Revenge Sex Kahani
मैं दीक्षा हूँ। अभी-अभी चौबीस साल की हुई हूँ। दस साल पहले मेरी माँ का देहांत हो गया। उसके डेढ़ साल बाद पिताजी ने दूसरी शादी कर ली। नई माँ ने कुछ ही समय में अपना रंग दिखाया और ढाई साल में तो मुझे घर छोड़ने पर मजबूर कर दिया। उस वक्त मैं करीब अठारह साल की थी। मुझे पढ़ाई भी छोड़नी पड़ी। मैंने वह शहर ही छोड़ दिया। Revenge Sex Kahani
मैं मुंबई आ गई। नौकरी की तलाश शुरू की। जहाँ भी गई, मुझे नौकरी तो तुरंत ही ऑफर होती थी, लेकिन वह मेरी खूबसूरती का जादू था। कोई-कोई तो पहले ही बेझिझक होकर प्रपोजल रखता था, तो कोई इशारों में समझाने की कोशिश करता था। लेकिन मतलब एक ही था— मुझे जॉब देकर वे मेरे रूप को भोगना चाहते थे। ऐसी करीब बीस ऑफर मिले। मैंने वे सारी ऑफर ठुकरा दीं।
एक जगह जहाँ ऐसी बात नहीं हुई, तो मैंने वह जॉब तुरंत ले ली। लेकिन एक ही हफ्ते में वही अनुभव हुआ। मैंने वह भी छोड़ दिया। एक और मिली तो वहाँ भी बीस दिन ठीक जाने के बाद वही बात हुई। मैंने वह भी छोड़ दिया, लेकिन अब मैं डर गई थी। जान चुकी थी कि मेरा ही रूप मेरा बैरी बन चुका है।
लोगों पर से और ईश्वर पर से विश्वास उठता जा रहा था। मन-ही-मन सोचने लगी कि शायद यही इस दुनिया का दस्तूर हो। इसे स्वीकार करने के खयाल भी मन में आने लगे। लेकिन तब मेरी किस्मत बदलने वाली थी। इत्तेफाक से मैं एक ऑफिस में जा पहुँची। बड़ी साफ-सुथरी ऑफिस थी।
मेरा इंटरव्यू खुद बड़े सेठ ने लिया। समीर नाम था उनका। एकदम साफ इंटरव्यू रहा। मेरे रूप की ओर तो जैसे नजर ही नहीं थी। मैं पास हो गई और मुझे वह जॉब मिल गई। सैलरी भी मेरी ख्वाहिश से दुगनी थी। यहाँ कोई आलतू-फालतू बात नहीं होती थी। बस काम से काम रहता था। मैं समीर सर की पी.ए. थी।
वे करीब पैंतालीस की उम्र के थे। उनके तीन बेटे थे। मँझला मेरी उम्र का था। सभी भाइयों में दो साल का अंतर था। वे पढ़ते थे, लेकिन कभी-कभी ऑफिस आ जाया करते थे किसी काम से। मैं उन सब से परिचित हो गई थी। समीर सर की पत्नी पिछले एक साल से बीमार रहा करती थी। उसे लेकर समीर सर चिंतित भी रहते थे। कभी-कभी मेरे पास भी वे अपनी चिंता व्यक्त करते थे।+
इसे भी पढ़े – भाभी के ऊपर से बाँझ होने का कलंक मिटाया
उनकी पत्नी के बचने के चांस कम थे। मुझे समीर सर से हमदर्दी होने लगी थी और शायद…… प्यार भी। कच्ची उम्र का पक्का प्यार…… आखिर जीवन में पहली बार कोई ऐसा आदमी मिला था जो संपूर्ण था, श्रीमंत था, स्वरूपवान था, शिक्षित था, अच्छे शरीर-सौष्ठव का और बहुत ही अच्छे व्यवहार वाला था। यूँ कह सकती हूँ, चुंबकीय व्यक्तित्व था उनका।
वक्त गुजरता जा रहा था। यूँ ही चार महीने बीत गए। एक रोज शनिवार के दिन दोपहर को वे बोले, “दीक्षा चलो।” मैंने पूछा, “कहाँ?” वे कड़क टोन में बोल उठे, “चलो भी।” और खुद चल दिए। मैं भी साथ हो गई। नीचे आकर वे अपनी नई होंडा क्रू में बैठे। मेरे लिए बाजू वाला दरवाजा खोल दिया।
मैं भी बाजू में बैठ गई। पूछने की हिम्मत ही नहीं हुई कहाँ जा रहे हैं। कार चल पड़ी और थोड़ी देर में हम शहर से बाहर आ गए। वे गुमसुम थे। मैं भी कुछ बोली नहीं। गाड़ी पहाड़ों में होती हुई लोनावाला जा पहुँची और ‘ड्यूक्स’ रिट्रीट में एंट्री ली। बड़ी शानदार जगह थी।
उन्होंने एक सूट ऑफिस से फोन करके बुक किया हुआ था। यहाँ उन्हें सब जानते थे। काउंटर पर रिसेप्शनिस्ट ने मुस्कुराते हुए कहा, “युवर सूट इज चिल्ड, सर, एंड मिनी फ्रिज इज फुल विद स्टॉक।” उसने रूम की चाबी दे दी। समीर सर ने कार की चाबी वहाँ दे दी और हम अंदर चले गए।
सूट आलीशान था और एकदम ठंडा भी। एयर-कंडीशनर पहले से ही ऑन था। रूम बॉय आकर कार में से समीर सर की छोटी सी बैग लाकर रख गया और कार की चाबी छोड़ गया। अंदर पहुँचकर उन्होंने कोट उतार फेंका और नेकटाई ढीली करते हुए सोफे में जा गिरे, जूते उतारे और पाँव लंबा करके सेंटर टेबल पर रखते हुए बोले, “दीक्षा, तुम सोच रही होगी, यह सब मैं क्या कर रहा हूँ, है ना?”
मैंने सिर हिलाया। उन्होंने पास बैठने का इशारा किया। मैं बाजू में जाकर बैठी। उन्होंने मुझे नजदीक खींचते हुए कहा (मैं उनके इतने पास कभी नहीं बैठी थी पहले), “दीक्षा, आज डॉक्टर ने जवाब दे दिया। सोनिया (उनकी पत्नी) अब बीस-पच्चीस दिन की मेहमान है।” गिड़गिड़ाती आवाज में आगे कहा, “हमारा तेईस साल का साथ छूट जाएगा, मैं अकेला हो जाऊँगा।”
मैंने सांत्वना दी, “यह सब तो ऊपरवाले के हाथ में है। लेकिन आप खुद को अकेला न समझें। मैं जो साथ हूँ।”
वे आगे झुके और मेरी आँखों में झाँकते हुए कहा, “सच? क्या तुम वाकई मेरे साथ हो?”
मेरी आँखों में झाँकती हुई उनकी आँखों में कुछ अजीब से भाव मैंने महसूस किए, पर मैं समझ नहीं पाई और बोली, “हाँ, सर।”
उनका दूसरा प्रश्न पीछे ही आया, “सोनिया की तरह?”
मैं चौंकी, पर बोल उठी, “हाँ, सर।”
वापस सोफे की बैक का सहारा लेते हुए बोले, “चलो अच्छा है…… जरा फ्रिज से व्हिस्की और सोडा ला। और तुम भी सफर से थकी होगी। जा, नहा के फ्रेश हो जा।”
मैंने उनका पेग भरते हुए कहा, “मैं तो कपड़ा भी नहीं लाई। नहा के क्या पहनूँगी? मुझे नहीं नहाना।”
मुस्कुराते हुए उन्होंने अपनी बैग से कुर्ता और लुंगी निकाल के फेंकते हुए कहा, “ले, यह तुझ पर बहुत जँचेगा।”
मैंने उसे उठाया और शरमाते हुए बोली, “लेकिन आपकी बैग में ब्रा और पैंटी थोड़ी होगी?”
व्हिस्की की घूँट लेते हुए वे बोल उठे, “अब जा भी। एक दिन ब्रा-पैंटी नहीं पहनेगी तो नंगी नहीं दिखेगी।”
खिलखिलाते हुए मैं कपड़े उठा के अंदर चली गई। बाथरूम बड़ा लक्जुरियस था। पूरे कद का मिरर लगा हुआ था। मैंने अपने कपड़े उतारे और अपने ही फिगर को एडमायर करते हुए देखती रही। सोचा, वे सब लोग जो मुझे जॉब देते समय मेरे रूप के पागल होते थे…… आखिर गलत तो नहीं थे!! मैं हूँ ही ऐसी।
इसे भी पढ़े – गाँव के खेत में सेक्स के मजे
फिर पानी भरे टब में लेटी और आज के बारे में सोचने लगी। तुरंत खयाल आया, समीर सर आज कुछ बदले-बदले लग रहे हैं। वैसे भी औरत किसी भी मर्द की नीयत को जल्दी ही समझ लेती है। मुझे भी वह पल याद आया, जब उन्होंने मेरी आँखों में अपनी आँखों से झाँकते हुए कहा था, “सच? क्या तुम वाकई मेरे साथ हो?” और दूसरा प्रश्न था, “सोनिया की तरह?”
मुझे बात समझ में आने लगी। भले ही इतने समय समीर सर ने नेक व्यवहार किया हो, आज की बात कुछ और है। आज वे भी उसी लाइन पर हैं और मुझे भोगना चाहते हैं। लेकिन आश्चर्य!!!! पहले जहाँ मैं ऐसे हर मौके पर जॉब ठुकरा के भागी थी, इस बार मन में कोई विरोध उठना तो दूर रहा, एक मीठी गुदगुदी सी हो रही थी।
मैंने टब में अपने ही स्तन को सहलाते हुए अपने मन को टटोला। नतीजा सामने था। इन चार महीनों में मैं मन-ही-मन उन्हें पसंद करने लगी थी। और सोनिया की जानलेवा बीमारी की बात ने तो यह आशा भी जगाई थी कि उसकी मृत्यु के बाद मैं मिसेज समीर भी बन सकती हूँ।
यह खयाल आते ही मन पुलकित हो उठा। फ्रेश होकर बाहर आई तो वह दूसरी ही दीक्षा थी। मैं बाहर आई तो देखा कि समीर सर सोफे से बेड पर आ गए थे, कपड़े बदल के अब सिर्फ शॉर्ट्स में थे। ऊपर का बदन खुला था। मैं उनके कसे हुए सीने को लोलुपता से देख रही थी।
वे दो पेग पी चुके थे। उनकी नजर मुझ पर पड़ी तो आँखें फाड़कर देखते ही रह गए। कुर्ता-लुंगी में, बिना ब्रा-पैंटी के, मैं बहुत ही सेक्सी लग रही थी। बालों से पानी टपक रहा था और मेरे स्तनों के ऊपर गिर के कुर्ते के उस भाग को गीला कर रहा था। गीला कुर्ता मेरे स्तनों से चिपक कर मुझे और सेक्सी लुक दे रहा था।
मैं बेड पर उनके बाजू में बाईं ओर जाके लेटी और एक गहरी साँस लेके अपने स्तनों को उभारा। कुर्ते का ऊपरी बटन भी खुला छोड़ रखा था मैंने। मेरी आधी क्लीवेज साफ नजर आ रही थी। उनके दिल में हल्का सा तूफान तो उठा ही हुआ था। अब मेरी हरकत से उनके दिल में खलबली मची। ये कहानी आप हमारी वासना डॉट नेट पर पढ़ रहे है.
उन्होंने पेग साइड टेबल पर छोड़ दिया और मेरी ओर मुड़े। एक ही झटके में उनका दायाँ पैर मेरी दोनों जाँघों पर आ गया, उनका दायाँ हाथ मेरे बाएँ बूब्स पर आ गया, और उनके होठ मेरे दाएँ कान के पास आ गए। वे बिना कुछ कहे, जैसे अपना अधिकार समझकर, शुरू हो गए।
मेरे कान की बूटी (लोब) को अपने मुँह में लेकर चूसने लगे, साथ ही जो हाथ मेरे बूब्स पर था उससे उसे सहलाने लगे और जो पाँव मेरी जाँघों पर आ चुका था उसे ऊपर-नीचे करने लगे। उनके लिए यह सब नया नहीं था, सिर्फ पात्र बदल गया था। पर मैं तो जीवन में पहली बार किसी मर्द का अनुभव कर रही थी।
बदन पर एक साथ तीन-तीन जगह स्पर्श हो रहा था—कान, बूब्स और जाँघ पर। बूब्स और जाँघ पर तो कपड़े के ऊपर से हो रहा था, लेकिन कान-बूटी पर तो सीधा ही हो रहा था। एक झंझनाहट सी महसूस हो रही थी। मैं आँखें मूँदकर पड़ी रही। कान तो एकदम गरम हो रहा था।
उतने में उन्होंने एक हल्की सी काट ली, लोब पर। मेरे मुँह से सिसकारी निकल गई। दर्द हो रहा था…… पर अच्छा भी लग रहा था। जाँघों पर उनके वजनदार पाँव ऊपर-नीचे हो रहे थे। उस वजन के नीचे सिल्की लुंगी का मुलायम स्पर्श मेरी लचीली जाँघों को उत्तेजित कर रहा था। और साथ ही मेरा बूब पहली बार किसी मर्द के हाथों दबाया जा रहा था।
(वैसे यह अनुभव पूरी तरह से नया नहीं था। हर लड़की यौवन प्रवेश पर अपने ही हाथों अपने स्तनों को दबा के यह अनुभव ले लेती है। मैंने भी लिया था। पर मानना पड़ेगा…… मर्द के हाथों स्तन दबाने पर जो अनुभव होता है, वह अपने हाथों चाहे कितना ही दबा लो, उससे अलग ही होता है।)
अब उनका मुँह मेरे कान छोड़कर गालों पर आ गया। उनकी साँसें मेरे गाल पर टकरा रही थीं और उनके होठ जो अब गीले हो चुके थे गाल पर किस कर रहे थे। पूरे गाल को चूमते हुए, वे थोड़े ऊपर उठे और मेरे रसीले होठों पर अपने गरम गीले होठ रख दिए। वे पूरी तरह ऊपर नहीं उठे थे। सिर्फ सीना और मुँह ऊपर उठाया था।
इसे भी पढ़े – दीदी और माँ ने कंडोम पहनना सिखाया
ऊपर उठके आने की वजह से अब उनका खुल्ला सीना मेरे दाएँ बूब्स को दबा रहा था। स्तनों पर मर्द का वजन कैसा रंगीन लगता है, यह तो लड़कियाँ ही जानती हैं। साथ ही बायाँ बूब जो अब तक सहलाया जा रहा था, अब मसला जा रहा था। जाँघों पर पाँव की मूवमेंट भी थोड़ी तेज हो गई। लुंगी सिल्की थी।
इतनी ढीली और अब तो तेज मूवमेंट से खुल गई और नीचे की ओर उतर गई। मैंने अपनी ओर से सहयोग देते हुए अपने पाँव चौड़े किए। अब पाँव की मूवमेंट के साथ उनका खुल्ला घुटना मेरी खुली चूत को टच करने लगा। ऊपर से नीचे तक सब जगह मजा आ रहा था……
अचानक एक खयाल मन में उठा, ‘यह मैं क्या करने जा रही हूँ? क्यों उन्हें रोकती नहीं हूँ? ऐसे तो मेरा यौवन भ्रष्ट हो जाएगा।’ पर मन की कौन सुनता था! अब तो दिल ही हावी था!! खयाल जैसा उठा वैसा ही दफन हो गया। मैं वापस मजा लेने में मगन हो गई…… अब उन्होंने पूरा बदन उठाया और मेरे ऊपर आ गए।
उनका पूरा बदन मेरे बदन पर ही था। मैं उनके भारी वजन के नीचे दबती जा रही थी। क्रश हो रही थी। और क्या मजा आ रहा था!! मैंने अपने हाथ उनकी खुली पीठ पर फैलाए और पसारने लगी। कभी-कभी नीचे शॉर्ट्स के ऊपर से हिप्स पर भी फिरा लेती थी। वे अब तेजी से मेरे पूरे चेहरे पर किस किए जा रहे थे।
मैं भी अब उन्हें किस में साथ दिए जा रही थी। मैंने उनके होठों पर मेरे होठ रख दिए और एक लंबी किस शुरू की। दोनों ने होठ थोड़े खोले और मैंने अपनी जीभ उनके मुँह के अंदर डाल दी। अंदर चारों ओर फिरते हुए उनकी जीभ से जीभ टकराई। होठ से होठ तो मिल ही रहे थे।
उनका दायाँ हाथ जो अब तक मेरे बाएँ बूब्स को मसले जा रहा था, तेजी से नीचे खिसका और कुर्ते के अंत तक पहुँच कर उसके नीचे घुसा और वापस ऊपर आ गया। आपको यह पढ़ने में जितना वक्त लगा, उससे भी कम समय में एक ही एक्शन में यह सारा मूवमेंट हो गया।
अब उनका दायाँ हाथ कुर्ते के अंदर मेरे बाएँ स्तन पर सीधा स्पर्श कर रहा था। पहली बार मेरे बूब्स को किसी मर्द ने छुआ था। वे तेजी से मसलने लगे उसे। अच्छा तो लग रहा था, पर कब से यह बायाँ बूब ही मसला जा रहा था…… तो मेरे दाएँ बूब्स में भी एक कसक उठी, वह भी दबवाने के लिए बेताब हो उठा।
मैंने शर्म छोड़कर उनका बायाँ हाथ थामा और उसे मेरे दाएँ बूब्स पर ले गई। वे समझे, और मुस्कुराते हुए दोनों हाथ नीचे ले गए, और कुर्ता ऊपर की ओर उठाया। मैं भी सिर के बाल हल्की सी ऊपर हुई और उन्होंने कुर्ता मेरे गले तक खिसका लिया। मैंने बदन नीचा किया और गर्दन ऊपर उठाई, उन्होंने कुर्ता पूरा बाहर निकाल दिया और फेंक दिया एक कोने में।
लुंगी तो पहले ही खुल के घुटनों तक उतर चुकी थी। उन्होंने पाँव ऊपर लेके उसमें उसे फँसा के पाँव जो नीचे किया तो वह भी मेरे सहयोग के साथ बाहर हो गई। अब मैं पूरी नंगी थी और उनके नीचे दबी हुई थी। वापस फेस पर किस करते हुए अब वे दोनों हाथों से मेरे दोनों स्तनों को मसल रहे थे। ये कहानी आप हमारी वासना डॉट नेट पर पढ़ रहे है.
ऐसा लग रहा था, जीवन भर कोई ऐसे ही मसला करे इन्हें! लेकिन थोड़ी ही देर में मैं बेचैन हो उठी……!!! पहले स्तनों को सहलाए जाने का मजा लिया, लेकिन फिर दबवाने की इच्छा हो रही थी, दबाए गए तो मसले जाने की कसक उठी, अब मसले गए तो चूसाए जाने की चाह उठी।
और उसी चाह ने मुझे बेचैन कर दिया था…… मैंने उनका मुँह—जो मेरे फेस पर किस करने में लगा हुआ था—पीछे से बालों से पकड़ के हल्के से नीचे मेरे स्तनों की ओर खींचा। वे तो दीक्षा,भवी थे, इशारा समझे और नीचे उतर बाएँ बूब्स की ओर लपके। पर मेरा तो दायाँ बूब कब से भूखा था।
मैंने फिर बालों से मुँह को दाएँ बूब्स की ओर खींचा। वे उसको चारों साइड से चूमने लगे। इस खेल के मंजे हुए खिलाड़ी जो थे! निप्पल को केंद्र बनाकर पूरे बूब्स पर निप्पल से डोर सर्कुलर मोशन में चूम रहे थे। धीरे-धीरे सर्कल छोटा करते जा रहे थे। मेरी उत्तेजना बढ़ती जा रही थी। निप्पल मर्द के मुँह में जाने के लिए उतावला हो रहा था।
इसे भी पढ़े – दोस्त की दीदी कामुक हो कर चुदवाई
एक-दो बार तो मैंने उनका फेस निप्पल की ओर घसीटना चाहा। पर वे तो अपनी स्टाइल से ही चूमते रहे। मुझे टीज जो कर रहे थे। निप्पल मोटा और कड़क होता जा रहा था। सर्कल एकदम छोटा हो गया तब तो निप्पल से उनकी गर्म साँसें टकराने लगीं, लेकिन उसे तो उनके मुँह का इंतजार था।
जब एकदम छोटा हो गया तो उन्होंने जीभ निकाली और अब तक कड़क हो चुके निप्पल पर टकराई। मेरे मुँह से आह निकल गई। शरारती नजर से मेरी ओर देखते हुए उन्होंने जीभ झटपट से निप्पल की चारों ओर फिरा दी…… और फिर लपक के निप्पल मुँह में ले ली। मेरी धड़कन तेज हो गई।
जिसके लिए कब से निप्पल बेताब हुआ जा रहा था, वह अनुभव होना शुरू हो गया। वे मस्ती से उसे चूस रहे थे। आहा! क्या फीलिंग थी!! निप्पल से जैसे करंट बह रहा था और पूरे बदन में फैल रहा था…… एक नशा सा छा रहा था! कितना आनंदप्रद अनुभव होता है यह!!
यही सब दूसरे बूब्स के साथ भी किया गया। बड़े आराम से वे लगे रहे, दोनों स्तनों पर। एक चूसाते थे तो दूसरे को मसलते थे। मैं नारी तो जन्म से थी लेकिन नारीत्व आज महसूस कर रही थी। एक अरसे के बाद नशा थोड़ा कम हुआ तो मैंने उनकी खुली पीठ पर रखे अपने दोनों हाथ से उन्हें अपनी ओर दबाते हुए एक आलिंगन दिया।
उन्होंने भी अपने हाथ मेरे स्तनों से हटा के साइड से होते हुए, मुझे हल्का सा उठाते हुए, मेरे बदन के नीचे पहुँचा दिए…… और आलिंगन दिया। मुझे साथ लेकर रोल ओवर होकर मेरी साइड में आ गए और आलिंगन पर बड़ा जोर दिया। आहहाअ…… मैं उनकी बाँहों में क्रश हो गई…… बड़ा सुकून मिल रहा था…… लगता था वक्त ठहर जाए तो कितना अच्छा होता।
उन्होंने पकड़ ढीली करके एक हाथ नीचे अपनी इलास्टिक शॉर्ट्स में सरकाया, और उसे नीचे खींचा। मैंने देखा तो मैंने भी शॉर्ट्स में पाँव फँसा के उसे नीचे उतार दिया। पता नहीं मैंने यह क्यों किया। उनका लंड बाहर निकल आया। फिर मुझे आलिंगन में क्रश करके वे रोल ओवर होते हुए मुझ पर आ गए।
लेकिन अब दोनों बिल्कुल नंगे थे। वे पूरी तरह तैयार हो चुके थे। उन्होंने अपने हिप्स उठाए और लंड को मेरी चूत के मुँह पर ले आए। तब मुझे खयाल आया, क्या होने जा रहा है। एक पल के लिए मैं सहमी और उनको कहा- सर, अब आगे नहीं। किसी भी मर्द को इस मौके पर रुकावट पसंद नहीं।
वे भी चिढ़े हुए स्वर में बोले, “क्या है?”
मैंने खुलासा किया, “मैं अभी तक कुँवारी हूँ, सर।”
झट से जवाब आया, “हर लड़की पहले कुँवारी ही होती है और तब तक रहती है जब तक कोई मर्द उसे औरत न बना दे।” और बिना मेरे जवाब की दरकार किए, उन्होंने अपना लंड अंदर घुसा दिया। आगे वही हुआ जो सब जानते हैं। कुछ ही पल में मैं लड़की से औरत बन गई।
इसे भी पढ़े – मम्मी वासना में दुसरे मर्दों से चुदवाने लगी
जब मुझे अहसास हुआ कि क्या हो गया है तो इस तरह अपना कौमार्य खोने पर मैं थोड़ी उदास हो गई। वे भी मेरे मूड को समझे। शाम हो रही थी। मुझे कहा, “मैं जरा बाहर हो आता हूँ।” उनके जाने के बाद मैं गुमसुम लेटी रही और अपने जीवन का मुआयना करती रही। घंटे भर में वे वापस आए, एक थैली मुझे दी और कहा, “ये ले, तैयार हो जा।”
मैंने देखा तो अंदर नया ड्रेस था। चाबी वाले पुतले की तरह, बिना कोई भावना के, मैं उठी और ड्रेस पहन लिया। वे मुझे साथ लिए बाहर चल दिए। गाड़ी रुकी तो वह एक सुनसान मंदिर था। वे दर्शन करने गए, तो मैं भी गई। दर्शन करके आँखें खोलीं तो…… आश्चर्यचकित हो गई। वे हाथ में मंगलसूत्र लिए खड़े थे।
मुझे भीगे स्वर में कहा, “भगवान को साक्षी मानकर, मैं तुझे अपनी पत्नी स्वीकार करता हूँ।”
मैं देखती ही रह गई…… कहीं यह सपना तो नहीं?? उन्होंने मेरे गले में वह मंगलसूत्र पहना दिया। मैं खुश हो गई। उस रात मैंने बेड पर तूफान मचा दिया। वे भी पूरी तरह से खिले थे। न जाने रात भर में कितनी बार चुदाई हुई। सुबह होते-होते नींद लगी और दोपहर को खुली। फिर एक बार हमने कामसुख भोगा। ये कहानी आप हमारी वासना डॉट नेट पर पढ़ रहे है.
जब वापस चले तो हम दोनों पूर्णतः तृप्त थे। मुझे लगा वे बादल हैं और मैं धरती। बादल रात भर बरसा और पानी बनकर धरती में समा गया। खुद खाली हो गया और धरती को तृप्त कर दिया। मैं अपने आप को मिसेज समीर समझने लगी थी। सोनिया के बाद मेरा ही तो है सब।
वापस लौटकर आने के बाद उन्होंने मेरे लिए एक फ्लैट ले लिया और मुझे वहाँ ठहरा दिया। डॉक्टर ने भले ही सोनिया को बीस-पच्चीस दिन की मेहमान होने का कहा था, उसकी तबीयत कुछ सुधरी और हॉस्पिटल में ही उसने चार महीने और खींचे। तब तक रोज, समीर सर मेरे फ्लैट पर आते थे, मुझे भोगते थे और चले जाते थे।
मैं कुछ बोल भी नहीं सकती थी। एक बार आत्मसमर्पण जो कर चुकी थी और उनकी पत्नी बनने के सपने भी देखती थी। सोनिया की डेथ के बाद वे बोले, “हमारे धर्म में एक साल का शोक मानते हैं।” तो एक साल शादी की बात फिर टाल गई। साल भी बीत गया और दूसरा साल भी आ गया।
समीर सर कोई-न-कोई बहाना बनाकर शादी टाल देते थे, पर मुझे चोदना नहीं भूलते थे। मेरी जवानी का और सुंदरता का पूरा-पूरा लुत्फ (आनंद) उठाया, मजा लिया। मैं भी समझने लगी थी…… कि…… पत्नी बनने के चक्कर में मैं उनकी रखैल बन चुकी हूँ!! फिर अपना बैकग्राउंड देखकर और जॉब ढूँढने के समय के अनुभवों को याद कर, मन को मनाती रही; रखैल भी बन गई तो ठीक ही है।
फिर एक दिन एक नई बात बनी। उस रात ऑफिस की ओर से पार्टी थी। मैं भी तैयार होकर गई थी और मेहमानों की देखभाल देख रही थी। यह सब मैं पहले भी कई बार कर चुकी थी। सारी व्यवस्था पर नजर रख रही थी। जब पार्टी खत्म होने में थोड़ी देर बाकी थी, तो समीर सर आए और मुझे एक कोने में ले जाकर प्यार भरे सुर में कहा, “दीक्षा, वह ब्राउन सूट में मिस्टर शाह खड़े हैं, देख रही हो?”
मैंने हामी भरी। आवाज और धीमी और गंभीर करते हुए कहा, “हमारे लिए बहुत इंपॉर्टेंट गेस्ट हैं। उनसे हमें पच्चीस करोड़ का कॉन्ट्रैक्ट मिल सकता है। बड़े रंगीन मिजाज आदमी हैं। कॉन्ट्रैक्ट पेपर्स को लड़की के खुले स्तन पर रखकर साइन करने का शौक रखते हैं। तू ही इनको संभाल सकती है। उनको ओबेरॉय में ड्रॉप करने जा और खुश करके सुबह लौटना, समझी??”
और मेरे जवाब की परवाह किए बिना ही मुझे ले चले और मिस्टर शाह से इंट्रोडक्शन करवा दिया, “सर, यह है हमारी हॉट ब्यूटी क्वीन, दीक्षा।” आँख विंक करते हुए आगे कहा, “हर काम में माहिर है। आपको होटल पर छोड़ने आ रही है। आप कॉन्ट्रैक्ट पर दस्तखत जरूर कर देना।”
इसे भी पढ़े – ससुर साथ सुहागरात मनाई कामुक बहु ने
शाह ने लोलुप नजरों से मेरे स्तनों को देखा और बोला, “साइन करने की जगह तो सही है।” और गंदी तरह से हँस पड़ा। समीर सर भी उसकी हँसी में शामिल हो गए और मुझे उसकी ओर पुश करते हुए कहा, “गुड नाइट तो बोथ ऑफ यू।”
सब कुछ इतना फास्ट हो गया कि बिना कोई प्रतिक्रिया किए मैं ओबेरॉय में शाह की बेड पर पहुँच गई। मैंने सोचा, अब आ ही गई हूँ तो काम पूरा कर दूँ…… और मैंने शाह को खुश कर दिया…… सुबह होते उसने कॉन्ट्रैक्ट पेपर्स निकाले और मेरे नंगे स्तनों पर रखकर साइन कर दिया।
वापस आकर पेपर्स समीर सर को दिए तो बहुत खुश होते हुए कह उठे, “मैं जानता था, तुम यह काम जरूर कर सकती हो।” उसके बाद तो यह सिलसिला ही बन गया। मैं रखैल से कब रंडी बन गई पता ही नहीं चला। धीरे-धीरे समीर सर का मेरे फ्लैट पर आना कम हो गया। और एक दिन देखा कि उन्होंने ऑफिस में एक नई पी.ए. भी रख ली थी।
अब मेरा ऑफिस में पहले जैसा रेस्पेक्ट भी नहीं रहा था। मुझे कहीं भी कुछ भी अच्छा नहीं लग रहा था। तो मैंने समीर सर को एक दिन अपने फ्लैट पर बुला लिया। वे आए। मैं साज-सज्जा करके तैयार हुई थी, उन्हें आकर्षित करने के लिए। उन्होंने जमकर मेरी चुदाई भी की।
जब लगा मुझे कि वे संतुष्ट हैं तो मैंने बात निकाली और जो हो रहा था उसके प्रति नाराजगी व्यक्त करते हुए कहा, “सर, आपने तो मुझे मंदिर में भगवान को साक्षी मानकर पत्नी बनाया था, फिर आपने पत्नी की जगह रखैल बना दिया, मैंने वह भी सह लिया, लेकिन अब तो आपने मुझे रंडी बना दिया है, क्या यह ठीक है?”
वे हँसते हुए बोले, “छोटी बच्ची थोड़ी हो कि मैं कहूँ और तुम चली जाओ किसी के साथ सोने के लिए? तुम्हें भी तो खुजली थी शाह से चुदाने की।” अब आवाज तीखी हुई, “एक तो रहने को आलीशान फ्लैट दिया है, पैसे की तकलीफ नहीं है, तुम्हें रोज नई वैरायटी मिलती है, फिर भी नखरे दिखाती है? और तुम्हें क्या फर्क पड़ता है, मैं चोदूँ या कोई और चोदे? चुदाई तो चुदाई ही है ना? समझ ले अपना शरीर मुझे ही दिया है।”
उनका यह रूप देखकर मैं तो हक्का-बक्का रह गई। थोड़ी देर तो क्या बोलना है, कुछ सूझा ही नहीं। फिर जब संभाली तो मैंने भी कसर नहीं छोड़ी। दोनों गुस्से में आ गए। बात बिगड़ती गई। बड़ा झगड़ा हो गया। मैंने कह दिया, “समीर, तूने मुझे धोखा दिया है। मैं तुझे नहीं छोड़ूँगी। देख लूँगी।”
इस पर तो वे लाल-पीले हो गए। बड़ी हस्ती थे। उन्हें कोई ऐसा कह जाए तो कैसे सुन लेते? वे भी बिगड़े, “तू? तू मुझे देख लेगी? तेरी हैसियत ही क्या है? मेरे सामने तेरा क्या वजूद है? मेरे पास पैसे की ताकत है, सोशल स्टेटस है, पोलिटिकल कॉन्टैक्ट है, बड़े-बड़े नेताओं से संबंध हैं, पुलिस और अंडरवर्ल्ड में पहचान है। और तू? एक रंडी मात्र!! तेरी क्या औकात है कि मुझे देख लेगी? चल खाली कर यह घर अभी का अभी!!”
मेरे पास कोई चारा नहीं था। लेकिन घर छोड़ते हुए मैंने अपनी सारी भड़ास निकाल दी, “समीर, तू देखना, इन सब के बावजूद मैं तुझे हरा दूँगी, चेकमैट दे दूँगी!! तुझे यह रंडी शिकस्त देगी, शिकस्त!!!” घर तो छोड़ दिया, पर जिए कैसे…… कहाँ जाए…… ये सारे प्रश्न सामने आ गए।
मैंने फिर एक बार शहर छोड़ दिया। लेकिन जल्द ही भूख-प्यास से मैं ऊब गई। रातों को हाईवे पर खड़ी रहकर ट्रक ड्राइवरों के साथ सोई और खाने का पैसा जुटाया। एक भले ड्राइवर ने बताया, “दिल्ली जितना सेक्स का व्यवसाय कहीं नहीं होगा अपने देश में। तू सुंदर है। वहाँ तेरी कदर होगी। मैं दिल्ली जा रहा हूँ यह ट्रक लेकर, मैं वहाँ कोठे भी जानता हूँ, बैठ जा, तुझे वहाँ पहुँचा दूँगा।”
इसे भी पढ़े – सौतेले पापा साथ संभोग कर चुदास मिटाई
इस तरह नसीब मुझे दिल्ली ले आया। मजबूरी में मुझे वाकई रंडी ही बनना पड़ा। मैंने भी वह कोठा पकड़ लिया। सुंदर तो मैं थी ही। मेरा काम चल पड़ा। बहुत कस्टमर आते थे। एक रात में दस कस्टमर्स को बैठा लेती थी। कोठे की मैडम भी खुश और मैं भी। अब रहने की और खाने की चिंता तो न रही। कुछ कस्टमर तो खास हो गए। ये कहानी आप हमारी वासना डॉट नेट पर पढ़ रहे है.
यूँ दिन बीत रहे थे…… कुछ साल भी बीत गए। अब पैसे भी बन गए थे। लेकिन मैं समीर को नहीं भूली थी। कैसे उससे बदला लूँ, यह सोचती रहती थी। फिर एक दिन कुछ ऐसी बात हुई कि मुझे मेरा हथियार मिल गया…… समीर को हराने के लिए। और मैं चल पड़ी वापस मुंबई की ओर।
मुंबई आकर दो महीने तक मैं उससे नहीं मिल पाई, क्योंकि वे विदेश गए हुए थे। लेकिन उस समय में मैंने अपना काफी काम कर लिया। अब अंतिम वार करने का समय आ गया। समीर के लौटते ही मैं उनसे मिली। सेक्सी ड्रेस में साज-सज्जा करके गई थी। मुझे देखकर उन्हें आश्चर्य हुआ।
मुझे ऊपर से नीचे तक देखते हुए बोले, “थोड़ी फीकी पड़ गई हो।”
मैंने कहा, “हाँ, आपके बिना यह हाल हो गया मेरा।”
उनके चेहरे पर अभिमान भरी मुस्कान छाई, “तो अब तेरी अक्ल ठिकाने आ गई! चली थी मुझे हराने की चैलेंज देकर!! कहाँ पिघल गया तेरा वह सब गुमान?”
विनती भरी आवाज में मैंने कहा, “अब भूल भी जाइए वह सब, सर! मैं लौट आई हूँ हमेशा के लिए आपकी होने के लिए। आप जो कहेंगे वह सब मैं करूँगी।”
शैतानी हँसी हँसते हुए वे बोले, “तो अब घर, पैसा और सुविधा के लिए तू रंडी बनने को भी तैयार हो गई।”
मैंने एक सेक्सी आवाज में कहा, “वह तो है ही, पर एक बात और भी है, सर…… जिसने मुझे मजबूर किया है।”
आश्चर्य भरी निगाह से वे मुझे देखते रह गए, लेकिन जब बात समझ में नहीं आई तो पूछ बैठे, “और वह क्या है?”
मैंने एक सेक्सी अंगड़ाई ली और ड्रेस की स्लिट से पूरी जाँघ उन्हें दिखाते हुए बोली, “आपकी जैसी चुदाई भी तो कोई नहीं करता, ना!! आप मुझे रंडी बनके चाहे जिसके पास भेजें, लेकिन आपको भी मुझे रोज चोदना होगा!”
वे घमंड से फूले न समाए। वैसे भी सारे मर्दों को यही लगता है कि उनके जैसी हार्ड चुदाई कोई नहीं करता। वे भी खुशी भरा चेहरा लेकर बोले, “तो यह बात है! ठीक है, तेरे साथ एक प्रोग्राम बनाता हूँ।”
मैं जाकर उनकी लैप में बैठी और उनके गले में हाथ डालते हुए कहा, “मुझे वहीं ले चलो, जहाँ पहली बार चोदा था।”
उन्हें सब याद था, बोल पड़े, “तो ‘ड्यूक्स’ लोनावाला में जाने का इरादा है मैडम का!”
मैंने सिर हिलाकर हाँ कही और उनके लोब पर एक गरम किस और काट दे दी। उन्होंने वीकेंड का प्रोग्राम बना लिया…… और दूसरे दिन शनिवार की दोपहर हम वही सूट में पहुँच गए…… जहाँ मैंने अपना कौमार्य खोया था! अंदर पहुँचकर मैं उनसे लिपट गई और उनके गले में बाँहें डालते हुए मेरे होठ उनके होठ पर रख दिए।
वे भी शुरू हो गए। तुरंत ही दोनों की जीभ एक-दूसरे के मुँह में फिर रही थी…… मैंने यह चुंबन बहुत लंबा चलाया…… और दोनों के मुँह की लार एक-दूसरे में घुलमिल गई। थोड़ी ही देर में जब दोनों नंगे हो गए और वे बेड पर लेटे तो मैं उनके मुँह पर जाकर इस तरह बैठी कि मेरी चूत उनके होठों पर आ जाए।
वे उसे चूमने लगे। मैंने सेक्सी आहें भरीं तो समझा मुझे मजा आ रहा है, और चूत को फैलाकर जीभ अंदर डालकर चाटने लगे। मैं यहाँ भी लंबे समय तक लगी रही। उन्हें भी मैंने पूरा गरम किया और उन्होंने मुझे जमकर चोदा। थोड़ी ही देर में मैं फिर उठी और उन्हें कहा, “चलो आज साथ नहाते हैं।”
बाथरूम में फिर एक और राउंड हो गया। रात भर मैं लगी रही। (दिल्ली में दस-दस को बैठा के मेरी कैपेसिटी भी तो बन चुकी थी!) सुबह तक मैंने उन्हें निचोड़ ही डाला। संडे का दिन और रात भी ऐसे ही तूफान भरे बिताए। उन्हें भी बड़ा आश्चर्य हो रहा था, मेरा यह रूप देखकर। कुछ अजीब भी लग रहा था उन्हें, मेरा इस तरह अचानक आना और उन्हें यहाँ ले आना, और उसके बाद इस तरह से चुदते रहना…… पर समझ नहीं पा रहे थे।
मंडे की सुबह को लौटने से पहले जब मैंने उन्हें फिर एक बार उकसाया तो आखिरी चुदाई करते हुए बोल ही पड़े, “दीक्षा,, तुम किस बात पर उतारू आई हो, समझ में नहीं आता! ऐसा लग रहा है, कोई राज है!” मैंने रंग बदलते तीखी आवाज में कहा, “तो मैं समझा देती हूँ…… कि…… मैं किस बात पर उतारू आई हूँ! तू सही कहता है, एक राज है, और ले, वह राज भी मैं खोल देती हूँ।”
इसे भी पढ़े – आवारा लड़को से चूत का ताला खुलवाने लगी
उन्हें धक्का देकर मेरे ऊपर से हटाया और मेरी पर्स से एक एनवेलप निकालकर उनकी ओर फेंकते हुए मैंने कहा, “पढ़ इसे, यह तेरी मौत का परवाना है!” वे बिना कुछ समझे मेरा मुंह ताकते रहे। मैंने आवाज में सारी नफरत घोलते हुए कहा, “समीर, मुझे एड्स हुआ है! उसका रिपोर्ट है उस एनवेलप में। इतना ही नहीं, और एक फेटल एसटीडी (सेक्सुअली ट्रांसमिटेड डिजीज) का भी मैं शिकार हो गई हूँ, जो बहुत-बहुत ही चेपी (कंटेजियस) है।
जो मेरे साथ एक बार भी सोएगा, उसका शिकार हो जाएगा। डॉक्टर्स ने हाथ उठा लिए हैं! मैं इस धरती पर अब कुछ ही महीनों की मेहमान हूँ! और मैंने ये दो दिन में तुझे भी ये रोग लगा दिया है। अब तू भी कुछ ही महीने का मेहमान है। इतना ही नहीं…… जब तुम पिछले दो महीने से विदेश में थे, मैंने तेरे तीनों बेटों को भी ये रोग पूरी तरह लगा दिया है। अब तो बड़े लड़के की पत्नी (एक बेटे की शादी इस दौरान हो गई थी) भी इसका शिकार हो गई होगी।”
दुख, घृणा, संतोष और आनंद मिश्रित स्वर में मैंने कहा, “समीर, मैंने सिर्फ तुझे ही नहीं तेरे सारे खानदान को सत्यानाश कर दिया है! अब लगा ले अपनी पैसों की ताकत! कर ले उपयोग अपने सोशल स्टेटस का!! इस्तेमाल कर अपने पोलिटिकल कॉन्टैक्ट्स! बुला उन सारे बड़े-बड़े नेताजी को! बुला तेरे वो पुलिस वालों को और अंडरवर्ल्ड वालों को! किसी तरह बचा ले तुझे! समीर, इस अकेली औरत ने तेरी उन सारी ताकतों के बावजूद तुझे हरा दिया! बेवकूफ, ये दो दिन से तू मुझे यहाँ चोद नहीं रहा था! मैं तुझे शिकस्त दे रही थी, शिकस्त!!!”
प्रातिक्रिया दे