसकारी के साथ चूत से पानी की धार निकाल दी। “आआआह्ह्ह… साली… मार डाला…”। वो थककर लेट गई। आया ने चूत से उँगलियाँ निकालीं और अपना मुँह चाट लिया। “मालकिन, पानी तो बहुत निकला आज”।
सुशीला देवी हँसते हुए बोली “साली तेरी जीभ में जादू है”।
थोड़ी देर बाद सुशीला देवी उठी और बोली “अब सुन, मुन्ना के बारे में और बता”।
आया बोली “मालकिन, सच कहूँ तो मुन्ना बाबू अब गाँव की कई औरतों के सपनों में आते हैं। बसंती तो रोज शाम को अमिया में उनके इंतजार में रहती है। कल तो मैंने देखा, मुन्ना बाबू ने बसंती को पेड़ के पीछे दबाकर उसके चूचे दबाए और बसंती चीखते-चीखते भी मजे ले रही थी”। ये कहानी आप हमारी वासना डॉट नेट पर पढ़ रहे है.
सुशीला देवी का चेहरा लाल हो गया। “साली, ये सब क्या हो रहा है। मैंने तो उसे शहर भेजा था अच्छे संस्कारों के लिए, और ये यहाँ आकर…”।
आया बोली “मालकिन, खून तो आपका ही है, आपकी तरह गरम है वो भी। बस अब आप उसे डाँटोगी तो और बिगड़ेगा। बेहतर है आप खुद संभाल लें”।
सुशीला देवी चौंकी “क्या मतलब”।
आया मुस्कुराई “मतलब वही जो आप समझ रही हैं। मुन्ना बाबू को आपकी जरूरत है। वो आपकी तरफ देखता है जैसे कोई भूखा शेर देखता है”।
सुशीला देवी ने झटके से कहा “चुप कर साली, ये क्या बकवास है”।
मगर उसके मन में कुछ उथल-पुथल मच गई थी। उस रात जन्मदिन की पार्टी में सोनू सबके बीच हँसता-खेलता रहा। सुशीला देवी उसे देखती रही। उसकी नजरें अब अलग ढंग से उसके बदन पर टिक रही थीं। सोनू की जिम की वजह से बना गठीला शरीर, चौड़ी छाती, मजबूत बाँहें… सब कुछ उसे अपनी ही तरह गरम कर रहा था। पार्टी खत्म होने के बाद जब सब सो गए, सुशीला देवी सोनू के कमरे में गई। सोनू जगा हुआ था।
“मम्मी, आप”।
सुशीला देवी पास बैठ गई। “बेटा, आज तेरा जन्मदिन था, माँ ने कुछ खास गिफ्ट देना चाहती है”।
सोनू मुस्कुराया “क्या गिफ्ट”।
सुशीला देवी ने धीरे से उसका हाथ पकड़ा और अपनी जाँघ पर रख दिया। “ये… तुझे जो चाहिए वो”।
सोनू चौंका, मगर उसकी आँखों में चमक आ गई। “मम्मी…”।
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सुशीला देवी ने उसके होंठों पर उँगली रखी “चुप… आज से तू मेरा राजा है… और मैं तेरी रानी… जो भी होगा, गाँव को पता नहीं चलेगा”। सोनू ने धीरे से उसकी कमर पकड़ी और खींच लिया। दोनों की साँसें तेज हो गईं। सुशीला देवी ने उसके कपड़े उतारे, उसका लंड देखकर आँखें फैल गईं। “वाह बेटा… कितना बड़ा…”। सोनू ने माँ को बिस्तर पर लिटाया और उसके बदन पर चूमने लगा। सुशीला देवी सिसकार रही थी। “आह्ह… सोनू… माँ को चोद… अपनी माँ की चूत फाड़ दे…”।
सोनू ने अपना लंड उसकी चूत पर रखा और धीरे से धक्का मारा। सुशीला देवी चीखी “आह्ह… मार डाला…”। फिर दोनों एक-दूसरे में खो गए। पूरी रात चुदाई होती रही। सुशीला देवी ने अपने बेटे को पूरा मजा दिया और सोनू ने अपनी माँ को संतुष्ट किया। सुबह दोनों अलग-अलग सोए थे जैसे कुछ हुआ ही न हो। मगर अब गाँव में एक नया राज शुरू हो गया था। चौधराइन अब अपने बेटे की रखैल बन चुकी थी। और ये राज गाँव में किसी को पता नहीं चला… कभी नहीं चलेगा।
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