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You are here: Home / Hindi Sex Story / रश्मि भाभी साथ वासना का अंतरंग सम्बन्ध 2

रश्मि भाभी साथ वासना का अंतरंग सम्बन्ध 2

फ़रवरी 21, 2026 by hamari Leave a Comment

Bhabhi Sex Kahani

मेरे दोस्तों, मेरी पिछली कहानी “रश्मि भाभी साथ वासना का अंतरंग सम्बन्ध 1” आपने पढ़ी होगी। उसमें मैंने रश्मि भाभी के साथ गुज़री एक रात की घटना का वर्णन किया था। और उस घटना से मेरे अंतर्मन की व्याकुलताओं का भी ज़िक्र किया था। Bhabhi Sex Kahani

दरअसल उस घटना के बाद से मेरी सारी दिनचर्या ही बदल गई थी। मैं अब अमरेश भैया और उनके परिवार से कटा-कटा रहने लगा था। अब मैं अपना ज़्यादा समय ऑफिस में ही बिताता था। रोज़ सुबह 8 बजे तक मैं ऑफिस के लिए निकल जाता, और रात 10 बजे के बाद घर वापस आता था।

इसी बीच भैया लौट आए थे, पर मेरी उनसे मुलाकात नहीं हुई थी। दरअसल मैं खुद उनसे मिलने में कतराता था। एक दिन वो सुबह खुद आए और मुझसे बातें कीं, पर उनकी बातों से मुझे कहीं भी ऐसा नहीं लगा कि रश्मि भाभी ने उन्हें सब कुछ कह दिया है।

मैंने राहत की साँस ली और मन ही मन में अब उनसे दूरी बनाए रखने में ही अपनी भलाई समझी। मैंने यह भी नोटिस किया कि भैया के बाहर जाने पर अब उनके यहाँ रात में कोई सोने नहीं आता था। शायद रश्मि भाभी ने ही मना कर दिया हो। धीरे-धीरे समय का चक्र आगे बढ़ता गया। चार महीने बीत गए। नवंबर की एक सुबह, उस दिन रविवार था। मैं अपने कमरे में ही था।

“क्या कर रहे हैं?”

मैं चौंका। देखा रश्मि भाभी खड़ी हैं। मैं हड़बड़ाकर उठा और उनसे बैठने को कहा। पर मेरी बात खत्म होने से पहले ही रश्मि भाभी एक कुर्सी लेकर बैठ चुकी थीं।

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“कैसे हैं?”

उनके पूछने पर बिना उनसे नज़रें मिलाए मैंने कहा, “जी ठीक हूँ।”

“वो तो मैं देख ही रही हूँ,” उन्होंने व्यंग किया।

मेरी आँखों में आँसू भर आए। बहुत दिनों बाद मुझे अपना पक्ष रखने का मौका मिला था।

मैंने कहा, “क्या सारा दोष मेरा ही था…? आप भी तो मुझे रोक सकती थीं।”

रश्मि भाभी चुप। बस सिर झुकाकर अपने नीचे के होंठों को दाँतों से काटने लगीं। मैंने देखा कि उनका गोरा चेहरा लज्जा की लालिमा से और भी निखर उठा है।

उन्होंने सिर उठाकर एक बार मेरी ओर देखा, फिर सिर झुकाकर कहा, “हम आज रात में आएँगे।”

एक आश्चर्य मिश्रित खुशी से मेरा सारा शरीर सिहर उठा। मुझे यकीन नहीं हुआ। मैंने प्रश्नवाचक दृष्टि से उनकी ओर देखा, कहा, “जी?”

उन्होंने कहा, “जी हाँ, आज आपके भैया बाहर जा रहे हैं। रात का खाना हम लेकर आएँगे। आप अंदर से दरवाजे की कुंडी खुला रखना। बच्चों के सोने के बाद ही हम आएँगे।”

और इतना कहकर रश्मि भाभी अर्थपूर्ण मुस्कान से मेरी ओर देखीं और चली गईं। मैं उत्तेजना और खुशी में सिर से पाँव तक काँप गया। उस रोज़ सारा दिन मैं व्यस्त रहा। अपने अव्यवस्थित कमरे को साफ किया, सजाया। बिस्तर के पुराने चादर को बदलकर नया चादर बिछाया।

मैं खुद बहुत देर तक साबुन से अपने सारे शरीर को मल-मलकर नहाया। शेविंग की। ऊपर-नीचे दोनों तरफ। शाम को कमरे में सुगंधित अगरबत्ती जला दी और करने लगा रश्मि भाभी का इंतज़ार। मुझे एक-एक पल सदियों जैसे लगने लगे थे। रात करीब 10:00-10:30 बजे होंगे।

दरवाजे पर आहट सुनाई दी। देखा रश्मि भाभी खाने की थाली लेकर खड़ी हैं। मैंने उन्हें अंदर आने का इशारा किया। वो भीतर आ गईं और मेरे कमरे की सजावट देखकर मेरी ओर देखा और मुस्कुरा दीं। मैंने देखा आज रश्मि भाभी और भी अधिक सुंदर लग रही हैं। ये कहानी आप हमारी वासना डॉट नेट पर पढ़ रहे है.

वो गुलाबी रंग का सलवार सूट पहने थीं। अपने लंबे खूबसूरत बालों का उन्होंने जूड़ा बना रखा था, जिसमें से कुछ बाल निकलकर उनके गालों पर लहरा रहे थे। मैं भाव-विभोर हो गया। उन्होंने मेरा खाना लगाया और बड़े प्रेम और आत्मीयता से मुझे खाना खिलाया।

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हाथ-मुँह धोकर आया तो देखा रश्मि भाभी मेरे बिस्तर पर बैठी हैं। मैंने म्यूज़िक सिस्टम पर अपने पसंदीदा ग़ज़लों का कैसेट चला दिया। जिसमें गुलाम अली की मशहूर ग़ज़ल “चमकते चाँद को टूटा हुआ तारा बना डाला, तेरी आवारगी ने मुझको आवारा बना डाला” आ रही थी।

रश्मि भाभी ने मुस्कुराते हुए कनखियों से मेरी ओर देखा और कहा, “वाह!” मैं उनके साथ ही पलंग पर बैठ गया। रश्मि भाभी ने मेरी हथेलियों को अपने दोनों हाथों में लेकर उस पर एक चुम्बन जड़ दिया। मैंने भी उनके गोरे नाज़ुक गालों को अपने दोनों हाथों में लेकर उनके माथे पर अपने गर्म होंठ रख दिए। रश्मि भाभी की आँखें बंद हो गईं।

मैं पलंग पर दीवार से टिककर बैठ गया। मैंने अपना एक पैर सीधा और दूसरे पैर को घुटने से मोड़कर रखा था। मैंने रश्मि भाभी की ओर अपनी बाहों को फैलाकर उन्हें अपने पास आने का इशारा किया। वो अपनी मोहक मुस्कान के साथ मेरी बाहों में आ गईं।

मैंने उनके कान के पीछे गर्दन पर अपना होंठ रखा। उनके मुँह से हल्की सी सिसकारी निकली। फिर उन्होंने खुद ही अपनी गर्दन को चारों ओर घुमा-घुमाकर आगे-पीछे सब ओर करके मेरे होंठों का स्पर्श/चुम्बन लेना शुरू कर दिया। उनके जूड़े से निकले हुए बाल मेरे चेहरे को स्पर्श कर रहे थे।

कमरे में लाल रंग की हल्की रोशनी थी। म्यूज़िक सिस्टम पर जगजीत सिंह की ग़ज़ल- “कभी खामोश बैठोगे कभी तुम गुनगुनाओगे” माहौल को और भी अधिक रोमानी कर रहा था। रश्मि भाभी ने अब मुँह मेरी तरफ कर लिया और अपना सीना मेरे सीने पर रख दिया।

वो मेरे गर्म होंठों का चुम्बन लेने के लिए अपने गालों, आँखों, नाक, माथे और ठोड़ी को मेरे होंठों के पास लाने लगीं। फिर उन्होंने अपने गुलाब की पंखुड़ियों जैसे कोमल होंठों को मेरे होंठों पर रख दिया। उनकी बाहें मेरे गले में थीं। मैंने भी उन्हें उनकी बाहों के नीचे से हाथ डालकर उन्हें जकड़ रखा था।

मेरे हाथ उनकी पीठ पर थे। मैं अपनी उँगलियों से उनकी पीठ को मसल रहा था। रश्मि भाभी उत्तेजित हो रही थीं। अब वो मुझे चूमने लगीं। मेरे चेहरे, गले, छाती सब तरफ। मैं भी उत्तेजित होने लगा था। मेरे हाथ अनायास ही रश्मि भाभी के सीने पर चले गए और मेरी उँगलियों ने उनसे खेलना शुरू कर दिया। रश्मि भाभी मचल रही थीं।

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कुछ देर तक उनके सीने को मसलता रहा, फिर मैंने उनकी पीठ पर हाथ रखा और कुर्ते पर पीछे की ओर लगे चेन को खींच दिया। कुर्ता पीठ की ओर आधा खुल चुका था। मैंने उसमें अपना हाथ डाल दिया और उनकी पीठ पर हाथ फेरने लगा। रश्मि भाभी ने मुझे रोका, उठकर खड़ी हुईं।

और अपना कुर्ता खुद ही उतारकर पलंग पर रख दिया। अब वो अपना हाथ पीछे की ओर ले जाकर अपने ब्रा के हुक खोल दिए और अपने मचलते सीने को मेरे सामने कर दिया। यह देखकर मैंने भी अपनी शर्ट उतार दी। अब मेरे और रश्मि भाभी के शरीर का ऊपरी हिस्सा बिल्कुल नग्न अवस्था में एक-दूसरे के सामने था। ये कहानी आप हमारी वासना डॉट नेट पर पढ़ रहे है.

मैंने रश्मि भाभी की पीठ पर अपना सीना रखा और पीछे से उन्हें अपनी बाहों में भर लिया। उनके दोनों वक्ष मेरे दोनों हाथों में थे। जिनसे मेरी उँगलियाँ कलात्मकता के साथ अपना खेल दिखा रही थीं। मेरे होंठ उनके गले को चूम रहे थे। रश्मि भाभी भी अपना सिर घुमा-घुमाकर अपने गले के हर हिस्से पर मेरा चुम्बन ले रही थीं।

म्यूज़िक सिस्टम पर गुलाम अली खान साहब की ग़ज़ल “ऐ हुस्न बेपरवाह तुझे शबनम कहूँ शोला कहूँ” माहौल को रंगीन बनाए हुए थी। अब रश्मि भाभी ने अपने सीने से मेरे हाथों को हटाकर मुझे बिस्तर पर गिरा दिया और खुद मेरे ऊपर लेट गईं। मैंने रश्मि भाभी की आँखों में देखा- उनकी लाल सुर्ख कामुक निगाहें। उनका यह रूप मैं पहली बार देख रहा था।

भाभी ने अपने कड़े हो चुके दो निप्पल्स को मेरे पूरे शरीर पर फेरने लगीं, फिर अपने दाहिने निप्पल को मेरे मुँह के पास लाया जिसे मैंने भूखे भेड़िये की तरह खा से अपने मुँह में ले लिया तथा अपने होंठ, जीभ और दाँतों से उसे चूसने लगा। रश्मि भाभी के मुँह से हल्की-हल्की सिसकारियाँ निकल रही थीं जो मुझे और भी उत्तेजित कर रही थीं।

मेरे हाथ रश्मि भाभी के बाएँ उरोजों पर थे जिस पर मेरी उँगलियाँ अपना कमाल दिखा रही थीं। अब उसने अपने बाएँ निप्पल को मेरे मुँह में डाला और दाहिने उरोजों को मेरे हाथ में दे दिया। इस तरह बारी-बारी से मैं उनके दोनों उरोजों को मसलता, सहलाता, दबाता रहा।

अब रश्मि भाभी के सब्र का बाँध टूट चुका था। उनके हाथ मेरी पैंट के हुक तक चले गए और उसने मेरी पैंट के बटन खोल दिए और उसे नीचे सरकाने की कोशिश करने लगी। मैंने अपने कमर को उठाया तो उसने मेरी पैंट नीचे सरका दी। उतावलेपन में उसने मेरी पैंट के साथ-साथ मेरी चड्डी भी उतार दी। अब मैं बिल्कुल नग्न अवस्था में उनके सामने पड़ा था।

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“माय गॉड!” उनके मुँह से निकला। दरअसल वो मेरे पत्थर की तरह सख्त हो चुके लंबे चौड़े शिश्न को देखकर रोमांचित हो उठीं। उसने मेरे शिश्न को अपनी कोमल हथेलियों में लेकर उससे खेलना शुरू कर दिया। मैं चीहुक उठा। वो मेरे पैरों के बीच बैठ गईं और झुककर मेरे शिश्न को अपने मुँह में ले लिया, और उसे चूसने लगीं।

मैं तड़पने लगा और बार-बार अपने नितंबों को ऊपर उठा-उठाकर अपने शिश्न को उनके मुँह के और भी अधिक अंदर डालने का असफल प्रयास करता रहा। दरअसल मेरा शिश्न अधिक लंबा होने के कारण उसके मुँह में पूरा जा नहीं रहा था। इसी कोशिश में शायद एक बार मेरा शिश्न उसके गले तक पहुँच गया था।

जिससे उसे उबकाई आ गई। मैंने अपने आप को नियंत्रित किया। मेरे भी सब्र का बाँध टूट रहा था। मैं उठा और रश्मि भाभी को लिटा दिया। उनके सलवार के बंधन खोले। रश्मि भाभी ने खुद ही अपने दोनों हाथों से अपने सलवार और फिर पैंटी उतार दी। हम दोनों बिल्कुल नग्न हो चुके थे।

पर कैसेट खत्म हो जाने के कारण म्यूज़िक सिस्टम बंद हो चुका था। मैं उठा और पंडित रविशंकर की सितार पर बजाई हुई राग शिवरंजनी की धुन लगा दी जो तीन ताल में आबद्ध थी। मैं नग्न कामदेव, रश्मि भाभी नग्न रति। शास्त्रीय संगीत की धुन, पूरा माहौल कामशास्त्र के जीवंत चित्रण जैसा था।

मैंने रश्मि भाभी के जूड़े में लगा काँटा खींचा तो उनके लंबे, काले, घने, घुंघराले बाल फरफराकर खुल गए। बिल्कुल काम की देवी लगने लगी थीं वो। मैंने उनके नग्न शरीर को अपनी गोद में रखा और उनके पूरे शरीर पर अपनी उँगलियों से अपने एक खास अंदाज़ से खेलने लगा। ये कहानी आप हमारी वासना डॉट नेट पर पढ़ रहे है.

वो मेरी गोद में थीं। उसने अपना सिर ऊपर उठा रखा था। उसके बाल मेरी पीठ पर थे और मेरी उँगलियाँ संगीत की धुन पर उनके निर्वस्त्र जिस्म के हर अंग से पूर्ण लयबद्धता से खेल रही थीं। रश्मि भाभी तड़प रही थीं। मैं सुलग रहा था। अब मैंने रश्मि भाभी को पलंग पर सुला दिया।

और मैं उनके दोनों पैरों को फैलाकर उसके बीच घुटनों के बल बैठ गया। फिर मैंने अपने दोनों हाथों से उनके दोनों पैरों को उठाया तो उनका योनि द्वार खुल चुका था। मैंने उनके पैरों को अपनी पीठ पर रखकर उनके व्यास योनि में अपना मुँह लगाया और जीभ उसमें डाल दी।

मेरे दोनों हाथ उनके सीने से खेल रहे थे और मुँह योनि के भीतर बहुत भीतर तक कलाकारी कर रहा था। वो हल्की सिसकारियाँ ले रही थीं और अपने नितंबों को बार-बार ऊपर उठाकर मेरी मदद कर रही थीं। घुटे हुए स्वर में उनके कंठ से निकला- “आआइईईये नाााा।”

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मैं उठा। पलंग के एक सिरे पर उन्हें ऐसे सुलाया कि उनकी कमर तक पलंग पर थी और उससे नीचे का हिस्सा ज़मीन पर। मैं ज़मीन पर उनके दोनों पैरों के बीच खड़ा हो गया। फिर मैंने उनके दोनों पैरों को अपने हाथ में उठाकर दोनों ओर फैला दिया।

अब मेरा शिश्नमुंड और उनका योनि मुख दो आमने-सामने थे, एक-दूसरे से मुखातिब। दोनों एक-दूसरे के प्यासे। मैंने अपने शिश्नमुंड को रश्मि भाभी के योनि मुख पर रखा और धीरे से दबा दिया। शिश्नमुंड अंदर जा चुका था। अब मैंने शिश्नमुंड को योनि मुख तक बाहर निकाला और एक भरपूर प्रहार के साथ संपूर्ण शिश्न को उनकी योनि के बिल्कुल भीतर तक पहुँचा दिया।

रश्मि भाभी के मुँह से आनंद मिश्रित चीख निकल गई- “आह्ह!” मैंने फिर से अपने शिश्न को योनि मुख तक बाहर निकालकर जोर का प्रहार किया। रश्मि भाभी ऊपर की ओर सरक गईं। मैंने अपने दोनों बाजुओं से उनकी जाँघ को अपने सीने से लगाया जिससे मेरे प्रहार से वो ऊपर की ओर न उठ सकें।

अब मैं संगीत के ताल पर अपने शिश्न को उनकी योनि के अंदर-बाहर करने लगा। शास्त्रीय संगीत की धुन, रश्मि भाभी की आह और मेरे शिश्न के प्रहार की आवाज़- फुक, फुक, फुक- सब साथ-साथ चल रहे थे। कुछ देर तक ऐसा करने के बाद मैंने अपना शिश्न बाहर निकाला और रश्मि भाभी को बिस्तर पर लेटा दिया।

मैंने अब उन्हें बाएँ करवट सुलाया और उनके बाएँ जाँघ पर बैठकर उनके दाहिने जाँघ को अपने कंधे पर रखा। अब उनकी योनि एक विशेष मुद्रा में मेरे शिश्न के सामने थी। मैंने फिर वैसे ही अपने शिश्नमुंड को उनके योनि द्वार पर रखकर धीरे-धीरे पूरा शिश्न अंदर डाल दिया।

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पहले तो धीरे-धीरे अंदर-बाहर करता रहा। फिर स्पीड बढ़ा दी। चूँकि मेरा शिश्न एक अलग कोण से रश्मि भाभी की योनि के अंदर-बाहर हो रहा था इसलिए शायद उन्हें अलग प्रकार का आनंद आ रहा था। क्योंकि अब वो पहले से ज़्यादा प्रतिक्रिया व्यक्त कर रही थीं। ये कहानी आप हमारी वासना डॉट नेट पर पढ़ रहे है.

शास्त्रीय संगीत द्रुत लय पर था। मैंने भी अपनी स्पीड बढ़ा दी थी। रश्मि भाभी ने एक हाथ से चादर को मरोड़ना शुरू कर दिया था, दूसरे हाथ से मुझे नोच रही थीं। मेरी स्पीड भी बढ़ती जा रही थी। और फिर एक लंबी गरजना के साथ अपने भीतर की सारी शक्तियों को गाढ़े द्रव के रूप में अपने शिश्न मार्ग से रश्मि भाभी की योनि के बहुत भीतर तक स्खलित कर दिया। और निढाल हो गया।

शास्त्रीय संगीत थम चुका था। एक तरफ मेरी प्यारी रश्मि भाभी नग्न अवस्था में और दूसरी तरफ मैं बिल्कुल नग्न पलंग पर पड़े हुए थे। चिड़ियों की चहचहाने की आवाज़ से मेरी नींद खुली। मैंने रश्मि भाभी को जगाया। वो उठीं, पहले मेरी तरफ, फिर अपनी ओर देखीं, शरमाईं, मुस्कुराईं, फिर अपने कपड़े पहनने लगीं।

वहीं पास रखे हुए मेरे कपड़ों को उठाकर शरारत भरे अंदाज़ से मेरी ओर फेंका। मैं मुस्कुराते हुए अपना कपड़ा पहना। फिर उन्हें बाहर तक विदा कर आया। जाते-जाते वो मुझे अपनी बाहों में भरकर मेरे माथे पर एक आत्मीय चुम्बन जड़ दिया। पाँव फटने ही वाली थी। मैं आकर अपने कमरे में सो गया।

सुबह उठा। 8 बज चुके थे। अपने कमरे की हालत पर निगाह डाली, जो रात की कहानी खुद बयान कर रहे थे। मैंने सबसे पहले अपने कमरे को व्यवस्थित किया, फिर नहाया और रश्मि भाभी के यहाँ चला गया। वो भी व्यवस्थित हो चुकी थीं। अपने खास अंदाज़ से मेरी ओर देखा, मुस्कुराईं, पूछा- “चाय पिएँगे?” मैंने हामी भरी। चाय पी। सब कुछ सामान्य था। जैसे रात में कुछ हुआ ही न हो।

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उसके बाद तीन दिन तक रश्मि भाभी रोज़ आती रहीं, रात में और हम रात भर अपनी उन्मुक्त काम कलाओं की पराकाष्ठाओं तक एक-दूसरे को सुखद अनुभूति से सराबोर करते रहे। पाँचवें दिन भैया आ गए। उन्होंने सुसंवाद दिया कि उनका ट्रांसफर हो गया है और सात दिन के भीतर उन्हें नई जगह पर जॉइन करना है। देखते-देखते सात दिन बीत गए। मैंने उनके सामान पैकिंग करने में मदद की। गाड़ी आ चुकी थी। रश्मि भाभी के आँखों का इशारा पकड़ मैं अपने कमरे में गया। पीछे-पीछे भाभी भी आ गईं।

उन्होंने मेरे दोनों हाथों को अपनी हथेलियों में लेकर उस पर एक चुम्बन जड़ दिया। उनकी आँखें डबडबाई हुई थीं। मेरी भी। भैया के पुकारने पर रश्मि भाभी चली गईं। जाने का समय हो गया था। सब गाड़ी पर बैठ चुके थे। मैंने हाथ हिलाकर डबडबाई हुई आँखों से उन्हें विदा किया और जाते हुए गाड़ी को तब तक देखता रहा जब तक वो आँखों से ओझल न हो गई। अपने कमरे में आया और फुफक-फुफक कर रोने लगा। बाद में मुझे पता चला कि अमरेश भैया का ट्रांसफर पहले ही हो चुका था और रश्मि भाभी को मालूम था कि 15 दिन के भीतर वो लोग चले जाएँगे। 

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