College Girl Jawani XXX
मैं एक अमीर और निहायत ही शरीफ घर की लड़की हूँ। हमारी इकदार हमें इजाजत नहीं देती कि मैं लड़की होकर अपने साथ चंद निहायत ही निजी और खौफनाक हालात बयान करूँ वो भी पूरी दुनिया के सामने लेकिन मेरे चंद बहुत ही करीबी दोस्तों और अजीजों के कहने से मैं अपनी ही जैसी चंद मासूम लड़कियों की जिंदगी और उनकी इज्जत बचाने के लिए यह सब आप से शेयर कर रही हूँ। College Girl Jawani XXX
हो सकता है मेरे यह सब बयान करने से कुछ मासूम लड़कियाँ हमारे समाज के दरिंदों के हाथ खिलौना बनने से बच सकें जो हम मासूम लड़कियों के जिस्म को न सिर्फ अपनी ऐयाशी बल्कि अपनी कमाई का जरिया जानते हुए हम से हर जायज और नाजायज काम करवाते हैं और हम सब जानते हुए भी मजबूर होते हैं वजह हमारा समाज ही होता है जो कि बजा तौर पर सिर्फ मर्दों का समाज है।
हम लाख अपने आप को बहला लें कि आज मर्द और औरत में कोई फर्क नहीं मर्द और औरत बराबर के हकूक रखते हैं लेकिन यह किताबी बातें सिर्फ किताबों में ही अच्छी लगती हैं या सियासतदानों के मुंह से… हकीकत क्या है यह हम जैसी लड़कियाँ जो हालात की भेंट चढ़ती हैं तो पता चलती है… मैं भी अपनी यूनिवर्सिटी के जमाने में औरतों के हकूक के लिए बहुत ही एक्टिव खयाल की जाती थी…
ऐसी तमाम तर सरगर्मियों में खूब बढ़ चढ़ कर हिस्सा लेती… क्या मालूम था कि एक दिन जीती जागती इबरत का निशान बना दी जाऊँगी… आप यह कहानी पढ़ते वक्त खयाल न करें कि मेरी जुबान से अदा होते स्ट्रेट सेंटेंस या लैंग्वेज से क्योंकि मैं ने अपने साथ बीते हुए वाकयात हरफ ब हरफ नकल किए हैं तो जुबान पर जाने के बजाय इस कहानी में छुपे हुए जज्बों और खयालात को जानेगा…
यह उन दिनों की बात है जब औरत पर जवानी आती है मुझ पर भी जवानी आई थी.. उमंगें जवां थीं ख्वाब इन आँखों में भी सजते थे.. ख्वाब जो कभी पूरे नहीं होते.. ख्वाब जो इंसान को अंदेखी दुनिया में ले जाते हैं.. जवानी के ख्वाब जो रंगीन और सँगीं होते हैं… मेरी आँखें भी ख्वाब देखती थीं…
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मेरे दिल में भी एक घर एक शौहर बच्चे सब का अरमान था… मैं उम्र की उस दहलीज पर थी जहाँ दुनिया बहुत ही हसीन दिखती है.. जवानी भी टूट कर आई थी.. मेरी दोस्तें अक्सर मेरे अल्हड़ जिस्म को शरारत से छेड़ती और फिकरे कसतीं.. क्या ही कसा हुआ और मस्त जिस्म था… चेहरा बिल्कुल किताबी.. हँसता हुआ… आँखें जैसे झील की अंदेखी गहराइयाँ… खूबसूरत लहराते बाल… खूबसूरत गोरा रंग…
और अंदर का हाल तो मैं ही जानती थी… खूबसूरत गोरी उठान लिए हुए छातियाँ जिन की बुलंदी हिमालय को भी शर्मा दे और जिस की नरमी मखमल को भी मात दे.. उस पर लगी गुलाबी बटनियाँ… नीचे पतली कमर जो जरा से जोर पड़ने पर बल खा जाए.. भारी कूल्हे… और सेहतमंद जिस्म….
मेरे पास वो सब कुछ था जिस की मर्द तमन्ना करता है.. एक हसीन दिल… जज्बे .. किस चीज की कमी थी.. और यही बात थी मैं यूनिवर्सिटी में हर दिल अजीज थी… क्या लड़के और क्या लड़कियाँ.. सब ही दोस्त थे… बहुत खूबसूरत दिन थे… अब बेहद जरूरी है मैं अपना तारुफ भी करवाती चलूँ ताकि मेरी इस दास्तान का तसिल्सुल न खराब हो सके..
मेरा नाम आशी है… अपने माँ बाप की बहुत लाडली और चाहती बेटी हूँ.. और अकेली भी.. मेरे पापा एक कामयाब बिजनेसमैन हैं.. जिन का बिजनेस दुनिया के कई मुल्कों में फैला हुआ है… लेकिन मेरे पापा ने मुझे बहुत प्यार दिया… उन्होंने दुनिया के सर्द-ओ-गरम से हमेशा बचा कर रखा..
मुझ से कहते थे “बेटा आशी तुम को जो पढ़ना है वो अपने ही मुल्क में रह कर पढ़ लो बाहर यूनिवर्सिटी हम मुसलमानों के लिए नहीं हैं वहाँ का माहौल बहुत ही खराब है” इतने पैसे और इतनी दौलत होने के बावजूद मेरे पापा बहुत ही सीधे सादे इंसान थे.. हम लाहौर के एक पॉश इलाके में रहते थे..
मेरे पापा ने हमें पूरी दुनिया घुमाई .. मुझे और मामा को लेकिन हम हमेशा लौट कर अपने पाकिस्तान ही आए.. यही हमारा वतन था.. यही हमारा घर था.. पापा कहा करते थे… “आदमी की थकान हमेशा उसके घर आ कर ही उतरती है..” और उनकी बात सही थी… हम दुनिया के हसीन तरीन मुल्कों में भी घूमे…
फाइव स्टार होटल्स के निहायत ही शानदार रूम्स में रहे लेकिन एक जहनी आसूदगी न थी… और वो हमें अपने वतन में आ कर ही मिली… तो मैं बता रही थी पापा ज्यादा तर अपने बिजनेस टूर्स पर होते थे.. घर पर मैं और मामा रहती थीं… वैसे तो सर्वेंट्स बहुत थे घर में लेकिन हम माँ बेटी एक दूसरे से ही दिल की बातें किया करते थे..
मेरी मामा मेरी बेहतरीन दोस्त थीं मैं हमेशा यूनिवर्सिटी से आ कर अपनी मामा के साथ लंच करती और दिन भर की बातें उन से डिस्कस करती और वो मेरी हर बात सुनतीं.. मुझे मश्वरे देतीं.. कभी पापा होते तो हम तीनों खूब बातें किया करते.. यूं ही जिंदगी के शब-ओ-रोज गुजर रहे थे… वक्त का चक्कर चल रहा था… ये कहानी आप हमारी वासना डॉट नेट पर पढ़ रहे है.
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सब कुछ हसीन था.. बहुत हसीन… और यह हसीन एहसास तब तक कायम रहा जब तक मेरी जिंदगी में “मोहब्बत ” का एहसास नहीं आ गया.. और यह एहसास पैदा करने वाला था “फराज” … वो “इकोनॉमिक्स” में मास्टर्स कर रहा था और मैं “मास कम्युनिकेशंस” में हमारे डिपार्टमेंट अलग-अलग थे..
लेकिन कभी कैंटीन में तो कभी लाइब्रेरी में आमना सामना हो ही जाता था.. और न जाने कब मैं “फराज” की मोहब्बत में गिरफ्तार हो गई पता ही न चला.. वो मेरे दिल पर हुकूमत करने लगा.. वही मेरे ख्वाबों में आने लगा.. मैं कहीं भी होती उसी के बारे में सोचती… उस का खयाल मेरे चारों तरफ फैल जाता.. और मैं परेशान हो गई..
मैं अभी अपना करियर बनाना चाहती थी… लेकिन क्या करूँ यह दिल मानता ही न था.. वो तो बस एक ही नाम जानता था..”फराज” उसके सिवा उससे कुछ सोचता ही न था… वो दिन-ब-दिन मेरे करीब होता चला गया… अब हम ज्यादा तर टाइम साथ गुजरते… खूब घूमते..
घंटों बैठे एक दूसरे की आँखों में देखा करते बातें किया करते.. मैं खुद को उसके प्यार की घनी छाँव में बहुत ही पुरसुकून महसूस करती और जब वो मुझ से जुदा होता तो ऐसा लगता जैसे जिंदगी ही जुदा हो जा रही है.. वो मेरी कमजोरी बन गया था… मेरा कोई कसूर न था भला दिल पर भी किसी का जोर चलता है…
मोहब्बत का जादू सर चढ़ कर बोल रहा था.. अक्सर हम सर-ए-शाम साहिल समंदर पर बैठे लहरें गिनते मैं उसके कंधे से सिर टिकाए किसी दूर अनजानी अंदेखी दुनिया में पहुँची होती.. कब टाइम गुजर जाता पता ही न चलता था.. मैं अपने आप से भी बेपरवाह होती जा रही थी..
मेरी मामा ने मुझ में होने वाली तब्दीलियों को नोट तो किया लेकिन मुझ से पूछा नहीं.. शायद वो इंतजार में थीं कि हमेशा की तरह मैं ही उन्हें बताऊँगी और मैं ने अपनी जिंदगी की बहुत बड़ी गलती यह की कि अपनी मामा जो मेरी हर बात की राजदार थीं.. जिन्होंने बचपन से हमेशा हर तरह के हालात में मुझे संभाला था… सहारा दिया था..
उनसे ही यह इतनी बड़ी बात छुपा ली… काश मैं ऐसा न करती… मैं फराज की मोहब्बत में डूबती चली गई और वो भी मुझे इस के मौके देता रहा इसी तरह दिन गुजरते रहे… मैं फराज पर जोर देती कि वो अपने वालदैन को मेरे घर रिश्ते के लिए भेजे लेकिन वो अपने करियर को लेकर बहुत ही जज्बाती था..
उस का कहना था कि वो अभी मेरे काबिल नहीं है… मैं एक अमीर बाप की अकेली औलाद थी और वो एक मिडल क्लास फैमिली से था…. और यही चीज हमारे दरमियान दीवार बन रही थी.. मुझे अपनी दौलत से अपने बाप के नाम से नफरत सी महसूस होने लगी.. मैं सोचने लगती कि काश मैं भी एक गरीब बाप की बेटी होती..
उस बाप के लिए मैं सोच रही थी जिस ने बचपन से खुद से ज्यादा मुझे चाहा था मेरी जरा सी तकलीफ पर पूरी पूरी रात मेरे सिरहाने बैठा रहता था.. मेरे पापा ने मुझे जितनी मोहब्बत दी थी बहुत ही कम बाप अपनी बेटियों से कर पाते हैं… वो मुझे देख देख कर जीते थे…
और अपने उन्हीं पापा की बेटी होने पर आज मुझे अफसोस हो रहा था…. आप अंदाजा कर ही सकते हैं कि मोहब्बत कितना मुंहजोर जज्बा होता है.. मैं फराज की मोहब्बत में अंधी हो गई थी…. अपने पापा का शफकत भरा चेहरा भी मुझे दिखाई न देता था.. अपनी मामा की मोहब्बत नजर न आती थी… ये कहानी आप हमारी वासना डॉट नेट पर पढ़ रहे है.
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न जाने क्या हो गया था मुझे अब सोचती हूँ तो हर्ट होती हूँ कि मुझ जैसी मजबूत पढ़ी लिखी लड़की का मोहब्बत ने यह हालत कर दी तो एक आम लड़की के दिल-ओ-दिमाग पर यह क्या बिजलियाँ गिराती होगी और शायद यही एक एहसास है जो मुझे मेरी दास्तान आप तक पहुँचाने पर मजबूर कर रही है…
यूनिवर्सिटी की पिकनिक हो या कोई पार्टी में फराज की पसंद के कपड़े पहनती उसे दिखाने के लिए सजती संवरती उसकी आँखों में पसंदीदगी देख कर मेरी खुद पर की गई सारी मेहनत वसूल हो जाती.. मैं ने अब तक अपने घर पर कुछ नहीं बताया था.. मैं इंतजार कर रही थी कि फराज कब अपने वालदैन से मेरी बात करता है तो मैं भी अपनी मामा को फराज के बारे में बताऊँ..
(नोट: डियर फ्रेंड्स यह मोहब्बत की दास्तान काफी तवील और यक्सानियत पर मुश्तमिल है दास्तान के तसल्सुल के लिए मैं काफी गैर जरूरी वाकयात हजफ कर के असल मत्तन आप तक पहुँचा रहा हूँ.. जिया शाहनील) आखिर यूनिवर्सिटी से जुदा होने के दिन करीब आ गए..
मेरा इसरार बढ़ता जा रहा था.. कि फराज अब हमारी बात कर ले ताकि हम जिंदगी के साथी बन जाएँ लेकिन फराज था कि अब तक टालता जा रहा था.. न जाने वो किस चीज का इंतजार कर रहा था.. उधर मेरे रिश्ते आने शुरू हो गए थे.. पापा के दोस्तों के घरानों से… लेकिन मैं थी कि फराज के इश्क में पागल हो जा रही थी..
आखिर एक रोज मेरे इसरार से मुतास्सिर हो कर फराज ने मुझ से कहा..”आशी क्या तुम मेरे साथ मेरे घर चलोगी मैं तुम्हें अपनी माँ से मिलवाना चाहता हूँ…” मैं तो खुशी के एहसास से सरशार हो गई.. मैं फौरन ही राजी हो गई और अगले रोज का प्रोग्राम बना.. उस दिन मैं ने अपने आप को खूब सजाया.. सँवारा.
मैं अपने होने वाले घर में पहली बार जा रही थी.. अपने होने वाले हमसफर के घर.. जो मेरी जन्नत था.. जहाँ मैं ने एक नई जिंदगी शुरू करनी थी और जिन लोगों के साथ शुरू करनी थी आज मुझे उन से मिलना था.. मैं ने अपना बेहतरीन सूट पहना हल्का मेकअप किया..
उस के बाद घंटों आईने में खड़ी अपनी सिरापे में कोई कमी ढूंढती रही.. मामा ने कई बार पूछा आज कोई खास दिन है लेकिन मैं ने उन को यह कह कर मुतमइन कर दिया कि मैं यूनिवर्सिटी में होने वाली एक पार्टी के लिए जा रही हूँ.. मामा खामोश तो हो गईं लेकिन उनकी निगाहें बता रही थीं कि वो मुतमइन नहीं थीं..
शायद माँ होने की वजह से उन्हें अपनी बेटी पर लहराते घने साए नजर आ गए थे.. लेकिन न जाने क्यों वो चुप ही रहीं… और मैं तैयार हो कर तयशुदा प्रोग्राम के मुताबिक सही टाइम पर यूनिवर्सिटी पहुँच गई.. यूनिवर्सिटी के बाहर फराज एक दोस्त की गाड़ी में मेरा मुंतजिर था…
मैं जल्दी से उसके साथ बैठ गई और उस ने गाड़ी अपने घर की तरफ दौड़ा दी… उस का घर लाहौर के उस इलाके में था जहाँ मैं कभी नहीं गई थी.. वो एक मिडल क्लास एरिया था.. यहाँ मेरा कहीं गुजर नहीं हुआ था.. मैं तेजी से गुजरते मंजर दिलचस्पी से देख रही थी.. फराज कोई बात नहीं कर रहा था..
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वो गैर मामूली तौर पर खामोश था.. फराज न जाने किन गलियों में घुमाता हुआ मुझे एक अलग थलग से बने एक तारीक और तंग से मकान पर ले आया.. मैं उस का घर देख कर झिझक गई.. मैं खुद से ज्यादा फराज पर ऐत्माद करती थी.. वो कई बार मेरे साथ तन्हा भी रहा था.. ये कहानी आप हमारी वासना डॉट नेट पर पढ़ रहे है.
लेकिन कहीं एक हद से आगे नहीं गया था.. वो मुझे दीवानों की तरह चूमता था… मेरे होंठ चूसता था.. लेकिन बस इस से ज्यादा कुछ नहीं जब कि मैं उन कमजोर लम्हों में शायद खूब पर काबू खो बैठती थी और दिल की अनजान गहराइयों से आवाज आती कि फराज और भी आगे बढ़े लेकिन वो इस से आगे कभी नहीं बढ़ा…
मुझे फराज पर ऐत्माद था लेकिन मैं झिझकी इस लिए थी कि उस का घर मेरे खयालों से भी कहीं बदतर था.. आप खुद सोचें मेरा घर 5000 यार्ड पर था. मेरा अकेला कमरा ही उसके पूरे घर से बड़ा था.. उस पर न रंग-ओ-रोगन.. अजीब वहशत सी बरस रही थी उस मकान पर… तो यह सब देख कर मेरा झिझकना कुदरती था..
फराज मुस्कुरा कर बोला.. “क्यों क्या हुआ आशी.. मेरी माँ से नहीं मिलना..?” मैं सब कुछ जहन से झटक कर मुस्कुराती हुई कार से उतर गई.. और फराज के साथ घर के दरवाजे पर पहुँची… दरवाजे पर दस्तक दी फराज ने अंदर कुछ लम्हे खामोशी रही फिर एक बूढ़ी सी औरत ने दरवाजा खोला.. हकल पर ही फटकार पड़ी थी उस के…
फराज बोला. “यह हमारे घर पर काम करती है.” मैं अंदर आई उस ने मुझे एक कमरे में बिठा दिया.. अजीब बोसीदा सा सोफा था.. वो अंदर चला गया मुझे वहाँ बिठा कर… कुछ देर बाद अंदर से किसी के बोलने की आवाजें आने लगीं और अभी मैं इस पर गौर ही कर रही थी कि अंदर से तीन गुंडे किस्म के आदमी अंदर आ गए..
मैं अपने आप में सिमट सी गई… फराज उनके पीछे ही था.. एक उधेड़ उम्र आदमी मेरे जिस्म के पार उतर जाने वाली निगाहों से मुझे देखता हुआ बोला.. “फज्जी बेटा.. तूने अपना काम सही तरह किया अब तू जा और इस की किसी दोस्त से इस के घर फोन करवा दे कि यह आज रात नहीं आएगी बाकी सारा काम यह बच्चे लोग कर लेंगे..”
मैं हक्का बक्का फराज को देख रही थी.. वो मुझ से नजरें नहीं मिला रहा था..
वो उस आदमी से बोला.. “बॉस कुछ पैसे मिल जाते तो.. वो क्या है ना आजकल जेब बिल्कुल खाली है…”
बॉस बोला “अभी तो तू माल लाया है जरा इस को टेस्ट कर लेने दे तेरे पैसे तुझे मिल जाएंगे अब तू जा यहाँ से..”
मैं जल्दी से उठ कर फराज से जा लगी और फट फट्टी आवाज से उस से बोली “यह सब क्या है फराज?” फराज कुछ न बोला.. उस आदमी से बोला “बॉस अब इस लौंडिया को पकड़ो मुझे अभी एक और माल की तरफ जाना है..” दो आदमी मेरी तरफ लपके और मुझे बाजू से जकड़ लिया.. फराज बाहर की तरफ जाने लगा.. मैं चीख चीख कर फराज को अपनी मोहब्बत के वास्ते देने लगी उस की मिन्नतें करने लगी कि वो मुझे इन दरिंदों के पास न छोड़ कर जाए..
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लेकिन उस ने जैसे कान बंद कर लिए थे.. मेरी चीख-ओ-पुकार सुन कर वो उधेड़ उम्र आदमी जिस को बॉस के नाम से पुकारा गया था आगे बढ़ा और मेरे फूल जैसे गालों पर एक जोरदार हाथ मारा.. मेरी आवाज एक दम रुक गई मैं हर्ट से बुत बनी रह गई इन गालों को हमेशा प्यार मिला था आज तक मेरे बाप ने भी मुझ पर हाथ न उठाया था.. मेरे आँसू बहने लगे..
वो अपनी खौनी आवाज में बोला.. “सुन लौंडिया.. वो तेरा आशिक हमारा आदमी था हम ने तुझ जैसी अमीर बाप की औलादों को घेरने के लिए पाला है उससे अब तेरे बाप से पैसे निकलवाएंगे जब तक तुझे यहाँ रहना होगा और हम जो कहें वो करना होगा.. इसी में तेरी भलाई है… अब तेरे हलक से आवाज निकली तो गला दबा कर यहीं गाड़ देंगे तुझे..”
और मैं अंदर तक सहम गई.. उन्होंने मुझे अंदर एक कमरे में बंद कर दिया… मैं बैठी अपनी किस्मत को कोसती रही और फराज के इस तरह बदल जाने पर हैरान होती रही.. शाम में बॉस फिर अंदर आया… और गौर से मेरे नजदीक बैठ कर मेरे जिस्म को घूरता रहा और मैं सिमटी बैठी रही.. ये कहानी आप हमारी वासना डॉट नेट पर पढ़ रहे है.
वो चला गया.. कुछ देर बाद वोही दोनों उसके चमचे अंदर आए और हाई रेजोल्यूशन कैमरे फिट करने लगे.. मेरी समझ नहीं आ रहा था कि यह सब क्या हो रहा था… वो क्या करना चाह रहे थे… कुछ देर बाद बॉस आया और बोला.. “देख लड़की हम ने सोचा है कि कल हम तुझे छोड़ दें.. अब घर जा कर तू क्या बहाना बनाती है यह तो खुद सोच ले..”
मैं उसके पाँव पर गिर पड़ी.. “आप मुझ पर रहम करें. आप जो मांगेंगे मैं आपको दूँगी ”
बॉस कमीनी हँसी हँस कर बोला.. “तो तू ने यह कैसे सोच लिया कि हम कुछ लिए बगैर तुझे यहाँ से जाने देंगे..”
मैं बोली.. “आप मुझे घर जाने दें. मैं वादा करती हूँ कि आप जितने पैसे बोलेंगे मैं आपको दूँगी..”
बॉस बोला.. “लेकिन जान-ए-मन तुम्हारा क्या भरोसा कि यहाँ से तुम सीधी पुलिस के पास नहीं जाती या अपने वादे से मुकर नहीं जातीं..”
मैं उस को यकीन दिलाती रही और वो हँसता रहा.. आखिर बोला… “तुम फिकर न करो कल सुबह हम तुम्हें छोड़ देंगे और पैसे भी तुम ही ला कर दोगी..” मैं खामोश हो गई.. मेरी समझ में कुछ नहीं आ रहा था कि ये लोग मुझे अभी क्यों नहीं छोड़ रहे सुबह का इंतजार क्यों कर रहे हैं..
अपने मामा का खयाल अलग परेशान कर रहा था वो कितने परेशान होंगे मैं अब तक घर नहीं पहुँची थी… और रात के साए गहरे होते जा रहे थे… आखिर रात को दरवाजा खुला वोही मकरूह शक्ल औरत मेरे लिए खाना लाई.. मैं ने जहर मार कर लिया थोड़ा बहुत..
कुछ ही देर गुजरी थी कि बॉस और उसके चेले इस हालत में अंदर आए कि उनके हाथों में शराब की बॉटल्स लटकी हुई थीं और उनकी आँखों में शैतानियत साफ देखी जा सकती थी.. मैं अनजाने लम्हों की खौफनाकियों को महसूस कर के सहम गई और बिस्तर पर एक तरफ सिमट कर बैठ गई..
न जाने क्या होने वाला था.. ये लोग तो मुझे रिहा करने वाले थे.. तो अब ये किस इरादे से यहाँ आए थे.. दोनों चेले जा कर कैमरा वगैरह सही करने लगे और बॉस मेरे बेड के करीब एक चेयर पर बैठ गया और मेरी तरफ गहरी नजरों से देखते हुए शराब पीने लगा…
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बॉस ने शराब का एक और घूंट लिया और मेरी तरफ घूरते हुए बोला, “क्या बात है रानी, इतनी डरी हुई क्यों बैठी है? हम तो बस तुझे थोड़ा मजा देने आए हैं। कल सुबह तुझे छोड़ देंगे ना, लेकिन आज रात तो हमें अपना हक चुकाना है।”
मैं काँपते हुए बोली, “प्लीज मुझे छोड़ दो, मैंने कुछ नहीं किया।”
लेकिन बॉस हँसा और अपने दोनों चमचों को इशारा किया। दोनों गुंडे मेरी तरफ बढ़े। एक ने मेरे बाल पकड़ लिए और दूसरे ने मेरी साड़ी का पल्लू खींचा। मैं चीखी, “नहीं… बचाओ… कोई तो मदद करो!” लेकिन वो बूढ़ी औरत बाहर से दरवाजा बंद कर चुकी थी।
उन्होंने मेरी साड़ी फाड़ डाली, ब्लाउज के हुक तोड़े, ब्रा को चीर दिया। मेरी 36 इंच की गोरी छातियाँ, गुलाबी निप्पल सब नंगे हो गए। बॉस ने मेरी छातियों को जोर से दबाया और बोला, “वाह क्या माल है यार! अमीर घर की मालकिन का माल तो कमाल का है।” मैं रो रही थी लेकिन उन्होंने मेरी पैंटी भी उतार दी।
मेरी साफ चूत, पतली कमर, भारी नितंब सब उनके सामने थे। कैमरे चल रहे थे। बॉस सबसे पहले मेरे ऊपर चढ़ा। उसने अपनी शराब से बदबूदार साँस मेरे मुँह पर छोड़ी और मेरे होंठ चूसने लगा। मैं ने सिर हिलाया लेकिन उसने मेरे दोनों हाथ सिर के ऊपर पकड़ लिए। उसने अपना मोटा, काला लंड मेरी चूत पर रगड़ा और एक जोरदार धक्के से अंदर घुसेड़ दिया। ये कहानी आप हमारी वासना डॉट नेट पर पढ़ रहे है.
मैं चीख पड़ी, “आआआह… निकालो… दर्द हो रहा है!” लेकिन वो रुकने वाला नहीं था। वो जोर-जोर से धक्के मारने लगा। मेरी टाइट चूत फटने लगी। वो चोदते हुए बोला, “साली अमीर की बेटी, आज तेरी चूत का भोसड़ा बना देते हैं।” दूसरे गुंडे ने मेरी छातियाँ चूसनी शुरू कर दीं, निप्पल काटे। तीसरा मेरे मुँह में अपना लंड ठूँसने लगा।
पूरी रात उन्होंने बारी-बारी से मुझे चोदा। पहले बॉस ने मेरी चूत भरी, फिर दूसरे ने, तीसरे ने। बीच में उन्होंने मुझे घोड़ी बनाया और मेरी गाँड भी फाड़ी। मक्खन लगाकर एक ने मेरी गाँड में पूरा लंड घुसा दिया। मैं दर्द से बेहोश होने लगी लेकिन वो रुकते नहीं थे। कैमरे सब रिकॉर्ड कर रहे थे। उन्होंने मुझे मुंह में, चूत में, गाँड में एक साथ भर दिया।
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मैं रोती रही, चीखती रही लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ। सुबह तक मेरे जिस्म पर उनके वीर्य के निशान थे, खून बह रहा था, मैं टूट चुकी थी। सुबह उन्होंने मेरे पापा को फोन किया। वीडियो भेजी जिसमें मैं नंगी चुद रही थी। पापा ने लाखों रुपये दिए लेकिन उन्होंने मुझे तुरंत नहीं छोड़ा। तीन दिन तक उन्होंने मुझे रखा। हर रात नई-नई हरकतें करते। कभी दो-दो लंड एक साथ चूत और गाँड में, कभी मुंह में वीर्य पिलाते, कभी मुझे नंगा नचाते। आखिरकार चौथे दिन पैसे लेने के बाद उन्होंने मुझे बेहोश करके किसी सड़क किनारे फेंक दिया।
मैं किसी तरह घर पहुँची। पापा-मामा ने मुझे देखा तो रो पड़े। पुलिस में रिपोर्ट हुई लेकिन वो लोग पकड़े नहीं गए। फराज भी गायब था। मैं आज भी उस रात के सपने देखकर काँप जाती हूँ। यह कहानी मैं इसलिए बता रही हूँ ताकि मेरी तरह की मासूम लड़कियाँ मोहब्बत के नाम पर अजनबियों पर भरोसा न करें। अपने माँ-बाप से कुछ भी छुपाएँ नहीं। अपना ख्याल रखें। मोहब्बत सुंदर है लेकिन अंधी नहीं होनी चाहिए। मेरी इज्जत लुट गई लेकिन शायद मेरी यह दास्तान किसी की इज्जत बचा ले।
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